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आज की बृज रस धारा

🌹🌹आज की ब्रज रस धारा 🌹🌹

दिनांक 10/01/2018

मीरा चरित्र – आली म्हाँने लागे वृन्दावन नीको


मीरा का आवास स्थान सेवाकुन्ज के समीप ही गली में ही था।सेवाकुन्ज तो स्वयं सिद्ध पीठ है मानो तो जैसे वृन्दावन का ह्रदय , प्रियालाल जी की नित्य रास स्थली। फिर पास में श्री यमुना महारानी जो प्रियालाल जी की नित्य रसकेलि की चिर साक्षी है। चारों तरफ़ मन्दिर ,सत्संग – मीरा का उत्साह तो पल पल में उफ़ान ले रहा था। वह किसी दूसरे ही जगत में थी। वृन्दावन वास के दिवा निशि भी इस जगत के कहाँ थे ? मीरा को कुछ खाने पीने की भी सुध कहाँ थी ? पर हाँ ….उसकी आत्मा अवश्य पुष्ट हो रही थी।मीरा की ऐसी स्थिति में अन्दर बाहर का सारा कार्य दासियाँ ही संभाल रही थी। चमेली बाई अपने पति शंकर और केसर बाई अपने पति केशव को साथ लेकर वृन्दावन के लिए प्रस्थान करते समय मीरा के पीछे चल दी थी।चमेली के कोई सन्तान नहीं थी और केसर ने अपना एकमात्र पुत्र गोमती को सौंपा। जब केसरबाई स्वामिनी के पीछेपीछे चली तो केशव भी चला आया। मीरा ने जब केसर के पुत्र गोविन्द को माँ के लिए रोते देखा तो केसर से लौट जाने को बहुत आग्रह किया।पर केसर ने हाथ जोड़ कर निवेदन किया -” माँ बाप ने सरकार के विवाह के समय मुझे इन चरणों में सौंपा था। सेवा में पटु न होने पर भी ऐसा क्या महान अपराध बन पड़ा हुकम कि इस दासी को आप अनाथ कर रही है ? बस एक अनुरोध है , वृन्दावन में आप जहाँ भी रहेंगी – मैं आपके दूर से ही दर्शन कर लिया करूँगी। बस , इतनी नियामत बख्शें आप इस किंकरी को !”

चमेली ने भी कहा ,” –  वहाँ तो सब सीधे सीधे मिलेगा नहीं। चम्पा श्री चरणों की सेवा करेगी , तो मैं और केसर लकड़ी लाना , आटा पीसना , कपड़े धोना , बर्तन मांजना बुहारी लगाना आदि कार्य संभाल लेंगी। इतना जीवन आपकी सेवा में बीता है तो बाकी का क्यों अभिशाप बनें ?” मीरा दोनों की सेवाभावना से निरूत्तर हो गई ।चम्पा ने विवाह किया ही नहीं था। वह मीरा की दासी ही नहीं , अंतरंग सखी भी थी , उसके भावों की वाहिका,अनुगामिनी ,अनुचरी । कभी कभी जब अंतरंग भावों की चर्चा होती तो उसके भावों की उत्कृष्टता देखकर मीरा चकित हो उठती। चम्पा से मीरा को स्वयं चिन्तन में सहायता मिलती। वे पूछती,” चम्पा ! कहाँ से पा गई तू यह रत्नकोष?”वह हँसती -” सब कुछ इन्हीं चरणों से पाया है सरकार ! और किसी को तो जानती नहीं मैं !!”कथा, सत्संग, मन्दिरों के दर्शन , भजन , कीर्तन नृत्य आदि का उल्लास और उत्साह ऐसा था कि मानों परमानन्द सागर में डुबकी पर -डुबकी लग रही हो। मीरा की भजन ख्याति वृन्दावन में फैलने लगी थी। जिसने भी सुना , वही दौड़ा दौड़ा आता। आकर कोई तो प्रणाम करता और कोई आशीर्वाद देता। ब्रज के संतों से विचार-विनिमय और भाव चर्चा करके मीरा तीव्रतापूर्वक साधन सोपानों पर चढ़ने लगी। यद्यपि मीरा स्वयं सिद्धा संत थी , पर यहाँ इस पथ में भला इति कहाँ है?मीरा का मन पूर्णतः वृन्दावन में रच बस गया था। उसे कभी स्मरण भी नहीं होता कि वह प्रारम्भ से यहाँ नहीं थी। उसे वृन्दावन भा गया था और वहाँ की सात्विकता और घर घर में सहज़ और स्वभाविक भक्ति देख उसका मन उल्लास से गा उठता……….
आली म्हाँने लागे वृन्दावन नीको ।
घर घर तुलसी ठाकुर पूजा दरसण गोविन्दजी को ॥
निरमल नीर बहे जमुना को भोजन दूध दही को।
रतन सिंघासण आप विराज्या मुकट धर्यो तुलसी को॥
कुंजन कुंजन फिरूँ साँवरा सबद सुणत मुरली को।
मीराँ रे प्रभु गिरधर नागर भजन बिना नर फीको॥

          “श्री श्याम सुन्दर गोस्वामी जी “

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