News

आज की बृज रस धारा पढ़ें

??आज की ब्रज रस धारा ??

दिनांक 04/01/2018

मीरा चरित्र – चित्तौड़ से मेड़ता वापसीक्रमशः से आगे ……….

संवत १५९१ वैशाख मास ( 1534 ) में सदा के लिए चित्तौड़ छोड़कर मीरा मेड़ते की ओर चली ।एक दिन भोजराज के दुपट्टे से गाँठ जोड़कर इसी वैशाख मास में गाजे -बाजे के साथ वे इस महल की देहली पर पालकी से उतरी थी। आज सबसे मिलकर इस देहली से विदाई ले रही है।ये वे महल-चौबारे थे , जहाँ उसने कई उत्सव किए थे , जहां उसके गिरधरलाल ने अनेक चमत्कार दिखाये थे , जहाँ उसके प्रिय सखा कलियुग में द्वापर के भीष्म से भी अधिक भीषण प्रतिज्ञा का पालन करने वाले महाभीष्म भोजराज ने देह छोड़ी थी और जहाँ विक्रमादित्य ने उसके विरुद्ध कई षडयन्त्र रचायें थे ।एकबार भरपूर नज़र से उसने सबको देखा ,उस कक्ष में जहाँ भोजराज विराजते थे ….वे वहाँ जाकर खड़ी हो गई। पंचरंगी लहरिये का साफा , गले में जड़ाऊ कण्ठा-पदक  पहने ,कटार -तलवार बाँधे , हँसते – मुस्कराते भोजराज मानों  उसके सम्मुख खड़े हो गये थे।मीरा की आँखें भर आई -“ सीख बख्शाओं, महाराजकुमार ! विदा , विदा मेरे सखा ! मेरे सुदृढ़ कवच ! मुझसे जो भूलें , जो अपराध हुये हों , उनके लिए मैं क्षमा याचना करती हूँ। ” कहते हुये मीरा ने मस्तक धरती पर रख भोजराज को प्रणाम किया-” मैं अभागिनी आपको कोई सुख नहीं पहुँचा सकी, कोई सेवा नहीं कर सकी।अपने गुणों और धीर – गम्भीर स्वभाव से आपने जो मेरी सहायता की और सदा ढाल बनकर रहे  , जो भीष्म प्रतिज्ञा आपने की और अंत तक उसे निभाया , उसके बदले मैं अकिंचन आपको क्या नज़र करूँ ? किन्तु हे मेरे सखा ! मेरे स्वामी सर्व समर्थ है। वे देंगे आपको अपनी इस दासी की सहायता का प्रतिफल। आपका मंगल हो…आप जहाँ भी है ….मेरा आपको प्रणाम “उसने आसुँओं से भरी आँखों से पुनः धरती पर प्रणाम किया।

बहुत देर से चम्पा स्वामिनी को यूँ भावुक हो रोते हुये देख रही थी-” बाईसा हुकम ! नीचे पालकी आ गई है , सबसे मिलने पधारें ।आँसू पौंछकर मीरा उस कक्ष से बाहर आ गई ।आवश्यक सामान और गिरधर की पोशाकें आभूषण सब गाड़ियों पर लदकर जा चुका था। मीरा के जो सेवक और दासियाँ जो चित्तौड़ में ही पीछे रह रहे थे , उनके लिए द्रव्य और जीविका का प्रबन्ध कर दिया था। सभी मन ही मन जानते थे कि अब मीरा वापस चित्तौड़ की ओर मुख न करेगी -सो उसके प्रियजनों के प्राण व्याकुल थे।मीरा अपनी सासों और गुरूजनों की चरणवन्दना करने पधारी। सब उसे भारी मन से मिले। धनाबाई सास तो उसे ह्रदय से लगा बिलख पड़ी तो मीरा ने उन्हें आश्वस्त किया। हाड़ी जी ( विक्रमादित्य की माता ) को मीरा ने प्रणाम कर अपने अन्जाने में अपराधों के लिए क्षमा माँगी।हाँडीजी बोली ,” पहले मैं समझती थी कि तुम जानबूझ कर हम सबकी अवज्ञा करती हो बीनणी ! किन्तु बाद में मैं समझ गई कि भक्ति के आवेश में तुम्हें किसी का ध्यान नहीं रहता। तुमसे पल्ला फैला एक भिक्षा माँगती हूँ…….दोगी ? हमारे किए अपराधों को मन में …………..”मीरा ने स्नेह से सास का पल्ला हटाकर उनके दोनों हाथ पकड़कर माथे से लगाते हुये बोली ,”-  ये हाथ किसी के सामने फैलाने के लिए नहीं बने है ये हाथ आश्रितों पर छत्रछाया करने और मुझ जैसी अबोध को आशीर्वाद देने के लिए बने है। यह चित्तौड़ की जननी के हाथ है , आपके ऐसा करने से आपके राजमाता के पद का अपमान होता है ।” नहीं !मुझे कहने दो बीणनी !” कहते कहते हाड़ी जी की आँखों से आँसू बहने लगे ।” नहीं हुकम ! कुछ मत फरमाइये आप। मेरे मन में कभी किसी के लिए रोष नहीं आया। मनुष्य अपने कर्मों का ही फल भोगता है। दूसरा कोई भी उसे दुख यां सुख नहीं दे सकता , यह मेरा दृढ़ विश्वास है । आप निश्चिंत रहे। भगवान कभी किसी का बुरा नहीं करते ।उसके विधान में सबका हित , सबका मंगल ही छिपा होता है ” मीरा ने स्नेह से सास को ह्रदय से लगाया तथा प्रणाम कर चलने की आज्ञा माँगी।मीरा का लक्ष्य उसे अपनी तरफ़ पुकार रहा था। वह धीरे धीरे पिछलें रिश्तों को सम्मान देकर आगे बढ़ने लगी……… उसके ह्रदय में कहीं दूर से एक ही संगीत ध्वनि सुनाई दे रही थी ……………चालाँ वाही देस………..

          “श्री श्याम सुन्दर गोस्वामी जी “

Share it on

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Shree Ji Barsana Mandal Trust (SJBMT)

counter