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आज की बृज रस धारा पढ़ें

??आज की ब्रज रस धारा ??

दिनांक 05/01/2018

मीरा चरित्र – अपने लक्ष्य की ओर एक और पग

मीरा राजमाता जी के महल से निकल दास दासियों को यथायोग्य अभिवादन करती पालकी में आ बैठी ।सब मुक्त कण्ठ से मीरा की प्रशंसा कर रहे थे। तभी ननद उदयकुँवर बाईसा उसके चरणों से आकर लिपट गई तो मीरा ने उसे ह्रदय से लगा आश्वस्त किया ” भाभी म्हाँरा ! मैं आपकी हूँ , आप मुझे भूल मत जाइयेगा। मेरे ठाकुर जी तो आप ही हो। मैं किसी और को नहीं जानती ” रोते रोते उदा ने कहा।धैर्य रखिये। आप म्हाँरा और म्हूँ आपरी हूँ बाईसा। थाप मारने से पानी अलग नहीं हो जाता। पर मनुष्य की शक्ति कितनी ? -आप उस सर्व समर्थ ठाकुर जी पर विश्वास कीजिए , उनके चरणों में मन लगाईये , उसके नाम का आश्रय लीजिए” मीरा ने समझाया। उदयकुँवर मुँह ढाँप कर जैसे ही एक तरफ़ हुई तभी कुमकुम आकर मीरा के चरणों में पड़ गई ।उसकी आँखों से झरता जल मीरा के पाँव पखारने लगा। उठो , तुम पर तो बहुत कृपा की है प्रभु ने ।अपनी दृष्टि संसार और इसके सुखों की ओर नहीं , प्रभु की ओर रखना। मन के सभी परदे उनके सामने खोल देना। ह्रदय में उनसे छिपा कुछ रह न जाए , यह ध्यान रखना।मीरा की पालकी भोजराज के बनवाये हुये मन्दिर की ओर चली प्रभु के दर्शन कर जब वह प्रांगण में खड़ी हुईं तो उसे प्राण प्रतिष्ठा का वो दिन स्मरण हो आया जब वह भोजराज के साथ पूजा के लिए बैठी थी-” कैसा अनोखा व्यक्तित्व था भोजराज का ! लोगों के अपवाद , मुखर जिह्वायें उनके पलकें उठाकर देखते ही तालू से चिपक जाती थी ।

तन और मन की सारी उमंग, सारे उत्साह को मेरी प्रसन्नता पर न्यौछावर करने वाले हे महावीर नरसिंह ! प्रभु आपके मानव जीवन का चरम फल बख्शेंगें। ” उसे ज्ञात ही नहीं हुआ कि कब उसकी आँखों से नीर बहने लगा। आँसू पौंछ वे नीचे झुकी और प्रागंण की रज उठा मीरा ने सीस चढ़ाई -” कितने संतों , भक्तों की चरण रज है यह ।”जोशीजी ने मीरा को चरणामृत दिया तो उसने ठाकुर जी की पूजा सेवा का प्रबन्ध ठीक से रखने की प्रार्थना की। बाहर आते उसे नन्हें देवर उदयसिंह मिल गये तो उसे दुलार कर उसके सिर पर हाथ रखा। मन्दिर से मिले प्रसाद की कणिका मुख में रख थोड़ा उदयसिंह के मुख में डाला। बाकी प्रसाद उसकी धाय पन्ना राजपूत को दे कर कहा ,” बड़े से बड़ा मूल्य चुका कर भी इस वट बीज की रक्षा करना। कल यह विशाल घना वृक्ष बनकर मेवाड़ को छाया देगा।ब्राह्मणों को दान, गरीबों को अन्न वस्त्र दे मीरा पालकी में सवार हुई -मानों चित्तौड़ का जीवंत सौभाग्य विदा हो रहा हो। कुछ स्त्रियाँ विदाई के गीत गाती साथ चली पर मीरा ने सबको समझा बुझा कर लौटाया । महराणा और उमराव नगर के बाहर तक पहुंचाने पधारे। सवारी ठहरने  पर महराणा विक्रमादित्य पालकी के समीप पहुंचे। हाथ जोड़कर वह झुके और बोले;” खम्माधणी ! मीरा ने हँसकर हाथ जोड़े;“सदा के लिए विदा दीजिये अपने इस खोटी भौजाई को। अब ये आपको कष्ट देने पुन: हाज़िर नहीं होगी। मुझसे जाने अन्जाने में जो अपराध बने हो, उनके लिए क्षमा बख्शावें महाराणा घबराकर बोल उठे,”ये क्या फरमाती है भाभी म्हाँरा ! कुल कान की खातिर, जो कुछ कभी कभार अर्ज कर देता था, उसके लिए मुझे ही क्षमा मांगनी चाहिए ।” भगवान आपको सुमति बख्शे !” मीरा ने हाथ जोड़े -” मेरे मन में कभी आपका कोई कार्य अथवा बात अपराध जैसी लगी ही नहीं ।फिर माफी कैसी लालजीसा ! यह राज जैसे अन्नदाता हुकम चलाते थे, वैसे ही आप भी चलायें ,यही सब की कामना है।मुकुन्द दास और श्यामकुँवर ने भी सबसे विदा ली। मीरा की कुछ दासियाँ सपरिवार साथ थी हीं। जो साथ नहीं चल सकते थे, जिनकी जड़े अब चित्तौड़ में जम चुकी थी ,उन्हें मीरा ने स्नेह से समझा कर वापिस भेजा। किन्तु संतों और यात्रियों की टोली तो साथ ही चली।मीरा चित्तौड़ से अपना मन सदा के लिये उधेड़ कर अपने लक्ष्य की ओर पग बढ़ा चुकी थी। उसके जीवन का एक और अध्याय रचने जा रहा था। उसके मन में अपूर्व प्रसन्नता थी …..उसे दूर से वही संगीत लहरी सुनाई दे रही थी……………चाला वाही देस………..

          “श्री श्याम सुन्दर गोस्वामी जी “

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