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आज की बृज रस धारा पढ़ें

??आज की ब्रज रस धारा ??

दिनांक 06/01/2018

मीरा चरित्र – जिन भेषाँ मेरो साहिब रीझो सो ही भेष धरूँगी

तीस वर्ष की आयु में मीरा ने चित्तौड़ का परित्याग करके पुनः मेड़ता में निवास किया। उसके हितैषी स्वजनों , चाकरों और दासियों को मानों बिन माँगे वरदान मिला। हर्ष और निश्चिन्तता से उनके आशंकित – आतंकित मन खिल उठे। मेड़ते का श्यामकुन्ज पुनः आबाद हुआ। कथा -वार्ता , उत्सव और सत्संग की सीर खुल गई।मेड़ता का श्याम कुन्ज उत्सव और सत्संग की उल्लास भरी उमंग से एकबार पुनः खिलखिला उठा। किन्तु मीरा के गिरधर गोपाल की योजना कुछ और ही थी । उसके प्राणधन श्यामसुन्दर को अपनी प्रेयसी का अपने धाम से दूर रहना नहीं सुहाता था। मीरा ने चित्तौड़ छोड़ दिया ,केवल इतने मात्र से वे संतुष्ट नहीं थे। वे इकलखोर देवता जो ठहरे। उन्हें चाहने वाला दूसरों की आस करे, यह वे तनिक भी सह नहीं पाते। लेना -देना सब का सब पूरा चाहिए उन्हें। जिसे उन्होंने अपना लिया , उसका और कोई अपना रहे ही क्यों ? बस ठाकुर जी की इच्छा से राजनैतिक परिस्थितियाँ करवट बदलने लगी।मीरा के चित्तौड़ त्याग के बाद बहादुरशाह ने चित्तौड़ पर आक्रमण कर दिया। राजपूत वीरों ने घमासान युद्ध किया पर सफलता नहीं मिल पाई। इस युद्ध में बत्तीस हज़ार राजपूत वीरगति को प्राप्त हुये और तेरह हज़ार स्त्रियाँ राजमाता हाड़ीजी के साथ जौहर की ज्वाला में कूदकर स्वाहा हो गई। इन्हीं बीच पासवान पुत्र वनवीर की राज्य -लिप्सा बढ़ चली और उसने एक रात महाराणा विक्रमादित्य को तलवार से मार डाला ।राज्य को अकंटक बनाने की लोलुपता में वह वनवीर तो महाराणा के छोटे भाई उदयसिंह को भी मार डालना चाहता था , परन्तु पन्ना धाय ने अपने पुत्र की बलि देकर उदयसिंह के प्राणों की रक्षा की।उधर मेड़ता की स्थिति भी अच्छी नहीं थी ,उसपर भी भीषण विपत्ति टूट पड़ी। मीरा को मेड़ता आये हुये अभी दो वर्ष ही हुये थे कि  जोधपुर के मालदेव ने मेड़ता पर चढ़ाई कर दी। सामन्तों के समझाया ,” परस्पर में व्यर्थ का संघर्ष उचित नहीं। जब उनका आवेश शांत हो जायेगा , तब हम सब लोग उन्हें समझा कर आपको मेड़ता वापिस दिलवा देंगे। ” सरल ह्रदय वीरमदेव जी उन सामन्तों पर विश्वास करके मेड़ता  छोड़ अजमेर आ गये -और वहाँ से नराणा तथा फिर पुष्कर। भाग्य की रेखाएँ वक्र थी जो उनको ज़गह ज़गह भटकना पड़ रहा था। मीराबाई भी परिवार के साथ ही थी।

सन् 1595 में पुष्कर में निवास करते समय मीरा के चिन्तन में मोड़ आया। प्रेरणा देनेवाले भी वही जीवन अराध्य गोपाल ही थे। मीरा सोचने लगी कि दर दर ठोकर खाने की अपेक्षा यही उचित है कि अपने प्राण प्रियतम के देश वृन्दावन में वास किया जाए। उसे मन ही मन बड़ी ग्लानि हो रही थी कि ऐसा निश्चय वे अब तक क्यों नहीं कर पाई। कुछ सैनिकों और अपनी दासियों के साथ वह तीर्थ यात्रियों की टोली  के संग वृन्दावन की तरफ़ चल पड़ी ……..”चाला वाही देस” की संगीत लहरियाँ उसके ह्रदय में हिलोर लेने लगी- आज उसका एक एक स्वप्न साकार रूप लेने को तैयार था। वह बार बार वृन्दावन नाHम का उच्चारण मन ही मन करते पुलकित हो उठती ….. उसकी भावनाओं को पंख से लग गये थे ……वह आज अपने प्रियतम  गिरधरलाल के देस जा रही थी और उनके लिए आज उनकी बैरागन बनना ही उसका सौभाग्य था

 व्हाला मैं बैरागन हूँगी…….
जिन भेषाँ मेरो साहिब रीझो सो ही भेष धरूँगी॥
कहो तो कसूमल साड़ी रँगावाँ,
कहो तो भगवा भेस  ॥
कहो तो मोतियन माँग पुरावाँ ,
कहो छिटकावा केस  ॥
मीरा के प्रभु गिरधर नागर ,
सुणज्यो बिड़द नरेस  

          “श्री श्याम सुन्दर गोस्वामी जी “

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