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आज की बृज रस धारा पढ़ें

??आज की ब्रज रस धारा ??

दिनांक 09/01/2018

मीरा चरित्र – ले लेहु री कोउ स्याम सलोना

ब्रज की सीमा पर पहुँच कर यात्रा रोक देनी पड़ी ।मीरा धरा पर लोट ही गई।  अपना घर…….अपना देस देखते ही उसके संयम के बाँध टूट गये। विवेक तो जैसे प्रेम से प्रताड़ित होकर कहीं जा दुबका। आँखों से बहती गंगा -यमुना ब्रजभूमि का अभिषेक करने लगी। सारी देह धूलि धूसरित हो उठी।थोड़ी देर तक मीरा को दासियों ने कठिनाई से सम्भाला ।सन्धया होते होते सबने वृन्दावन में प्रवेश किया। मीरा और उसके दास दासियाँ यात्री दल से यहाँ से पृथक हो गये और वृन्दावन में प्रथम रात्रि वास उन्होंने श्री श्यामसुन्दर की लीला स्थली  ब्रह्म कुण्ड पर किया।ब्रह्म कुण्ड पर वह रात्रि पर्यन्त निरन्तर अस्पष्ट कण्ठ से अपने प्राणप्रियतम को पुकारती , निहोरा करने लगी। बहुत प्रयत्न करने पर भी वह प्रकृतिस्थ नहीं हुईं। किसी प्रकार भी उन्हें दो कौर अन्न और दो घूँट पानी नहीं पिलाया जा सका। अपनी प्रेम दीवानी स्वामिनी को घेरकर दासियाँ सारी रात संकीर्तन करती रही।चम्पा ने किसी को डाँटकर तो किसी को प्यार से भोजन करने को समझाया -“चाहे मन हो याँ न हो पर स्वयं को सेवा के लिये स्वस्थ रखने के लिए हमें इस देह को पुष्ट रखना  है। अन्यथा हमारा सेवक धर्म कलंकित होगा। “

प्रातः होते ही मीरा ने यमुना -स्नान की रट लगा ली। यमुना अभी दूर है , कहकर उन्हें पालकी पर चढ़ाया गया। चम्पा साथ बैठी। लेकिन मीरा के ह्रदय में इतनी त्वरा थी कि बैठे रहना उसे सुहा नहीं रहा था। वह ज़िद कर फिर उतर पड़ी-” कि निज घर में भी कोई पालकी में सवार होता है भला ? ब्रजरज का तो जितना हम स्पर्श पाये उतना ही हमारा सौभाग्य है वृन्दावन धाम !!! यह तो है ही प्रेम -परवश प्राणों का आधार , उनके ह्रदय सर्वस्व की लीलास्थली , रसिकों का निवास -स्थल। दूर दूर से प्यासे प्राण इस लीलाधाम को ताकते हुये चले आते है। बड़े बड़े राजाओं के मुकुट यहाँ धूल में लोटते नज़र आते है। महान दिग्विजयी विद्वान रजस्नान करके वृक्षों से लिपटकर आँसू बहाते हुये दिखते है। कहीं नेत्र मूँदे हुये आँसू बहाते , प्रकम्पित पुलकित देह, किसी घाट पर याँ किसी वृक्ष की छाया में, याँ किसी एकान्त कुटिया में प्रेमी जन लीला दर्शन सुख में निमग्न है ।जिस वृन्दावन की महिमा महात्मय के  वर्णन में स्वयं ब्रजराजकिशोर अपने को असमर्थ पाते है , उसे मैं मूढ़ शुष्क ह्रदय कैसे कहूँ ?सेवाकुन्ज के पीछे की गली में एक घर लेकर दो सेवकों और तीन दासियों के साथ मीरा रहने लगी। यद्यपि वह प्रारम्भ से ही नहीं चाहती थी कि वृन्दावन यात्रा में कोई भी उसके साथ आये , पर जिन्होंने अपनी ज़िंदगी की डोर उसके चरणों में उलझा दी थी , उन्हें वह कैसे पीछे छोड़ आती ?वृन्दावन में मीरा का मन पहले से ही रमा हुआ था। फिर भक्ति में स्वछन्दता , किसी भी तरह की व्यवहारिकता से परे का वातावरण ,कोई बन्दिश नहीं मानों मीरा की प्रेम भक्ति को उड़ने के लिये विस्तृत आकाश मिल गया हो। उसे वृन्दावन में हुई ठाकुर जी की लीलाओं की स्मृति अनायास ही हो आती-कभी   ठाकुर की गोपियों से छेड़छाड़ की लीला तो कभी माधुर्य भाव की लीला ।वह  उन भावों को संगीत में स्वभाविक ही  बाँध देती………..
या ब्रज में कछु देख्यो री टोना ॥
ले मटकी सिर चली गुजरिया ।
आगे मिले बाबा नन्द जी के छोना॥
दधि को नाम बिसरि गयो प्यारी।
“ले लेहु री कोउ स्याम सलोना ॥
बिंद्राबन की कुंज गलिन में।
आँख लगाय गयो मनमोहना ॥
मीरा के प्रभु गिरधर नागर।
सुन्दर स्याम सुघर रस लोना ॥

          “श्री श्याम सुन्दर गोस्वामी जी “

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