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आज की बृज रस धारा

??आज की ब्रज रस धारा ??

दिनांक 07/01/2018

मीरा के प्रभु गिरधर नागर चरण कँवल पर सीर

मीरा की अपने प्रियतम के देश ………अपने देश पहुँचने की सोयी हुई लालसा मानों ह्रदय का बाँध तोड़कर गगन छूने लगी। ज्यों ज्यों वृन्दावन निकट आता जाता था ,मीरा के ह्रदय का आवेग अदम्य होता जाता। कठिन प्रयास से वे स्वयं को थाम रही थी।उसके बड़े बड़े नेत्र आसपास के वनों में अपने प्राणआराध्य की खोज़ में इधर उधर चंचलता से परिक्रमा सी करने लगते। मानों वहीं कहीं श्यामसुन्दर वंशीवादन करते हुये किसी वृक्ष के नीचे खड़े दिख जायेंगे।मीरा बार बार पालकी, रथ रूकवाकर बिना पदत्राण ( खड़ाऊँ )  पहने पैदल चलने लगती। बड़ी कठिनाई से चम्पा , चमेली केसर आदि उन्हें समझा कर मनुहार कर के यह भय दिखा पाती कि अभ्यास न होने से वह धीरे चल रही है और अन्तःत साथ में चल रहे सब यात्रियों को असुविधा होती है। इसके बाद भी मीरा  पैदल चलने से विरत नहीं हो रही थी।  उनके पद छिल गये थे , उनमें छाले उभरकर फूट गये थे , किन्तु वह इन सब कष्टों से बेखबर थी। दासियों , सेवकों की आँखें भर आती। मीरा हँसकर उन सभी को अपनी सौगन्ध दे रथ पर याँ गाड़ी पर बैठा देती।
मीरा भजन गाती ,करताल बजाती चल रही है, किन्तु दासियों को केवल वह रक्त छाप दिखाई देती है,और उसके प्रत्येक पद पर उनके ह्रदय कराह उठते। जब उनकी यह पीड़ा असहनीय हो गयी तो चम्पा रथ से कूद पड़ी और स्वामिनी के चरणों से लिपट गयी।मुझसे जो भी अपराध हुए हों बाईसा हुकम ! इतनी कठिन सज़ा मत दीजिये कि अभागिनी चम्पा सह न सके। हम पर दया करें स्वामिनी …दया करें ………वह अचेत सी हो स्वामिनी के चरणों में लुढक गयी ।”क्या हुआ तुझे ?” कहती हुई मीरा  नीचे बैठ गयीं। चम्पा को  गोदमें भरकर उसके आंसू पोंछती बोली। अपने पदतल तो देखिए बाईसा हुकम !” चमेली ने जैसे ही मीरा के पाँव को छुआ मीरा की दर्द से हल्की सी कराह निकल गई।में तो ठीक हूँ पगली तुम क्यों घबरायीं? यदि कुछ हुआ भी तो सार्थक हुआ ये मांस पिंड , प्रभु के धाम की तरफ़ चलने से ।हानि क्या हुई भला?” हानि तो हमारी हुई है हुकम! हम अभागिनियों  को , जो सदा सेवा की अभ्यासी हैं उनको तो सवारी पर चढ़ने की आज्ञा हुईं और हमारी सुमन सुकुमारी स्वामिनी पांवों से चलें ,हम उनके घावों से रक्त बहता देखें और सवारी का सुख लें,इससे बड़ा दण्ड तो यमराज की शासन पुस्तिका में भी नहीं होगा” चम्पा के इस कथन के साथ ही सभी बरबस हो ज़ोर से रो पड़ी।

जो यात्री यह दृश्य देख रहे थे , वे भी अपने आँसू  रोक नहीं सके। रात होने पर , पड़ाव के खेमें में , जब चमेली मीरा के घायल तलवों पर औषध लेप लगाने लगी , तब भी मीरा का एक ही आग्रह था ,” जा ! अरे , यह सब छोड़ ! जा , ज़रा किसी यात्री से पूछकर तो आ कि वृन्दावन अब कितनी दूर रह गया है ?” वृन्दावन समीप जानकर एकदम से चलने को उद्यत हो उठती। जो यात्री पहले वृन्दावन गये थे ,उन्हें बुलवाकर दूरी पूछती , वहाँ के घाट ,वन और कुन्जों का विवरण पूछती , यमुना, गोवर्धन और मन्दिरों का हाल पूछती , वहाँ की महिमा कभी स्वयं बखान करती और कभी दूसरों के मुख से सुनती।सुबह , जब सब यात्रियों की टोली चली तो मीरा के पाँव मन की गति पा उड़ने से लगे। उसका पुलकित ह्रदय शब्दों में आनन्द उड़ेलने लगा ……………
चलो मन गंगा -जमना तीर ॥
गंगा जमना ,निरमल पाणी सीतल होत सरीर।
बंसी बजावत गावत कान्हो संग लियाँ बलबीर॥
मोर मुकुट पीतांबर सोहै कुण्डल झलकत हीर।
मीरा के प्रभु गिरधर नागर चरण कँवल पर सीर॥
कहीं एक साथ नदी ,पर्वत और वन देखती तो मीरा को वृन्दावन की स्फुरणा हो आती। वह गाती -नृत्य करती और प्रणिपात ( प्रणाम  ) करने लग जाती। दासियाँ पद -पद पर मीरा की संभाल करती। बहुत कठिनाई से समझा पाती -” बाईसा! अभी वृन्दावन थोड़ी दूर है…….!!!

          “श्री श्याम सुन्दर गोस्वामी जी “

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