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आज बृज में होली रे रसिया।
होरी रे रसिया, बरजोरी रे रसिया॥

अपने अपने घर से निकसी,
कोई श्यामल कोई गोरी रे रसिया।

कौन गावं केकुंवर कन्हिया,
कौन गावं राधा गोरी रे रसिया।

नन्द गावं के कुंवर कन्हिया,
बरसाने की राधा गोरी रे रसिया।

कौन वरण के कुंवर कन्हिया, 
कौन वरण राधा गोरी रे रसिया।

श्याम वरण के कुंवर कन्हिया प्यारे,
गौर वरण राधा गोरी रे रसिया।

इत ते आए कुंवर कन्हिया,
उत ते राधा गोरी रे रसिया।

कौन के हाथ कनक पिचकारी,
कौन के हाथ कमोरी रे रसिया।

कृष्ण के हाथ कनक पिचकारी,
राधा के हाथ कमोरी रे रसिया।

उडत गुलाल लाल भए बादल,
मारत भर भर झोरी रे रसिया।

अबीर गुलाल के बादल छाए,
धूम मचाई रे सब मिल सखिया।

चन्द्र सखी भज बाल कृष्ण छवि,
चिर जीवो यह जोड़ी रे रसिया।

ब्रज चौरासी कोस यात्रा / Braj Chaurasi Kos Yatra

  • वराह पुराण कहता है कि पृथ्वी पर 66 अरब तीर्थ हैं और वे सभी चातुर्मास में ब्रज में आकर निवास करते हैं। यही वजह है कि व्रज यात्रा करने वाले इन दिनों यहाँ खिंचे चले आते हैं। हज़ारों श्रद्धालु ब्रज के वनों में डेरा डाले रहते हैं।
  • ब्रजभूमि की यह पौराणिक यात्रा हज़ारों साल पुरानी है। चालीस दिन में पूरी होने वाली ब्रज चौरासी कोस यात्रा का उल्लेख वेद-पुराण व श्रुति ग्रंथसंहिता में भी है। कृष्ण की बाल क्रीड़ाओं से ही नहीं, सत युग में भक्त ध्रुव ने भी यही आकर नारद जी से गुरु मन्त्र ले अखंड तपस्या की व ब्रज परिक्रमा की थी।
  • त्रेता युग में प्रभु राम के लघु भ्राता शत्रुघ्न ने मधु पुत्र लवणासुर को मार कर ब्रज परिक्रमा की थी। गली बारी स्थित शत्रुघ्न मंदिर यात्रा मार्ग में अति महत्व का माना जाता है।
  • द्वापर युग में उद्धव जी ने गोपियों के साथ ब्रज परिक्रमा की।
  • कलि युग में जैन और बौद्ध धर्मों के स्तूप बैल्य संघाराम आदि स्थलों के सांख्य इस परियात्रा की पुष्टि करते हैं।
  • 14वीं शताब्दी में जैन धर्माचार्य जिन प्रभु शूरी की में ब्रज यात्रा का उल्लेख आता है।
  • 15वीं शताब्दी में माध्व सम्प्रदाय के आचार्य मघवेंद्र पुरी महाराज की यात्रा का वर्णन है तो
  • 16वीं शताब्दी में महाप्रभु वल्लभाचार्य, गोस्वामी विट्ठलनाथ, चैतन्य मत केसरी चैतन्य महाप्रभु, रूप गोस्वामी, सनातन गोस्वामी, नारायण भट्ट, निम्बार्क संप्रदाय के चतुरानागा आदि ने ब्रज यात्रा की थी।

??आज की “ब्रज रस धारा”??
दिनांक 31/12/2017

श्री जीव गोस्वामी(1513-1598), वृंदावन में चैतन्य महाप्रभु द्वारा भेजे गए छः षडगोस्वामी में से एक थे. उनकी गणना गौडीय संप्रदायके सबसे महान दार्शनिकों एवं सन्तों में होती है. उन्होने भक्ति योग, वैष्णव वेदान्त आदि पर अनेकों ग्रंथों की रचना की.

 

श्री जीव गोस्वामी का जन्म श्री वल्लभ अनुपम के यहांपौष शुक्ल तृतीया, संवत् 1568(सन् 1511)को बंगाल के रामकेलि ग्राम में हुआ थाश्री सनातन गोस्वामी और श्री रूप गोस्वामीतथा श्री वल्लभ अनूपम गोस्वामी, ये तीनों भाई नवाब हुसैन शाह के दरबार में उच्च पदासीन थे.बादशाह की सेवाओं के बदले इन लोगों को अच्छा भुगतान होता था, जिसके कारण इनका जीवन अत्यंत सुखमय था.

 

और इनके एकमात्र पुत्र के लिए किसी वस्तु की कमी न थी. श्री जीव के चेहरे पर सुवर्ण आभा थी, इनकी आंखें कमल के समान थीं, व इनके अंग-प्रत्यंग में चमक निकलती थी.वे रूप गोस्वामीऔर सनातन गोस्वामी के भतीजे थे.और श्री रूप गोस्वामी जीसे दीक्षा ग्रहण की.

 

श्री राधा दामोदर जी का प्राकट्यएक रात्रि जब श्रील रूप गोस्वामी सो रहे थे तब ठाकुर राधा दामोदर ने उन्हें यह स्वप्न दिया कि तुम अपने शिष्य व मेरे भक्त जीव गोस्वामी के लिए दामोदर स्वरूप को प्रकट करो.तुम मेरे प्रकट विग्रह को मेरी नित्य सेवाहेतु जीव गोस्वामी को दे देना.इस घटना के तुरन्त बाद जब रूप गोस्वामी यमुना स्नान करके आ रहे थे, तो उन्हें रास्ते में श्याम रंग का विलक्षण शिलाखण्ड प्राप्त हुआ.

 

तत्पश्चात ठाकुर राधा दामोदर ने उन्हें अपने प्रत्यक्षदर्शन देकर शिलाखण्ड को दामोदर स्वरूप प्रदान किया.यह घटना माघ शुक्ल दशमी, संवत् 1599(सन् 1542)की है.यह दिन वृंदावन में ठाकुर राधा दामोदर प्राकट्य महोत्सवके रूप में अत्यन्त धूमधाम के साथ मनाया जाता है.

 

स्वप्नादेशके अनुसार रूप गोस्वामी ने दामोदर विग्रह को अपने शिष्य जीव गोस्वामी को नित्य सेवा हेतु दे दिया.जीव गोस्वामी ने इस विग्रह को विधिवत् ठाकुर राधा दामोदर मंदिर के सिंहासन पर विराजितकर दिया.जीव गोस्वामी को अपने ठाकुर राधा दामोदर के युगल चरणों से अनन्य अनुराग था.उनके रसिक लाडले ठाकुर राधा दामोदर भी उन्हें कभी भी स्वयं से दूर नहीं जाने देते थे.वह यदि कभी उनसे दूर चले भी जाएं, तो उनके ठाकुर उन्हें अपनी वंशी की ध्वनि से अपने समीप बुला लेते थे.श्रीलजीवगोस्वामी श्रृंगार रस के उपासक थे.सम्राट अकबर ने गंगा श्रेष्ठ है या यमुना, इस वितर्क को जानने के लिए जीव गोस्वामी को अपने दरबार में बडे ही सम्मान के साथ बुलाया था.

 

इस पर उन्होंने शास्त्रीय प्रमाण देते हुए यह कहा कि गंगा तो भगवान का चरणामृत है और यमुना भगवान् श्रीकृष्ण की पटरानी.अतएव यमुना, गंगा से श्रेष्ठ है.इस तथ्य को सभी ने सहर्ष स्वीकार किया था.जीव गोस्वामी जी के द्वारा रचित ग्रन्थ -जीव गोस्वामी के द्वारा रचित ग्रंथ “सर्व संवादिनी”,”षट्संदर्भ”एवं”श्री गोपाल चम्पू”आदि विश्व प्रसिद्ध हैं.षट् संदर्भ न केवल गौडीयसम्प्रदाय का अपितु विश्व वैष्णव सम्प्रदायों का अनुपम दर्शन शास्त्र है..

 

षट् संदर्भ ग्रंथ का अध्ययन, चिन्तन व मनन उन व्यक्तियों के लिए परमआवश्यक है, जो भक्ति के महारससागर में डुबकी लगाना चाहतेहैं.नित्य लीला में प्रवेश -गौडीयवैष्णव सम्प्रदाय की बहुमूल्य मुकुट मणि श्रीलजीव गोस्वामी का अपने जन्म की ही तिथि व माह में पौषशुक्ल तृतीया, संवत् 1653(सन् 1596)को वृंदावन में निकुंज गमन हो गया.वे ६५ वर्ष तक श्री वृंदावन में वास करते हुए ८५ वर्ष तक इस धरा धाम पर प्रकट रहे.

 

वृंदावन के सेवाकुंज स्थित ठाकुर राधा दामोदर मंदिर में जीव गोस्वामी का समाधि मंदिर स्थापित है.यहां उनकी वह याद प्रक्षालन स्थली भी है, जिसकी रज कानित्य सेवन करने से प्रेम रूपी पंचम पुरुषार्थ की प्राप्ति होती है.

?श्री श्याम सुन्दर गोस्वामी जी?

वृन्दावन महिमा

रंगीलो राधावल्लभ लाल, जै जै जै श्री वृन्दावन ।
विहरत संग लाडली बाल, जै जै जै श्री वृन्दावन ॥

जमुना नीलमणि की माल, जै जै जै श्री वृन्दावन ।
प्रेम सुरस वरषत सब काल, जै जै जै श्री वृन्दावन ॥

सखिनु संग राजत जुगल किशोर, जै जै जै श्री वृन्दावन ।
अदभुत छवि सांझ अरू भोर, जै जै जै श्री वृन्दावन ॥

आनन्द रंग कौ ओर न छोर, जै जै जै श्री वृन्दावन ।
प्रेम की नदी बहे चहुँ ओर, जै जै जै श्री वृन्दावन ॥

दुर्लभ पिय प्यारी को धाम, जै जै जै श्री वृन्दावन ।
चंहुँ दिसि गूँजत राधा नाम, जै जै जै श्री वृन्दावन ॥

नैननि निरखिये स्यामा स्याम, जै जै जै श्री वृन्दावन ।
मनुवा लेत परम विश्राम, जै जै जै श्री वृन्दावन ॥

धनि धनि श्री किनका प्रसाद, जै जै जै श्री वृन्दावन । 
पाये सब मिटिहैं विषै विषाद, जै जै जै श्री वृन्दावन ॥

सभे सुख एक सीथ के स्वाद, जै जै जै श्री वृन्दावन । 
सर्वसु मान्यौ हित प्रभुपाद, जै जै जै श्री वृन्दावन ॥

धनि धनि ब्रजवासी बड़भाग, जै जै जै श्री वृन्दावन ।
जिनके हिये सहज अनुराग, जै जै जै श्री वृन्दावन ॥

लेत सुख रास हिंडोला, फाग, जै जै जै श्री वृन्दावन । 
गावत जीवत जुगल सुहाग, जै जै जै श्री वृन्दावन ॥

छबीली वृन्दावन की बेलि, जै जै जै श्री वृन्दावन । 
छाँह तरै करैं जुगल रस केलि, जै जै जै श्री वृन्दावन ॥

मंद मुसिकात अंस भुज बेलि, जै जै जै श्री वृन्दावन । 
रसिक दें कोटि मुक्ति पग पेलि, जै जै जै श्री वृन्दावन ॥

पावन वृन्दावन की धूरि, जै जै जै श्री वृन्दावन ।
परस किये पाप ताप सब दूरि, जै जै जै श्री वृन्दावन ॥

रसिक जननि की जीवन मूरि, जै जै जै श्री वृन्दावन ।
हित कौ राज सदा भरपूर, जै जै जै श्री वृन्दावन ॥

रसीली मनमोहन की वेणू, जै जै जै श्री वृन्दावन ।
कौन हरिवंशी सम रस दैन, जै जै जै श्री वृन्दावन ॥

अगोचर नित विहार दरसैन, जै जै जै श्री वृन्दावन ।
‘सलोनी’ पायौ निकुंजनि ऐन, जै जै जै श्री वृन्दावन ॥

??आज की “ब्रज रस धारा”??
दिनांक 30/12/2017

श्री गौडीय षड गोस्वामियो में आप अन्यतम है. ब्रजलीला में आप”अनंग-मंजरी”थे कोई इन्हें श्रीगुण मंजरीभी कहते है.

“अनंगमंजरी यासीत साघ गोपालभट्टक :भट्ट गोवामिनं केचिदाहु: श्रीगुणमंजरी “

 

श्री रंगक्षेत्र में कावेरी के कूल स्थित बेलगुंडी ग्राम में श्री सम्प्रदायी श्रीवैंकटभट्ट के घर में संवत १५५७ में आपका आर्विर्भाव हुआ.जब चैतन्य महाप्रभु संवत १५६८ में दक्षिण यात्रा करते हुए रंग क्षेत्र पधारे और वहाँ श्रीरंगनाथ भगवान के दर्शन किये, तब वहाँ श्रीवैंकटभट्ट जी ने भी महाप्रभु के दर्शन किये.और अपने घर भिक्षा का निमंत्रण दिया.

 

उस समय महाप्रभु ने चातुर्मास इनके ही घर में किया,तब गोपाल भट्ट जी की आयु ११ वर्ष की थी.इन्होने भी महाप्रभु की हर प्रकार से सेवा की और गोपाल जी से महाप्रभु का भी अत्यंत स्नेह हो गया.फिर महा प्रभु ने ही इन्हें वृंदावन जाने की आज्ञादी थी.वृंदावन ने आकर श्रीरूप-सनातनके पास रहने लगे.

 

गोपालभट्ट जी के द्वारा श्रीराधा रमण जी का प्राकट्यएक बार श्रीगोपाल भट्ट गोस्वामी अपनी धर्म प्रचार यात्रा के दौरान जब एक बार गण्डकी नदी में स्नान कर रहे थे, उसी समय सूर्य को अर्घ देते हुए जब अंजुली में जल लिया तो तो एक अद्भुत शलिग्राम शिला आपकी अंजुली में आ गई जब दुबारा अंजलि में एक-एक करके बारह शालिग्राम की शिलायें आ गयीं.जिन्हे लेकर श्री गोस्वामी वृन्दावन धाम आ पहुंचे और यमुना तट पर केशीघाट के निकट भजन कुटी बनाकर श्रद्धापूर्वक शिलाओं का पूजन-अर्चन करने लगे.एक बार वृंदावन यात्रा करते हुए एक सेठ जी ने वृंदावनस्थ समस्त श्री विग्रहों के लिए अनेक प्रकार के बहुमूल्य वस्त्र आभूषण आदि भेट किये.

 

श्री गोपाल भट्ट जी को भी उसनेवस्त्र आभूषण दिए.परन्तु श्री शालग्राम जी को कैसे वे धारण कराते श्री गोस्वामी के हृदय में भाव प्रकट हुआ कि अगर मेरे आराध्य के भी अन्य श्रीविग्रहों की भांति हस्त-पद होते तो मैं भी इनको विविध प्रकार से सजाता एवं विभिन्न प्रकार की पोशाक धारण कराता, और इन्हें झूले पर झूलता.यह विचार करते-करते श्री गोस्वामी जी को सारीरात नींद नहीं आई.प्रात: काल जब वह उठे तो उनके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा, जब उन्होंने देखा कि श्री शालिग्राम जी त्रिभंग ललित द्विभुज मुरलीधर मधुर मूर्ति श्रीव्रजकिशोर श्याम रूप में विराजमान है. श्री गोस्वामी ने भावविभोर होकर वस्त्रालंकार विभूषित कर अपने आराध्य का अनूठा श्रृंगार किया.

 

श्री रूप सनातन आदि गुरुजनों को बुलाया और राधारमणलाल का प्राकटय महोत्सव श्रद्धापूर्वक आयोजित किया गया.यही श्री राधारमण लाल जी का विग्रह आज भी श्री राधारमण देव मंदिर में गोस्वामी समाज द्वारा सेवित है.और इन्ही के साथ गोपाल भट्ट जी के द्वारा सेवित अन्य शालिग्राम शिलाएं भी मन्दिर में स्थापित हैं ।1599 की वैशाख की पूर्णिमा को शालग्राम शिला से राधारमण जी प्रकट हुए थे.हर वर्ष इसी दिन इनका प्राकट्य उत्सव बड़े प्रेम से मनाया जाता है, और उस दिन इनका अभिषेक भी होता है.राधारमण जी का श्री विग्रह वैसे तो सिर्फ द्वादश अंगुल का है, तब भी इनके दर्शन बड़े ही मनोहारी है.

 

श्रीराधारमण विग्रह का श्री मुखारविन्द”गोविन्द देव जी”के समान, वक्षस्थल”श्री गोपीनाथ”के समान तथा चरणकमल”मदनमोहन जी”के समान हैं.इनके दर्शनों से तीनों विग्रहों के दर्शन का फल एक साथ प्राप्त होता है.श्री राधा रमण जी का मन्दिर श्री गौड़ीय वैष्णव सम्प्रदाय के सुप्रसिद्ध मन्दिरों में से एक है.श्री राधा रमण जी उन वास्तविक विग्रहों में से एक हैं, जो अब भी वृन्दावन में ही स्थापित हैं.अन्य विग्रह जयपुर चले गये थे, पर श्री राधा रमणजी ने कभी वृन्दावन को नहीं छोड़ा ।

 

मन्दिर के दक्षिण पार्श्व में श्री राधारमण जी का प्राकट्य स्थल तथा गोपाल भट्ट गोस्वामीजी का समाधि मन्दिर है.गोपालभट्ट द्वारा लिखे ग्रन्थ -श्री सनातन प्रभु के आदेश से श्री गोपाल भट्ट जी ने”लघुहरिभक्ति विलास”नाम से रचना की उसे देखकर श्रीसनातन जी ने उसका परिवर्तन परिवर्धन कर श्रीहरि भक्ति विलास का संपादन किया और उसकी विस्तृत दिग्दर्शिनी नामक टीका लिखी.इस प्रकार अनेक वैष्णव ग्रन्थ प्रणयन में सहायक होकर श्रीमन महाप्रभु के भक्ति रस सिद्धांतों के प्रचार प्रसार के लिए अनेको व्यक्तियों के लिए दीक्षा दी.

 

संवत १६४३ की श्रावण कृष्ण पंचमी को आप नित्य लीला में प्रविष्ट हो गए.श्री राधा रमण जी के प्राकट्य स्थल के पार्श्व में इनकी पावन समाधि का दर्शन अब भी होता है.

?श्री श्याम सुन्दर गोस्वामी जी ?

ब्रज शब्द की परिभाषा

वैदिक संहिताओं तथा रामायण, महाभारत आदि संस्कृत के प्राचीन धर्मग्रंथों में ब्रज शब्द गोशाला, गो-स्थान, गोचर भूमि के अर्थों में प्रयुक्त हुआ है। ऋग्वेद में यह शब्द गोशाला अथवा गायों के खिरक के रूप में वर्णित है। यजुर्वेद में गायों के चरने के स्थान को ब्रज और गोशाला को गोष्ठ कहा गया है।

 

शुक्ल यजुर्वेद में सुन्दर सींगों वाली गायों के विचरण स्थान से ब्रज का संकेत मिलता है। अथर्ववेद में गोशलाओं से सम्बधित पूरा सूक्त ही प्रस्तुत है। हरिवंशपुराण तथा भागवतपुराण आदि में यह शब्द गोप बस्त के रूप में प्रयुक्त हुआ है। स्कंदपुराण में महर्षि शाण्डिल्य ने ब्रज शब्द का अर्थ वतलाते हुए इसे व्यापक ब्रह्म का रूप कहा है। अत: यह शब्द ब्रज की आध्यात्मिकता से सम्बधित है।

परिचय

ब्रज उत्तर प्रदेश राज्य का सर्वप्रमुख प्रसिद्ध तीर्थ स्थल है। यह सम्पूर्ण भारत में भगवान श्रीकृष्ण की क्रीड़ास्थली और उनकी लीलाओं के लिए प्रसिद्ध है। ‘ब्रज’ शब्द के अर्थ का काल-क्रमानुसार ही विकास हुआ है। वेदों और रामायण-महाभारत के काल में जहाँ इसका प्रयोग ‘गोष्ठ’, ‘गो-स्थान’ जैसे लघु स्थल के लिये होता था,

 

वहीं पौराणिक काल में ‘गोप-बस्ती’ जैसे कुछ बड़े स्थान के लिये इसका प्रयोग किया जाने लगा। उस समय तक यह शब्द एक प्रदेश के लिए प्रयुक्त न होकर क्षेत्र विशेष का ही प्रयोजन स्पष्ट करता था। भागवत में ‘ब्रज’ क्षेत्र विशेष को इंगित करते हुए प्रयुक्त हुआ है। वहाँ इसे एक छोटे गाँव की संज्ञा दी गई है। उसमें ‘पुर’ से छोटा ‘ग्राम’ और उससे भी छोटी बस्ती को ‘ब्रज’ कहा गया है। 16वीं शताब्दी में ‘ब्रज’ प्रदेश के अर्थ में होकर ‘ब्रजमंडल’ हो गया और तब उसका आकार 84 कोस का माना जाने लगा था। उस समय मथुरा ‘ब्रज’ में सम्मिलित नहीं माना जाता था। सूरदास तथा अन्य ब्रजभाषा के कवियों ने ‘ब्रज’ और मथुरा का पृथक् रूप में ही कथन किया है।

जिनके पग को नित ध्यान धरें नहि आवत नेकहूँ ध्यान में 

वो तो प्रेम के कारण नाक नचे ब्रज गोपिंन के दधि चाखन में 

 

Shree Ji Barsana Mandal Trust (SJBMT)

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