News

Today’s Braj Ras Dhara On 30/12/2017

??आज की “ब्रज रस धारा”??
दिनांक 30/12/2017

श्री गौडीय षड गोस्वामियो में आप अन्यतम है. ब्रजलीला में आप”अनंग-मंजरी”थे कोई इन्हें श्रीगुण मंजरीभी कहते है.

“अनंगमंजरी यासीत साघ गोपालभट्टक :भट्ट गोवामिनं केचिदाहु: श्रीगुणमंजरी “

 

श्री रंगक्षेत्र में कावेरी के कूल स्थित बेलगुंडी ग्राम में श्री सम्प्रदायी श्रीवैंकटभट्ट के घर में संवत १५५७ में आपका आर्विर्भाव हुआ.जब चैतन्य महाप्रभु संवत १५६८ में दक्षिण यात्रा करते हुए रंग क्षेत्र पधारे और वहाँ श्रीरंगनाथ भगवान के दर्शन किये, तब वहाँ श्रीवैंकटभट्ट जी ने भी महाप्रभु के दर्शन किये.और अपने घर भिक्षा का निमंत्रण दिया.

 

उस समय महाप्रभु ने चातुर्मास इनके ही घर में किया,तब गोपाल भट्ट जी की आयु ११ वर्ष की थी.इन्होने भी महाप्रभु की हर प्रकार से सेवा की और गोपाल जी से महाप्रभु का भी अत्यंत स्नेह हो गया.फिर महा प्रभु ने ही इन्हें वृंदावन जाने की आज्ञादी थी.वृंदावन ने आकर श्रीरूप-सनातनके पास रहने लगे.

 

गोपालभट्ट जी के द्वारा श्रीराधा रमण जी का प्राकट्यएक बार श्रीगोपाल भट्ट गोस्वामी अपनी धर्म प्रचार यात्रा के दौरान जब एक बार गण्डकी नदी में स्नान कर रहे थे, उसी समय सूर्य को अर्घ देते हुए जब अंजुली में जल लिया तो तो एक अद्भुत शलिग्राम शिला आपकी अंजुली में आ गई जब दुबारा अंजलि में एक-एक करके बारह शालिग्राम की शिलायें आ गयीं.जिन्हे लेकर श्री गोस्वामी वृन्दावन धाम आ पहुंचे और यमुना तट पर केशीघाट के निकट भजन कुटी बनाकर श्रद्धापूर्वक शिलाओं का पूजन-अर्चन करने लगे.एक बार वृंदावन यात्रा करते हुए एक सेठ जी ने वृंदावनस्थ समस्त श्री विग्रहों के लिए अनेक प्रकार के बहुमूल्य वस्त्र आभूषण आदि भेट किये.

 

श्री गोपाल भट्ट जी को भी उसनेवस्त्र आभूषण दिए.परन्तु श्री शालग्राम जी को कैसे वे धारण कराते श्री गोस्वामी के हृदय में भाव प्रकट हुआ कि अगर मेरे आराध्य के भी अन्य श्रीविग्रहों की भांति हस्त-पद होते तो मैं भी इनको विविध प्रकार से सजाता एवं विभिन्न प्रकार की पोशाक धारण कराता, और इन्हें झूले पर झूलता.यह विचार करते-करते श्री गोस्वामी जी को सारीरात नींद नहीं आई.प्रात: काल जब वह उठे तो उनके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा, जब उन्होंने देखा कि श्री शालिग्राम जी त्रिभंग ललित द्विभुज मुरलीधर मधुर मूर्ति श्रीव्रजकिशोर श्याम रूप में विराजमान है. श्री गोस्वामी ने भावविभोर होकर वस्त्रालंकार विभूषित कर अपने आराध्य का अनूठा श्रृंगार किया.

 

श्री रूप सनातन आदि गुरुजनों को बुलाया और राधारमणलाल का प्राकटय महोत्सव श्रद्धापूर्वक आयोजित किया गया.यही श्री राधारमण लाल जी का विग्रह आज भी श्री राधारमण देव मंदिर में गोस्वामी समाज द्वारा सेवित है.और इन्ही के साथ गोपाल भट्ट जी के द्वारा सेवित अन्य शालिग्राम शिलाएं भी मन्दिर में स्थापित हैं ।1599 की वैशाख की पूर्णिमा को शालग्राम शिला से राधारमण जी प्रकट हुए थे.हर वर्ष इसी दिन इनका प्राकट्य उत्सव बड़े प्रेम से मनाया जाता है, और उस दिन इनका अभिषेक भी होता है.राधारमण जी का श्री विग्रह वैसे तो सिर्फ द्वादश अंगुल का है, तब भी इनके दर्शन बड़े ही मनोहारी है.

 

श्रीराधारमण विग्रह का श्री मुखारविन्द”गोविन्द देव जी”के समान, वक्षस्थल”श्री गोपीनाथ”के समान तथा चरणकमल”मदनमोहन जी”के समान हैं.इनके दर्शनों से तीनों विग्रहों के दर्शन का फल एक साथ प्राप्त होता है.श्री राधा रमण जी का मन्दिर श्री गौड़ीय वैष्णव सम्प्रदाय के सुप्रसिद्ध मन्दिरों में से एक है.श्री राधा रमण जी उन वास्तविक विग्रहों में से एक हैं, जो अब भी वृन्दावन में ही स्थापित हैं.अन्य विग्रह जयपुर चले गये थे, पर श्री राधा रमणजी ने कभी वृन्दावन को नहीं छोड़ा ।

 

मन्दिर के दक्षिण पार्श्व में श्री राधारमण जी का प्राकट्य स्थल तथा गोपाल भट्ट गोस्वामीजी का समाधि मन्दिर है.गोपालभट्ट द्वारा लिखे ग्रन्थ -श्री सनातन प्रभु के आदेश से श्री गोपाल भट्ट जी ने”लघुहरिभक्ति विलास”नाम से रचना की उसे देखकर श्रीसनातन जी ने उसका परिवर्तन परिवर्धन कर श्रीहरि भक्ति विलास का संपादन किया और उसकी विस्तृत दिग्दर्शिनी नामक टीका लिखी.इस प्रकार अनेक वैष्णव ग्रन्थ प्रणयन में सहायक होकर श्रीमन महाप्रभु के भक्ति रस सिद्धांतों के प्रचार प्रसार के लिए अनेको व्यक्तियों के लिए दीक्षा दी.

 

संवत १६४३ की श्रावण कृष्ण पंचमी को आप नित्य लीला में प्रविष्ट हो गए.श्री राधा रमण जी के प्राकट्य स्थल के पार्श्व में इनकी पावन समाधि का दर्शन अब भी होता है.

?श्री श्याम सुन्दर गोस्वामी जी ?

Share it on

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Shree Ji Barsana Mandal Trust (SJBMT)

counter