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Today’s Braj Ras Dhara On 31/12/2017

??आज की “ब्रज रस धारा”??
दिनांक 31/12/2017

श्री जीव गोस्वामी(1513-1598), वृंदावन में चैतन्य महाप्रभु द्वारा भेजे गए छः षडगोस्वामी में से एक थे. उनकी गणना गौडीय संप्रदायके सबसे महान दार्शनिकों एवं सन्तों में होती है. उन्होने भक्ति योग, वैष्णव वेदान्त आदि पर अनेकों ग्रंथों की रचना की.

 

श्री जीव गोस्वामी का जन्म श्री वल्लभ अनुपम के यहांपौष शुक्ल तृतीया, संवत् 1568(सन् 1511)को बंगाल के रामकेलि ग्राम में हुआ थाश्री सनातन गोस्वामी और श्री रूप गोस्वामीतथा श्री वल्लभ अनूपम गोस्वामी, ये तीनों भाई नवाब हुसैन शाह के दरबार में उच्च पदासीन थे.बादशाह की सेवाओं के बदले इन लोगों को अच्छा भुगतान होता था, जिसके कारण इनका जीवन अत्यंत सुखमय था.

 

और इनके एकमात्र पुत्र के लिए किसी वस्तु की कमी न थी. श्री जीव के चेहरे पर सुवर्ण आभा थी, इनकी आंखें कमल के समान थीं, व इनके अंग-प्रत्यंग में चमक निकलती थी.वे रूप गोस्वामीऔर सनातन गोस्वामी के भतीजे थे.और श्री रूप गोस्वामी जीसे दीक्षा ग्रहण की.

 

श्री राधा दामोदर जी का प्राकट्यएक रात्रि जब श्रील रूप गोस्वामी सो रहे थे तब ठाकुर राधा दामोदर ने उन्हें यह स्वप्न दिया कि तुम अपने शिष्य व मेरे भक्त जीव गोस्वामी के लिए दामोदर स्वरूप को प्रकट करो.तुम मेरे प्रकट विग्रह को मेरी नित्य सेवाहेतु जीव गोस्वामी को दे देना.इस घटना के तुरन्त बाद जब रूप गोस्वामी यमुना स्नान करके आ रहे थे, तो उन्हें रास्ते में श्याम रंग का विलक्षण शिलाखण्ड प्राप्त हुआ.

 

तत्पश्चात ठाकुर राधा दामोदर ने उन्हें अपने प्रत्यक्षदर्शन देकर शिलाखण्ड को दामोदर स्वरूप प्रदान किया.यह घटना माघ शुक्ल दशमी, संवत् 1599(सन् 1542)की है.यह दिन वृंदावन में ठाकुर राधा दामोदर प्राकट्य महोत्सवके रूप में अत्यन्त धूमधाम के साथ मनाया जाता है.

 

स्वप्नादेशके अनुसार रूप गोस्वामी ने दामोदर विग्रह को अपने शिष्य जीव गोस्वामी को नित्य सेवा हेतु दे दिया.जीव गोस्वामी ने इस विग्रह को विधिवत् ठाकुर राधा दामोदर मंदिर के सिंहासन पर विराजितकर दिया.जीव गोस्वामी को अपने ठाकुर राधा दामोदर के युगल चरणों से अनन्य अनुराग था.उनके रसिक लाडले ठाकुर राधा दामोदर भी उन्हें कभी भी स्वयं से दूर नहीं जाने देते थे.वह यदि कभी उनसे दूर चले भी जाएं, तो उनके ठाकुर उन्हें अपनी वंशी की ध्वनि से अपने समीप बुला लेते थे.श्रीलजीवगोस्वामी श्रृंगार रस के उपासक थे.सम्राट अकबर ने गंगा श्रेष्ठ है या यमुना, इस वितर्क को जानने के लिए जीव गोस्वामी को अपने दरबार में बडे ही सम्मान के साथ बुलाया था.

 

इस पर उन्होंने शास्त्रीय प्रमाण देते हुए यह कहा कि गंगा तो भगवान का चरणामृत है और यमुना भगवान् श्रीकृष्ण की पटरानी.अतएव यमुना, गंगा से श्रेष्ठ है.इस तथ्य को सभी ने सहर्ष स्वीकार किया था.जीव गोस्वामी जी के द्वारा रचित ग्रन्थ -जीव गोस्वामी के द्वारा रचित ग्रंथ “सर्व संवादिनी”,”षट्संदर्भ”एवं”श्री गोपाल चम्पू”आदि विश्व प्रसिद्ध हैं.षट् संदर्भ न केवल गौडीयसम्प्रदाय का अपितु विश्व वैष्णव सम्प्रदायों का अनुपम दर्शन शास्त्र है..

 

षट् संदर्भ ग्रंथ का अध्ययन, चिन्तन व मनन उन व्यक्तियों के लिए परमआवश्यक है, जो भक्ति के महारससागर में डुबकी लगाना चाहतेहैं.नित्य लीला में प्रवेश -गौडीयवैष्णव सम्प्रदाय की बहुमूल्य मुकुट मणि श्रीलजीव गोस्वामी का अपने जन्म की ही तिथि व माह में पौषशुक्ल तृतीया, संवत् 1653(सन् 1596)को वृंदावन में निकुंज गमन हो गया.वे ६५ वर्ष तक श्री वृंदावन में वास करते हुए ८५ वर्ष तक इस धरा धाम पर प्रकट रहे.

 

वृंदावन के सेवाकुंज स्थित ठाकुर राधा दामोदर मंदिर में जीव गोस्वामी का समाधि मंदिर स्थापित है.यहां उनकी वह याद प्रक्षालन स्थली भी है, जिसकी रज कानित्य सेवन करने से प्रेम रूपी पंचम पुरुषार्थ की प्राप्ति होती है.

?श्री श्याम सुन्दर गोस्वामी जी?

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