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नटवर नागर नन्दा

नटवर नागर नन्दाभजो रे मन गोविन्दा

चमके मुख ज्यों चन्दाभजो रे मन गोविन्दा।

 

वो ही मेरा नटवर वो ही मेरा नागर

       वो ही मेरा बालमुकुन्दा || भजो रे —-

 

 

कालिय दह के नाग को नाथा,

       फन-फन नृत्य करन्ता || भजो रे —-

 

मथुरा जाकर कन्स को मारा,

       सब दुष्टों के हन्ता || भजो रे —-

 

सब अवतारों में श्याम बड़े हैं

       ज्यौं तारों में चंदा || भजो रे—–

 

सब देवों में शिवजी बड़े हैं

       लिपटे रहत भुजंगा || भजो रे —-

 

सब सखियों में राधा बड़ी हैं

       ज्यों नदियों में गंगा || भजो रे —-

 

सब साज़ों में बंसी बड़ी है

       सब ग्रंथों में गीता || भजो रे —–

नटवर नागर नन्दा, भजो रे मन गोविन्दा ॥ 

राधे शिरी वृषभान-दुलारी

धुन: देखो वृन्दावन की ……….

कृष्ण:   राधे शिरी वृषभान-दुलारी, प्यारी बन्सी दे देओ मोय।

 

       या बन्सी बिन चैन  न पाऊँ,

              बन्सी के बल गइयाँ चराऊँ,

                     याहि के बल गिरिराज उठाऊँ,

       बंसी की धुन तीन लोक में, सुर-नर-नाग समोय ॥ राधे शिरी वृषभान ——

 

राधा:   कैसी बन्सी श्याम तुम्हारी,

              हम क्या जाने गोपि बिचारी,

                      तुम छलिया हम भोरी-भारी,

       झूँटो नाम लगाओ हमारों, बन में खोई होय ॥ राधे शिरी वृषभान ——

 

कृष्ण:   तुमने बन्सी चोरि हमारी,

              तुम सब खंखा ब्रज की नारी,

                      कौन क़हत तुम भोरी-भारी,

       नेंक दही के पाछे वा दिन, गारी दीनी मोय ॥ राधे शिरी वृषभान ——

 

राधा:   चोरी करे सो खाए गारी,

              राजा होय या निपट भिखारी,

                      आँख दिखाओ न पीरी-कारी,

       नाम बिगारों नन्दबबा को, लाज न आवै तोय ॥ राधे शिरी वृषभान ——

 

कृष्ण:   भगतन के हित देह ये धारी,

              तुम कहा जानो राधा प्यारी,

                      बन्सी तीन लोक से न्यारी,

       सुर-नर-मुनि-ब्रह्मादिक जाको, पार न पायो कोय ॥ राधे शिरी वृषभान ——

राधे बन्सी हमारी हमें दे दो

राधे बन्सी हमारी हमें दे दो तुम्हारे किस काम की |

काहे से गाऊँ राधे काहे से बजाऊँ
काहे से लाऊं गइयाँ घेरतुम्हारे किस काम की || राधे बन्सी ——-


मुख से गाओ कान्हा हाथों से बजाओ
लाठी से लाओ गइयाँ घेरहमारे है काम की || राधे बन्सी ——-


वृन्दावन जाऊँ राधे रास रचाऊँ
काहे से सखियाँ बुलाऊँतुम्हारे किस काम की || राधे बन्सी ——-


वृन्दावन जाओ कान्हा रास रचाओ
नैनों से सखियाँ बुलाओहमारे है काम की || राधे बन्सी ——-

बन्सी का बजाना छोड़ दे

बन्सी का बजाना छोड़ दे रे नन्द मेहर के लाल |

 

तेरी बन्सी रस की भीनी बाजे मधुर रसाल

सुन-सुन सारी ब्रज की नारी भूल गईं घर-माल || बन्सी का ——

 

बन में जाते धेनु चराते मोह लिए सब ग्वाल

दूध बेचन को जात गुजरियाँ रोक लईं तत्काल || बन्सी का ——

 

पक्षी मौन हुए पशुओं ने तजा चरन का ख्याल

ध्यान छुटा मुनियों का वन में सुन मुरली निरधार || बन्सी का ——

 

मोर-मुकुट पीताम्बर सोहेगल वैजंती माल

ब्रहमानन्द की सुन लो विनती दे दो दरस दयाल || बन्सी का ——

यशुदा तेरे री लाला ने

यशुदा तेरे री लाला ने मेरी मटकी फोरी री |

हम दधि बेचन जात वृन्दावनमिल ब्रज-गोरी री

       गैल रोक ली हमरी और कीनी झकझोरी री || यशुदा तेरे री ——-

 

दधि सब खाय मटुकिया तोड़ीबाँह मरोड़ी री

       चोरी तो सब जगह होयतेरे ब्रज में जोरी री || यशुदा तेरे री ——-

 

ले नन्दरानी हमने तेरी नगरी छोड़ी री

       नाम बिगाड़े तेराबेशरमाई ओढ़ी री || यशुदा तेरे री ——-

 

चुनरी खींच मसक दी ठोड़ीमाला तोड़ी री

       पिचकारी की धार मारउन्ने खेली होली री || यशुदा तेरे री ——-

तेरे लाला ने माटी खाई

तेरे लाला ने माटी खाई, यशोदा सुन माई।

अद्भुत खेल सखन संग खेलो।    

       छोटों सो माटी को ढेलों,

              लै कान्हा ने मुख में मेलो,

              गटक-गटक गटकाई, यशोदा सुन माई ॥

 

दूध-दही को कबहुँ न नाटी,

       क्यों लाला तैने खाई माटी,

              यशुदा समझा रही लै साँटी,

              याने नेक दया नहिं आई ॥

 

यशोदा सुन माई

मुख के माहीं आँगुली मेली,

       निकल पड़ी माटी की ढेली

              भीर भई सखियन की भेली,

              याने देखें लोग-लुगाई, यशोदा सुन माई ॥

 

 

मोहन का मुखड़ा फरवाया,

       तीन लोक मुख अंदर पाया,

              तब भरोस यशुदा कहँ आया,

              ये तो पूरन ब्रह्म कन्हाई, यशोदा सुन माई ॥

राधे राधे
??आज की “ब्रज रस धारा”??
दिनांक 31/01/2018

भगवान जब चलने लगे तो पहली बार घर सेबाहर निकले. ब्रज से बाहर भगवान की मित्र मंडली बन गयी. सुबल, मंगल, सुमंगल, श्रीदामा, तोसन, आदि मित्र बन गये. सब मिलकर हर दिन माखन चोरी करने जाते.

 

चोर मंडली के अध्यक्ष स्वयं माखन चोर श्रीकृष्ण थे.सब एक जगह इकट्टा होकर योजना बनाते कि किसगोपी के घर चोरी करनी है .आज ‘चिकसोले वाली’ गोपी की बारी थी.भगवान ने गोपी के घर के पास सारे मित्रों को छिपा दिया और स्वयं उसकेघर पहुँच गये.

 

दरवाजा खटखटाने लगे,भगवान ने अपने बाल और काजल बिखरा लिया. गोपी ने दरवाजा खोला, तोश्रीकृष्ण को खड़े देखा.गोपी बोली– ‘अरे लाला! आज सुबह-सुबहयहाँ कैसे?कन्हैया बोले– ‘गोपी क्या बताऊँ! आजसुबह उठते ही,

 

मैया ने कहा लाला तू चिकसोले वाली गोपी के घर चले जाओ और उससे कहना आज हमारे घर में संत आ गए है मैंने तो ताजा माखन निकला नहीं, चिकसोले वाली तो बहुत सुबह ही ताजा माखन निकल लेती है उनसे जाकर कहना कि एक मटकी माखन दे दो, बदले में दो मटकी माखन लौटा दूँगी .

 

गोपी बोली– लाला! मै अभी माखन की मटकी लाती हूँ और मैया से कह देना कि लौटने की जरुरत नहीं है संतो की सेवा मेरी तरफ से हो जायेगी .झट गोपी अंदर गयी और माखन की मटकी लाई और बोली – लाला ये माखन लो और ये मिश्री भी ले जाओ.कन्हैया माखन लेकर बाहर आ गए और गोपी ने दरवाजा बंद कर लिया .

 

भगवान ने झट अपने सारे सखाओ को पुकारा श्रीदामा, मंगल, सुबल, जल्दी आओ, सब-के-सब झट से बाहर आ गए भगवान बोले जिसके यहाँ चोरी की हो उसके दरवाजे पर बैठकर खाने में ही आनंद आता है, झट सभी गोपी के दरवाजे के बाहर बैठ गए, भगवान ने सबकी पत्तल पर माखन और मिश्री रख दी.

 

और बीच में स्वयं बैठ गए सभी सखा माखन और मिश्री खाने लगे. माखन के खाने से पट पट और मिश्री के खाने से कट-कट की, जब आवाज गोपी ने अंदर से सुनी तो वह सोचने लगी कि ये आवाज कहाँ सेआ रही है और जैसे ही उसने दरवाजा खोला तो सारे मित्रों के साथ श्रीकृष्ण बैठे माखन खा रहे थे.

 

गोपी बोली– ‘क्यों रे कन्हैया! माखन संतो को चाहिए था याइन चोरों को?भगवान बोले-‘देखो गोपी! ये भी किसी संत से कम नहीं है सब के सब नागा संत है देखो किसी ने भी वस्त्र नहीं पहिन रखे है, तू इन्हें दंडवत प्रणाम कर.

 

गोपी बोली- अच्छा कान्हा! इन्हें दंडवत प्रणाम करूँ, रुको, अभी अंदर से डंडा लेकर आती हूँ .गोपी झट अंदर गयी और डंडा लेकर आयी.भगवान ने कहा- ‘मित्रों! भागो, नहीं तो गोपी पूजा कर देगी.

 

एक दिन जब मैया ताने सुन सुनकर थक गयी तो उन्होंने भगवानको घर में ही बंद कर दिया जब आज गोपियों ने कन्हैया को नहीं देखा तो सब के सब उलाहना देने के बहाने नंदबाबा के घर आ गयी और नंदरानी यशोदा से कहने लगी- यशोदा तुम्हारे लाला बहुत नटखट है,

 

ये असमय ही बछडो को खोल देते है, और जबहम दूध दुहने जाती है तो गाये दूध तो देती नहीं लात मारती है जिससे हमारी कोहनी भी टूटे और दुहनी भी टूटे.घरमै कही भी माखन छुपाकर रखो, पता नहीं कैसे ढूँढ लेते है यदि इन्हें माखन नहीं मिलता तो ये हमारे सोते हुए बच्चो को चिकोटी काटकर भाग जाते है, ये माखन तो खाते ही है साथ में माखन की मटकी भी फोड़ देते है*.

 

यशोदा जी कन्हैया का हाथ पकड़कर गोपियों के बीच में खड़ा कर देती है और कहती है कि ‘तौल-तौल लेओ वीर, जितनों जाको खायो है, पर गली मत दीजो, मौ गरिबनी को जायो है’. जब गोपियों ने ये सुना तो वे कहने लगी – यशोदा हम उलाहने देने नही आये है आपने आज लाला को घर में ही बंद करके रखा है हमने सुबह से ही उन्हें नही देखा है इसलिए हम उलाहने देने के बहाने उन्हें देखने आए थे.

 

जब यशोदा जी ने ये सुना तो वे कहने लगी- गोपियों तुम मेरे लाला से इतना प्रेम करती हो, आज से ये सारे वृन्दावन के लाल है .*आध्यात्मिक पक्ष-भगवान समय ही बछडो को खोल देते है भगवान को बँधा हुआ जीव अच्छा नहीं लगता इसलिए भगवान जीव को मुक्त कर देते है.

 

और सोता हुआ जीव भी अच्छा नहीं लगताइसलिए भगवान उसे उठा देते है. माखन ये मन है, और मटकी ही ये शरीर है, भगवान जब अपने भक्त का मन चुरा लेते है तो फिर इस देह का क्या काम इसलिए भगवान इसे फोड़ देते है.“ जय जय श्री राधे ”

“श्री श्याम सुन्दर गोस्वामी जी “

ग्वालिन मत पकड़े

ग्वालिन मत पकड़े मोरी बहियाँ, मोरी दूखे नरम कलइया।

तेरो माखन मैं नहिं खायो,

       अपने घर के धोखे में आयो,

              मटकी ते नहिं हाथ लगायो,

हाथ छोड़ दे हा-हा खाऊँ, तेरी लऊँ बलइयाँ ॥ ग्वालिन मत पकड़े —–

खोल किवारिया तू गई पानी,

       भूल करी अब क्यों पछतानी,

              मो संग कर रही ऐंचातानी,

झूठो नाम लगाय रही, घर में घुसी बिलइया ॥ ग्वालिन मत पकड़े —–

तोको तनिक लाज नहिं आवे,

       मुझ सूधे को दोस लगावे,

              घर में बुला के चोर बतावे,

हाथ छोड़ दे देर होत है, दूर निकस गईं गइयाँ ॥ ग्वालिन मत पकड़े —–

आज छोड़ दे सौगंध खाऊँ,

       फेर न तेरे घर में आऊँ,

              नित तेरी गागर उचकाऊँ,

पड़ूँ पाँव तेरे, जान दे मोहे, बोल रह्यो बल भइया ॥ ग्वालिन मत पकड़े —–

सदाशिव सर्व वरदाता

सदाशिव सर्व वरदातादिगम्बर हो तो ऐसा हो,

       हरे सब दुःख भक्तों केदयाकर हो तो ऐसा हो।

शिखर कैलाश के ऊपर, कल्पतरुओं की छाया में,

       रमे नित संग गिरिजा के, रमणधर हो तो ऐसा हो।

शीश पर गंग की धारासुहाए भाल पर लोचन,

       कला मस्तक पे चन्दा कीमनोहर हो तो ऐसा हो।

भयंकर जहर जब निकलाक्षीरसागर के मंथन से,

       रखा सब कण्ठ में पीकरकि विषधर हो तो ऐसा हो।

सिरों को काटकर अपनेकिया जब होम रावण ने,

       दिया सब राज दुनियाँ कादिलावर हो तो ऐसा हो।

बनाए बीच सागर केतीन पुर दैत्य सेना ने,

       उड़ाए एक ही शर सेत्रिपुरहर हो तो ऐसा हो।

देवगण दैत्य नर सारेजपें नित नाम शंकर जो,

       वो ब्रह्मानन्द दुनियाँ मेंउजागर हो तो ऐसा हो॥

मारे मत मइया

मारे मत मइया, वचन भरवाय लै

वचन भरवाय लै, सौगन्ध खवाय लै।

गंगा की खवाय लै, चाहे जमुना की खवाय लै

क्षीर सागर में मइया ठाड़ो करवाय लै ॥ मारे मत मइया ——

गइया की खवाय लै, चाहे बछड़ा की खवाय लै

नन्द बाबा के आगे ठाड़ो करवाय लै ॥ मारे मत मइया ——

गोपिन की खवाय लै, चाहे ग्वालन की खवाय लै

दाऊ भइया के आगे कान पकराय लै ॥ मारे मत मइया ——

बंसी की खवाय लै, चाहे कामर की खवाय लै

मेरे अपने सिर पे हाथ धर के कहवाय लै ॥ मारे मत मइया ——

Shree Ji Barsana Mandal Trust (SJBMT)

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