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राधे राधे
??आज की “ब्रज रस धारा”??
दिनांक 15/02/2018

एक बार राधा रानी जी ने कहा- कान्हा तुम मुझसे प्रेम करते हो ना तो इस पर कृष्ण नेकहा कि राधा तुम ऐसा क्यों कह रही हो तो राधा रानी कहनेलगी कि यदि तुमप्रेम मुझसे करते हो तो विवाह रुक्मणि से क्यों किया?

 

तब भगवान कृष्णबोले-राधे ! विवाह के लिए दो लोगो कि जरुरत होती है और तुम और हम तो एक है.इतना सुनते ही राधा जी के नैनो मेंआँसू भर आये.

 

श्री गोपीजन प्रेम का आश्रय और श्री कृष्ण प्रेम का विषय हैं. श्री गोपिओं का अप्राकृत दिव्य भाव ही परब्रह्म में दिव्य सुखेच्छा उत्पन्न कर देता है.

 

प्रेम का महान उच्च भावही उन पूर्णकाम में कामना , नित्य तृप्त में अतृप्ति , क्रियाहीन मेंक्रिया और आनंदमय में आनंद की वासना जागृत कर देता है.

 

अवश्य ही यह सुखेच्छा कामना , अतृप्ति , क्रिया या वासना जड़ इन्द्रिय जन्यनहीं है , इस मृत्य जगत की मायामयी वस्तुनहीं है : कयोंकि वह दिव्य आनंद और दिव्य प्रेम अभिन्न है.

 

श्री कृष्ण और श्री राधारानीसदा अभिन्न हैं.श्री भगवान् कहते हैं -“हे राधे जो तुम हो , वही मैं हूँ , हम दोनों में किंचित भी भेद नहीं है !जैसे दूध में सफेदी , अग्नि में दाहिका शक्ति और पृथ्वी में गंध रहती है ,

 

उसी प्रकार मैं सदा तुम में रहता हूँ.”जहाँ श्री कृष्ण हैं , वहाँ श्री राधा नहीं हैं – यह कहना ही नहीं बनता.

 

तार्किकों को नहीं , भक्तो और शास्त्र के सामने सर झुकाने वालों को तो भगवान् के ये वाक्य सदा स्मरण रखने चाहिए -“जो अज्ञानी हम दोनों में भेद बुद्धि करता है ,

 

वह जब तक चाँद सूरज हैं , तब तक के लिए मेरी कृपा से च्युत हो जाता है.”

 

“जय जय श्री राधे”

“श्री श्याम सुन्दर गोस्वामी जी “
सेवाधिकारी श्री राधा रानी मन्दिर बरसाना

राधे राधे
??आज की “ब्रज रस धारा”??
दिनांक 14/02/2018

विद्वान और पंडित लोग कहते हैं जिस समाधि भाषा में भागवत लिखी गई और जब राधाजी का प्रवेश हुआ तो व्यासजी इतने डूब गए कि राधा चरित लिख ही नहीं सके.

 

सच तो यह है कि ये जो पहले श्लोक में वंदना की गई इसमें श्रीकृष्णायमें श्री का अर्थ है कि राधाजी को नमन किया गया.शुकदेव जी पूर्व जन्म में राधा जी की निकुंज के शुक थे.

 

निकुंज में गोपियों के साथ परमात्मा क्रीडा करते थे, शुकदेव जी सारे दिन श्री राधे-राधे कहते थे.

 

यह सुनकर श्री राधे ने हाथ उठाकर तोते को अपनी ओर बुलाया तोता आकर राधा जी के चरणों कि वंदना करता है.

 

वे उसे उठाकर अपने हाथ में ले लेती है तोता फिर श्री राधे , श्री राधे बोलने लगा. राधा जी ने कहा – कि अब तू राधे-राधे न कहकर कृष्ण-कृष्ण कह- राधेतिमा वद –कृष्ण कृष्ण बोल.

 

इस प्रकार राधा जी तोते को समझा रही थी.उसी समय कृष्ण वहाँ आ जाते है राधा जी ने उनसे कहा – कि ये तोता कितना मधुर बोलता है ओर उसे ठाकुर जी के हाथ मेंदे दिया.

 

इस प्रकार श्री राधा जी ने शुकदेव जी का ब्रह्मके साथ प्रत्यक्ष सम्बन्ध कराया.

 

इसलिए शुकदेव जी कि सद्गुरु श्री राधा जी है और सद्गुरु होने के कारण भागवतमें राधा जी का नाम नहीं लियाशुकदेव जी ने अपने मुख से राधा अर्थात अपने गुरु का नाम नहीं लिया,

 

और दूसरा कारण राधा शब्द भागवत में ना आने का कारण है किजब शुकदेव जी यदि राधा शब्द ले भी लेते तो वे उसी पल राधा जी के भाव में इतने डूब जाते कि पता नहीं कितने दिनों तक उस भाव से बाहर ही नहीं आ पाते ऐसे में राजा परीक्षित के पास तो केवल सात दिन ही थे फिर भागवत कि कथाकैसे पूरी होती.

 

जब राधाजी से कृष्णजी ने पूछा कि इस साहित्य में तुम्हारी क्या भूमिका होगी. तो राधाजी ने कहा मुझे कोई भूमिका नहीं चाहिए मैं तो आपके पीछे हूं.

 

इसलिए कहा गया कि कृष्ण देह हैं तो राधा आत्मा हैं. कृष्ण शब्द हैं तो राधा अर्थ हैं, कृष्ण गीत हैं तो राधा संगीत हैं, कृष्ण वंशी हैं तो राधा स्वर हैं, कृष्ण समुद्र है तो राधा तरंग हैं और कृष्ण फूल हैं तो राधा उसकी सुगंध हैं.

 

इसलिए राधाजी इसमें अदृश्य रही हैं. राधा कहीं दिखती नही है इसलिए राधाजी को इस रूप में नमन किया. जब हम दसवें, ग्यारहवें स्कंध में पहुंचेंगे, पांचवें, छठे, सातवें दिन तब हम राधाजी को याद करेंगे.

 

पर एक बार बड़े भाव से स्मरण करें राधे-राधे. ऐसा बार-बार बोलते रहिएगा राधा-राधा आप बोलें और अगर आप उल्टा भी बोलें तो वह धाराहो जाता है और धारा को अंग्रेजी में बोलते हैं करंट. भागवत का करंट ही राधा है.

 

आपके भीतर संचार भाव जाग जाए वह राधा है.जिस दिन आंख बंद करके आप अपने चित्त को शांत कर लें उस शांत स्थिति का नाम राधा है.

यदि आप बहुत अशांत हो अपने जीवन में तो मन में राधे-राधे….. बोलिए आप पंद्रह मिनट में शांत हो जाएंगे क्योंकि राधा नाम में वह शक्ति है.

 

भगवान ने अपनी सारी संचारी शक्ति राधा नाम में डाल दी. इसलिए भागवत में राधा शब्द हो या न हो राधाजी अवश्य विराजी हुई हैं.

“जय जय श्री राधे ”

“श्री श्याम सुन्दर गोस्वामी जी”

सेवाधिकारी श्री राधा रानी मन्दिर बरसाना

राधे राधे
??आज की “ब्रज रस धारा”??
दिनांक 13/02/2018

बनठन कर रहनेवाले व्यक्ति कोहिन्दी मेंबांकाकहा जाता है.अर्थात बांका जो भी होगा वह सजीला भी होगा. कोई भी व्यक्तिया तो पैदाइशी सुंदर होताहै या बनाव-श्रृंगार से सजीला बनताहै.

 

जब सजीले सलोनेपन कीबात आती है तो कृष्ण की छवि ही मन में उभरती है. कृष्ण जी का एक नामबांकेबिहारी है .

 

श्रीकृष्ण हर मुद्रा मेंबांकेबिहारीनहीं कहे जाते बल्कि “होठों पर बांसुरी लगाए”, “कदम्ब के वृक्ष से कमर टिकाए” हुए,”एक पैर में दूसरे को फंसाए हुए” तीन कोण पर झुकी हुई मुद्रा में ही उन्हें बांकेबिहारी कहा जाताहै.

 

भगवान तीन जगह से टेढ़े है.होठ,कमर और पैर. इसलिए उन्हें त्रिभंगी भी कहा जाता है.भगवान श्री कृष्ण तीन जगह से क्यों टेढ़े है इसका सम्बन्ध उनकी जन्म कथा से है.

 

जब गोकुल में भगवान के जन्म का पता चला तो सारे ग्वाल -बाल नन्द बाबा के घर बधाईयाँ ले-लेकर आये. नन्द बाबा की दो बहनें थी, नन्दा और सुनंदा, जो लाला के जन्म से पहले ही आई हुई थी.

 

जब बाल कृष्ण के जन्म को दो तीन घंटे हो गए तो सुनन्दा जी ने यशोदा जी से कहा – भाभी ! लाला को जन्म लिए इतनी देर हो गई, अब तक लाला को आपने दूध नहीं पिलाया.

 

तब यशोदा जी ने कहा -हाँ बहिन! आप ठीक कह रही हो.सुनन्दा जी बोली -भाभी! मै प्रसूतिका गृह के बाहर खड़ी हो जाती हूँ, किसी को भी अन्दर नहीं आने दूँगी, आप लाला को दूध पिला दीजिये.

 

इतना कहकर सुनंदा जी प्रसूतिका गृह के बाहर खड़ी हो गई.अब यशोदा जी जैसे ही बाल कृष्ण को अपनी गोद में उठाने लगी, तो बाल कृष्ण इतने कोमल थे कि यशोदा जी की उगलियाँ उन्हें चुभी,

 

यशोदा जी ने बहुत प्रयास किया, पर उन्हें यही लगा कि लल्ला इतना कोमल है कि मै इसे गोद में उठाऊँगी तो इसे मेरी उगलियाँ चुभ जायेगी.

 

अब माता यशोदा जी ने लाला को तो पलग पर ही लिटा दिया और स्वयं टेढ़ी होकर लाला को दूध पिलाने लगी.भगवान ने एक घूँट दूध पिया, दो घूँट दूध पिया,

 

जैसे ही तीसरा घूँट पीने लगे, तो बाहर खड़ी सुनंदा जी ने सोचा बड़ी देर हो गई अब तो लाला ने दूध पी लिया होगा और जैसे ही उन्होंने खिडकी से अन्दर झाँका तो तुरंत बोल पड़ी.

 

भाभी! लाला को प्रथम बार टेढ़े होकर दूध मत पिलाओ,जितने घूँट दूध ये पिएगा उतनी जगह से टेढ़ा हो जायेगा.इतना सुनते ही यशोदा जी झट हट गई, तब तक् बाल कृष्ण ने तीसरे घूँट दूध भी गटक लिया.

 

तीन घूँट दूध पीने के कारण कृष्ण तीन जगह से टेढे हो गए अर्थात “बाँके” और भगवान के जन्म कुंडली का नाम “बिहारी” था इस तरह बाँके बिहारी श्री कृष्ण का एक नाम बाँके बिहारी हुआ.

 

“टेढ़े सुन्दर नैन, टेढ़े मुख कहे बैन,

टेढो ही मुकुट बात,टेढ़ी कछु कह गयों,

टेढ़े घुंघुराले बाल, टेढ़ी गले फूल माल,

टेढ़े ही गुलाक,मेरे चित्त में बसे गयों,

टेढे पग ऊपर नुपुर झंकार करे,

टेढ़े बाँसुरी बजाय, चित्त चुरे गयो,

ऐसे टेढ़े टेढ़ीन को ध्यान धरे माया राम,

लत पटि पाग सो, लपेट मन ले गयो “

संस्कृत में भङ्ग का मतलब भी टेढ़, तिरछा, मोड़ा हुआ, सर्पिल, घुमावदार आदि ही होता है. गौर करें भंगिमा शब्द पर.

 

हाव-भाव के लिए नाटक या नृत्य में अक्सर भंगिमाएं बनाई जाती हैं. चेहरे पर विभिन्न हाव-भाव दर्शाने के लिएआंखों, होठों की वक्रगति से ही विभिन्न मुद्राएं बनाई जाती हैं जोभंगिमाकहलाती हैं.

 

इसी मेंबांकी चितवनया तिरछी चितवन को याद किया जा सकता है जिसका अर्थ ही चाहत भरी तिरछी नज़र होता है. श्रीकृष्ण की बांकेबिहारी वालीमुद्रा को इसीलिए त्रिभंगी मुद्रा भी कहते हैं.

 

लेकिन हमारे बाँके बिहारी जी के कहने ही क्या है , इनकी तो हर एक अदा टेढ़ी है

“तेरा टेढा रे मुकुट, तेरी टेढ़ी रे अदा”

हमें तेरा दीवाना बना दिया.

 

इस बाँके का तो सब कुछ बांका है-

“बाँके है नंद बाबा, और यशोमती,

बांकी घड़ी जन्मे है बिहारी,

बाँके कन्हैया के बाँके ही भ्रात

लड़ाके बड़े हलमुषलधारी

बांकी मिली दुल्हिन जग वन्दिनी

और बाँके गोपाल के बाँकेपुजारी

भक्तन दर्शन देन के कारण

झाँकी झरोखा में बाँके बिहारी”

नंदबाबा और यशोदा जी भी टेढ़ी है, बाल कृष्ण का जन्म ही हो गया उन्हें पता ही नहीं , जन्म भी श्री कृष्ण का हुआ, तो रात को १२ बजे , उनके भाई बलदाऊ जी,

जरा-सी बात पर ही हलमूशर उठा लेते है , और दुल्हन यानि राधा रानी वे भी बांकीहै दुनिया कृष्ण के चरण दबाती है ,

पर हमारी राधा रानी जी, कृष्ण से ही चरण दबवाती है , और उनके पुजारी भी बाँके है.

वृंदावन में भक्त तो दर्शन करने जाते है, और पुजारी जी बार-बार पर्दा लगा देते है. तो हुआ न उस बाँके का सब कुछ बांका

.”जय जय श्री राधे”

“श्री श्याम सुन्दर गोस्वामी जी”

सेवाधिकारी श्री राधा रानी मन्दिर बरसाना

राधे राधे
???आज की “ब्रज रस धारा”???
दिनांक 12/02/2018

भगवान श्रीकृष्ण और बलराम जी ने अक्रूरजी का भलीभांति सम्मान किया.फिर भगवान ने मथुरा में स्थित अपने सुह्रदय-कुटुम्बी जनो की कुशलता पूँछी.

 

नंदबाबा ने कहा हम सब काल प्रातःकाल ही मथुरा की यात्रा करेगे, और वहाँ चलकर राजा कंस को गोरस देंगे. वहाँ एक बहुत बड़ा उत्सव हो रहा है.

 

उसे देखने के लिए देश की सारी प्रजा इकट्टी हो रही है.हम लोग भी उसे देखेगे. नंदबाबा ने गाँव के कोतवाल के द्वारा यह घोषणा सारे व्रज में करवा दी .

 

यशोदा मैया को जब ये पता चला तो विकल हो गयी सारी रात उनकी रोते-रोते निकल गयी.मेरे कान्हा चले जायेगे ये विचार उन्हें व्यथित करे जा रहा था .

 

जब गोपियों ने सुना,कि हमारे मनमोहनश्यामसुन्दर और गौरसुन्दर बलरामजी को मथुरा ले जाने के लिए अक्रूरजी व्रज में आये है तब उनके ह्रदय में बड़ी व्यथा हुई,

 

गोपियों ह्रदय में ऐसी जलन हुई -कि गरम साँस चलने लगी,मुखकमल कुम्हला गया.भगवान के स्वरुप का ध्यान आते ही बहुत-सी गोपियों की चित्तवृत्तियाँ सर्वथा निवृत हो गयी.

 

मानो वे समाधिस्थ – आत्मा में स्थित हो गयी हो,और उन्हें अपने शरीर और संसार का कुछ ध्यान ही न रहा .

 

गोपियों के सामने भगवान श्रीकृष्ण का प्रेम उनकी मंद-मंद मुसकान और ह्रदय को स्पर्श करने वाली विचित्र पदों से युक्त मधुर वाणी नाचने लगी.

 

वे उसमे तल्लीनहो गयी,गोपियाँ मन-ही-मन उदारताभरी लीलाओ का चिंतन करने लगी और उनके विरह के भय से कातर हो गयी.

 

उनका ह्रदय, उनका जीवन – सब कुछ भगवान के प्रति समर्पित था, उनकी आँखों से आँसू बह रहे थे वे झुंड-के-झुंड इकट्ठी होकार इस प्रकार कहने लगी -गोपियों ने कहा-धन्य हो विधाता! तुम सब कुछ विधान तो करते हो परन्तु तुम्हारे ह्रदय में दया का लेश भी नहीं है पहले तो तुम सौहार्द और प्रेम से जगत के प्राणियों को एक-दूसरे के साथ जोड़ देते हो.

 

उन्हें आपस में एक कर देते हो,मिला देते हो परन्तु अभी उनकी आशा अभिलाषाएँ पूरी भी नहीं हो पाती, वे तृप्त भी नहीं हो पाते कि तुम उन्हें व्यर्थ ही अलग-अलग कर देते हो.

 

विधाता ! तुमने एक बार तो हमें वह परम सुन्दर मुखकमल दिखाया और अब उसे ही हमारी आँखे से ओझल कर रहे हो.सचमुच तुम्हारी यह करतूत बहुत हीअनुचित है.

 

हम जानती है इसमें अक्रूर का दोष नहीं है, यह तुम्हारी क्रूरता है वास्तव में तुम्ही अक्रूर के नाम से यहाँ आये हो.अहो! नंदनंदन श्यामसुन्दर को भी नये-नये लोगो से नेह लगाने की चाट पड़ गयी है.

 

देखो तो सही, इनका प्रेम एक क्षण में ही कहाँ चला गया? हम तो अपने घर-द्वार,स्वजन-सम्बन्धी, पति-पुत्र,आदि को छोडकर इनकी दासी बनी है परन्तु ये ऐसे है कि हमारी ओरदेखते तक नहीं.

 

मथुरा की युवतिया अपने मधु के समान मधुर वचनों से इनका चित्त बरबस अपनी ओर खीच लेगी ओर ये उनकी सलज्ज मुस्कान और विलासपूर्ण भाव-भंगी से वही रम जांएगे फिर हम गँवार ग्वालिनो के पास ये लौटकर क्यों आने लगे.

 

देखो सखी !यह अक्रूर कितना निष्ठुर कितना ह्रदय हीन है इधर तो हुम्गोपियाँ इतनी दुखित हो रही है और यह हमारे परम प्रियतम नंददुलारे श्यामसुन्दर को हमारी आँखों से ओझल करके बहुत दूर ले जाना चाहता है और दो बाते कहकर हमें धीरज भी नहीं बंधता सचमुच ऐसे अत्यंत क्रूर पुरुष का अकुर नाम नहीं होना चाहियेथा.

 

विरह की संभावना से अत्यंत व्याकुल हो गयी और लाज छोडकर हे गोविन्द!हे दामोदर हे माधव पुकार-पुकारकर सुललित स्वर से रोने लगी.

 

जबभगवान रथ पर सवार हो गये और छकडे पर चढ़कर गोप और नंदबाबा पीस-पीछे चले.

 

तब अनुराग के रंग में रागी हुई गोपियाँ अपने प्राणधन श्रीकृष्ण केपास गयी और मार्ग में लेट गयी भगवान ने देख की मेरे मथुरा जाने से गोपियों के ह्रदय में बड़ी जलन हो रही है वे रथ से उतरकर गोपियों के पास आये,

 

तो गोपियों ने कहा-प्यारे यदि आप को जाना ही है तो रथ को हमारे ह्रदय के ऊपर से निकलकर जाओ.हम तुम्हारे विरह का दुःख कैसे सहेगी और तुम्हारी मैया तो रो-रो के मार जायेगी .

 

भगवान ने कहा -गोपियों तुम प्रेम की ध्वजा हो,प्रेम करने वालो के लिए ये जरुरी नहीं कि उनका प्रेमी उनकी आँखों के सामने ही हो.मेरे कर्तव्य के मार्ग में बंधा बनना क्य तुम्हे शोभा देता हैमै कल या परसों तक आ जाऊँगा .

 

गोपियाँ जब तकरथ की ध्वजा और पहियों से उड़ती हुई धूल दीखती रही, तब तक उनके शरीर चित्रलिखित से वही ज्यो-के-त्यों खड़े रहे .

 

परन्तु उन्होंने अपना चित्त तो मनमोहन प्राण वल्लभ श्रीकृष्ण के साथ भेज दिया था फिर वे अपने घर चली आयी.सार-प्रेम यदि भगवान से कारण हो तो गोपियों जैसा हो .

 

गोपियों और सारे वृन्दावन के लोगो का इतना प्रेम भगवान से था कि भगवान कभी भी वृन्दावन छोडकर गए ही नहीं एक रूप से भगवान सदा वृन्दावन में ही रहे.

“ जय जय श्री राधे ”

“श्री श्याम सुन्दर गोस्वामी जी “
सेवाधिकारी श्री राधा रानी मन्दिर बरसाना

राधे राधे
??आज की “ब्रज रस धारा”??
दिनांक 11/02/2018

अक्रूरजी मथुरा में भगवान कृष्ण के कुटुम्बी थे. कंस की आज्ञा से वे भगवान को लेने व्रज गये.अक्रूरजी भगवान के बहुत बड़े भक्त थे. जो क्रूर न हो, तन से भी नहीं, मन से भी नहीं, वही भगवान को प्यारा है .

 

भगवानभी ऐसे भक्त का इंतजार करते है.अक्रूरजी की व्रज यात्रा, आध्यात्मिक द्रष्टि से, एक साधक की अध्यात्मिक यात्रा है. किस तरह से जाये? मन में भाव कैसा हो ?

 

भगवान ने कहा है–“ निर्मल, जन-मन सोही मोहि भावा, मोहे कपट, छल, छिद्र न भावा ”..प्रातःकाल रथ पर सवार हुए, और नंदबाबा के गोकुल की ओर चल दिए.

 

परम भाग्यवान अक्रूरजी व्रज की यात्रा करते समय मार्ग में कमलनयन भगवान श्रीकृष्ण की परम प्रेममयी भक्ति से परिपूर्ण हो गये. और इस प्रकार सोचने लगे – मैंने ऐसा कौन-सा शुभ कर्म किया है,

 

ऐसी कौन-सी श्रेष्ठ तपस्या की है जिसके फलस्वरूप आज मै भगवान श्रीकृष्ण के दर्शन करूँगा.

 

मै बड़ा विषयी हूँ ऐसी स्थिति में, बड़े-बड़े सात्विक पुरुष भी जिनके गुणों का ही गान करते रहते है दर्शन नहीं कर पाते, अवश्य ही आज मेरे अशुभनष्ट हो गये .

 

आज मेरा जीवन सफल हो गया ब्रह्मा, शंकर, इन्द्रादि बड़े-बड़े देवता जिन चरणकमलो की उपासना करते रहते हैस्वयं भगवती लक्ष्मी एक क्षण के लिएभी जिनकी सेवा नहीं छोडती.

 

प्रेमी भक्तो के साथ बड़े-बड़े ज्ञानी भी जिनकी आराधना में संलग्न रहते है भगवान के वे ही श्रीचरण गौओ को चराने के लिए ग्वालबालो के साथ वन-वन में विचरते है आज अवश्य ही उनका दर्शन करूँगा.

 

वे सम्पूर्ण लावण्य के धाम है. सौंदर्य की मूर्तिमान निधि है .जब समस्त पापों के नाशक उनके परम मंगलमय गुण, कर्म और जन्म की लीलाओ से युक्त होकर वाणी उनका गान करती है

 

तब उस गान से संसार में जीवन की स्फूर्ति होने लगती है शोभा का संचार हो जाता है सारी अपवित्रता धुलकर पवित्रता का साम्राज्य छा जाता है.

 

और जिस वाणी से उनके गुण, लीला और जन्म की कथाएँ नहीं गायी जाती, वह तो मुर्दों को हीशोभा करने वाली है, होने पर भी नहीं के समान – व्यर्थ है.

 

जो नेत्र वालेहै उनके लिए वह आनंद और रस की चरम सीमा है . जब मै उन्हें देखूँगा तब सर्वश्रेष्ठ पुरुष बलराम और श्रीकृष्ण के चरणों में नमस्कार करने के लिए तुरंत रथ से कूद पडूँगा.

 

उनके चरण पकड़ लूँगा ‘ओह! उनके चरण कितने दुर्लभ है, योगी-यति आत्मसाक्षात्कार के लिए मन-ही-मन अपने ह्रदय में उनके चरणों की धारणाकरते है .

 

मै तो उन्हें प्रत्यक्ष पाजाऊँगा. जब में उनके चरणों में गिर जाऊँगा, तब क्या, वे अपने करकमल मेरेसिर पर रख देगे ?मै कंस का दूत हूँ, कही वे मुझे अपना शत्रु तो न समझ बैठेगे? नहीं वे कदापि ऐसा न समझेगे क्योकि वे निर्विकार है, सम है, अच्युत है, सर्वज्ञ है.

 

वे अपनी लंबी-लंबी बांहों से पकड़कर मुझे अवश्य अपने ह्रदय से लगा लेगे. अहा ! उस समय मेरी तो देह पवित्र होगी ही, वह दूसरों को पवित्र करने वाली भी बन जायेगी और उस समय उनका आलिंगन प्राप्त होते ही मेरे कर्ममय बंधन जिनके कारण मै अनादिकाल से भटक रहा हूँ, टूट जायेगे.

 

इसी चिंतन में डूबे-डूबे रथ से वे नंदगाँव पहुँच गये.अक्रूर जी ने गोष्ठ में उनके चरणचिन्हो के दर्शन किये. अक्रूरजी देखते ही प्रेम के आवेश में रथ से कूद कर उस धूलि में लोटने लगे.

 

श्रीकृष्ण और बलराम को देखकर अक्रूरजी उनके चरणों में साष्टांग लोट गये, उनके नेत्रो से आँसू बहने लगे, वे इतना भाव विभोर हो गये कि अपना नाम भी न बता सके .

 

भगवान उनका मानो भाव जानकर उन्हें गले से लगा लिया और हाथ पकडकर घर में ले गये .औरउनका बड़ा आदर-सत्कार किया उन्होंने मार्ग में जो-जो अभिलाषाएँ की थी, वे सब पूरी हो गयी.

 

सार–कंस के सन्देश से लेकर यहाँ तक अक्रूर जी के चित्त की जैसी अवस्था रही है यही जीवो के देह धारण करने कापरम लाभ है.

 

इसलिए जीवमात्र का यही परम कर्तव्य है कि दंभ, भय, और शोक त्यागकर भगवान की मूर्ति, चिन्ह, लीला, स्थान, और गुणों के दर्शन, श्रवण आदि के द्वारा ऐसा ही भाव सम्पादित करे.

“ जय जय श्री राधे ”

“श्री श्याम सुन्दर गोस्वामी जी “
सेवाधिकारी श्री राधा रानी मन्दिर बरसाना

राधे राधे
??आज की “ब्रज रस धारा”??
दिनांक 10/02/2018

एक दिन भगवान ने देखा-कि व्रज में सब गोप और नंदबाब, किसी यज्ञ की तैयारी में लगे है, सारे व्रज में पकवान बन रहे है. भगवान श्रीकृष्ण सबके अंतर्यामी और सर्वज्ञ है, वे सब जानते है.

 

फिर भी उन्होंने नंदबाब आदि बड़े-बूढ़े गोपो से पूंछा–बाबा आपलोगों के सामने यह कौन-सा उत्सव आ पहुँचा है? इसका क्या फल है?

 

किस उद्देश्य से, कौन लोग, किन साधनों केद्वारा, यह यज्ञ किया करते है? आप बताइये मुझे सुनने की बड़ी उत्कंठा है .

 

नंदबाबा ने कहा-बेटा! भगवान इंद्र वर्षा करने वाले मेघों के स्वामी है, ये मेघ उन्ही के अपने रूप है, वे समस्त प्राणियों को तृप्त करने वाले एवं जीवनदान करने वाले जल बरसाते है. हम उन्ही मेघपति इंद्र की यज्ञ के द्वारा पूजा किया करते है उनका यज्ञ करने के बाद जो कुछ बचारहता है

 

उसी अन्न से हम सब मनुष्य अर्थ, धर्म, काम, की सिद्धि के लिए अपना जीवन निर्वाह करते है.भगवान ने कहा–कर्मणा जायते जंतु: कर्मणैव विलीयते.

 

सुखं दु:खं भयं क्षेमं कर्मणैवाभिपधते..“बाबा! प्राणी अपने कर्म के अनुसार ही पैदा होता और कर्म से ही मर जाता है उसे उसके कर्मो के अनुसार ही सुख-दुख भय और मंगलके निमित्तो की प्राप्ति होती है”

ये गौए, ब्राह्मण और गिरिराज का यजन करना चाहिये. इंद्र यज्ञ के लिए जो सामग्रियाँ इकठ्ठी की गयी है उन्ही से इस यज्ञ का अनुष्ठान होने दे.अनेको प्रकार के पकवान – खीर, हलवा, पुआ, पूरी, बनायें जाएँ, व्रज का सारा दूध एकत्र कर लिया जाये,

वेदवादी ब्राहाणों के द्वारा भलीभांति हवन करवाया जाये फिर गिरिराज को भोग लगाया जाये इसके बादखूब प्रसाद खा-पीकर सुन्दर-सुन्दर वस्त्र पहनकर गोवर्धन की प्रदक्षिणा की जाये, ऐसा यज्ञ गिरिराज और मुझे भी बहुत प्रिय है .

 

भगवान की इच्छा थी कि इंद्र का घमंड चूर-चूर कर दे. नंदबाबा आदि गोपो ने उनकी बात बड़ी प्रसन्नता से स्वीकार कर ली . भगवान जिस प्रकार कायज्ञ करने को कहा था वैसे यज्ञ उन्होंने प्रारंभ कर दिया .

 

सबने गिरिराज और ब्राह्मणों को सादर भेटे दी, और गौओ को हरी-हरी घास खिलाई फिर गोपिया भलीभांति श्रृंगार करके और बैलो से जुटी गाडियों पर सवार होकर भगवान कृष्ण की लीलाओ का गान करती हुई गिरिराज की परिक्रमा करने लगी.

 

भगवान श्रीकृष्ण गिरिराज के ऊपर एक दूसरा विशाल शरीर धारण करके प्रकट हो गये और ‘मै गिरिराज हूँ’ इस प्रकार कहते हुए उन्होंने अपना बड़ा-सा मुहँ खोला और छप्पन भोग और सारी सामग्री पात्र सहित आरोगने लगे.

 

आन्यौर-आन्यौर,और खिलाओ,और खिलाओ इस प्रकार भगवान ने अपने उस स्वरुप को दूसरे ब्रजवासियो के साथ स्वयं भी प्रणाम किया और कहने लगे – देखो कैसा आश्चर्य है, गिरिराज ने साक्षात् प्रकट होकर हम पर कृपा की है.और पूजन करके सब व्रज लौट आये .

 

जब इंद्र को यह पता चला की मेरी पूजाबंद कर दी गयी है तब वे नंदबाबा और गोपो पर बहुत ही क्रोधित हुए इंद्र को अपने पद का बड़ा घमंड था वे स्वयंको त्रिलोकी का ईश्वर समझते थे उन्होंने क्रोध में तिलमिलाकर प्रलय करने वाले मेघों के संवर्तक नामक मेघों को व्रज पर चढ़ाई करने की आज्ञ दी.

 

और स्वयं पीछे-पीछे ऐरावत हाथी पर चढ कर व्रज का नाश करने चल पड़े .इस प्रकार प्रलय के मेघ बड़े वेग से नंदबाबा के व्रज पर चढ़ आये और मूसलाधार पानी बरसाकर सारे ब्रज को पीड़ित करने लगे चारो ओर बिजलियाँ चमकने लगी.

 

बादल आपस में टकराकर कडकने लगे और प्रचण्ड आँधी की प्रेरणा से बड़े-बड़े ओले और दल-के-दल बादल बार-बार आ-आकर खम्भे के समान मोटी-मोटी धाराएँ गिराने लगे. तब व्रजभूमि का कोना-कोना पानी से भर गया और वर्षा की झंझावत झपाटे से जब एक–एक पशु और ग्वालिने भी ठंड केमारे ठिठुरने और व्याकुल हो गयी.

 

तब सब-के-सब भगवान श्रीकृष्ण की शरण में आये, सब बोले – कृष्ण अब तुम ही एकमात्र हमारे रक्षक हो, इंद्र के क्रोध से अब तुम्ही हमारी रक्षा कर सकते हो.भगवान ने देखा तो वे समझ गये कि ये सब इंद्र की करतूत है वे मन-ही-मन कहने लगे हमने इंद्र का यज्ञ भंग कर दिया है

 

इसी से व्रज का नाश करने के लिए बिना ऋतु के ही यह प्रचंड वायु और ओलो के साथ घनघोर वर्षा कर रहे हैमै भी अपनी योगमाया से इसका भालिभाँती जवाव दूँगा .

 

इस प्रकार कहकर भगवान ने खेल-खेल में एक ही हाथ से गिरिराज गोवर्धन को उखाड़ लिया और जैसे छोटा बच्चा बरसाती छत्ते के पुष्प को उखाडकर हाथ में रख लेते है वैसे ही उन्होंने उस पर्वत को धारण कर लिया.

 

इसके बाद भगवान ने कहा –मैया, बाबाऔर व्रजवासी तुम लोग अपनी गौओ और सब सामग्रियों के साथ इस पर्वत के गड्डे में आकर आराम से बैठ जाओ तब सब-के-सब ग्वालबाल छकडे, गोधन लेकर अंदर घुस गये.

 

थोड़ी देर बाद कृष्ण के सखाओ ने अपनी अपनी लाठिया गोवर्धन पर्वत में लगा दी और कृष्ण से कहने लगे कि ये मत समझना कि केवल तुम ही उठाये हुए हो तब कृष्ण जी ने कहा -“कछु माखन को बल बढ्यो कछु गोपन करि सहायश्री राधा जू कि कृपा से मेने गिरिवर लियो उठाय

 

“भगवान ने सब व्रजवासियो के देखते-देखते भूख प्यास की पीड़ा आराम-विश्राम की आवश्यकता आदि सब कुछ भुलाकर सात दिन तक लगातार उस पर्वत को उठाये रखा वे एक पग भी वहाँसे इधर-उधर नही हुये.

 

श्रीकृष्ण की योगमाया का यह प्रभाव देखकर इंद्र के आश्चर्य का ठिकाना नरहा अपना संकल्प पूरा न होने के कारण उनकी सारी हेकड़ी बंद हो गयी.

 

उन्होंने मेघों को अपने-आप वर्षा करने से रोक दिया. जब आकाश में बादल छट गये और सूरज देखने लगे तब सब लोग धीरे-धीरे सब लोग बाहर निकल आये सबके देखते-ही-देखते भगवान ने गिरिराज को पूर्ववत् उसके स्थान पर रख दिया .और व्रज लौट आये .

 

व्रज पहुँचे तो ब्रजवासियों ने देखा कि व्रज की सारी चीजे ज्यो-की-त्यों पहले की तरह है एक बूंद पानी भी कही नहीं है.तब ग्वालो ने श्रीकृष्ण से पूंछा–कान्हा सात दिन तक लगातार इतना पानी बरसा सब का सब पानी कहाँ गया.

 

भगवान ने सोचा – यदि मै इन ग्वालवालो से कहूँगा कि मैने शेष जीऔर सुदर्शन चक्र को व्रज के चारों ओर लगा रखा था ताकि व्रज में पानी न आये.तो ये व्रजवासियो को विश्वास नहीं होगा.इसलिए भगवान ने कहा– तुम लोगो ने गिरिराज जी को इतना भोग लगाया, पर किसी ने पानी भी पिलाया इसलिए वे ही सारा पानी पी गये .

 

तब सब ने कहा – लाला गिरिराज जी ने इतना खाया कि हम लोग उन्हें पानी पिलाना ही भूल गये .एक दिन भगवान जब एकांत में बैठे थे तब गोलोक से कामधेनु और स्वर्ग से इंद्र अपने अपराध को क्षमा माँगने के लिए आये उन्होंने हाथ जोड़कर १० श्लोको में भगवान की स्तुति की .

 

फिरकामधेनु ने अपने दूध से और इंद्र ने ऐरावत की सूंड के द्वारा लाए हुए आकाश गंगा के जल से देवर्षियो के साथ यदुनाथ श्रीकृष्ण का अभिषेक किया और उन्हें ‘गोविन्द’नाम से संबोधित किया इसके बाद वे स्वर्ग चले गये.“जय जय श्री राधे”

” श्री श्याम सुन्दर गोस्वामी जी”
सेवाधिकारी श्री राधा रानी मन्दिर बरसाना

राधे राधे
??आज की “ब्रज रस धारा”??
दिनांक 09/02/2018

एक दिन नन्दनंदन श्यामसुन्दर वन में कलेवा करने के विचार से, बड़े तडके उठ गये, और सिंगी कीमधुर ध्वनि सेअपने साथी ग्वालबालो को मन की बात जनाते हुए जगाया औरबछडो को आगे करके, वे ब्रजमंडल से निकल पड़े.

 

श्रीकृष्ण के साथ ही उनके प्रेमी सहस्त्रो ग्वालबाल छीके, बेत, सिंगी औरबाँसुरी,लेकर, घरों से चल पड़े, फिर उन्होंने वृन्दावन के लाल-पीले-हरे फलोसे, नयी-नयी कोपलों से गुच्छों से, रंग-बिरंगे फूलोंसे, मोरपंखो से, और गेरु आदिरंगीन धातुओ सेअपने को सजा लिया.

 

कोई किसीका बेत या बाँसुरी चुरा लेता, एक दूसरे कीतरफ फेक देते, फिर वापसलौटा देते, कोई भौरों केसाथ गुनगुना रहा है, कोई कोयलो केस्वर-में-स्वर मिलकर कुहू-कुहू कर रहे है,

 

कोई मोरो को देखकर नाचता, कोई बंदरों की पूंछ पकड़कर खीच रहे है,भगवान श्रीकृष्ण ज्ञानी संतो के लिए स्वयं ब्रह्मानंद के मूर्तिमान अनुभवहै दास्यभाव से युक्त भक्त के लिए वे आराध्येदेव देव परम ऐश्वर्येशाली परमेश्वर है.

 

बहुत जन्मो काश्रम और कष्ट उठाकर जिन्होंने अपनी इन्द्रियों और अन्तःकरण को वश में कर लिया है उन योगियों के लिए भगवान केचरण कमलों कीरज अप्राप्त है.

 

वही भगवान स्वयं ब्रजवासी ग्वालबाल की आँखों केसामने रहकर सदाखेल खेलते है. कभी उनके कंधे पर चढ़ जातेहै, कभी किसी के गले से लग जाते है,

 

उनके सौभाग्य की महिमाइससे अधिक क्या कहीजाये.इसी समय अघासुर नाम का महान दैत्य आ गया. उससे श्रीकृष्ण और ग्वालबालो की सुखमयी क्रीडा देखी ना गयी, वह इतना भयानक था, कि देवता भीउसकी मृत्यु की बाट देखते रहते थे,

 

वह पूतनाऔर बकासुर का छोटा भाई, कंस का भेजा हुआ था. श्रीकृष्ण को देखकर वहसोचने लगा कि यह ही मेरे भाईबहिन को मारने वाला है इसे मार दूँगा.

 

यह सोचकरवह अजगर का रूप धारण करके मार्ग में लेट गया,उसकावह शरीर एक योजन लंबे बड़े पर्वत केसमान विशाल एवं मोटाथा,वह बहुत ही अदभुद था.

 

उसकी नियत सब बालको कीनिगलने की थी इसलिए उसने गुफा के समान अपना बहुत बड़ा मुहँ फाड़ रखाथा उसका नीचे का होठ पृथ्वी, और ऊपर का होठ बादलों से लग रहा था, उसके जबड़े कंदराओ के समान थे,

 

और दाढे पर्वत केशिखर-सी जान पड़ती थी,जीभ एक चौड़ीलाल सड़क-सी दीखती थी,साँस आँधी के समान थी.अघासुर का रूप देखकर बालको नेसमझा कि यह भी वृन्दावन की शोभा है.

 

वे कौतुकवश खेल-खेल में उत्प्रेक्षा करने लगे–वे कहने लगेकि ये तो अजगर का खुला हुआमुहँ है.

 

इस प्रकार कहते हुएवे ग्वालबाल श्रीकृष्ण का सुन्दर मुख देखते औरताली पीट-पीटकर एक गुफा समझकर,अधासुर के मुहँ मेंचले गये.

 

उन अनजानबच्चो कीआपस में की हुई भ्रमपूर्ण बाते सुनकर भगवान श्रीकृष्ण ने सोच कि-‘अरे इन्हें तो सच्चासर्प भी झूठा प्रतीत होता है ‘.भगवान जान गये कि यह राक्षस है भला उनसे क्या छिपा है?सब ग्वालबाल अघासुरके पेट में चले गये.

 

पर उसने उन्हें निगला नहीं क्योकि वह इस बात की बाट देख रहा था कि श्री कृष्ण मुहँ मेंआ जाये तब सबको एक साथ निगल जाऊँगा.

 

भगवान भूत-भविष्य-वर्त्तमान,सबको प्रत्यक्ष देखतेरहते है वे स्वयंउसके मुहँ मेंघुस गये.अघासुर बछडो और ग्वालो के सहित भगवान श्रीकृष्ण को अपनी दाढ़ो सेचबाकर चूर-चूरकर डालना चाहता था.

 

परन्तु उसी समय अविनाशी श्रीकृष्ण ने बड़ी फुर्ती से अपना शरीर बढ़ा लिया.इसके बादभगवान नेअपने शरीर को इतना बड़ा कर लिया कि उसका गलाही रुँध गया .

 

वह व्याकुल होकर बहुत ही छटपटाने लगा साँसरुककर सारे शरीर मेंभर गयी.और अंत में उसकेप्राण ब्रहारंध्र फोडकर निकल गये.

 

उसी समय भगवान नेबछडो और ग्वालबालो को जिला दिया और उन सबको साथ लेकरवे अघासुर के मुहँ से बाहर निकल गयेउस अजगर के स्थूलशरीर से एक अत्यंत अद्भुत और महान ज्योति निकली, और भगवानमें समांगयी.

 

सार-यह लीला भगवान नेपाँच वर्ष मेंही की थी अघासुर पाप का स्वरुप था भगवानके स्पर्श मात्र सेसके सारेपाप धुल गये और उसे उस ‘सारूप्यमुक्ति’प्राप्त हुई

 

“भगवान श्रीकृष्ण के किसी एक अंग की भावनिर्मित प्रतिमा यदि ध्यान केद्वारा एक बार भी हृदय में बैठाली जाये तो वह सालोक्य,सामीप्य,आदि गति दान करतीहै.

 

भगवानआतामानंद के नित्य साक्षत्कारस्वरुप है माया उनके पासफटक नहींपाती.वे ही स्वयंअघासुर के शरीर में प्रवेश कर गये.

“श्री श्याम सुन्दर गोस्वामी जी”

राधे राधे
??आज की “ब्रज रस धारा”??
दिनांक 08/02/2018

जब गोकुल में बहुत बड़े-बड़े उत्पात होने लगे, तो नंदबाबा और बड़े-बूढ़े सब लोगो ने इकठ्ठा होकर – ‘अबब्रजवासियो को क्या करना चाहिए?’ इसविषय पर विचार किया.

 

उनमेसे उपनन्द नाम के गोपथे, उन्हेंपता था कि किस समय क्या व्यवहार करना चाहियें, उन्होंने कहा –‘भाईयो ! अब यहाँ ऐसे उत्पात होने लगे है जो बच्चो के लिए तो बहुत ही अनिष्टकारी है

 

इसलिएयदि हम लोगगोकुल और गोकुलवासियो का भला चाहते है तो यहाँ सेकूच कर देना चाहिए.यहाँ से पास ही में“वृन्दावन”नाम का एक वन है,

 

उसमे छोटे-छोटे और भी बहुत से नये-नये वन है वहाँ बड़ा ही पवित्र पर्वत,घास और हरी-भरी लता-वनस्पतियाँ है .गोप, गोपी और गायों के लिए तोवह केवल सुविधा का ही नहीं, सेवन करने योग्य स्थान है सो यदि तुम सब लोगो को यह बात जँचती हो तो आज ही हम लोग वहाँ के लिए कूच कर दे.

 

गाड़ी–छकडे जोते और पहले गायों को जो हमारी एकमात्र संपत्ति है वहाँ भेज दे . सब ने सहमति दे दी.सब लोगों ने झुंड-की-झुंड गाये इकट्टी की, बूढों, बच्चो और स्त्रियों को, और घर की सब सामग्री छकडे पर लादकर स्वयं उनके पीछे-पीछे धनुष-बाण लेकर बड़ी सावधानी से चलने लगे,

 

उन्होंने गौ और बछडो को सबसे आगे कर लिया और उनके पीछे सिंगी और तुरही जोर-जोर से बजाते हुए वृन्दावन की यात्रा करने लगे. गोपियाँ सुन्दर-सुन्दर वस्त्र पहनकर गले में हार धारण किये हुए,

 

बड़े आनंद से भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओ के गीत गाती जाती थी यशोदारानी और रोहिणी जी भी वैसे ही सज-धज कर अपने-अपने प्यारे पुत्र श्रीकृष्ण और बलराम के साथ एक छकडे पर शोभायमान हो रही थी.

 

वे अपने दोनों बालको की तोतली बोली सुनकर अघाती ना थी.वृन्दावन बड़ा ही सुन्दर वन था. चाहे कोई भी ऋतु हो, वहाँसुख-ही-सुख है, वहाँ हरा-भरा वन अत्यंत मनोहर, गोवर्धन पर्वत और यमुना नदी के सुन्दर-सुन्दर पुलिनो को देखकर भगवान कृष्ण और बलराम के हृदय में प्रीति का उदय हुआ .

 

थोड़े ही दिनों में समय आने पर वे ‘बछड़ा चराने’ लगे. दूसरे ग्वालबालो के साथ खेलने के लिए बहुत-सी सामग्री लेकर, वे घर से निकल पड़ते और गोष्ठी के पास ही अपने बछडोको चराते, कही भगवान बाँसुरी बजा रहे है तो कही गुलेल या ढेलवाँस से ढेले फेक रहे है,

 

किसी समय अपने पैरों के घुँघरू पर तान छेड रहे है तो कही बनावटी गाय और बैल बनकर खेल रहे है,एक ओर देखिये तो सांड बनकर आपस में लड़ रहे है, तो दूसरी ओर मोर, कोयल, बन्दर, आदि पशु-पक्षियों की बोलियाँ निकाल रहे है

 

इस प्रकार उस सुन्दर वृन्दावन मेंभगवान की बड़ी ही अनुपम शोभा है .सार-वृन्दावन के कण-कण में भगवान का वास है वृन्दावन की धूलिके लिए बड़े-बड़े योगी जन भी तरसते है|“जय जय श्री राधे “

“श्री श्याम सुन्दर गोस्वामी जी “

राधे राधे
??आज की “ब्रज रस धारा”??
दिनांक 07/02/2018

भगवान अब ‘पौगंण्ड-अवस्था’ में अर्थात छठे वर्ष में प्रवेश किया.एक दिन भगवान मैया से बोले – ‘मैया! अब हम बड़े हो गये है.

 

मैया ने कहा- अच्छा लाला! तुम बड़े हो गये तो बताओ क्या करे?भगवान ने कहा- मैया अब हम बछड़े नहीं चरायेगे, अब हम गाये चरायेगे.मैया ने कहा- ठीक है! बाबा से पूँछ लेना.

 

झट से भगवान बाबा से पूंछने गयेबाबा ने कहा– लाला!, तुम अभी बहुत छोटे हो, अभी बछड़े ही चराओ . भगवान बोले – बाबा मै तो गाये ही चराऊँगा.

 

जब लाला नहीं माने तो बाबा ने कहा – ठीक है लाला!, जाओ पंडित जी को बुला लाओ, वे गौ-चारण का मुहूर्त देखकर बता देगे.

 

भगवान झट से पंडितजी के पास गए बोले- पंडितजी! बाबा ने बुलाया है गौचारण का मुहूर्त देखना है आप आज ही का मुहूर्त निकल दीजियेगा, यदि आप ऐसा करोगेतो मै आप को बहुत सारा माखन दूँगा.

 

पंडितजी घर आ गए पंचाग खोलकर बार-बार अंगुलियों पर गिनते.बाबा ने पूँछा-पंडित जी क्या बात है?आप बार-बार क्या गिन रहे है .

 

पंडित जी ने कहा –क्या बताये, नंदबाबाजी, केवल आज ही का मुहूर्त निकल रहा है इसके बाद तो एक वर्ष तक कोई मुहूर्त है ही नहीं. बाबा ने गौ चारण की स्वीकृति दे दी .

 

भगवान जिस समय, जो काम करे, वही मुहूर्त बन जाता है उसी दिन भगवान ने गौ चारण शुरू किया वह शुभ दिन कार्तिक-माह का“गोपा-अष्टमी”का दिन था.

 

अब भगवान अपने सखाओ के साथ गौए चराते हुए वृन्दावन में जाते औरअपने चरणों से वृन्दावन को अत्यंत पावन करते. यह वन गौओ के लिए हरी-हरीघास से युक्त एवं रंग-बिरंगे पुष्पों की खान हो रहा था,

 

आगे-आगे गौएँ उनके पीछे-पीछे बाँसुरी बजाते हुए श्यामसुन्दर तदन्तर बलराम और फिर श्रीकृष्ण के यश का गान करते हुए ग्वालबाल,इस प्रकार विहार करने के लिए उन्होंने उस वन में प्रवेश किया.

 

उस वन में कही तो भौरे बड़ी मधुर गुंजार कर रहे थे कही झुंड-के-झुंड हिरन चौकड़ी भर रहे थे कही बहे ही सुन्दर-सुन्दर सरोवर थे भगवान ने देखा बड़े-बड़े वृक्ष फल और फूलों के भर से झुक कर अपनी डालियों और नूतन कोपलों की लालिमा से उनके चरणों का स्पर्श कर रहे है

 

इस प्रकार वृन्दावन को देखकर भगवान श्रीकृष्ण को बहुत ही आनंद हुआ.वे अपने सखाओ के साथ गोवर्धन की तराई में,यमुना तट पर गौओं को चराते.

 

भगवान बलरामजी के साथ वनमाला पहने हुए मतवाले भौरों की सुरीली गुनगुनाहट में अपना स्वर मिलकर मधुर संगीत अलापने लगे,कभी मोरो के साथ ठुमक-ठुमककर नाचने लगते है उनकेकंठ की मधुर ध्वनि सुनकर गौए और ग्वालबाल का चित्त वश में नहीं रहता.

 

जब बलराम जी खेलते-खेलते थक जाते तोकिसी ग्वालबाल की गोद के तकिये पर सिर रखकर लेट जाते तब श्रीकृष्ण उनके पैर दबाने लगते,

 

पंखा झलने लगतेऔर उनकी थकावट दूर करते, जब वे थक जाते तो वे किसी ग्वालबाल की गोद में सिर रखकर लेट जाते उस समय कोई–कोई पुण्य के मूर्तिमान स्वरुप ग्वालबाल महात्मा श्रीकृष्ण के चरण दबाने लगते और दूसरे निष्पाप बालक उन्हें पत्तों या अँगोछियो से पंखा झलाने लगते

 

स्वयं लक्ष्मीजी जिनके चरणों की सेवा में संलग्न रहती है,वे ही भगवान इन ग्रामीण बालको के साथ बड़ेप्रेम से खेल खेला करते थे भगवान ने योगमाया से अपने ऐश्वर्येमय स्वरुपको छिपा रखा था. इस प्रकार वे अनेको लीलाये करने लगे.

 

सार-गौ ही सबकी माता है, भगवान भी गौ की पूजा करते है, सारे देवी-देवो का वासगौ में होता है, जो गौ की सेवा करता है गौ उसकी सारी इच्छाएँ पूरी कर देती है.

“ जय जय श्री राधे ”

“श्री श्याम सुन्दर गोस्वामी जी “

राधे राधे
??आज की “ब्रज रस धारा”??
दिनांक 06/02/2018

एक बार कन्हैया ब्रज में किसी के घर जाते है और उस गोपी से कहते है,” क्या मक्खन ले लूँ .गोपी कहती है -देख लाला !

 

यदि तुम्हें मक्खन खाना हो, तो मेरा थोड़ा सा काम करना पड़ेगा.यह सुनकर कन्हैया कहता है -गोपी ! बता तेरा क्या काम करना है?

 

गोपी कहती हैं-देखो! ‘मेरा वह पीढ़ा(पाटला) ले आओ”सच जहाँ प्रेम होता है वहाँ संकोच नहीं होता. यह तो शुद्ध प्रेम-लीला है.

 

कन्हैया जाते है और पीढ़ा उठाते तो है,किन्तु भारी होने के कारण उसे उठा नहीं पाता .कन्हैया अत्यंत कोमलशरीर का है.

 

फिर भी उसे मक्खन का लालचहै वह पीढ़ा उठाते है, किन्तु वह पीढा बड़ा भारी था ,

 

भारी होने के कारण रास्ते में उसके हाथ से छुट जाता है और उसका पीताम्बर भी खुल जाता है.ज्ञानी पुरुष को ब्रह्म-साक्षात्कार होता है.

 

फिर भी ज्ञानी पुरुष जब तक पंचभौतिक शारीर में होता है, तब तक माया का थोड़ा पर्दा होता ही है.उसे प्रारब्ध का कुछ भोग भोगना ही पड़ता है.

 

माया यदि थोड़ी भी बाकि होती है, तो भी प्रारब्ध भोगना ही पड़ता है. गोपियाँ निरावरणपरमात्मा के दर्शन करती हैं. जहाँ अतिशय प्रेम होता है वहाँ पर्दा हट जाता है.

 

पीढ़ा गिरते ही कन्हैया रोने लगते है. गोपी दोड़कर आती है और कहती है,- अरे! लाला तुझे क्या हो गया? क्या कुछ चोट लग गई? कन्हैया कहते है,

 

” चोट तो नहीं लगी, किन्तु मेरा पीताम्बर खुल गया है .गोपी लाला को पीताम्बर पहनाती है.

 

वास्तव में जहाँ ऐश्वर्य होता है, वहाँ पर्दा होता है. प्रेम में पर्दा नहीं होता.सच है प्रेम का सम्बन्ध ही सबसे ऊँचा है.

“श्री श्याम सुन्दर गोस्वामी जी”

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Shree Ji Barsana Mandal Trust (SJBMT)

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