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राधे राधे
??आज की “ब्रज रस धारा”??
दिनांक 31/03/2018

 

भगवान कृष्ण के उत्सव इतनेहै कि साल में ३६५ दिन है और भक्तजन ३७०उत्सव मानते है जब भगवान ने पहली बार छीका,जब उगली से इशारा किया,जव बोलना शुरूकिया,चलना शुरू किया,पहली बार खाया. इन्ही में से एक है भगवान का‘करवट उत्सव’, जब भगवान ने करवट बदली.

 

एक बार यशोदा मैयाने भगवान को चित पलगपर सुलाया, जब मैया काम करके थोड़ी देर बाद आई, तो उन्होंने देखा की लाला ने स्वयं करवटली है, तो वे बड़ी प्रसन्न हुई और उसीदिन भगवान का जन्म नक्षत्र भीथा.उस दिन घर में भगवान के करवट बदने का‘अभिषेक-उत्सव’मनाया जा रहा था.

 

घर में बहुत सी स्त्रियों की भीड़ लगी हुई थी,गाना बजाना हो रहा था,यशोदा जी ने पुत्र का अभिषेक किया.उस समय ब्राह्मण लोग मंत्र पढ़कर आशीर्वाद दे रहे थे, नंदरानी यशोदा जी ने ब्राह्मणों का खूब पूजन-सम्मान किया,उन्हें अन्न, वस्त्र, माला, गाय, आदि मुँहमाँगी वस्तुएँ दी.

 

जब यशोदा ने उन ब्राह्मणों द्वारा स्वस्तिवाचन कराकर स्वयं बालकके नहलाने आदि का कार्ये संपन्न कर लिया,तब ये देखकर कि मेरे लल्लाके नेत्रोंमें नींद आरही है,अपने पुत्र को धीरे से शय्या पर सुला दिया,थोड़ीदेर में श्यामसुन्दर की आँखेखुली,तो वे दूध के लिएरोने लगे.

 

उस समययशोदा जी उत्सव में आये हुए ब्रजवासियो के स्वागत सत्कार मेंबहुत ही तन्मय थी.इसलिए उन्होंने श्रीकृष्ण का रोना सुनायी नहीं पड़ा,तब श्रीकृष्ण रोते-रोते अपने पाँव उछालने लगे,श्रीकृष्ण एक छकडे़ के नीचे सोये हुए थे उनके पाँव अभी लाल-लाल कोपलों के समान बड़े ही कोमल औरनन्हे-नन्हे थे

 

परन्तु वह नन्हा-सा पाँव लगते ही विशाल छकडा़ उलट गया*उस छकडे पर दूध दही आदि अनेक रसो से भरीहुई मटकियाँ औरदूसरे बर्तन रखे हुए थे वे सब-के- सब फूट-फाट गये और छकडे़ के पहिये तथा धुरे अस्त-व्यस्त हो गये, उनका जुआ फट गया.

 

करवट बदलनेके उत्सव में जितनी भी स्त्रियाँ आई हुई थी वे सब-के-सब और यशोदा, रोहिणी, नंदबाबा, और गोपगण इस विचित्रघटना को देखकर व्याकुल होगये वे आपसमें कहने लगे अरे!येक्या हो गया ?यह छकडा़ अपने-आप कैसे उलट गया ?वे इसका कोई कारण निश्चित नाकर सके वहाँ खेलतेबालको ने कहा इस कृष्ण ने ही रोते-रोते अपने पावँ की ठोकर सेइसे उलट दिया है.

 

परन्तु बालको की बात पर किसी ने विश्वास नहीं किया.यशोदा जी ने अपने रोते हुए लाडले लाल को गोद मेंलेकर ब्राह्मणों से वेदमंत्रो के द्वारा शांतिपाठ कराया.*हिरण्याक्ष का पुत्र था उत्कच .

 

वह बहुत बलवानथा, एक बार उसने लोमश ऋषि के आश्रम के वृक्षों कोकुचल डाला लोमश ऋषि ने क्रोध करके शाप दे दिया- अरे दुष्ट! जा, तू देह रहित हो जा.उसी समय उसका शरीर गिरनेलगा वह ऋषिके चरणों में गिर पड़ा और प्रार्थना की.

 

तो ऋषि ने कहा -वैवस्वत मन्वंतर में श्रीकृष्ण के चरण-स्पर्शसे तेरी मुक्ति हो जायेगी वहीअसुर छकडे़में आकर बैठ गया थाऔर भगवान के चरण स्पर्श मुक्त हो गया .

 

सारयशोदा जी ने दूध-दहीकी मटकिंयोको तो ऊपर रख दिया औरभगवान को नीचे सुला दिया उसी प्रकार हम भी यह गलतीकरते है सांसारिक वस्तुओं कोऊपर रखते है भगवान बाद में रखते है परभगवान उन सांसारिक वस्तुओं तोड़ देते है.

“ जय जय श्री राधे”

“श्री श्याम सुन्दर गोस्वामी जी ”

सेवाधिकारी श्री राधा रानी मन्दिर बरसाना
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राधे राधे
??आज की “ब्रज रस धारा”??
दिनांक 30/03/2018

पूर्व काल में नैमित्तिक प्रलय के समय एक महान दैत्य प्रकट हुआ जो शंखासुर के नाम से प्रसिद्ध हुआ जो देवताओ को जीतकर ब्रह्लोक गया वहाँ सोते हुए ब्रह्मा के पास से वेदों की पोथी चुराकर समुद्र में जा घुसा वेदों के जाते ही देवताओ का सारा बाल चला गया तब पूर्ण भगवान यज्ञेश्वर श्री हरि ने मतस्य रूप धारण करके उस दैत्य के साथ युद्ध किया और और अंत में चक्र से उसका मस्तक काट डाला.

 

इसके बाद देवताओ के साथ भगवान श्री हरि प्रयाग में आये और वे चारो वेद ब्रह्मा जी को दे दिए. फिर यज्ञ अनुष्ठान किया और प्रयाग तीर्थ के अधिष्ठाता देवताओ को बुलाकर उसे”तीर्थराज”पद पर अभिषिक्त किया. मुनि कन्या गंगा और सूर्यसुता यमुना अपनी तरंगरुपी चामरो से से उनकी सेवा करने लगी.

 

उसी समय सारे तीर्थ भेट लेकर बुद्धिमान तीर्थ रज के पास आये और उनकी पूजा और वंदना करने लगे फिर अपने अपने स्थानो को चले गए.जब सब चले गए तो देवर्षि नारद जी वहाँ आये और सिंहासन पर विराजमान तीर्थ राज से बोले.नारद जी ने कहा -महातपस्वी तीर्थराज ! निश्चित ही तुम सभी तीर्थो द्वारा विशेष रूप से पूजित हुए हो सभी ने तुम्हे भेटे दी है.

 

परन्तु व्रज के वृंदावन आदि तीर्थ यहाँ तुम्हारे सामने नहीं आये तुम तीर्थो के राजाधिराज हो व्रज के प्रमादी तीर्थो ने यहाँ न आकर तुम्हारा तिरिस्कार किया है.यू कहकर देवर्षि नारद चले गए.

 

और तीर्थराज को मन में क्रोध हुआ और तुरंत श्री हरि के लोक में गए.तीर्थराज ने हाथ जोड़कर भगवान से कहा- हें देव ! मै आपकी सेवा में इसलिए आया हूँ, कि आपने तो मुझे तीर्थराज बनाया है और समस्त तीर्थ मेरे पास आये परन्तु मथुरामंडल के तीर्थ मेरे पास नहीं आये. उन प्रमादी व्रजतीर्थ ने मेरा तिरिस्कार किया है.

 

अतः यह बात मै आपसे कहने के लिए आया हूँ.भगवान ने कहा -मैंने तुम्हे तीर्थोका राजा तीर्थराज अवश्य बनाया है किन्तु अपने घर का राजा तुम्हे नहींबनाया है . फिर भी तुम मेरे गृह पर भी अधिकार ज़माने की इच्छा लेकर प्रमत्त पुरुष के समान बात कैसे कर रहे हो ?

 

तीर्थराज तुम अपने घर जाओ और मेरा यह शुभ वचन सुनो ! मथुरामंडलमेरा साक्षात् परात्पर धाम है त्रिलोकी से परे है उस दिव्यधाम का प्रलयकाल में भी संहार नहीं होता.

 

भगवान की बात सुनकर तीर्थराज बड़े विस्मित हुए और उनका सारा अभिमान टूट गया फिर वहाँ से आकर उन्होंने मथुरामंडल के व्रज मंडल का पूजन किया और प्रतिवर्ष आने लगे.

“कीरत सुता के पग-पग में प्रयागराज ,केशव की केलि कुंज कोटि-कोटि काशी हैं

यमुना में जगन्नाथ, रेणुका में रामेश्वर, पग -पग में पड़े यहाँ अयोध्या निवासी हैं

गोपिन के द्वार-द्वार, बसत हरिद्वारजहाँ , बद्री, केदारनाथ फिरत दास-दासी हैं

स्वर्ग अपवर्ग  व्याधा लेकर हम करेंगे कहा , जानते नहीं हो हम श्री वृंदावन वासी हैं ”

इसी प्रकार वारह कल्प में श्री हरि ने जब वारह रूप में अपनी दाढ पर पृथ्वी को उठाकर रसातल से बाहर लाकरउसका उद्धार किया, तब पृथ्वी ने पूछा कि -प्रभो ! सारा विश्व पानी से भरा दिखायी देता है. अतः बताईये आप किस स्थल पर मेरी स्थापना करेगे?

 

भगवान ने कहा -जब वृक्ष दिखायी देने लगे और जल में उद्वेग का भाव प्रकट हो तब उसी स्थान पर स्थापना करुगा .पृथ्वी ने कहा -भगवान ! स्थावर वस्तुओ कि रचना तो मेरे ही ऊपर हुई है क्या कोई दूसरी भी धरणी है?धारणामई धरणी तो केवल मै हूँ .

 

तभी पृथ्वी ने जल में वृक्ष देखे उन्हें देखकर पृथ्वी का अभिमान दूर हो गया और बोली देव ! किस स्थल पर ये वृक्ष है ? इसका क्या रहस्य है ? मुझे बड़ा आश्चर्य हो रहा है ?भगवान ने कहा- यह दिव्य”माथुर मंडल”दिखायी देता है ,

जो गोलोक कि धरती से जुड़ा हुआ है प्रलय काल में भी इसका संहार नहीं होता .इस प्रकार इस व्रज मंडल की महिमा प्रयाग से भी उत्कृष्ट है. ये पृथ्वी का हिस्सा नहीं है.”जय जय श्री राधे”

“श्री श्याम सुन्दर गोस्वामी जी ”

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राधे राधे
???आज की “ब्रज रस धारा”???
दिनांक 29/03/2018

एक दिन की बात है यशोदाजी अपने प्यारे लल्ला को गोद में लेकर दुलाररही थी.सहसा श्रीकृष्ण चट्टान के समान भारी बन गये,वे उनका भार न सह सकी उन्होंने भार से पीड़ित होकर श्रीकृष्ण को पृथ्वी पर बैठा दिया,इस नयी घटना से वे अत्यन्त चकित हो रही थी.

 

इसके बाद उन्होंने भगवान पुरुषोत्तम का स्मरण किया और घर के कामो में लग गयी.तृणावर्त नामक एक दैत्य था वह कंस का निजी सेवक था कंस की प्रेरणा से ही बवंडर के रूप में वह गोकुल में आया और बैठेहुए बालक श्रीकृष्ण को उडाकर आकाश में ले गया.

 

उसने ब्रजरज से सारे गोकुल को ढक दिया और लोगो के देखने की शक्ति हर ली उसके अत्यंत भयंकर शब्दों से दसों दिशाएँ काँप गयी सारा ब्रज दो घडी तक रज और तम से ढक गया.

 

यशोदा जी ने अपने पुत्र को जहाँ बैठा दिया था वहाँ जाकर देखा तो श्रीकृष्ण वहाँ नहीं थे,अपने पुत्र का पता न पाकर यशोदाजी को बड़ा शोक हुआ वे अपने पुत्र की याद में बहुत दीन हो गयी औरपृथ्वी पर गिर गयी. जब बवंडर शांत होगया, तब दूसरी गोपियाँ वहाँ दौड आई उन सब के हृदय में बड़ा संताप हुआ आँखों से आँसू बहने लगे.

 

यहाँ भगवान ने तृणावर्त का गला इतनीजोर से पकड़ रखा था कि वह असुर निश्चेत हो गया,उसकी बोलती बंद हो गयी,प्राण पखेरू उड़ गये,और बालक श्रीकृष्ण के साथ वह ब्रज में गिर पड़ा*.

 

वहाँ जो स्त्रियाँ इकट्टी होकर रो रही थी उन्होंने देखा उसका एक-एक अंग चकनाचूर हो गया.भगवान उसके वक्ष:स्थल पर लटक रहे थे,यह देखकर गोपियाँ विस्मित हो गयी उन्होंने झटसे कृष्णको गोदी में लेकर माता को दे दिया, श्रीकृष्ण को पाकर सभी को बड़ा आनंद हुआ.

 

*तृणावर्त का पूर्व जन्म- पांडूदेश में सहस्त्राक्ष नाम का एक राजा था वह नर्मदा तट पर अपनी रानियों के साथ विहार कर रहा था उधर से दुर्वाशा ऋषि निकले परन्तु उन्होंने प्रणाम नहीं किया ऋषि ने श्राप दिया – तू! राक्षस हो जा.’

 

जब वह उनके चरणों पर गिरा, तब ऋषि ने कहा – भगवान श्रीकृष्ण के श्रीविग्रह का स्पर्श होते ही तू मुक्त हो जायेगा और वही सहस्त्राक्ष तृणावर्त के रूप में भगवान के सामने आया और श्री कृष्ण का संस्पर्श प्राप्त करके मुक्त हो गया.

 

सार-भगवान के सामने बस आने बस की देर है जो एक बार उनकी नजरो में आ जाता है उसका उद्धार हो जाता है.“ जय जय श्री राधे ”

“श्री श्याम सुन्दर गोस्वामी जी ”

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राधे राधे
??आज की “ब्रज रस धारा”??
दिनांक 28/03/2018

वृंदावन श्यामा जू और श्रीकुंजविहारीका निज धाम है. यहां राधा-कृष्ण की प्रेमरस-धाराबहती रहती है. मान्यता है कि चिरयुवाप्रिय-प्रियतम श्रीधामवृंदावन में सदैव विहार मेंसंलग्न रहते हैं. यहां निधिवन को समस्त वनों का राजा माना गया है, इसलिए इनको श्रीनिधि वनराज कहा जाता है.

 

पंद्रहवीं शताब्दी में सखी-संप्रदाय के प्रवर्तक संगीत सम्राट तानसेन के गुरु स्वामी हरिदास जब वृंदावन आए, तब उन्होंने निधिवन को अपनी साधनास्थली बनाया.ऐसा कहा जाता है कि स्वामी हरिदासनिधिवन में कुंजबिहारी को अपने संगीत से रिझाते हुए जब तानपूरे पर राग छेडते थे, तब राधा-कृष्ण प्रसन्न होकर रास रचाने लग जाते थे.

 

यह रास-लीला उनके शिष्यों को नहीं दिखती थी. विहार पंचमी को लेकर कथा है कि अपने भतीजे और परमप्रिय शिष्य वीठलविपुलजी के अनुरोध पर उनके जन्मदिवस मार्गशीर्ष-शुक्ल-पंचमी के दिन स्वामी जी ने जैसे ही तान छेडी, वैसेही श्यामा-श्याम अवतरित हो गए. स्वामीजी ने राधा जी से प्रार्थना की वे कुंजविहारी में ऐसे समा जाएं, जैसे बादल में बिजली.

 

स्वामी जी के आग्रह पर प्रियाजी अपने प्रियतम में समाहित हो गई. इस प्रकार युगल सरकार की सम्मिलित छवि बांकेबिहारीके रूप में मूर्तिमान हो गई और अगहन सुदी पंचमी (मार्गशीर्ष शुक्ला पंचमी) विहार पंचमी के नाम से प्रसिद्ध हो गई.निधिवन में श्यामा-श्यामसुंदर के नित्य विहार के विषय में स्वामी हरिदासजी द्वारा रचित काव्य ग्रंथ केलिमाल पर्याप्त प्रकाश डालता है.

 

110पदों वाला यह काव्य वस्तुत:स्वामीजी के द्वारा समय-समय पर गाये गए ध्रुपदोंका संकलन है, जिनमें कुंजबिहारीके नित्य विहार का अतिसूक्ष्मएवं गूढ भावांकन है.”माई री सहज जोरी प्रकट भई जु रंग कीगौर श्याम धन दामिनी जैसे !प्रथम हूँ हुती अबहूँ आगे हूँ रहिहैना ट रिहै तैसे !अंग अंग की उजराई सुधराई चतुराई सुंदरता ऐसे !श्री हरि दास के स्वामी श्यामा कुंजबिहारी सम वैसे वैसे ” !ऐसी कहा जाता है

 

निधिवन के सारी लताये गोपियाँ है जो एक दूसरे कि बाहों में बाहें डाले खड़ी है जब रात में निधिवन में राधा रानी जी, बिहारी जी के साथ रास लीला करती है तो वहाँ की लताये गोपियाँ बन जाती है,और फिर रास लीला आरंभ होती है,इस रास लीला को कोई नहीं देख सकता,दिन भर में हजारों बंदर, पक्षी,जीव जंतु निधिवन में रहते है पर जैसे ही शाम होती है,सब जीव जंतु बंदर अपने आप निधिवन में चले जाते है एक परिंदा भी फिर वहाँ पर नहीं रुकता यहाँ तक कि जमीन के अंदर के जीव चीटी आदि भी जमीन के अंदर चले जाते है

 

रास लीला को कोई नहीं देख सकता क्योकि रास लीला इस लौकिक जगत की लीला नहीं है रास तो अलौकिक जगत की”परम दिव्यातिदिव्य लीला”है कोई साधारणव्यक्ति या जीव अपनी आँखों से देख ही नहीं सकता. जो बड़े बड़े संत है उन्हें निधिवन से राधारानी जी और गोपियों के नुपुर की ध्वनि सुनी है.

 

जब रास करते करते राधा रानी जी थक जाती है तो बिहारी जी उनके चरण दबाते है. और रात्रि में शयन करते हैआज भी निधिवन में शयन कक्ष है जहाँ पुजारी जी जल का पात्र, पान,फुल और प्रसाद रखते है, और जब सुबह पट खोलते है तो जल पीला मिलता है पान चबाया हुआ मिलता है और फूल बिखरे हुए मिलते है.एक बार की बात है जब एक व्यक्ति रास लीला देखने के लिए निधिवन में झाडियों में छिपकर बैठ गया.

 

जब सुबह हुई तो वह व्यक्ति निधिवन के बाहर विक्षिप्त अवस्था में पड़ा मिला लोगो ने उससे पूंछा पर वह कुछ भी नहीं बोला सात दिन तक उसने ना कुछ खाया ना पिया और ना ही कुछ बोला सात दिन बाद उसने एक कागज पर लिखा कि मेने राधा रानी और बिहारी जी को रास लीला करते अपनी इन आँखों से देखा है और इतना लिखकर वह मर गया.

 

क्योकि एक तो कोई उनकी उस लीला को देख नहीं सकता और कोई अगर देख लेता है तो फिर वह इस जगत का नहीं रहता.हमने जो संतो के श्री मुख से सुना औरपढ़ा उसी को लिखने कि छोटी सी कोशिश है क्योकि उस दिव्यातिदिव्य लीला के बारे में और निधिवन के बारे में हम और हमारे शब्द पर्याप्त नहीं है राधा रानी और बिहारी जी जैसे अनंत है अपार है वैसे ही उनकी लीलाएँ भी अनंत और अपार है.”जय जय श्री राधे”

 

“श्री श्याम सुन्दर गोस्वामी जी ”

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राधे राधे,शुभ प्रभातम
??आज की “ब्रज रस धारा”??
दिनांक 27/03/2018

 

ये ब्रज की महिमा है कि सभी तीर्थ स्थल भी ब्रज में निवास करने को उत्सुक हुए थे एवं उन्होने श्री कृष्ण से ब्रज में निवास करने की इच्छा जताई, ब्रज की महिमा का वर्णन करना बहुत कठिन है, क्योंकि इसकी महिमा गाते-गाते ऋषि-मुनि भी तृप्त नहीं होते.

 

भगवान श्री कृष्ण द्वारावन गोचारण से ब्रज-रज का कण-कण कृष्णरूप हो गया है तभी तो समस्त भक्त जन यहाँ आते हैं और इस पावन रज को शिरोधार्य कर स्वयं को कृतार्थ करते हैं.रसखान ने ब्रज रज की महिमा बताते हुए कहा है –

 

“एक ब्रज रेणुका पै चिन्तामनि वार डारूँ”

वास्तव में महिमामयी ब्रजमण्डल की कथा अकथनीय है क्योंकि यहाँ श्री ब्रह्मा जी, शिवजी, ऋषि-मुनि, देवता आदि तपस्या करते हैं. श्रीमद्भागवत के अनुसार श्री ब्रह्मा जी कहते हैं-भगवान्! मुझे इस धरातल पर विशेषतः गोकुल में किसी साधारण जीव की योनि मिल जाय, जिससे मैं वहाँ की चरण-रज से अपने मस्तक को अभिषिक्त करने का सौभाग्य प्राप्त कर सकूँ.

 

भगवान शंकर जी को भी यहाँ गोपी बनना पड़ा -“नारायण ब्रजभूमि को,को न नवावै माथ,जहाँ आप गोपी भये श्री गोपेश्वर नाथ।ब्रज में तो विश्व के पालनकर्ता माखनचोर बन गये, इस सम्पूर्ण जगत के स्वामी को ब्रज में गोपियों से दधि का दान लेना पड़ा.

 

जहाँ सभी देव, ऋषि मुनि, ब्रह्मा, शंकर आदि श्री कृष्ण की कृपा पाने हेतु वेद-मंत्रों से स्तुति करते हैं, वहीं ब्रजगोपियों की तो गाली सुनकर ही कृष्ण उनके ऊपर अपनी अनमोल कृपा बरसा देते हैं.

 

बृज की ऐसी विलक्षण महिमा है कि स्वयं मुक्ति भी इसकी आकांक्षा करती है –

“मुक्ति कहै गोपाल सौ मेरि मुक्ति बताय।

ब्रज रज उड़ि मस्तक लगै मुक्ति मुक्त हो जाय”

श्री कृष्ण जी उद्धव जी से कहते हैं-

ऊधौ मोहि ब्रज बिसरत नाहीं

हंस सुता की सुन्दर कगरी,अरु कुञ्जनि की छाँहीं,

ग्वाल-बाल मिलि करत कुलाहल,नाचत गहि – गहि बाहीं

यह मथुरा  कञ्चन की नगरी,मनि – मुक्ताहल जाहीं,

जबहिं सुरति आवति वा सुख की,जिय उमगत तन नाहीं

अनगनभाँति करी बहु लीला,जसुदा नन्द निबाहीं,

सूरदासप्रभु रहे मौन ह्वै,यह कहि – कहि पछिताहीं”

“जय जय श्री राधे ”

“श्री श्याम सुन्दर गोस्वामी जी ”

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राधे राधे
??आज की “ब्रज रस धारा”??
दिनांक 26/03/2018

जब भगवान कृष्ण ने गौलोक धाम की रचना की,और सारे गोप
ग्वाले और यमुना वृंदावन सबकी रचना की तब एक दिन रास मंडल में श्री राधिका जी ने कोटि मनोजमोहन वल्लभ से कहा – यदि आप
मेरे प्रेम से प्रसन्न है तो मेरी एक मन की प्रार्थना व्यक्त करना
चाहती हूँ. तब श्यामसुन्दर ने कहा- मुझसे आप जो भी मांगना
चाहती है माँग लो.

 

श्री राधा जी ने कहा- वृंदावन में यमुना के तट पर दिव्य निकुंज के
पाश्र्वभाग में आप रास रस के योग्य कोई एकांत एवं मनोरम स्थान
प्रकट कीजिये. यही मेरा मनोरथ है.

“तब भगवान ने तथास्तु कहकर एकांत लीला के योग्य स्थान
का चिंतन करते हुए नेत्र कमलों द्वारा अपने ह्रदय की ओर
देखा उसी समय गोपी समुदाय के देखते देखते श्रीकृष्ण के ह्रदय
से अनुराग के मूर्तिमान अंकुर की भांति एक सघन तेज प्रकट
हुआ रास भूमि में गिरकर वह पर्वत के आकार में बढ़ गया वह
सारा का सारा पर्वत रत्नधातुमय था,

 

सुन्दर झरने लताये ,बड़ा ही सुन्दर.”
एक ही क्षण में वह पर्वत एक लाख योजन विस्तृत ओर शेष की तरह
सौ कोटि योजन लंबा हो गया, उसकी ऊचाई पचास करोड योजन
की हो गई, पचास कोटि योजन में फैल गया, इतना विशाल होने
पर भी वह पर्वत मन से उत्सुक सा होकर बढ़ने लगा. इससे गौलोक
निवासी भय से विहल होने लगे.

तब श्री हरि उठे और बोले – अरे प्रच्छन्न रूप से क्यों बढ़ता जा
रहा है यो कहकर श्री हरि ने उसे शांत किया.उसका बढ़ना रुक
गया उस उत्तम पर्वत को देखकर राधाजी बहुत प्रसन्न हुई.
गिरिराज जी का पृथ्वी पर आगमन
जब भगवान पृथ्वी पर अवतार लेने वाले थे तब भगवान ने गौलोक को
नीचे पृथ्वी पर उतरा और गोवर्धन पर्वत ने भारतवर्ष से पश्चिमी
दिशा में शाल्मली द्वीप के भीतर द्रोणाचल की पत्नी के गर्भ से
जन्म ग्रहण किया.

 

एक समय मुनि श्रेष्ठ पुलस्त्य जी तीर्थ यात्रा के लिए भूतल पर
भ्रमण करने लगे उन्होंने द्रोणाचल के पुत्र श्यामवर्ण वाले पर्वत
गोवर्धन को देखा उन्होंने देखा कि उस पर्वत पर बड़ी शान्ति है
जब उन्होंने गोवर्धन कि शोभा देखी तो उन्हें लगा कि यह तो
मुमुक्षुओ के लिए मोक्ष प्रद प्रतीत हो रहा है.

 

मुनि उसे प्राप्त करने के लिए द्रोणाचल के समीप गए पुलस्त्य जी ने
कहा – द्रोण तुम पर्वतों के स्वामी हो मै काशी का निवासी हूँ
तुम अपने पुत्र गोवर्धन को मुझे दे दो काशी में साक्षात् विश्वनाथ
विराजमान है मै तुम्हारे पुत्र को वहाँ स्थापित करना चाहता हूँ
उसके ऊपर रहकर मै तपस्या करूँगा.

 

पुलस्त्य जी की बात सुनकर द्रोणाचल पुत्र स्नेह में रोने लगे और
बोले- मै पुत्र स्नेह से आकुल हूँ फिर भी आपके श्राप के भय से मै इसे
आपको देता हूँ फिर पुत्र से बोले बेटा तुम मुनि के साथ जाओ.
गोवर्धन ने कहा – मुने मेरा शरीर आठ योजन लंबा ,दो योजन
चौड़ा है ऐसी दशा में आप मुझे किस प्रकार ले चलोगे.

 

पुलस्त्य जी ने कहा – बेटा तुम मेरे हाथ पर बैठकर चलो जब तक
काशी नहीं आ जाता तब तक मै तुम्हे ढोए चलूँगा.
गोवर्धन ने कहा – मुनि मेरी एक प्रतिज्ञा है आप जहाँ कहि भी
भूमि पर मुझे एक बार रख देगे वहाँ की भूमि से मै पुनः उत्थान नहीं
करूँगा.

 

पुलस्त्य जी बोले – में इस शाल्मलद्वीप से लेकर कोसल देश तक तुम्हे कहीं नहीं रखूँगा यह मेरी प्रतिज्ञा है.
इसके बाद पर्वत पाने पिता को प्रणाम करने मुनि की हथेली पर
सवार हो गए.पुलस्त्य मुनि चलने लगे. और व्रज मंडल में आ पहुँचे
गोवर्धन पर्वत को अपनी पूर्व जन्म की बातो का स्मरण था व्रज
में आते ही वे सोचने लगे की यहाँ साक्षात् श्रीकृष्ण अवतार लेगे
और सारी लीलाये करेगे.

 

अतः मुझे यहाँ से अन्यत्र नहीं जाना
चाहिये. यह यमुना नदी व्रज भूमि गौलोक से यहाँ आये है. और वे
अपना भार बढ़ाने लगे.
उस समय मुनि बहुत थक गए थे, उन्हें पहले कही गई बात याद भी नहीं रही. उन्होंने पर्वत को उतार कर व्रज मंडल में रख दिया.थके हुए थे

सो जल में स्नान किया.फिर गोवर्धन से कहा – अब उठो ! अधिक
भार से संपन्न होने के कारण जब वह दोनों हाथो से भी नहीं उठा.
तब उन्होंने अपने तेज से और बल से उठाने का उपक्रम किया. स्नेह से
भी कहते रहे पर वह एक अंगुल भी टस के मस न हुआ.
वे बोले – शीघ्र बताओ ! तुम्हारा क्या प्रयोजन है.

 

गोवर्धन पर्वत बोला – मुनि इसमें मेरा दोष नहीं है मैंने तो आपसे
पहले ही कहा था अब में यहाँ से नहीं उठुगा यह उत्तर सुनकर मुनि
क्रोध में जलने लगे और उन्होंने गोवर्धन को श्राप दे दिया.
पुलस्त्य जी बोले – तू बड़ा ढीठ है, इसलिए तू प्रतिदिन तिल-
तिल क्षीण होता चला जायेगा.

 

यो कहकर पुलस्त्य जी काशी चले गए और उसी दिन से गोवर्धन
पर्वत प्रतिदिन तिल तिल क्षीण होते चले जा रहे है.
जैसे यह गौलोक धाम में उत्सुकता पूर्वक बढने लगे थे उसी तरह यहाँ
भी बढे तो वह पृथ्वी को ढक देगे यह सोचकर मुनि ने उन्हें प्रतिदिन
क्षीण होने का श्राप दे दिया.

जब तक इस भूतल पर भागीरथी गंगा और गोवर्धन पर्वत है, तब तक
कलिकाल का प्रभाव नहीं बढ़ेगा.
“जय जय श्री राधे

“श्री श्याम सुन्दर गोस्वामी जी ”

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राधे राधे
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दिनांक 25/03/2018

देखा जाता है कि दुनिया में ऐसे बहुत लोग हैं जो धन धान्य से सम्पूर्ण हैं किंतु वो फिर भी खुश नही हैं क्योंकि उनके मन को शांति नही मिल पाती

कुछ इसलिए भी नाखुश हैं कि वो श्री जी के प्रति नित्य अपराध कर रहें कुछ जानकर करते हैं और अनजाने में भी हो जाते हैं उसका कारण यही है कि उन्हें ज्ञान नही हैं कि अपराध कौन कौन से होते हैं ।

नित्य अपराधों में कुछ अपराध यह हैं
श्री जी के सामने कुछ भी खाने की वस्तु ग्रहण करना ,उनके विग्रह की तरफ पैर करना,झूट बोलना,उनके विग्रह के सामने या घर में जो मन्दिर है उसके सामने सो जाना ।

 

यह कुछ अपराध हैं जो नित्य प्रति हो रहे हैं किंतु किसी को इसका ज्ञान नही और मनुष्य इन अपराधों को करता जा रहा है उसका दण्ड भी श्री जी देती हैं।लेकिन तब उन्हें नही समझ आता कि ये कैसे और क्यों हुआ है हमारे साथ।

 

श्री राधा नाम की बहुत बड़ी महिमा है इसका को बखान नही कर सकता न ही इसका सार आजतक किसी ने पाया है क्योंकि अनन्त कोटि ब्रह्माण्ड नायक स्वयं श्री कृष्ण भी उनकी चरण सेवा में विलीन रहते हैं श्री कृष्ण की गुरु हैं हमारी श्री प्रिया जी।

 

और भैयाओं अगर बरसाने पर नन्दगाँव के भाव ते देखो तो या सारे कन्हैया में लट्ठ पड़ें यहां सारे कूँ इतनी गारी दई जावें कि कछु बोले नाहे
ई तो ग्वारिया गवार है ढोरन कूँ चरावों आवे बस यापे।

 

लेकिन हमारो कन्हैया लगे हमे प्राणन हूँ ते प्यारो। क्योकि ई हमारी किशोरी जी को प्यारो है।
जब उन्होंने अपना लिया तो हम कौन है भैया जो श्री जी की बात नाय माने।

“प्यारे राधा राधा रटो, रटो नटनागर आवेगो”
इसी भाव को जीवन में धारण कर जीवन सफल बनायें और श्री जी का नाम लेते रहें ताकि अपराधों से मुक्ति हो सके

 

“श्री श्याम सुन्दर गोस्वामी जी ”

सेवाधिकारी श्री राधा रानी मन्दिर बरसाना
श्री जी बरसाना मण्डल ट्रस्ट (रजि०)
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राधे राधे
??आज की “ब्रज रस धारा”??
दिनांक 24/03/2018

धुव्रजी का चरित्र हम सभी जानते है धुव्र,
जी के पिता का नाम उत्तानपाद था. जिनकी दो रानिया
थी, पहिली का नाम सुनीति दूसरी का नाम सुरुचि था. सुनीति के बेटे का धुव्र नाम था,सुरुचि के बेटे का नाम उत्तम था. उत्तानपाद का प्रेम दूसरीरानी से ज्यादा था. सुरुचि के महलो मे राजा सदा रहा करते थे और उत्तम से प्रेम करते थे.

 

एक दिन की बात है, राजा उत्तम को गोदी में लेकर बैठे थे. तभी धुव खेलते हुए वहाँ पहुँच गए और पिता की गोदी में बैठने की जिद करने लगे, तभी सुरुचि ने पिता की गोदी से धकेलते हुए बोली- कि देखो ध्रुव! अगर तुम्हे पिता की गोदी में बैठना है तो जाओ पहले जाकर तप करो फिर जब भगबान प्रकट हो जाये तो मृत्यु माँगना और फिर मेरी कोख से पैदा होना तब जाकर तुम्हें अपने पिता की गोदी में
बैठने मिलेगा.

ध्रुव उस समय पाँच वर्ष के थे,रोते-रोते अपनी माता सुनीति के पास गए, और अपनी माँ को सब बताया.सुनीति ने कहा देखो ध्रुव तुम्हारी विमाता ने जो कहा वह ठीक ही तो कहा है, इस संसार में
केवल एक ही सार है और वह है केवल हरि की भक्ति.तुम जरा भी देर मत करो तुरंत जंगल में जाओ और तप में लग जाओ.

माँ का आशीर्बाद लेकर ध्रुव घर से निकल गए रास्ते में उन्हें
देवर्षी नारद जी मिले और ध्रुव से पूछने लगे. तुम
कहा जा रहे हो. ध्रुव ने कहा- गुरुदेव में भगबान का तप करने जा रहा
हूँ. नारद जी ने कहा – ध्रुव अभी तुम्हारे खेलने-कूदने के दिन है कहा जंगल में जा रहे हो जाओ वापस लौट जाओ.

पर ध्रुव जी नहीं माने वे अपनी बात से तनिक भी नहीं हटे.नारद जी ने
जब देखा की ये बालक तो द्ढसंकल्प वाला है तो वे बोले ध्रुव
यहाँ से आगे जाने पर तुम्हे वृन्दावन नाम का एक वन मिलेगा वँहा पर यमुना नदी के किनारे बैठकर पहले अपनी सांसो को
प्राणायाम से अपने वश में करना फिर उन्हें मंत्र बताया-
“ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नम:”

 

इस मंत्र का जप करना,इतना कहकर नारद जी चले गए, और
सीधे उत्तान पाद के पास गए और उन्हें सब बताया और कहा
कि वे ध्रुव के पास ना जाये ध्रुव स्वयं तप के बाद लौट आएगा.
फिर नारद जी वैकुण्ठ गए, भगवान ने कहा – नारद बड़े प्रसन्न लग रहे हो नारद जी बोले प्रभु सबसे छोटी उम्र का शिष्य मिला है उम्र केवल पाँच वर्ष की है भगवान ने कहा कि नारद जी कितना समय
देकर आये हो नाराज जी ने कहा प्रभु छै महीने
का भगवान तुरंत बोले – नारद जी ! ये क्या किया आपने भक्त
और भगवान के मिलने के लिए इतना लंबा समय क्यों दे दिया मै तो बहुत बेचेन हूँ अपने छोटे से भक्त को देखने के लिए

 

नारद जि ने कहा प्रभु थोडा वो बैचेन हो थोडा आप होइए.
ध्रुव जी वृन्दावन में जाकर तप करने
लगे.पहला महीने में फल खाकर तप किया, जब दूसरा
महीना आया तो फल खाना छोड़ दिया केवल जंगल के सूखे पत्ते
खाने लगे, जब तीसरा महीना आया तो पत्ते भी छोड दिये केवल पानी पीकर तप किया,जब चौथा महीना आया तो पानी पीना
भी छोड दिया केवल हवा खाकर तप करने लगे जब पाचँवा
महीना आया तो हवा भी बंद कर दी बिना सांसो के तप करने लगे,

 

जब सांस लेना बंदकर दी तो उनके हृदय में स्थित भगवान ने
सांस लेना बंद कर दी,भगवान के उदर में स्थित कोटि ब्रामांड में
स्थित लोगो ने सांस लेना बंद कर दी तब सबने भगवान से प्रार्थना
की तब भगवान ने वृंदावन में यमुना के किनारे धुव को दर्शन देने
के लिए प्रकट हुए भगवान ने देखा, छोटे से पाँच वर्ष के धुव
जी है.

कितने कष्ट इसने उठाए मेरे लिए, खाना,पीना,सोना सब छोड दिया कुछ देर खड़े धुव जी को देखते रहे कितना प्यारा छोटा सा भक्त है, पर धुव जी आँखे ही नहीं खोल रहे, तब भगवान ने अपनी छवि खीची,जो छवि हृदय से हटी तो झट से ध्रुव जी ने आँखे खोली तो भगबान सामने खड़े है.अदभुद द्रश्य है भगवान की नज़रे ध्रुव जी से नहीं हटती और ध्रुव जी की नजर भगवान
से नहीं हटती मानो आँखों से भगवान को
पी जायेगे कैसा अद्भुत मिलन है भक्त और भगवान का.

 

धुव जी सोच रहे है क्या कहू स्तुति वंदन तो आता
नहीं. भगवान समझ गए और अपना शंख ध्रुव जी
के गाल से लगाया ध्रुव जी को समस्त वेदों का ज्ञान हो
गया, भगवान ने अपनी गोदी में बैठाया कहा- धुव
तुम्हें पिता की गोद में बैठना है. धुव जी ने भगवान
से कहा- प्रभु! परम पिता की गोदी में बैठने के बाद
अब मुझे किसी संसार के पिता की गोदी
में नहीं बैठना है.

आपको पाने के बाद अब मुझे कुछ
नहीं चाहिए,बस आप मुझे अपनी अखंड भक्ति का
वरदान दीजिए. भगवान ने धुव जी को दुनिया में सबसे
ऊँचा स्थान दिया और सुरुचि के बेटा उत्तम की अंत मे मृत्यु हो
जाती है. सार जो राजा उत्तानपाद है ये हम सब जीव है. इसकी
ये जो दो रानिया है सुनीति और सुरुचि. ये हमारे बुद्धि और मन
है. जैसे राजा केवल सुरुचि की बात सुनता था सुनीति
की नहीं. उसी प्रकार हम भी मन की बात ही केवल सुनते है,
बुद्धि की नहीं ,जो सदा नीति पर
चलती है. मन से उत्तम फल तो मिलता है पर थोड़े दिन के लिए
ही होता है और बुद्धि से ध्रुव फल मिलता है जो शाश्वत
होता है.

 

“श्री श्याम सुन्दर गोस्वामी जी ”

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राधे राधे
??आज की “ब्रज रस धारा”??
दिनांक 23/03/2018

श्री हरि अपनी बाल लीलाओ से गोप-गोपियों को आनन्द प्रदान करते हुए सखाओ के साथ घरों में जा-जाकर माखन और घृत की चोरी करने लगे एक दिनउप नन्द पत्नी गोपी प्रभावती श्री नन्द भवन में आकर यशोदा जी से बोली-प्रभावती ने कहा -यशोदारानी! तुम्हारे इस लाला ने चोरी कहाँ से सीखी है, माखन तो यह स्वयं ही चुराताफिरता है, परन्तु तुम इसे ऐसा न करनेके लिए कभी शिक्षा नहीं देती.

 

एक दिनजब मैंने शिक्षा दी, तो तुम्हारा यह ढीठ बालक मुझे चिढ़ाकर भाग गया. अरे!व्रजराज का बेटा होकर चोरी करे,यह उचित नहीं है.प्रभावती की बात सुनकरकी बात सुनकर,यशोदा जी ने कहा- मैंने इसे डाट लगायी है, यदि तुम इसे माखन चुराकर खाते और मुख में माखन लपेटे हुए पकड़कर मेरे पास ले आओगी तो मै इसे अवश्य ताडना दूंगी और घर में बांध रखूँगी.

 

प्रभावती यशोदा जी की यह बातसुनकर घर चली गई.”प्रेम के बधन में बंधे कान्हा ,देखोक्या क्या रूप दिखाते हैंसकल श्रृष्टि के संचालक ,माखन खातिरमैया से डांट खाते हैं “एक दिन श्री कृष्ण बालको के साथ फिर दही चुराने के लिए उसके घर में गए. सब-के-सब घर में घुस गए. छीके पर रखा हुआ गोरस हाथ से पकड़ में नहीं आ सकता, यह देखकर श्री हरि ने स्वयं एकओखली के ऊपर पीढा रखा और ऊपर चढ गए पर तब भी न पा सके.

 

तब श्रीदामा और सुबल के साथ उन्होंने मटके पर डंडे से प्रहार किया. सारा माखन नीचे गिर गया झट सारे ग्वाल बाल और सहित माधव माखन खाने लगे.भांड फूटने की आवाज सुनकर गोपी प्रभावती वहाँ आ पहुँची अन्य सब बालक तो वहाँ से भाग गए किन्तु श्री कृष्ण का हाथ प्रभावती ने पकड़ लिया.बाल कृष्ण भयभीत होकर मिथ्या आँसू बहाने लगे. प्रभावती उन्हें लेकर नन्द भवन की ओर चली. बड़ी ही प्यारी झाकी है.

 

नन्द भवन में पहुँची तो सामने ही नन्द राय जी खड़े थे. उन्हें देखकर प्रभावती ने मुख पर घूँघट डाल लिया. श्री हरि सोचने लगे- इस तरह जाने परतो मैईया अवश्य दंड देगी अतः भगवान ने प्रभावती के ही पुत्र का रूप धारण कर लिया. रोष से भरी प्रभावती यशोदा जी के पास शीघ्र जाकर बोली – ‘इसने मेरा दही का बर्तन फोड दिया’.

 

और सारा दही लूट लिया.यशोदा जी ने देखा, यह तो इसी का पुत्र है, तब वे हँसते हुए उस गोपी से बोली पहले अपने मुख से घूँघट तो हटाओ फिर बालक के दोष बताना. तब प्रभावती ने जैसे ही घूँघट हटाकर देखा तो उसे अपना ही बालक दिखायी दिया, उसे देखकर वह मन ही मन बोली चकित होकर बोली – अरे निगोड़े! तू कहाँ से आ गया.

 

मेरे हाथ में तो व्रजका सारा सर्वस्व था इस तरह बडबडाती हुई नन्द भवन से चली गई, वहाँ उपस्थित सारे गोप, यशोदा, नन्द , हँसने लगे.इधर भगवान नन्द-नन्दन बाहर की गली में पहुँचकर फिर नन्द नन्दन बन गए, और चंचल नेत्र मटकाकर,

जोर-जोर से हँसते हुए उस गोपी से बोले-बाल कृष्ण ने कहा -अरी गोपी! यदि फिर कभी तू मुझे पकडेगी, तो अब की बार तेरे पति का रूप धारण कर लूँगा,यह सुनकर वह गोपी आश्चर्य से चकित हो अपने घर चली गई और उस दिन से सब घरों की गोपियाँ लाज के मारे श्री हरि का हाथ नहीं पकड़ती थी.”जय जय श्री राधे”

“श्री श्याम सुन्दर गोस्वामी जी ”

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राधे राधे
??आज की “ब्रज रस धारा”??
दिनांक 22/03/2018

श्रीमद्भागवत में शौनक जी ने सूत जी से प्रश्न किया है
कल्याण का साधन क्या है ?तब सूत जी ने कहा है कल्याण के
दो साधन है १. श्रेय और २.प्रेय.

 

जो श्रेय का वरण करेगा वह परमांनद को पाता है और जो
प्रेय का वरण करता है वह अपने लक्ष्य से गिर जाता है और ८४
लाख की योनियों में भटकता है. चुकि हम उस आनंद के अंश है
इसलिए हम भी आनंद ही चाहते है और आनंद को पाने के लिए
“श्रेय” अर्थात “आत्मा” को अपनाना, “प्रेय” अर्थात “शरीर”
के धर्म को अपनाना. पर प्रेय से काम नहीं चलेगा.

 

सूत जी ने कहा – भगवान श्रीकृष्ण के प्रति भक्ति की
जाती है वह “परधर्म” है. “पर” का अर्थ है कृष्ण.परतत्व,
परब्रह्म जो भगवान को धारण करेगा, अर्थात भागवत धर्म
को धारण करेगा. अर्थात आत्मा के धर्म को वह श्रीकृष्ण
को प्राप्त होता है.

 

“अपर-धर्म” अर्थात शरीर का धर्म परिवर्तन शील है क्योकि
शरीर नश्वर है, इससे जुड़े हुए सम्बन्ध पति, पत्नी,माता, पिता
पुत्र सभी की जीवन भर सेवा की, अगले जन्म में ये सारे
सम्बन्ध बदल गए,फिर सेवा की फिर बदल गए. और जो सुख
मनुष्य को अपने बच्चे को कीमती कपड़े पहनाने में मिलता है
वो सुख तो एक पशु को अपने बच्चे को चाटने में भी मिल
जाता है,जो सुख हेम ५६ व्यंजन में मिलते है वह सुख तो गाय
को हरि घास में भी मिल जाता है. हमारे सुख और उसके सुख
में कोई अंतर नहीं है. इसलिए वास्तव में परधर्म ही धर्म है.

 

अपरधर्म का फल स्वर्ग है दुःख, अशांति, नश्वरता है, इस अपर
धर्म का पालन कर भी लिया तो पुण्यलोक मिल
जायेगा,और जो बीमारी इस मृत्युलोक में है वही
बीमारियाँ उस ऊपर के लोको में है, बस स्तर का फर्क है.ये
बिलकुल वैसा ही है जैसे दूध में केशर डालो, इलायची डालो,

 

बादाम डालो और बाद में थोडा सा जहर डाल दो, ये है
स्वर्ग का दुख. पानी में थोडा सा जहर डाल दो ये है
मृत्युलोक का दुख. और कडवी नीम में जहर डाल दो ये है नरक
का दुःख.
और भगवान को इस धर्म से कोई प्रयोजन ही नहीं है क्योकि
इनके परिणाम पर विचार करो वह धर्म जो श्री कृष्ण से प्रेम
उत्पन्न ना कर सके वह धर्म किसी काम का नहीं वह तो
अधर्म है.
ब्राह्मण को १२ गुणों से युक्त होना चाहिये,परन्तु ऐसा
ब्राह्मण अरबो में कोई एक भी बहुत मुश्किल से मिलेगा,मिल
भी गया तो उस ब्राह्मण से वह चंडाल श्रेष्ठ है जिसके अन्दर
भगवान की भक्ति है,और यदि उस ब्राह्मण के अन्दर भगवान
की भक्ति नहीं है तो वह भगवान को प्रिय नहीं है.

 

अपरधर्म अर्थात शरीर पहले भी नहीं था बाद में भी नहीं
रहेगा केवल बीच में ही दिखायी दे रहा है.और इस प्रेय में पहले
दुःख निवृति हो, संसार में बहुत झंझटो से व्यक्ति घिरा
है.सब साधनाओ की सिद्धि है श्री कृष्ण भक्ति. अष्टांग
योग – यम, नियम, आसन, प्रत्याहार.ये पाँच बहिरंग और ३
नियम – ध्यान, धारणा, समाधि. ये तीन अन्तरंग है.
ध्यान अर्थात मन का भगवान में लगाना, धारणा –
परमात्मा में मन लग जाना, और समाधि अर्थात इतना मन
परमात्मा में लग गया कि अपने स्वरुप को भी भूल गए इसे
समाधि कहते है. और ऐसे योगी जो जीवन मुक्त हो चुके है
उन्होंने भी यदि कृष्ण भक्ति नहीं की तो उनका भी पतन
हो जाता है.इसलिए मनुष्य जीवन का एक ही धर्म है श्री
कृष्ण में भक्ति हो.

 

श्रवण,कीर्तन स्मरण और भगवान ने भी गीता में यही कहा है-
“सर्वधर्मान परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज” . मेरी शरण में आ
जाओ, सारे धर्मो का परित्याग कर दो. और गोपियाँ भी
भगवान के सिद्धात से ही भगवान की बात काट रही है.अब
ठाकुर जी आगे कुछ ना बोल सके.

 

“श्री श्याम सुन्दर गोस्वामी जी ”

सेवाधिकारी श्री राधा रानी मन्दिर बरसाना
श्री जी बरसाना मण्डल ट्रस्ट (रजि०)
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