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श्री राधे

☘☘आज की ब्रज रस धारा ☘☘

दिनांक 30/04/2018

 

जिसके रोपण करने से व्यक्ति को शिव लोक की प्राप्ति होती है – वटवृक्ष

वटवृक्ष के बारे में विस्तार से शास्त्रों में बताया गया है. वृक्षायुर्वेद में बताया गया है कि जो व्यक्ति दो वटवृक्षों का विधिवत रोपण करता है वह मृत्योपरांत शिवलोक को प्राप्त होता है.

 

भविष्य पुराण में ही बताया गया है कि वटवृक्ष मोक्षप्रद.ज्येष्ठ पूर्णिमा” वटसावित्री व्रत पर वट वृक्ष की पूजा की जाती है.

 

शास्त्रों में ऐसी अनेक कथाये आती है जिसमे सावित्री जी की कथा आती है कि वटवृक्ष के नीचे पड़े अपने मृत पति को सावित्री ने पतिव्रत के प्रभाव से पुनर्जीवित किया था.

 

एक बार मार्कंडेय ऋषि ने भगवान से उनकी माया का दर्शन कराने का अनुरोध किया, तब भगवान ने प्रलय का दृश्य दिखलाकर वृटवृक्ष के पत्ते पर चरण के अंगूठे को चूसते हुए बाल स्वरूप में दर्शन दिए.

 

             करारविन्दे पदारविन्दे मुखारविन्दे विनिवेशयन्तम | 
           वटस्य पत्रस्य पुटे शयनम् बालं मुकुन्दं मनसा स्मरामि॥

यह दृष्टांत वटवृक्ष का आध्यात्मिक महत्व दर्शाता है.इसी तरह वनवास के समय भगवान श्रीराम ने कुंभज मुनि के परामर्श से माता जानकी एवं भ्राता लक्ष्मण सहित पंचवटी (पांच वटों से युक्त स्थान) में निवास कर वटवृक्ष की गरिमा को और अधिक बढ़ा दिया.

 

शुक्रताल मुजफ्फरनगर जनपद में स्‍थित एक विश्‍व प्रसिद्ध धार्मिक स्थान माना जाना जाता है. इस स्थान पर वटवृक्ष के नीचे महर्षि शुकदेव महाराज ने राजा परीक्षत को भागवत कथा सुनाई थी आज भी उस स्थान पर वह प्राचीन व पवित्र वटवृक्ष स्थित है.

 

शास्त्रों में बताया गया है कि वृक्षों को काटने वाला गूंगा और अनेक व्याधियों से युक्त होता है. अश्वत्थ (पीपल, वटवृक्ष और श्रीवृक्ष) का छेदन करने वालों को ब्रह्म हत्या का पाप लगता है.

 

वट वृक्ष का आयुर्वेद में भी बहुत महत्व है, इसकी जड़े छाल, फल, पत्ते, दूध सभी औषधि हैं. चर्म रोग व बहुमूत्र में छाल औषधि के रूप में इस्तेमाल होता है.

 

इसका फलों का प्रयोग मधुमेह व बहुमूत्र जैसे रोगों में किया जाता है.  वट का दूध कटे छिले व घाव में काफी असरकारक है.

 

          “श्री श्याम सुन्दर गोस्वामी जी ”

      सेवाधिकारी श्री राधा रानी मन्दिर बरसाना 

          श्री जी बरसाना मण्डल ट्रस्ट (रजि०)

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दिनांक 29/04/2018

 

दरिद्रता दुर्भाग्य का नाश करता है – पीपल का वृक्ष

पुराणों में पीपल के वृक्ष के महत्व का विस्तार से वर्णन किया गया है. आध्यात्मिक ही नहीं पीपल के वृक्ष का वैज्ञानिक भी महत्व है.

* प्रात:स्नान के बाद पीपल का स्पर्श करने से व्यक्ति के समस्त पाप भस्म हो जाते है, और लक्ष्मी की प्राप्ति होती है. पीपल वृक्ष की नित्य तीन बार परिक्रमा करने और जल चढाने पर दरिद्रता, दु:ख और दुर्भाग्य का विनाश होता है और आयु में वृद्धि होती है.

* अश्वत्थ वृक्ष को दूध, नैवेद्य, धूप, दीप,फल-फूल, अर्पित करने से मनुष्य को समस्त सुख वैभव की प्राप्ति होती है.

* पीपल की जड़ के निकट बैठकर जो जप, दान, होम, स्तोत्रपाठ, व अनुष्ठान किया जाता है उनका फल अक्षय होता है.

*जड़ से ऊपर तक का तना नारायण कहा गया है और ब्रह्मा, विष्णु, महेश ही इसकी शाखाओ के रूप में स्थित है. पीपल के पत्ते संसार के प्राणियों के समान है. प्रत्येक वर्ष नए पत्ते निकलते है पतझड़ होता, मिट जाते है, फिर नए पत्ते निकलते है, यही जन्म-मरण का चक्र है.

* पीपल के नीचे किया गया दान अक्षय होकर जन्म-जन्मातर तक फलदायी होता है जिस प्रकार संसार में गौ ब्राह्मण व देवता पूजित है उसी प्रकार पीपल भी पूजा के योग्य है पीपल को रोपने से धन रक्षा करने से पुत्र स्पर्श करने से स्वर्ग और पूजने से मोक्ष की प्राप्ति होती है.

भगवद्गीता में भगवान से कहते हैं – अश्वत्थ: सर्ववृक्षाणाम् (अर्थात् समस्त वृक्षों में मैं पीपल का वृक्ष हूं) कहकर पीपल को अपना स्वरूप बताया है.स्वयं भगवान ने उसे अपनी उपमा देकर पीपल के देवत्व और दिव्यत्व को व्यक्त किया है.

 

इसलिए धर्मशास्त्रों में पीपल के पत्तों को तोडना, इसको काटना या मूल सहित उखाड़ना वर्जित माना गया है. जो व्यक्ति पीपल को काटता है या हानि पहुँचता है उसे एक कल्प तक नरक भोगकर चंडाल की योनि में जन्म लेना पडता है.

रात में पीपल की पूजा को निषिद्ध माना गया है. क्योंकि ऐसा माना जाता है कि रात्री में पीपल पर दरिद्रता बसती है और सूर्योदय के बाद पीपल पर लक्ष्मी का वास माना गया है. वैज्ञानिक दृष्टि से भी पीपल का महत्तव है. पीपल ही एकमात्र ऎसा वृक्ष है जो रात-दिन ऑक्सीजन देता है.

          “श्री श्याम सुन्दर गोस्वामी जी ”

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दिनांक 28/04/2018

 

जिसकी उत्पत्ति भगवान विष्णु के मुख से हुई – आंवले का वृक्ष

पुराणों में आंवले के वृक्ष को परम पवित्र तथा भगवान विष्णु को अत्यन्त प्रिय कहा गया है जिस घर में आंवले का पेड़ होता है उस में भूत ,प्रेत ,दैत्य व राक्षस का प्रवेश नहीं होता तथा उसकी छाया में किया गया दीप दान अनंत पुण्य फल प्रदान करने वाला होता है .

 

आँवले के वृक्ष की पूजा “कार्तिक मास में आँवला नवमी “को की जाती है.

                                  आंवले के वृक्ष की उत्पत्ति

विष्णु पुराण के अनुसार एक बार भगवान विष्णु के थूकने के फलस्वरुप उनके मुख से चन्दमा का जैसा एक बिन्दू प्रकट होकर पृ्थ्वी पर गिरा.

 

उसी बिन्दू से आमलक अर्थात आंवले के महान पेड की उत्पति हुई. यही कारण है कि विष्णु पूजा में इस फल का प्रयोग किया जाता है.

 

श्रीविष्णु के श्री मुख से प्रकट होने वाले आंवले के वृ्क्ष को सर्वश्रेष्ठ कहा गया है. इस फल के महत्व के विषय में कहा गया है, कि इस फल के स्मरणमात्र से गऊ दान करने के समान फल प्राप्त होता हे. यह फल भगवान विष्णु जी को अत्यधिक प्रिय है. इस फल को खाने से तीन गुणा शुभ फलों की प्राप्ति होती है.

 

 

आंवले के द्वारा एक चंडाल की मुक्ति 

एक चंडाल शिकार कहलने के लिए वन में गया वहाँ अनेको मरगो और पक्षियों को मरकर जब वह भूख-प्यास से अत्यंत पीड़ित हो गया तब सामने ही उसे एक आंवले का वृक्ष दिखायी दिया. उसमे खूब मोटे-मोटे फल लगे थे.

 

चंडाल साहस वृक्ष के ऊपर चढ गया और उसके उत्तम-उत्तम फल खाने लगा प्रारब्ध वश वह वृक्ष के शिखर से पृथ्वी पर गिर पड़ा और वेदना से व्यथित होकर इस लोक से चल बसा.

फिर सम्पूर्ण प्रेत, राक्षस, भूतगण और यमराज के सेवक बड़ी प्रसन्नता के साथ वहाँ आये किन्तु उसे ले न जा सके, यधपि वे महान बलवान थे तथापि उस मृतक चंडाल कि ओर आँख उठाकर देख भी नहीं सकते थे. जब कोई उसे पकड़कर ले जा न सका. तब वे अपनी असमर्थता देख मुनियों के पास


जाकर बोले –
हे महर्षियो!  चंडाल तो बड़ा पापी था फिर क्या कारण है कि हमलोग और ये यमराज के सेवक उसकी ओर देख भी न सके. क्यों ओर किसके प्रभाव से वह सूर्य कि भांति दुष्प्रेक्ष्य हो गया है?और हमें उसकी ओर दृष्टिपात करना भी कठिन जान पडता.

 

मुनियों ने कहा – हे प्रेत गण ! इस चंडाल ने आँवले के पके हुए फल खाए थे, उसकी डाल टूट जाने से उसके समपर्क में ही इसकी मृत्यु हुई है. मृत्यु काल में इसके आस-पास बहुत से फल बिखरे पड़े थे इन्ही कारणों से आप इसकी ओर देख भी नहीं सके ऑर रविवार आदि निषिद्ध बेला में भी नहीं हुआ इसलिए यह दिव्य लोक को प्राप्त होगा.

 

आंवले का प्रयोग एवम महत्व 

आंवले के सेवन से आयु में वृद्धि ,उसका जल पीने से धर्म का संचय तथा उसके जल में स्नान करने से दरिद्रता दूर हो कर समस्त ऐश्वर्यों की प्राप्ति होती है.आंवले के दर्शन ,स्पर्श एवम उसके नाम के उच्चारण से ही श्री विष्णु प्रसन्न हो जाते है. एकादशी तिथि में भगवान् विष्णु को आंवला अर्पित करने पर सभी तीर्थों के स्नान का फल मिल जाता है .

एकादशी के दिन यदि एक ही आँवला मिल जाए तो उसके सामने गंगा गया कशी और पुष्कर आदि तीर्थ कोई विशेष महत्व नहीं रखते है.

 

एकादशी को आंवले से स्नान करता है उसके सब पाप नष्ट हो जाते है जिस घर में आंवले का वृक्ष या उसका फल रहता है उसमे लक्ष्मी एवम विष्णु का वास होता है. आंवले के रस में स्नान करने पर दुष्ट एवम पाप ग्रहों का प्रभाव नहीं होता .

 

मृत्यु काल में जिसके मुख ,नाक कान या बालों में आंवले का फल रखा जाता है वह व्यक्ति विष्णु लोक को जाता है. सर के बाल नित्य आंवला मिश्रित जल से धोने पर कलियुग के दोषों का नाश होता है .कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को आंवले के वृक्ष का पूजन व प्रदक्षिणा करने से भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है.

 


इन तिथियो में उपयोग वर्जित है –
 रविवार, सप्तमी को, सूर्य-चन्द्र ग्रहण , सक्रांति , शुक्रवार , षष्टी, प्रतिपदा, नवमी तिथि, एवम अमावस्या तिथि को आंवले का त्याग करना चाहिए.

 

          “श्री श्याम सुन्दर गोस्वामी जी ”

      सेवाधिकारी श्री राधा रानी मन्दिर बरसाना 

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राधे राधे

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दिनांक 27/04/2018

 

विश्व के सबसे लघु आकार और चक्रांकित शालिग्राम

विश्व की अमूल्य दिव्य धरोहर — विश्व के सबसे लघु आकार और चक्रांकित शालिगराम विग्रह श्रीसर्वेश्वर प्रभु । मात्र गुंजा फल के समान आकार ।

 

सर्वप्रथम श्रीसनकादिक ऋषियो ने सेवा की फिर देवर्षि वर्य श्री नारद जी को प्राप्त हुयी और आज से लगभग 5100 वर्ष पूर्व देवर्षि श्रीनारद जी ने अपने शिष्य सुदर्शन चक्रराज के अवतार श्रीनिम्बार्क भगवान को वृज में श्रीगोबर्धन की तरहटी में स्थित नीमगाँव में प्रदान की ।

यह प्रतिमा अत्यन्त प्राचीन है। जिसके बारे में कई पुराणों एवं उपनिषदो में वर्णन मिलता है। जैसे माण्डूक्योपनिषद के मन्त्र में भगवान्‌ सर्वेश्वर श्रीहरि की महिमा का वर्णन करते हुये लिखा गया है :-                                                          एष सर्वेश्वर सर्वज्ञ एषोन्तर्याम्येष:।
                                                      योनि: सर्वस्य प्रभवाप्ययोहि भूतानाम्‌।।

अर्थात्‌ :-यह सर्वेश्वर भगवान्‌ सर्वज्ञ है। यह प्राणी मात्र अर्थात्‌ चराचर जगत्‌ में अन्तर्यामी रूप से व्याप्त हैं। सम्पूर्ण जगत्‌ का यह कारण है। प्राणियों की उत्पत्ति्, उनका पालन और समय पूर्ण होने पर उनका संहार भी उन्हीं सर्वेश्वर श्रीहरि के द्वारा होता हैं।

श्रीसर्वेश्वर प्रभु सलेमाबाद में किस प्रकार पधारे, इस बारे में कथा इस प्रकार है-

एक बार जब ब्रह्मा जी ने सनकादिक ऋषियों से कहा कि वे भगवान्‌ की पूजा करें तो सनकादिक ऋषियों ने ब्रह्मा जी से पूछा कि वे किस भगवान्‌ की पूजा करें।

 

तब ब्रह्मा जी ने उन्हें सूचित किया कि वे गण्डक नदी के उद्गम स्थल पर स्थित दामोदर कुण्ड जो कि वर्तमान में नेपाल में मुक्तिनारायण धाम से आगे स्थित हैं पर जायें, जहा तुलसी पत्र पर भगवान्‌ विष्णु का प्रतिरूप प्राप्त होगा। आप उसी की पूजा करें।

इसके पश्चचात्‌ सनकादि ऋषि दामोदर कुण्ड गये तो वहा उन्हें तुलसी पत्र पर भगवान्‌ विष्णु के प्रतिरूप श्री शालग्राम प्राप्त हुये। इनका नाम श्री सर्वेश्वर प्रभु रखा गया। तथा इस श्रीविग्रह की श्रीसनकादि को द्वारा पूजा अर्चना की गई।

                                 गोर-श्यामावभासं तं सूक्ष्मदिव्यमनोहरम्‌।
                                    वन्दे सर्वेश्वरं देवं श्रीसनकादिसेवितम्‌।।

अर्थात्‌ :- गौर और श्याम इन दो बिन्दुओं से सुशोभित,श्यामल विग्रह, सूक्ष्माकार, दिव्य मनोहर उन शालग्राम स्वरूप श्रीसर्वेश्वर प्रभु की मैं वन्दना करता हूँ। जिनकी आराधना-पूजा महर्षि सनकादिक एवं देवर्षि नारद ने भी की थी।

यही श्रीविग्रह श्री सनकादिको ने देवर्षि नारद जी को प्रदान किया था। नारद जी ने यही श्रीविग्रह भगवान्‌ श्रीनिम्बार्काचार्य जी को प्रदान किया था।

तब से ही परम्परानुसार यह श्रीविग्रह श्रीनिम्बार्काचार्यपीठ, श्रीनिम्बार्कतीर्थ सलेमाबाद में विराजमान है। इसका प्रमाण हमें श्रीनिम्बार्कपादपीठाधीश्वर जगद्गुरु श्रीनिम्बार्कशरण देवाचार्यजी महाराज द्वारा स्वरचित ’’श्रीसर्वेश्वर प्रपत्ति स्तोत्र’’ के प्रथम श्लोक में मिलता है।

’कृष्णं सर्वेश्वरं देवमस्माकं कुलदैवतम्‌’’

अर्थात्‌ :- श्रीसर्वेश्वर प्रभु हमारे कुलदेव है अर्थात्‌ परम्परागत ठाकुर है।

वर्तमान श्रीनिम्बार्कपादपीठाधीश्वर जगद्गुरु श्रीराधासर्वेश्वरशरण् देवाचार्यजी महाराज ने भी इस बारे में लिखा है :-

श्रीसनकादिक सेव्य हैं, श्रीसर्वेश्वर देव।
                              परम्परागत प्राप्त हैं,’’शरण’’ लसत शुभ सेव।।1।।

सर्वेश्वर प्रभु अर्चना, सुरर्षि नारद प्राप्त।

                           सनकादिक सेवित प्रभु,’’शरण’’ निम्बार्क आप्त।।2।।

श्रीसर्वेश्वर प्रभु श्री शालग्राम का यह श्रीविग्रह इतना सूक्ष्म है, कि इनके दर्शन करने के लिये आवर्धक लेन्स की आवयकता पड़ती है। ऐसा माना जाता है कि भगवान्‌ श्री शालिग्राम का स्वरूप जितना ज्यादा सूक्ष्म होता है उसके पूजन का उतना ही महत्व अधिक होता है। पद्मपुराण में भी इसके बारे में वर्णन मिलता है :-

                                  तत्राप्यामलकीतुल्या पूज्या सूक्ष्मैव या भवेत्‌।
                                 यथा यथा शिलासूक्ष्मा तथास्यास्तु महत्फलम्‌।।

अर्थात्‌ – आंवले के बराबर श्री शालिग्राम की मूर्ति पूजा में हो तो उसका बड़ा भारी फल है और यदि उससे भी ज्यों-ज्यों सूक्ष्म मूर्ति प्राप्त हो त्यों-त्यों और भी अधिक फल देने वाली होती है।

 

प्रभु कृपा से आचार्य पीठ में विराजित श्री शालग्राम का श्रीविग्रह तो गुंजाफल चिरमी के ही बराबर है।

इन सबके अतिरिक्त सूक्ष्मतम श्री शालग्राम श्रीविग्रह की एक और विशेषता है कि इस श्रीविग्रह में एक गोलाकार चक्र दिखलाई देता और उस चक्र के मध्य भाग में दो बिन्दु दिखाई देते है।

 

ये दोनों बिन्दु भगवान्‌ श्रीराधाकृष्ण के प्रतीक है। ऐसा सुन्दर एवं सूक्ष्मतम श्री शालग्राम श्रीविग्रह विश्व में और कहीं नही मिलता है। आचार्य श्री जब भी धर्म प्रचारार्थ कहीं भी पधारते है, तब श्रीविग्रह को गले में धारण करके अपने साथ ही ले जाते हैं। जिसके दर्शन मात्र से इस भव के कई कष्टों से मुक्ति मिल जाती है।

राधे राधे

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दिनांक 26/04/2018

 

शालिग्राम का स्वरूप और महिमा का वर्णन

शालिग्राम का स्वरूप और महिमा का वर्णन

1. – जिस शालिग्राम-शिला में द्वार-स्थान पर परस्पर सटे हुए दो चक्र हों, जो शुक्ल वर्ण की रेखा से अंकित और शोभा सम्पन्न दिखायी देती हों, उसे भगवान “श्री गदाधर का स्वरूप” समझना चाहिये.

2.- “संकर्षण मूर्ति” में दो सटे हुए चक्र होते हैं, लाल रेखा होती है और उसका पूर्वभाग कुछ मोटा होता है.

3.-  “प्रद्युम्न” के स्वरूप में कुछ-कुछ पीलापन होता है और उसमें चक्र का चिह्न सूक्ष्म रहता है.


4. – “अनिरुद्ध की मूर्ति”
गोल होती है और उसके भीतरी भाग में गहरा एवं चौड़ा छेद होता है; इसके सिवा, वह द्वार भाग में नीलवर्ण और तीन रेखाओं से युक्त भी होती है.

5. – “भगवान नारायण” श्याम वर्ण के होते हैं, उनके मध्य भाग में गदा के आकार की रेखा होती है और उनका नाभि-कमल बहुत ऊँचा होता है.

6. – “भगवान नृसिंह” की मूर्ति में चक्र का स्थूल चिह्न रहता है, उनका वर्ण कपिल होता है तथा वे तीन या पाँच बिन्दुओं से युक्त होते हैं. ब्रह्मचारी के लिये उन्हीं का पूजन विहित है. वे भक्तों की रक्षा करनेवाले हैं.

7. – जिस शालिग्राम-शिला में दो चक्र के चिह्न विषम भाव से स्थित हों, तीन लिंग हों तथा तीन रेखाएँ दिखायी देती हों, वह “वाराह भगवान का स्वरूप” है, उसका वर्ण नील तथा आकार स्थूल होता है.

8.-  “कच्छप” की मूर्ति श्याम वर्ण की होती है. उसका आकार पानी की भँवर के समान गोल होता है. उसमें यत्र-तत्र बिन्दुओं के चिह्न देखे जाते हैं तथा उसका पृष्ठ-भाग श्वेत रंग का होता है.

9. – “श्रीधर की मूर्ति” में पाँच रेखाएँ होती हैं,

10.- “वनमाली के स्वरूप” में गदा का चिह्न होता है.

11. – गोल आकृति, मध्यभाग में चक्र का चिह्न तथा नीलवर्ण, यह “वामन मूर्ति” की पहचान है.

12.- जिसमें नाना प्रकार की अनेकों मूर्तियों तथा सर्प-शरीर के चिह्न होते हैं, वह भगवान “अनन्त की” प्रतिमा है.

13. – “दामोदर” की मूर्ति  स्थूलकाय एवं नीलवर्ण की होती है. उसके मध्य भाग में चक्र का चिह्न होता है. भगवान दामोदर नील चिह्न से युक्त होकर संकर्षण के द्वारा जगत की रक्षा करते हैं.

14. – जिसका वर्ण लाल है, तथा जो लम्बी-लम्बी रेखा, छिद्र, एक चक्र और कमल आदि से युक्त एवं स्थूल है, उस शालिग्राम को “ब्रह्मा की मूर्ति” समझनी चाहिये.

15. – जिसमें बृहत छिद्र, स्थूल चक्र का चिह्न और कृष्ण वर्ण हो, वह “श्रीकृष्ण का स्वरूप” है. वह बिन्दुयुक्त और बिन्दुशून्य दोनों ही प्रकार का देखा जाता है.

16. – “हयग्रीव मूर्ति” अंकुश के समान आकार वाली और पाँच रेखाओं से युक्त होती है.

17. – “भगवान वैकुण्ठ” कौस्तुभ मणि धारण किये रहते हैं. उनकी मूर्ति बड़ी निर्मल दिखायी देती है. वह एक चक्र से चिह्नित और श्याम वर्ण की होती है.

18. – “मत्स्य भगवान” की मूर्ति बृहत कमल के आकार की होती है. उसका रंग श्वेत होता है तथा उसमें हार की रेखा देखी जाती है.

19.- जिस शालिग्राम का वर्ण श्याम हो, जिसके दक्षिण भाग में एक रेखा दिखायी देती हो तथा जो तीन चक्रों के चिह्न से युक्त हो, वह भगवान “श्रीरामचंद्र जी” का स्वरूप है, वे भगवान सबकी रक्षा करनेवाले हैं.

20. – द्वारिका पुरी में स्थित शालिग्राम स्वरूप “भगवान गदाधर” को नमस्कार है, उनका दर्शन बड़ा ही उत्तम है.भगवान गदाधर एक चक्र से चिह्नित देखे जाते हैं.


21.- “लक्ष्मीनारायण”
दो चक्रों से,


22. – “त्रिविक्रम”
तीन से,


23.- “चतुर्व्यूह”
चार से,


24. – “वासुदेव”
पाँच से,


25.- “प्रद्युम्न”
छ: से,


26. – “संकर्षण”
सात से,


27. – “पुरुषोत्तम”
आठ से,


28.- “नवव्यूह”
नव से,


29. –  “दशावतार”
दस से,

 

 

          “श्री श्याम सुन्दर गोस्वामी जी ”

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राधे राधे

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दिनांक 25/04/2018

 

शालिग्राम पूजा महात्म्य

भक्तो की अनेक प्रकार की इच्छाये अपने ठाकुर जी के प्रति होती है, किसी भक्त ने इच्छा की, कि भगवान सगुण साकार बनकर आये तो भगवान राम, कृष्ण का रूप लेकर आ गये.

 

किसी भक्त ने कहा मेरे बेटे के रूप में आये तो भगवान कश्यप अदिति के पुत्र के रूप में आ गए किसी भक्त कि इच्छा हुई कि भगवान मेरे सखा बनकर आये, तो वृंदावन में सखा बनकर ग्वाल बाल के साथ खेलने लगे.

 

किसी कि भगवान के साथ लडने की इच्छा हुई तो भगवान ने उसके साथ युद्ध किया. इसी प्रकार किसी भक्त की भगवान को खाने की इच्छा हुई तो भगवान शालिग्रामके रूप में प्रकट हो गए.

 

जो नेपाल में पहाडो के रूप में होते है वहाँ एक विशेष प्रकार के कीड़े उन पहाडो को खाते है और वह पहाड़ टूट टूटकर टुकडो के रूप में गंडकी नदी में गिरते जाते है. नेपाल में गंडकी नदी के तल में पाए जाने वाले काले रंग के चिकने, अंडाकार पत्थर को शालिग्राम कहते हैं.

 

इसमें एक छिद्र होता है तथा पत्थर के अंदर शंख, चक्र, गदा या पद्म खुदे होते हैं. कुछ पत्थरों पर सफेद रंग की गोल धारियां चक्र के समान होती हैं. इस पत्थर को भगवान विष्णु का रूप माना जाता है तथा इसकी पूजा भगवान शालिग्राम के रूप में की जाती है.

 

पुराणों में तो यहां तक कहा गया है कि जिस घर में भगवान शालिग्राम हो, वह घर समस्त तीर्थों से भी श्रेष्ठ है. इसके दर्शन व पूजन से समस्त भोगों का सुख मिलता है.

 

भगवान शिव ने भी स्कंदपुराण के कार्तिक माहात्मय में भगवान शालिग्राम की स्तुति की है. प्रति वर्ष कार्तिक मास की द्वादशी को महिलाएं प्रतीक स्वरूप तुलसी और भगवान शालिग्राम का विवाह कराती हैं.

तुलसी दल से पूजा करता है,ऐसा कहा जाता है कि पुरुषोत्तम मास में एक लाख तुलसी दल से भगवान शालिग्राम की पूजा करने से वह संपूर्ण दान के पुण्य तथा पृथ्वी की प्रदक्षिणा के उत्तम फल का अधिकारी बन जाता है.

 

ऐसा कहा जाता है कि पुरुषोत्तम मास में एक लाख तुलसी दल से भगवान शालिग्राम की पूजा करने से समस्त तीर्थो का फल मिल जाता है मृत्युकाल में इसका जलपान करने वाला समस्त पापों से मुक्त होकर बैकुंठ की प्राप्ति करता है

  सदना कसाई का प्रसंग 

एक सदना नाम का कसाई था,मांस बेचता था पर भगवत भजन में बड़ी निष्ठा थी एक दिन एक नदी के किनारे से जा रहा था रास्ते में एक पत्थर पड़ा मिल गया.

 

उसे अच्छा लगा उसने सोचा बड़ा अच्छा पत्थर है क्यों ना में इसे मांस तौलने के लिए उपयोग करू. उसे उठाकर ले आया.और मांस तौलने में प्रयोग करने लगा.

 

जब एक किलो तौलता तो भी सही तुल जाता, जब दो किलो तौलता तब भी सही तुल जाता, इस प्रकार चाहे जितना भी तौलता हर भार एक दम सही तुल जाता, अब तो एक ही पत्थर से सभी माप करता और अपने काम को करता जाता और भगवन नाम लेता जाता.

 

एक दिन की बात है उसी दूकान के सामने से एक ब्राह्मण निकले ब्राह्मण बड़े ज्ञानी विद्वान थे उनकी नजर जब उस पत्थर पर पड़ी तो वे तुरंत उस सदना के पास आये और गुस्से में बोले ये तुम क्या कर रहे हो क्या तुम जानते नहीं जिसे पत्थर समझकर तुम तौलने में प्रयोग कर रहे हो वे शालिग्राम भगवान है इसे मुझे दो जब सदना ने यह सुना तो उसे बड़ा दुःख हुआ और वह बोला हे ब्राह्मण देव मुझे पता नहीं था कि ये भगवान है मुझे क्षमा कर दीजिये.और शालिग्राम भगवान को उसने ब्राह्मण को दे दिया.

 

 

ब्राह्मण शालिग्राम शिला को लेकर अपने घर आ गए और गंगा जल से उन्हें नहलाकर, मखमल के बिस्तर पर, सिंहासन पर बैठा दिया, और धूप, दीप,चन्दन से पूजा की.

 

जब रात हुई और वह ब्राह्मण सोया तो सपने में भगवान आये और बोले ब्राह्मण मुझे तुम जहाँ से लाए हो वही छोड आओं मुझे यहाँ अच्छा नहीं लग रहा. इस पर ब्राह्मण बोला भगवान ! वो कसाई तो आपको तुला में रखता था जहाँ दूसरी ओर मास तौलता था उस अपवित्र जगह में आप थे.

 

भगवान बोले – ब्रहमण आप नहीं जानते जब सदना मुझे तराजू में तौलता था तो मानो हर पल मुझे अपने हाथो से झूला झूला रहा हो जब वह अपना काम करता था तो हर पल मेरे नाम का उच्चारण करता था.हर पल मेरा भजन करता था जो आनन्द मुझे वहाँ मिलता था वो आनंद यहाँ नहीं.

 

इसलिए आप मुझे वही छोड आये.तब ब्राह्मण तुरंत उस सदना कसाई के पास गया ओर बोला मुझे माफ कर दीजिए.वास्तव में तो आप ही सच्ची भक्ति करते है.ये अपने भगवान को संभालिए.

सार

भगवान बाहरी आडम्बर से नहीं भक्त के भाव से रिझते है.उन्हें तो बस भक्त का भाव ही भाता है.

“जय जय श्री राधे “

 

          “श्री श्याम सुन्दर गोस्वामी जी ”

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दिनांक 24/04/2018

 

वैशाख मास

क्या है वैशाख मास – हिंदू पंचांग में चंद्रमास के नाम नक्षत्रों पर आधारित हैं. जिस मास की पूर्णिमा जिस नक्षत्र में होती है उसी के अनुसार माह का नाम पड़ा है. वैशाख मास की पूर्णिमा विशाखा नक्षत्र में होने के कारण इस मास का नाम वैशाख पड़ा.

“मेष संक्रांति” – वैसाख मास के लगते ही जब सूर्य मेष राशि में आते हैं तब मेष संक्रांति मानी जाती है.

 

वैशाख भारतीय पंचांग के अनुसार वर्ष का दूसरा माह है. चैत्र पूर्णिमा के बाद आने वाली प्रतिपदा से वैशाख मास का आरंभ होता है. धार्मिक और सांस्कृतिक तौर पर वैशाख महीने का बहुत अधिक महत्व माना जाता है. वैशाख मास में धार्मिक तीर्थ स्थलों पर स्नानादि का भी महत्व माना जाता है.

वैशाख मास के मुख्य त्यौहार – वैशाख मास का महत्व इसलिये भी माना जाता है क्योंकि इसी मास में भगवान विष्णु के अवतार जिनमें नर-नारायण, भगवान परशुराम, नृसिंह अवतार और ह्यग्रीव आदि अवतार अवतरित हुए थे. मान्यता है कि देवी सीता भी इसी मास में धरती माता की कोख से प्रकट हुई थी.

इस मास में मुख्य त्यौहार है –  अक्षय तृतीया, सीता नवमी,वैशाख अमावस्या,वैशाख पूर्णिमा


वैशाख मास का महत्व – 


न माधव समो मासो न कृतेन युगं समम्।

                           न च वेदसमं शास्त्रं न तीर्थं गंगया समम्।।” 

अर्थात – वैशाख के समान कोई मास नहीं है, सत्ययुग के समान कोई युग नहीं है, वेद के समान कोई शास्त्र नहीं है, और गंगाजी के समान कोई तीर्थ नहीं है.अपने कतिपय वैशिष्ट्य के कारण वैशाख उत्तम मास है.

कथा है—कि नारद जी ने राजा अम्बरीष से कहा – कि वैशाख मास को ब्रह्माजी ने सब मासों में उत्तम सिद्ध किया है। यह माता की भांति सब जीवों को सदा अभीष्ट वस्तु प्रदान करता है। धर्म, यज्ञ, क्रिया और तपस्या का सार है. यह मास संपूर्ण देवताओं द्वारा पूजित है.

जैसे विद्याओं में वेद-विद्या, मंत्रों में प्रणव, वृक्षों में कल्पवृक्ष, धेनुओं में कामधेनु, देवताओं में विष्णु, वर्णों में ब्राह्मण, प्रिय वस्तुओं में प्राण, नदियों में गंगाजी, तेजों में सूर्य, अस्त्र-शस्त्रों में चक्र, धातुओं में स्वर्ण, वैष्णवों में शिव तथा रत्नों में कौस्तुभमणि उत्तम है, उसी प्रकार धर्म के साधनभूत महीनों में वैशाखमास सबसे उत्तम है.

भगवान विष्णु को प्रसन्न करने वाला इसके समान दूसरा कोई मास नहीं है. जो वैशाख मास में सूर्योदय से पहले स्नान करता है, उससे भगवान विष्णु निरंतर प्रीति करते हैं. पाप तभी तक गर्जते हैं, जब तक मनुष्य वैशाख मास में प्रातःकाल जल में स्नान नहीं करता.

 

                            वैशाख मास में ब्रहममुहूर्त में स्नान का महत्व 

राजन्! वैशाख के महीने में सब तीर्थ, देवता आदि (तीर्थ के अतिरिक्त) बाहर के जल में भी सदैव स्थित रहते हैं. भगवान विष्णु की आज्ञा से मनुष्यों का कल्याण करने के लिए वे सूर्योदय से लेकर छह दंड के भीतर वहां उपस्थित रहते हैं. वैशाख सर्वश्रेष्ठ मास है और शेषशायी भगवान विष्णु को सदा प्रिय है.

                                     वैशाख मास में जल दान का महत्व 

जो पुण्य सब दानों से होता है और जो फल सब तीर्थों के दर्शन से मिलता है, उसी पुण्य और फल की प्राप्ति वैशाख मास में केवल जलदान करने से हो जाती है. जो जलदान में असमर्थ है, ऐसे ऐश्वर्य की अभिलाषा रखने वाले पुरुष को उचित है कि वह दूसरे को प्रबोध करे, दूसरे को जलदान का महत्व समझाए. यह सब दानों से बढ़कर हितकारी है.

जो मनुष्य वैशाख मास में मार्ग पर यात्रियों के लिए प्याऊ लगाता है, वह विष्णुलोक में प्रतिष्ठित होता है, नृपश्रेष्ठ ! प्रपादान (पौसला या प्याऊ) देवताओं, पितरों तथा ऋषियों को अत्यंत प्रिय है. जो प्याऊ लगाकर थके-मांदे पथिकों की प्यास बुझाता है, उस पर ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि देवतागण प्रसन्न होते हैं.

राजन् ! वैशाख मास में जल की इच्छा रखने वाले को जल, छाया चाहने वाले को छाता और पंखे की इच्छा रखने वाले को पंखा देना चाहिए. राजेन्द्र ! जो पीड़ित महात्माओं को प्यार से शीतल जल प्रदान करता है, उसे उतनी ही मात्र से दस हजार राजसूय यज्ञों का फल प्राप्त होता है.

ब्राह्मण को पंखा, छाता, पादुका दान  – श्रम से पीड़ित ब्राह्मण को जो “पंखा” डुलाकर शीतलता प्रदान करता है, वह निष्पाप होकर भगवान् का पार्षद हो जाता है. जो मार्ग में थके हुए श्रेष्ठ द्विज को वस्त्र से भी हवा करता है, वह भगवान विष्णु का सायुज्य प्राप्त कर लेता है. जो शुद्ध चित्त से ताड़ का पंखा देता है, उसके सारे पापों का शमन हो जाता है और वह ब्रह्मलोक को जाता है.

जो विष्णुप्रिय वैशाखमास में “पादुका दान” करता है, वह विष्णुलोक को जाता है। जो मार्ग में अनाथों के ठहरने के लिए विश्रामशाला बनवाता है, उसके पुण्य-फलका वर्णन नहीं किया जा सकता.मध्याह्न में आए हुए ब्राह्मण अतिथि को यदि कोई भोजन दे तो उसे अनंत पुण्य की प्राप्ति होती है.

                            वैशाख मास में इन आठ वस्तुओ का त्याग कर देना चाहिए

स्कन्द पुराण के अनुसार – १.वैशाख में तेल लगाना, २.दिन में सोना, ३.कांस्यपात्र में भोजन करना, ४.खाट पर सोना, ५.घर में नहाना, ६.निषिद्ध पदार्थ खाना, ७.दोबारा भोजन करना तथा ८.रात में खाना – इन आठ बातों का त्याग करना चाहिए-

तैलाभ्यघ्गं दिवास्वापं तथा वै कांस्यभोजनम्।

                                                  खट्वानिद्रां गृहे स्नानं निषि(स्य च भक्षणम्।। 

                                                   वैशाखे वर्जयेदष्टौ द्विभुक्तं नक्तभोजनम्।।

वैशाख में व्रत का पालन करने वाला जो पुरुष पद्म पत्ते पर भोजन करता है, वह सब पापों से मुक्त हो विष्णुलोक जाता है. जो विष्णुभक्त वैशाखमास में नदी-स्नान करता है, वह तीन जन्मों के पापों से मुक्त हो जाता है. जो सूर्योदय के समय किसी समुद्रगामिनी नदी में वैशाख-स्नान करता है, वह सात जन्मों के पापों से तत्काल मुक्त जाता है.

सूर्यदेव के मेष राशि में आने पर भगवान विष्णु का वरदान प्राप्त करने के उद्देश्य से वैशाख मास-स्नान का व्रत लेना चाहिए. स्नान के अनंतर भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहिए.

 

          “श्री श्याम सुन्दर गोस्वामी जी ”

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राधे राधे

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दिनांक 23/04/2018

 

बाबा माधव दास जी का लीला स्फुरण – वाह! पट्ठे तैने आनंद कर दियौ.

एक बार बाबा माधव दास जी महाराज गोवर्धन की परिक्रमा करते-करते गोविंद कुंड पर चले आये. यहां पर्वत के ऊपर गाय, हिरन आदि पशु घूम रहे थे.

 

माधव दास जी महाराज वन और पर्वतों के बीच में गोविंद कुण्ड के तट पर बैठ गए. थोड़ी देर बाद पद्मासन लगाकर ध्यान मग्न हो गए. एक सुंदर लीला का स्फुरण हुआ.

श्यामसुंदर एक विचित्र वेश धारण किए हुए चंचल साखाओं के साथ खेल रहे हैं. एक और श्याम सुंदर पीतांबर की कमर में फेंट कसे हुए मनसुखा, श्रीदामा आदि के संग है.

 

दूसरी और दाऊ दादा सुबल,सुदामा आदि सखाओं के संग विराजमान है. कबड्डी का खेल प्रारंभ हुआ. कभी श्याम सुंदर हार जाते .कभी बलराम जी हार जाते.

इस प्रकार खेल चल रहा था. श्रीदामा बलराम जी को हराने के लिए चला, बहुत प्रयास किया लेकिन बलराम जी को हरा नहीं सका . तब श्यामसुंदर मनसुखा के पास आकर उसकी पीठ पर हाथ मारते हुए कहा -मेरे शेर ! जा अब की बार दाऊ दादा को हराकर ही आना.

मनसुखा कबड्डी -कबड्डी कहता हुआ श्री बलरामजी में फारे में गया. दारु दादा ने अपने सखाओ से कहा- घेर ले सारे कूँ! बचकै नहिं जानौ चाहिए .

 

सभी सखाओं ने चारों तरफ से मनसुखा को घेर लिया. दाऊ दादा ने थोड़ा झुक कर मनसुखा के पैरों को पकड़कर अपनी ओर खींचा तो मनसुखा धड़ाम से नीचे गिर पड़ा. बाकी सखा मनसुखा के ऊपर चढ़ गए.

मनसुखा फारे की लकीर को छूने के लिए अपने दाहिने हाथ को आगे बढ़ाने लगा. दाऊ दादा ने परिक्र मनसुखा को फारे के अंदर खींचने का प्रयास कर रहे हैं और मनसुखा ताकत लगाकर फारे की लकीर को छूने का प्रयास कर रहा है.

 

तभी श्यामसुंदर अपने फारे में लकीर के पास आकर घुटनों के बल बैठकर मनसुखा का उत्साह बढ़ाने लगे.

श्यामसुंदर कह रहे हैं – शाबास! मनसुखा नैक कसर रह गई है, थोरो सो और जोर लगा, सोई काम बन जायेगो. मनसुखा ने पूरी ताकत लगाय कै अंतिम प्रयास कियो और फारे की लकीर को छू लियौ.

श्यामसुंदर इतने प्रमुदित भयै कि जमीन ते ऊपर उछल पड़े और बोले – वाह! पट्ठे तैने आनंद कर दियौ.

 

बाबा जी सब लीला देख रहे थे. बाबा भी वाह पट्ठे कहकर उछल पड़े. लीला का विश्राम हुआ, तो बाबा ने आंखें खोली. बाबा अचंभित रह गए.

उसी दिन से बाबा बात -बात में वाह पट्ठे कहने लगे. श्याम सुंदर की वह मधुर वाणी हृदय में बस गई थी. कोई भी थोड़ा सा अच्छा काम कर देता तो बाबा सहज भी बोल पड़ते थे- वाह! पट्ठे तैने आनंद कर दियौ.

 

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दिनांक 22/04/2018

 

संत पनहियाँ की महिमा

एक बार गोस्वामी तुलसीदास जी वृन्दावन के कालीदह के निकट रामगुलेला के स्थान में रुके थे. उस समय वृन्दावन भक्तमाल ग्रन्थ के रचियता परम भागवत नाभा जी भी वृंदावन में  निवास कर रहे थे.

 

एक दिन श्री नाभा जी ने वृंदावन के   समस्त संत वैष्णवों के लिए विशाल भंडारे का आयोजन किया.सब जगह भंडारे की चर्चा थी.

तुलसीदास उस समय वृन्दावन में ही ठहरे थे , पर वे ऐसे भंडारों में विशेष रुचि नहीं रखते थे.उनका विचार वहाँ जाने का नहीं था.

 

किन्तु श्री नाभा जी के भंडारे में संत श्रीतुलसी दास जी की उपस्थिति को आवश्यक जानकर, श्रीगोपेश्वर महादेव जी ने स्वयं जाकर उन्हें भंडारे में जाने का अनुरोध किया.

 

तब श्री तुलसी दास जी ने श्री नाभा जी की महिमा को जाना और श्री महादेव जी की कृपा का भी अनुभव किया.

तुलसीदास जी ने भगवान शंकर की आज्ञा का पालन किया और नाभा जी के भंडारे में जाने के लिया चल दिए, जब गोस्वामी जी वहाँ पहुंचे तो थोडा बिलम्ब हो गया था,

 

संतो की पंक्ति बैठ चुकी थी,स्थान खचा खच भरा हुआ था. गोस्वामी जी एक ओर जहाँ संतो की पनहियाँ (जूतियाँ)रखी थी,वही बैठ गए.

अब परोसने वाले ने पत्तल रख दी ओर परोसने वाले ने आकर पुआ, साग, लड्डू, परोस दिए, जब खीर परसने वाला आया तो वह बोला – बाबा! तेरो कुल्ल्हड़ कहाँ है? खीर किसमे लोगे?

श्री गोस्वामी जी ने पास में पड़ी एक संत की पनहियाँ आगे कर दी- और बोले – लो इसमें खीर डाल दो’

तो वो परोसने वाला तो क्रोधित को उठा बोला – बाबा! पागल होए गयो है का इसमें खीर लोगे?उलटी सीधी सुनाने लगा संतो में हल चल मच गई श्री नाभा जी वहाँ दौड़े आये गोस्वामी जी को देखते ही उनके चरणों पर गिर पड़े सर्व वन्ध महान संत के ऐसे दैन्य को देखकर सब संत मंडली अवाक् रह गई सबने उठकर प्रणाम किया उस परोसने वाले ने तो शतवार क्षमा प्रार्थना की.

 

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दिनांक 21/04/2018

 

जब एक गज की निष्ठा संत चरणामृत में हो गई

रसिक मुरारी जी की संत सेवा की बड़ी अलौकिक रीति थी,संतो के चरणामृत के माट (मटके)भरे हुए वेदिकाओ पर रखते, उन्ही की पूजा, उन्ही को प्रणाम किया करते थे.

 

बस यही उनकी आराधन सेवा पूजा सबकुछ था. हर समय खूब संतो का जमावड़ा लगा ही रहता था.

एक दिन भंडारे में बहुत से संत आये,इन्होने अपने एक शिष्य को आज्ञा दी -कि जाओ!  और अच्छे प्रकार से संतो का चरणामृत उतार लाओ .जब शिष्य चरणामृत उतार लाया तो रसिक मुरारी जी ने पान किया,और पान करते ही बोले – क्या कारण है?

 

कि जैसा स्वाद नित्य आता है,वैसा स्वाद नहीं आया.शिष्यों को दिया और बोले-  तुम लोग भी पान करो और बताओ कि स्वाद है कि नहीं.

वे विचारे चरणामृत की महिमा और स्वाद क्या जाने.आप समझ गए कि किसी संत का चरणामृत लेना छोड़ दिया है.जब उन्होंने पूँछा – तो शिष्य ने कह दिया – कि एक संत थे जिनके शरीर में गलित कोढ़ था,उनका नहीं लिया.

 

तब रसिक मुरारी जी स्वयं गए और उनका चरणामृत लिया और जैसे ही पान किया तो स्वाद पाते ही नेत्रो में प्रेम के अश्रु छलछला उठे.

प्रसंग २-  इनके गुरु श्यामानंद जी थे एक स्थान पर अनाज होता था और उससे संत सेवा होती थी,एक बार एक राजा ने अपना अधिपत्य जमाया और सारा ग्राम ले लिया,श्यामानंद जी ने इन्हों बुलाया,जब ये राजा के पास गए तो उनके मंत्री इनके शिष्य थे,

 

इसलिए उन्होंने इनसे तो कुछ कहा नहीं उलटे राजा को समझाने लगे.ये बात राजा को अच्छी नहीं लगी और राजा ने जिस रास्ते से ये जा रहे थे उस जगह एक बड़ा पागल हाथी छुड़वा दिया.

 

सब भागने लगे,तब रसिक जी ने रसीली वाणी से बोले – हे चेतन तुम हाथी शरीर का तमोगुण तजो और श्री कृष्ण श्री कृष्ण बोलो ! इतना सुनते ही हाथ का ह्रदय भाव से भर गया और वह सूंड आपके चरणों में नवाकर उनको प्रणाम करने लगा.

उसके आँखों से आँसू बहने लगे,रसिक जी ने उसकी श्रद्धा देखकर कान में भगवन्नाम मंत्र सुना दिया और गोपालदास उसका नाम रखा और उसके गले में तुलसी जी की माला पहिना दी.तब राजा ने भी क्षमा माँगी.

 

अब तो गोपालदास हाथी संतो की सेवा करने लगा,संतो को देखकर प्रणाम करता संतो के लिए व्यापारियों से अनाज लेकर आता,उसका नियम था कि संतो के भंडारे में आता संतो का उच्छिष्ट प्रसादी ही पाता था.इससे संतो की भी हाथी में बड़ी प्रीति हो गई,

 

और संतो की जमात फिरने लगी और गोपाल दास को साथ ले जाते,अब  तो सर्वत्र गोपाल दास महंत का नाम तो सर्व विदित हो गया.

एक राजा ने जब सुना तो उसकी इच्छा उस हाथी को देखने की हुई उसने कहा जो भी उस हाथी को पकड़कर लाएगा उसे बहुत सा द्रव्य देगे.यह सुनकर एक दुष्ट संत वेशधारी गया और गोपालदास जी ने जब देखा संत वेषधारी है तो उसके साथ चले आये.

परन्तु गज गोपालदास का नियम था कि चरणामृत और प्रसाद के अलावा कुछ ग्रहण ही नहीं करते थे,इसलिए जल भी नहीं पिया.तीन चार दिन बीत गए, तब वे लोग उसे गंगाजी की धारा में जल पिलाने ले गए,गंगा जी में उतरकर भी गजराज ने अपनी सूंड ऊपर कर ली और अपना शरीर छोड़ दिया.

ऐसी संत प्रसाद और संत चरणामृत में निष्ठा थी,होती भी क्यों नहीं जिनके गुरु की ऐसी संत चरणामृत में निष्ठा थी,कि उनकी साधन उपासना,पूजा,सभी कुछ संत चरणामृत था.

 

ऐसी निष्ठा कि एक गज को भी संत बना दिया,ऐसे संत और उनकी संत चरणामृत में निष्ठा की सदा ही जय हो …

 

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