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गौरांग महापृभु के मुख्य पार्षद श्री अद्वैताचार्य

निमाई (चैतन्य महापृभु) की चाँचल्य वृत्ति से माता पिता को बहुत ही आनन्द प्राप्त होता. विश्वरूप (निमाई के बडे भाई) इनसे 10 12 वर्ष बडे थे, किन्तु वे जन्म से ही बहुत अधिक गंभीर थे इसलिए पिता भी उनका आदर करते थे. अब विश्वरूप की अवस्था 16 वर्ष की हो चली थी.

माता ने भोजन बनाकर निमाई को अद्वैताचार्य की पाठशाला में विश्वरूप को बुलाने भेजा. निमाई के शरीर की कांति तपाये हुए सुवर्ण की भांति सूर्य के प्रकाश के साथ झलमल कर रही थी.

गौर वर्ण शरीर पर स्वच्छ धोती, आधी धोती ओढे हुए, उनके बडे बडे -विकसित कमल के समान सुन्दर और स्वच्छ नेत्र मुख चन्द्र की शोभा को द्विगुणित कर रहे थे,

आचार्य के सामने हँसते-हँसते इन्होंने भाई से कहा, दद्दा चलो भात तैयार है अम्मा बुला रही है.

विश्वरूप निमाई को गोद में बिठाकर स्नेह से बोले, – निमाई आचार्य देव को प्रणाम करो, ये सुनकर निमाई लज्जा के कारण विश्वरूप की गोदी में छिपे जाते थे,

जैसे ही निमाई के साथ विश्व रूप आचार्य से आज्ञा लेने गये, आचार्य ने निमाई को पहली बार खूब ध्यान से देखा, देखते ही उनके सारे शरीर में बिजली सी दौडने लगी.

उन्हें प्रतीत होने लगा कि मैं इतने दिन से जिन भव भयहारी जनार्दन की उपासना कर रहा हूं वे ही जनार्दन साकार बनकर बालक रूप में मुझे अभय प्रदान करने आये है.

उन्होंने मन ही मन निमाई के पाद पद्मो में प्रणाम किया और अपने भाव को दबाते हुए बोले, विश्वरूप ये तुम्हारे भाई हैं न.

विश्व रूप ने नम्रता पूर्वक कहा, – हां आचार्य देव. ये बडा चंचल है आप इसे गंगा किनारे देखे संसार को उलट पलट कर डालता है. मां तंग हो जाती है.

जाते जाते निमाई ने दो तीन बार निमाई को देखा. आचार्य चेतना शून्य से हो गये, समझ न सके यह बालक हमारे चित्त को अपनी ओर क्यों आकर्षित कर रहा है.

                                                 

श्री अद्वैताचार्य जी  परिचय 

अन्त में ये आचार्य गौरांग महापृभु के मुख्य पार्षद हुए, जिनके द्वारा गौरांग अवतारी माने जाने लगे. इसलिए अब ये जान लेना आवश्यक है कि अद्वैताचार्य कौन थे, और इनकी पाठशाला कैसी थी.

जो अद्वैत आचार्य गौर धर्म के प्रधान स्तम्भ है, गौरांग लीलाओं के जो प्रथम प्रवर्तक, और संयोजक समझे जाते है,

जिन्होंने वयोवृद्ध, विद्या वृद्ध होने पर भी बालक गौरांग महापृभु की पद रज को अपने मस्तक का सर्वोत्तम लेपन बनाया, जिन्होंने गौरांग से पहिले अवतरीण होकर गौर लीला के अनुकूल वायुमंडल बनाया.

उत्तम से उत्तम रंगमंच तैयार किया, उस पर गौरांग महापृभु को प्रधान अभिनय कर्ता बनाकर भक्तो के साथ भांति भांति की लीलाएं करायीं और गौरांग के तिरोभाव के अंनतरअपनी सम्पूर्ण लीलाओं का संवरण करके आप भी तिरोहित हो गये.

उन अद्वैताचार्य के पूर्वज श्री हट्ट (सिलहट) जिले में लाउड परगने के अन्तर्गत “नवग्राम नाम” के एक छोटे से ग्राम मे रहते थे. हम पहिले ही बता चुके है कि उस समय भारत मे बहुत छोटे छोटे राज्य थे.

जिनमें प्रायः स्वतंत्र ही नरपति शासन करते थे. लाउड भी एक छोटी सी रियायत थी, उन दिनों उस रियासत के शासन कर्ता महाराज दिव्य सिंह जी थे.

महाराज परम धार्मिक तथा गुण ग्राही थे. उनकी सभा में पण्डितो का बहुत सम्मान होता था, आचार्य के पूज्य पिता “कुबेर” तर्क पञचानन महाराज की सभा के राज पण्डित थे.

ये न्याय के अद्वितीय विद्वान थे, ये बहुत धनवान थे. किंतु एक दुख था इनके कोई संतान नहीं थी, इनकी पत्नी “लाभा देवी” के गर्भ से बहुत से बच्चे हुये, लेकिन असमय ही संसार को त्याग कर परलोक गामी हुये.

इस कारण ये दोनों अपने पुराने गांव को छोड़कर नवदीप के इस पार शांतिपुर मे रहने लगे. यहीं पर लाभा देवी के यथा समय पुत्र उत्पन्न हुआ. पुत्र का नाम रखा गया कमलाक्ष. ये ही कमलाक्ष आगे चलकर महाप्रभु अद्वैताचार्य के नाम से प्रसिद्ध हुए.

महाप्रभु के बाल रुप में चतुर्भुज भगवान के दर्शन

निमाई (चैतन्य महाप्रभु) अलौकिक बालक थे. उनकी लीलाएं भी बडी मधुर और साधारण बालकों की भाँति होने पर भी परम अलौकिक थी.

                                            निमाई की चंचलता 


1.
एक दिन माता ने देखा, निमाई एकदम नंगा है. इधर उधर से चीरें उठाकर लपेट ली है सम्पूर्ण शरीर में धूलि लपेटे हुए हैं. एक घूरे पर अशुद्ध हांडियों पर आप बैठे है,

हाडिंयो में से कालिख लेकर मुँह और माथे पर काली काली लम्बी लम्बी रेखाएं खींच ली है, शरीर,में जगह जगह काली बिंदी लगा ली है. एक फूटी हाँडी को खपडे से बजा बजाकर आप कुछ गा रहे है.

सुवरण से शरीर पर काली काली बिन्दी बहुत ही भली मालूम होती थी, जो भी उधर से निकलता वही उस अद्भुत स्वांग को देखने के लिए खडा हो जाता.

निमाई दीन दुनिया से बेखबर अपने राग में मस्त थे किसी ने यह समाचार शचीमाता को सुनाया माता दौड़ी दौड़ी आयी प्रेम युक्त डाँट कर कहने लगी, भला ब्राह्मण के बेटे को ऐसे अपवित्र स्थान में बैठना चाहिए.


आपने कहा, –
अम्मा, स्थान का क्या अपवित्र और क्या पवित्र. स्थान तो सभी एक से है.

हाँ जो स्थान हरि सेवा पूजा से विहीन हो वहां बैठना ठीक नहीं, इन हांडियों मे तो मैंने प्रसाद बनाया है. भला फिर हाँडियाँ अपवित्र कैसे हुई.


माता ने डाँटकर कहा –
बहुत ज्ञान मत छाँट जल्दी से उठकर स्नान कर ले.

निमाई भला कब उठने वाले थे वे तो वहीं डटे रहे और फिर वही अपना पुराना राग अलापते रहे माता ने स्वयं जाकर इनका हाथ पकड़ा और उठा लायी.

और घर में आकर इन्हें स्नान कराया और स्वयं स्नान किया.


   महाप्रभु के बाल रुप में चतुर्भुज भगवान के दर्शन

2. निमाई (चैतन्य महाप्रभु ) की सभी लीलाएं दिव्य है. एक दिन निमाई के पिता पं० जगन्नाथ मिश्र स्नान करके लौट रहे थे.

उन्होंने एक ब्राह्मण जिसके चेहरे पर तेज, माथे पर तिलक, गले में तुलसी की माला, मुख से भगवन नाम जप रहा था.

मिश्र जी ने प्रणाम कर अपने यहाँ आतिथ्य स्वीकार करने की प्रार्थना की ब्राह्मण ने आतिथ्य स्वीकार किया.

मिश्र जी ने परिवार सहित उसकी पूजा की, और भोजन बना लेने की प्रार्थना की, शची देवी सफाई करके रसोई बनाने की सभी सामग्री जुटा दी.

ब्राह्मण देव ने सब सामग्री बनाकर विष्णु भगवान् के भोग के लिए रखा, और ध्यान करने लगे, इतने में ही घुटनों चलते निमाई आकर चावल खाने लगे, ब्राह्मण ने आँखें खोल कर देखा तो निमाई को खाते देखकर चौंक उठा निमाई वहां से भागने लगे .

मिश्र जी मारने दौडे तो वो माँ के चरणों में लिपट गये. ब्राह्मण कहने लगे बच्चे को क्या ज्ञान, भोजन की कोई बात नहीं कुछ भी खा लूँगा.

ब्राह्मण सभी के कहने पर फिर से भोजन बनाने को तैयार हो गये, ब्राह्मण, फिर से स्नान करके भोजन बनाने लगे शची देवी ने निमाई को पल भर को भी कही नहीं जाने दिया,

अचानक माता निमाई को छोड़कर किसी काम से अन्दर चली गई, तभी ब्राह्मण ने फिर से भोग अर्पण किया, आँख खोलकर देखा तो चावल खा रहे हैं और दाल शरीर पर लगा रहे हैं.

मिश्र जी ने जब ये देखा तो निमाई को तमाचा मारने वाले ही थे, कि ब्राह्मण ने हाथ पकडा और कहा इस अबोध बालक पर हाथ न उठाएं, आज भोजन बदा ही नही है.

शची माता डरे हुए निमाई को गोद में लिए खड़ी थी, निमाई बीच-बीच मे पिता की ओर देख लेते कि गुस्सा शांत हुआ या नही.

तभी विश्व रूप (निमाई के बडे भाई) भी पढकर लौट आये,विश्व रूप के विश्व विमोहन रूप को देखकर ब्राह्मण की तृप्ति नही होती थी.

विश्व रूप ने कहा – कि इस बार मैं जिम्मेदारी लेता हूँ इस बार खाने में विघ्न न होगा, ब्राह्मण कहने लगे कि मेरा तो अभ्यास है कुछ भी खाकर जल पी लूँगा,

विश्व रूप ने बड़े प्रेम से आग्रह किया तो उन्होंने भोजन बनाना प्रारंभ किया. अबकी बार माता ने रस्सी से बाँधकर इन्हें रखा, बडे भाई ने अपने पास सुला लिया, उसी समय सबको निद्रा आ गई.

भोजन बनाकर जैसे ही रात्रि में भगवान् को अर्पित किया, त्यों ही चतुर्भुज भगवान उनके सामने उपस्थित हो गये देखते ही देखते उनके आठ भुजाएं दृष्टिगोचर होने लगी,

चार भुजाओं मे शंख, चक्र, गदा, और पद्म थे, एक में माखन रखा था, दूसरे से खा रहे थे शेष दो हाथो से मुरली बजा रहे थे, भगवान् ने हँसते हुए कहा – मैं बालक रूप में तुम्हारे पास आता था, तुमने मुझे पहिचाना नहीं, मैं तुमसे प्रसन्न हूं, तुम मुझसे वर माँगाे.


गदगद कण्ठ से हाथ जोड़कर ब्राह्मण ने हाथ जोड़कर कहा-
हे पुरूषोत्तम ! आपकी माया अनन्त है, भला मैं क्षुद्र प्राणी उसे कैसे समझ सकता हूँ, हे निरंजन ! मुझ अज्ञानी पर आपने इतनी कृपा की, मै तो अपने को इसके अयोग्य समझता हूँ.

भगवन, मैंने न कोई तप किया, न कभी ध्यान किया, जप, दान, धर्म, पूजा पाठ मैने आपकी प्रसन्नता के निमित्त कुछ भी तो नहीं किया,

फिर भी मुझ दीन हीन कंगाल पर आपने इतनी कृपा की, इसे मैं आपकी स्वाभाविक करूणा ही समझता हूं.

मेरा कोई एेसा साधन तो नही था, जिससे आपके दर्शन हो सके. हे नाथ, आप मुझे वरदान देना ही चाहते है तो यही वरदान दीजिए कि आपकी मंजुल मूर्ति मेरे मन मन्दिर में सदा बनी रहे.

एवमस्तु कहकर भगवान् अन्तर ध्यान हो गये ब्राह्मण ने बडे आनंद के साथ भोजन किया. निमाई को पास सोता देखकर माँ को प्रसन्नता हुई.

प्रातः काल ब्राह्मण देवता निमाई को मन ही मन प्रणाम करके चले गये और जब तक वे रहे नित्य प्रति किसी न किसी समय आकर निमाई के दर्शन कर जाते थे.

निमाई अब थोड़ा थोड़ा बोलने लगे थे . स्त्रियाँ कहती तू ब्राह्मण बालक होकर भिखारी ब्राह्मण के हाथ का चावल खा लेता है

अब तेरी जाति कहां रही, निमाई कहते हमें ब्राह्मणपने से क्या हम तो ग्वाल वाल है जहां मिल जाता है खा लेते है. लाओ तुम्हारे घर का खा लें.


3.
अब निमाई ( चैतन्य महाप्रभु ) मिश्र जी के साथ गंगा जाने लगे. कुछ दिन बाद ये अकेले गंगा जाने लगे, वहां घंटो खेला करते दो तीन बार स्नान करते, मिश्र जी इन्हें बहुत समझाते, कि बेटा कुछ पढना भी चाहिए, किन्तु ये उन बातों पर ध्यान ही नही देते.

एक बार मिश्र जी को निमाई पर बडा गुस्सा आया ये इन्हें पीटने के लिए गंगा किनारे गये, मां भी पीछे पीछे चल दी, ये वहां उपद्रव कर रहे थे.

पिता इन्हें देखकर आपे से बाहर हो गये, और पकडने दौडे, ये उन्हे देखकर घर की तरफ भागे, रास्ते में माँ से जाकर लिपट गये मां ने गोद में उठा लिया,

मां इन्हें डांटने लगी इतने में मिश्र जी भी आ गये, और बांह पकड कर खींचने लगे, इसी बीच और लोग भी आ गये और मिश्र जी को समझाने लगे, तब मिश्र जी का गुस्सा शांत हुआ.


कहते हैं एक दिन रात्रि के समय स्वप्न में किसी महापुरुष ने इनसे कहा –
पंडित जी आप अपने पुत्र को साधारण पुरूष न समझे, ये अलौकिक पुरूष है इनकी इस प्रकार भर्त्सना करना ठीक नहीं.

स्वप्न में ही मिश्र जी ने उत्तर दिया ये चाहे महापुरुष हो या साधारण पुरूष जब ये हमारे यहाँ पुत्र रूप में प्रकट हुए हैं तो हमें इनकी भर्त्सना करनी पडेगी. पिता का धर्म है कि पुत्र को शिक्षा दे.

दिव्य पुरूष ने फिर कहा – जब ये स्वयं सब कुछ सीखे हुए है इन्हें शास्त्र के सीखने की आवश्यकता नहीं तब आप इन्हें व्यर्थ क्यों तंग करते हैं.

इस पर इन्होंने कहा पिता का तो यही धर्म है कि वह पुत्र को सदैव शिक्षा दे चाहे पुत्र कितना भी गुणी शास्त्रज्ञ क्यो न हो महापुरुष इनसे प्रसन्न होकर अन्तर ध्यान हो गये, प्रातःकाल ये इस बात पर सोचते रहे, कालांतर में ये इस बात को भूल गये.

महाप्रभु का प्रथम कृपापात्र

शाके १४०७ ( सं० १५४२वि०) के फाल्गुन की पूर्णिमा का शुभ दिवस है पं० जगन्नाथ मिश्र और शची देवी यहां महान आनंद के समय नामावतार श्री गौरांग देव का प्रादुर्भाव हुआ.

जो कभी भी भगवान् का नाम नहीं लेते थे, वे भी उस दिन प्रेम में उन्मत्त होकर कृष्ण कीर्तन कर रहे थे, उस दिन मुसलमान भी हरि बोल, हरि बोल कहकर हिन्दुओ का साथ दे रहे थे.

शची देवी के पिता नीलामबर चक्रवर्ती भी वहां उपस्थित थे, वे तो प्रसिद्ध ज्योतिषी ही थे, वे बोले यह बालक कोई महान पुरुष होगा, इसके द्वारा असंख्य जीवों का कल्याण होगा,

यह असाधारण महापुरुष होगा, भक्तो ने अनुभव किया कि आकाश में देवता उनकी प्रसन्नता में अपनी प्रसन्नता मिलाकर जय घोष कर रहे हैं,

और भक्तों को अभयदान का आदेश कर रहे है कि अब भय की कोई बात नही नवदीप में ही नहीं सम्पूर्ण देश में भक्ति की ऐसी मनोरम बाढ आएगी कि जिसके द्वारा सभी जीव पावन बन जायेंगे,

और चारो ओर हरि बोल हरि बोल यही सुमधुर ध्वनि सुनाई पडेगी.

हरि बोल की ध्वनि सुनकर ही चुप होते – चैतन्य महाप्रभु एक महीने के ही थे, एक दिन ये खटोलने पर पडे बहुत जोरों से रो रहे थे माता ने बहुत चेष्टा की. किन्तु ये चुप नहीं हुये.

तब तो माता इन्हें, हरि हरि बोल, बोल हरि बोल, मुकुंद माधव गोविंद बोल. ये पद गाकर धीरे-धीरे गाने लगी, बस इसका श्रवण करना था कि ये चुप हो गये.

माता को बडी प्रसन्नता हुई. उन्हे चुप करने का सहज ही उपाय मिल गया, जब कभी ये रोते तभी माता अपने कोमल कण्ठ से गानें लगतीं.


हरि हरि बोल बोल हरि बोल ।
                                               

  मुकुन्द माधव गोविन्द बोल।।

 


महाप्रभु और सर्प –
चैतन्य महाप्रभु का एक नाम निमाई था, एक दिन माँ ने विश्वरूप (इनके बडे  भाई) को गोद में  निमाई को देकर, खाना बनाने में लग गयी,

विश्वरूप एक तरफ निमाई को बिठा कर स्वयं पुस्तक पढने लगे, धीरे-धीरे निमाई रेंगकर आँगन में जा पहुंचे, मां ने आँगन में आकर देखा तो छक्के छूट गये.

सर्प गुडी मुडी बैठा है उसके ऊपर निमाई सवार हैं फन ऊपर उठा रखा है, किसी की हिम्मत नहीं पडती कि कैसे बच्चे को साँप से छुडायें, उसी समय शची देवी छुडाने के लिए दौडी,

देखते ही साँप बिल मे घुस गया निमाई मुस्कराते रहे, बूढी स्त्रियाँ कह रही हैं क्या तुझे खेलने को साँप ही मिले हैं, निमाई उनकी तरफ देखकर हँस देते है, तभी स्त्रियाँ गानें लगती हैं.


हरि हरि बोल, बोल हरि बोल।


चोर पर कृपा –
एक दिन ये घर से निकल कर रास्ते में एकान्त में खेल रहे थे,

शरीर पर बहुत से आभूषण थे, उनमें कई सोने के भी थे इतने में ही चोर उधर आ निकला, निमाई को आभूषण पहिने एकांत में खेलते देखकर उसके मन में बुरा भाव उत्पन्न हुआ

और वह इन्हें पीठ पर चढ़ाकर एकान्त स्थान की ओर जाने लगा, इनके स्पर्श मात्र से ही उसकी विचित्र दशा हो गयी,

उसे अपने कुकृत्यो पर रह रह कर पश्चाताप होने लगा, निमाई का एक पैर उसके कंधे के नीचे लटक रहा था.

उस कमल की भाँति कोमल चरण को देखकर उसका ह्रदय भर आया, उसने एक बार निमाई के कमल की तरह खिले हुए मुहँ की तरफ ध्यान पूर्वक देखा,

पीठ पर चढे हुए निमाई हँस रहे थे, चोर का ह्रदय पानी पानी हो गया, चैतन्य महाप्रभु (निमाई) का वह सर्व प्रथम कृपा पात्र यदि चोर बना.

चोर की चितवृति शुद्ध होने से उसका भाव ही बदल गया. बस वही उसका चोरी का अंतिम दिन था. उसने धीरे से लाकर निमाई को उनके द्वार पर छोड़ दिया.

श्रीकृष्ण ने राधारानी जी से उनके महाभाव की याचना क्यों की ?

                       

 नवद्वीपे अवतार,राधाभाव अंगीकार,भाव कांति अंगेर् भूषण.

अर्थ – व्रज राज नंदन श्री कृष्ण चैतन्य रूप से नवद्वीप में अवतार ग्रहण किया. उन्होंने श्री राधा के भाव तथा कांति को अपने अंगों का भूषण किया है और कृष्ण से गौर हुए हैं.

                     

  तीन वाञ्छा अभिलाषी,शची गर्भे प्रकाशी, संगे सब पार्षद गण

अर्थ – अपनी तीन वांछायो को पूर्ण करने की अभिलाषा से वे शचि माता के गर्भ से आविरभूत हुए हैं. उनके साथ उनके समस्त पार्षद गण भी अवतीर्ण हुए हैं.

                             

 गौर हरि अवतरि,प्रेमेर बादर करि,साधिला मनेर निज काज.

अर्थ – श्री गौर हरि ने अवतार लेकर प्रेम को तो मेघ बना दिया-प्रेम की सब स्थानों पर निर्विचार वर्षा कर दी.इधर अपनी भी मनोभिलाषा को पूर्ण किया.

                       

राधिकार प्राण पति, की भाबे कांदिया निति, इहा बूझे भकत समाज

अर्थ- श्री राधिका के प्राण पति श्री कृष्णचैतन्य रूप में प्रेम विभोर होकर किस तरह नित रोये-यह तो गौरभक्त समाज ही जानता है.

(श्रील नरोत्तम दास ठाकुर विरचित प्रेम भक्ति चंद्रिका)

इस त्रिपदी में श्रील नरोत्तम ठाकुर महाशय ने प्रेम पुरुषोत्तम श्रीश्री कृष्ण चैतन्य स्वरूप का संक्षिप्त परिचय दिया है.

व्रज लीला में निखिल रस-निर्यास आस्वादन करने के बाद भी ब्रजेन्द्र नंदन श्री कृष्ण की 3 वांछाये पूर्ण न हो सकीं-

1) श्री राधा प्रेम की महिमा क्या है?

2) श्री राधा अपने महाभाव से मेरे जिस रूप-सौंदर्य का आस्वादन करती हैं, उसका माधुर्य कैसा है?

3) उस मेरे माधुर्य आस्वादन में जो सुख श्री राधाजी अनुभव करती हैं, वह सुख कैसा है?

इन तीन बातों को जानने के लिए श्री कृष्ण व्रजलीला में सक्षम न हो सके.क्योंकि इनको जानने के लिए श्री राधाजी के मादनाख्य-महाभाव का आश्रय होना आवश्यक.

व्रजलीला में श्री कृष्ण उसके विषय हैं. इन वांछायो की पूर्ति के लिए उन्होंने श्री राधाजी से उनके महाभाव की याचना की.

श्री राधाजी का तो कृष्ण-वाञ्छा पूर्ति करना स्वरूप-धर्म है.उन्होंने प्राणपति को अपना मादनाख्य महाभाव प्रदान किया. क्योंकि श्री राधाजी का भाव एवं देह पृथक नही हैं,

महाभाव से गठित महाभाव स्वरूपिणी हैं वे.भाव के प्रदान में उनकी अंगकान्ति भी श्री श्यामसुन्दर को सहज में प्राप्त हो गई.श्यामसुन्दर से वे श्री गौरसुन्दर बन गए.

जैसा की श्री रूप गोस्वामी पाद ने कहा- राधा-भावद्युति-सुवलितं नौमी कृष्णस्वरूपम…श्री कृष्ण ही राधा-भाव-द्युति से सुवलित होकर श्री चैतन्य रूप में आविरभूत हुए.

इस रूप में उन्होंने अपनी तीन वांछाये पूर्ण की. श्री राधाप्रेम की महिमा का अनुभव किया.

राधाभाव से अपनी रूप-माधुरी एवं प्रेम-माधुरी का आस्वादन किया, तथा उससे उद्भूत परमानंद का भी अनुभव किया.

इसके अलावा उन्होंने कलि के युगधर्म श्रीनाम संकीर्तन का भी स्वयम आस्वादन-आचरण करते हुए जीव जगत में प्रचार किया.

तथा नाम प्रेम को बिना किसी विचार के आचाण्डाल वितरण किया,जैसे मेघ बिना विचार के सब स्थानों पर जल बरसाता है.

श्री गौरभक्तों ने श्रीकृष्ण चैतन्य के नाम संकीर्तन में उनके स्वेद,कम्प,पुलक,अश्रु आदि प्रेम के सात्विक विकारों को अपने नेत्रों से देखा है. उनके कृष्ण विरह में क्रन्दन को सुनकर पाषाण भी विगलित हो जाते थे.

कब और कैसे ठाकुरजी का विरह हजार गुना बढ़ जाता है?

श्री महाप्रभुजी के चरणकमल, और श्री महाप्रभुजी के चरणकमल की रज, यानि कमल का मकरंद, जब इस मकरंद का सम्बन्ध जीव के साथ होता है तभी उसका उद्धार होता है.

श्री महाप्रभुजी के चरणारविन्द में अनेक -चिन्ह है.उन चिन्हों में एक चिन्ह कमल का है. श्री महाप्रभुजी ने  चरणरज द्वारा कई जीवों का उद्धार किया है.


 श्री नाथ जी और श्री यमुना जी ने भी धारण किया ये कमल 

ये चरणरज चरणकमल का मकरंद है.श्री महाप्रभुजी के चरण में कमल है.ये ही कमल श्री यमुनाजी ने और श्री श्रीनाथजी ने स्वयं के हस्त में धारण किया है.

“ये कमल कैसा है.जब श्री ठाकुरजी को श्री स्वामिनी जी का विप्रयोग होता है.ये  विप्रयोग इतना बढ़ जाता है की श्री ठाकुरजी श्री स्वामिनीजी बिना रह नही सकते, उस समय श्री महाप्रभुजी के चरण में रहा ये कमल हजार पाखुड़ी वाला बन जाता है.

श्री ठाकुरजी इस कमल के मध्य में..बिराजमान हो जाते है और स्वयं के श्रीमुख से “राधे राधे” शब्द  का उच्चारण कर.. श्री स्वामिनीजी को याद करते है.

   

   जब ठाकुर जी अपने हाथ से श्री जी का एक एक नाम लिखते है 

श्री ठाकुरजी के नेत्रों से अश्रुधारा बहने लगती है. इतना प्रगाढ़ विरह होता है कि.. श्री स्वामिनीजी के वियोग में श्री प्रभु के नेत्र का काजल भी बहते-बहते अश्रु के साथ कपोल पर आ जाता है.

ये काजल मिश्रित अश्रु श्री ठाकुरजी स्वयं के हस्त की ऊँगली पर ले जब कर.. कमल की पाँखुड़ी पर श्री स्वामिनीजी का चित्र बनाते है.

श्री ठाकुरजी स्वयं के हस्त से श्री स्वामिनी-जी का एक-एक नाम लिखते है.

इस प्रकार श्री ठाकुरजी इस कमल के हजार पंखुड़ी पर श्री स्वामिनीजी का नाम लिख-कर “राधासहस्त्रनाम” लिखते है.

जब श्री ठाकुर जी स्वयं के द्वारा बनाये गए स्वामिनीजी के चित्र की तरफ दृष्टी करे,तब श्री प्रभु विचारे कि अभी तक तो एक ही स्वामिनीजी का वियोग था,

लेकिन  अब तो हजार स्वामिनीजी के दर्शन हो रहे.. जिससे श्री ठाकुरजी का विरह हजार गुना बढ़ गया.

श्री ठाकुरजी को इतना ताप हुआ की मूर्छित होकर उस कमल में पौढ़ गए. ये ही कमल हमारे श्री महाप्रभुजी के चरण में है.जहाँ श्री महाप्रभु जी के गुणगान होते हो..

वहाँ इस रज का इस कमल का सम्बन्ध प्रकट होता है.जब श्री महाप्रभुजी के गुणगान सुनते-सुनते नेत्रों में प्रेमाश्रु आ जाय तब मानना की  प्रभुने कृपा कर के.. इस कमल  का  स्पर्श हमारे नेत्र को कराया.

श्री महाप्रभुजी के गुणगान सुनते-सुनते..जब ह्रदय में रोमांच छा जाय तब मानना कि श्रीप्रभु ने कृपा करके इस कमल का स्पर्श हमारे ह्रदयको कराया.

जहाँ जहाँ श्री महाप्रभुजी की वाणी व श्री महाप्रभुजी का गुणगान वैष्णव करते हो, वहाँ ये कमल स्वयं ही प्रकट होता है.

वास्तव में जब श्री महाप्रभुजी का गुणगान करते हो या गुणगान सुनते हो तब ये कमल प्रकट होता ही है.

श्री ठाकुरजी को याद करते-करते श्री महाप्रभुजी के गुणगान गाते-गाते.. जब नेत्र  में अश्रु आ जाये.

तब श्री महाप्रभुजी कहते है कि तब ये नेत्र नही,नेत्रकमल कहलाते है, जेसे कमल जल बिना रह नही सकता, उसी तरह नेत्र भी जल धारण करता है..

तब ये नेत्रकमल कहलाता है. श्री महाप्रभुजी के चरणरज का ये सामर्थ्य है, जो इस कमल का दान जीवों को करते है और उन्हें धन्य बनाते है. ऐसे श्री महाप्रभुजी के चरणकमल में कोटि-कोटि दंडवत प्रणाम.

चैतन्य जीवनामृत

महाप्रभु का प्रादुर्भाव विक्रम कि सोलहवी शताब्दी के मध्य भाग में हुआ और वे लगभग आधी शताब्दी तक इस धरा धाम पर विराजमान रहकर भावुक भक्तो को निरामय श्रीकृष्ण प्रेम पीयूष का पान कराते रहे.

महाप्रभु गौरांग देव के पूर्वज हुआ है श्री हट्ट निवासी थे यह नगर आसाम प्रान्त में है और बंगाल से सटा हुआ है यहाँ भरद्वाज वंशी परम धार्मिक और विद्वान उपेन्द्र मिश्र नाम के एक तेजस्वी और कुलीन ब्राह्मण निवास करते थे

उनके सात पुत्र थे जिनमे से एक जगन्नाथ थे इनके यहाँ गौराग प्रभु का जन्म हुआ ये पढ़ने के लिए सिलहट (श्री हट्ट)से नवद्वीप में आये.

यहाँ जगन्नाथ मिश्र पंडित गंगादासजी कि पाठशाला में अध्ययन करने लगे यही नवद्वीप निवासी नीलाम्बर चक्रवर्ती ने अपने ज्येष्ठ कन्या शची देवी का इनसे विवाह कर दिया ये माया पुर में घर बनाकर रहने लगे.

मायापुर नवद्वीप का ही एक मुहल्ला है.

प्राचीन नवद्वीप कि परिधि १६ कोस कि थी उसमे अन्तःद्वीप, सीमांन्तद्वीप, गोद्रुमद्वीप, मध्यद्वीप  और रूद्रद्वीप, ऋतुद्वीप, जन्हुद्वीप, मोद्द्र्मद्वीप, कोलद्वीप,इन नवो को मिलाकर ही नवद्वीप कहते थे.

शाके १४०७ (स.१५४२ विक्रमी)के फाल्गुन की पूर्णिमा का शुभ दिन महाप्रभु का जन्म हुआ सब बालक ९ महीने गर्भ में रहते है किन्तु गौरांग पुरे १३ महीने गर्भ में रहे थे.

शची देवी के सखियों ने गौरांग का नाम ‘निमाई’ रखा बहुतो का यह मत है कि इनका प्रसवग्रह एक नीम के वृक्ष के नीचे था इसलिए इनका नाम निमाई रखा गया.

इनके दो विवाह हुए थे पहली पत्नी का नाम लक्ष्मी था उनके परलोक गमन के बाद इनका दूसरा विवाह विष्णुप्रिया जी के साथ हुआ.

एक बार जब ये अपने पिता के श्राद्ध के लिए गया जी गए थे तब उन्हें वहाँ श्री ईश्वरपुरी जी मिले जिन्होंने इनके कानो में गोपिजनवल्ल्भाय नमः इस दशाक्षर मंत्र का उपदेश कर दिया सुनते ही ये मूर्च्छित हो गए.

ईश्वरपुरी जी इन्हें दीक्षा देकर कहाँ गए किसी को पता नहीं चला.

आगे जब इन्होने संन्यास लिया तो संन्यास कि दीक्षा भारती महाराज से ली तब इनका नाम चैतन्य रखा गया .

आगे ये १८ वर्ष तक जगन्नाथ पूरी में रहे वृंदावन कि यात्रा भी की और पुरे भारत का भ्रमण भी किया.

यात्रा में नित्यानंद जी, अद्वैताचार्य जी, गदाधर जी श्री वास, आदि बहुत से भक्तो से भेट हुई. अद्वैताचार्य जी इनके बड़े भाई के अध्यापक थे.

हरि नाम का संकीर्तन श्री चैतन्य महाप्रभु ने ही शुरू किया.

                               

“हरे कृष्णा, हरे कृष्णा , कृष्णा-कृष्णा, हरे-हरे  

                                  

   हरे-राम, हरे-राम, राम-राम, हरे-हरे”

श्री चैतन्य महाप्रभु जी का परिचय या उनके बारे में कुछ भी लिखना हमारे जैसे तुच्छ जीवो के बस की बात नहीं है फिर भी हम जो भी थोडा बहुत लिखने की कोशिश कर रहे है उसमे त्रुटियाँ भी बहुत होगी उन सब के लिए हम क्षमा प्रार्थी है.

श्री राधे 

“श्रील नारायण भट्ट ज़ू जयति”

“श्री नारायण दास गोस्वामी जयति”

??आज की ब्रज रस धारा ??

दिनांक 31/05/2018

प्रेम में श्री राधा भाव

श्री राधिका की एक सखी श्यामसुंदर से कहती है – ‘वेणुवर ! तुम्हारे अदर्शन से राधा की दशा आज कैसी हो रही है ! उनके नेत्रों से जल की इतनी अधिक वर्षा हो रही है कि उससे यमुना जी का जल बढ़कर दूना हो गया है.

उनके श्री से इस प्रकार पसीना झर रहा है, जैसे चांदनी रात्री में चंद्रकांतमणि  पसीजकर रस बहाने लगती है.

उनका शरीर भी चन्द्रकान्तमणि की भाँती  निश्चेष्ट हो गया है और उसका वर्ण भी उसी मणि के सदृश पीला पड गया है. उ

नके कंठ की वाणी रुक रुक कर निकलती है तथा उसका स्वर भंग हो गया है.

उनका सर्वांग कदम्ब के केसर की भाँती पुलकित हो रहा है.  भयंकर आंधी पानी में जैसे केले का वृक्ष कांपकर भूमि पर गिर जाता है, वैसे ही उनकी अंग लता भूमि पर गिर पड़ी है.

ये सब महान भाव तरंगें श्री राधा के महाभाव सागर को प्रकट दिखला रही है .

वस्तुतः श्री कृष्ण, श्री राधा, श्री गोपांगना समूह एवम उनकी मधुरतम लीलाओं में कोई भेद नहीं है .

रस स्वरुप श्री श्यामसुंदर ही अनंत अनंत रसों के रूप में प्रकट होकर स्वयं ही आस्वाद्य, आस्वादक, आस्वाद बने हैं तथापि श्री राधा गोविन्द का माधुरातिमपुर लीला रस प्रवाह अनादि अनंत रूप से चलता रहता है .

श्री कृष्ण और श्री राधा का कभी विछोह न होने पर भी वियोग लीला होती है, पर उस वियोग लीला में भी संयोग की अनुभूति होती है और संयोग में भी वियोग का भान होता है.

ये सब रस समुद्र की तरंगे हैं. प्रेम का स्वाभाव श्री राधा के अन्दर पूर्ण रूप में प्रकट है, इसलिए वे अपने में रूप गुण का अभाव मानती है.

श्री कृष्ण को नित्य अपने सानिंध्य में ही देखकर सोचती है कि मेरे मोह में प्राण नाथ यथार्थ सुख से वंचित हो रहे हैं.

अच्छा हो, मुझे छोड़कर ये अन्यत्र चले जाएँ तथा सुख सम्पादन करें, पर श्री कृष्ण कभी इनसे पृथक नहीं होते.

इस प्रकार प्रेम का प्रवाह चलता रहता है. परम त्याग, परम प्रेम और परम आनंद  – प्रेम की इस पावन त्रिवेणी का प्रवाह अनवरत बहता रहता है !

एक विचित्र बात तब होती है, जब श्री कृष्ण मथुरा पधार जाते हैं, श्री राधा तथा समस्त गोपीमण्डल एवं सारा ब्रज उनके वियोग से अत्यंत पीड़ित हो जाता है

यद्यपि श्रीश्याम सुन्दर माधुर्य रूप में नित्य श्री राधा के समीप ही रहते है, पर लोगों की दृष्टि  में चलते जाते हैं . मथुरा से सन्देश देकर वे उद्धवजी को ब्रज में भेजते हैं.

श्याम सखा श्री उद्धवजी ब्रज में आकर नंदबाबा एवं यशोद मैया को सान्तावना देते है, फिर गोपांगना समूह में जाते हैं, वहां बड़ा ही सुन्दर प्रेम का प्रवाह बहता है

और उसमे उद्धव जी का समस्त चित्त प्रदेश आप्लावित हो जाता  है. तदन्तर वे श्री राधिकाजी से एकांत में बात करते हैं. श्री राधा कि बड़ी ही विचित्र स्थिति है.

वे जब उद्धव जी से श्री श्यामसुंदर का मथुरा से भेजा हुआ सन्देश सुनती हैं, तब पहले तो चकित सी होकर मानो संदेह में पड़ी हुई सी कुछ सोचती है. फिर कहने लगीं –

 

उद्धव ! तुम मुझको यह किसका कैसा सन्देश सुना रहे हो ? तुम झूट मूठ मुझे क्यों भुलावे में डाल रहे हो. मेरे प्रियतम श्री श्यामसुंदर तो यहीं है.

वे कब परदेश गए, कब मथुरा गए, वे तो सदा मेरे पास ही रहते हैं ! मुझे देखे बिना एक क्षण भी उनसे नहीं रहा जाता, मुझे न पाकर वे क्षण भर में व्याकुल हो जाते हैं,

वे मुझे छोड़कर कैसे चले जाते. फिर मै तो उन्ही के जिलाय जी रही हूँ, वे ही मेरे प्राणों के प्राण हैं . वे मुझे छोड़कर चले गए होते तो मेरे श्री में ये प्राण कैसे रह सकते.

इतने में ही श्री कृष्ण दिखलाई दिए ! तब श्री राधा बोली – ‘अरे देखो, उधर देखो, वे नंदकिशोर कदब्म के मूल में खड़े कैसी निर्मिमेष दृष्टि से मेरी ओर देख रहे हैं और मंद मंद मुस्कुरा रहे है !

देखो तो, मेरे मुख को कमल समझकर प्राण प्रियतम के नेत्र भ्रमर मतवाले होकर मधुर रस पान कर रहे हैं.’

‘देखो, भोहें चलाकर और आँखे मटकाकर वे मेरे प्राण धाम मुझे इशारा कर रहे हैं तथा अत्यंत आतुर होकर मुझको एकांत  कुञ्ज में बुला रहे हैं .

उद्धव ! तुम भौचक्के से होकर कदम्ब की ओर कैसे देख रहे हो . क्या तुम्हे श्यामसुंदर नहीं  दिखाई देते, अथवा क्या तुम उन्हें देखकर प्रेम में डूब गए हो.’

श्री राधिकाजी यों कह रही थीं कि उन्हें श्यामसुंदर के दर्शन होने बंद हो गए, तब वे अकुला उठीं और बोलीं –

‘हैं, यह सहसा क्या हो गया. श्यामसुंदर कहाँ छुप गए. हाय ! वे आनंद निधान मनमोहन मुझे क्यों नहीं दिखाई दे रहे हैं .

वे लीलामय क्या आज पुनः आंखमिचोली खेलने लगे. अथवा मैंने उनको तुम्हे दिखा दिया, इससे क्या उन्हें लाज आ गयी और वे कहीं छिप गए.’

‘नहीं, नहीं ! तब क्या वे सचमुच ही मुझे छोड़कर चले गए. हाय ! क्या वे मुझसे मुख मोड़कर मुझे अपरिमित अभागिनी बनाकर चले गए.

हाय उद्धव ! तुम सच कहते हो, तुम सत्य सन्देश सुनाते हो. वे चले गए ! हा ! वे मेरे लिए रोना शेष छोड़ कर चले गए. ‘

‘पर ऐसा कैसे होता. जो पल पल में मुझे अपलक नेत्रों से देखा करते, जो मुझे सुखमय देखने के लिए बड़े सुख से मान अपमान, स्तुति निंदा, हानि लाभ, सुख दुःख – सब सहते,

मेरा दुःख जिनके लिए घोर दुःख और मेरा सुख ही जिनका आत्यंतिक सुख था, वे मुझे दुःख देकर कैसे अपने जीवन सुख को खो देते. अतएव वे गए नहीं है, यहीं छिपे होंगे.’

इतना कहते कहते ही राधा का भाव बदला. उनके मुख पर हंसी छा गयी और उल्लसित होकर कहने लगीं – ‘हाँ ठीक, वे चले गए. मुझे परम सुख देने के लिए ही वे मथुरा में जाकर बसे हैं.

में इसका रहस्य समझ गयी. मै सुखी हो गयी मुझे सुख देने वाले प्रियतम के इस कार्य को देखकर ! मुझे वो सब पुरानी बाते याद आ गयीं, जो मुझमे उनमे हुआ करती थी.

उनके जाने का कारण में जान गयी. वे मुझे सुखी बनाने के लिए ही गए हैं. इसी से देखो, मै कैसी प्रफुल्लित हो रही हूँ – मेरा अंग अंग आनंद से किस प्रकार रोमांचित हो रहा है.’

 

“जय जय श्री राधे”

 

“श्री श्याम सुन्दर गोस्वामी जी ”

      सेवाधिकारी श्री राधा रानी मन्दिर बरसाना 

          श्री जी बरसाना मण्डल ट्रस्ट (रजि०)

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निकुंज में चंचल सखी की सेवा

एक सखी दो पान के बीडे लिए खडी है.बीच मे एक वृक्ष के नीचे युगल परस्पर चिपके हुए बैठे है.राधेजु ने नीले रंग का कम घूम का लहगां चोली पहर रखा है,

इस पर बहुत बडे बडे मोर पंख पूरे पूरे बने है,गहरे हरे रंग से.सिर पर भी मोर की गरदन वाला छोटी सी चंद्रिका,जिसमे लाल व हरे रंग के बहुत चमकने वाले नग जडे है.

श्यामसुन्दर भी हरे रंग की धोती पहने है,जिस पर पीले रंग की फैट बंधी है.गले मे एक हार व बडी सी पुष्पमाल.सखी एक साथ दोनो के मुख मे बीडा रख देती है.

तभी कुछ सखिया भोजन के लिए युगल को बुलाने आयी.सब सखिया व युगल चल पडते है.

सखी बीडा खिलायी उसको पंखा सेवा करनी है सो वह बडी तेजी से युगल के आगे जाने लगती है…..की तभी पीछे से श्यामसुन्दर उसकी चोटी पकड लेती है,

कहते है….तुझे बडी जल्दी है री….वह तुनककर पीछे मुडती है पहले गुस्से से श्यामसुन्दर व बाद मे शिकायती तरीके से राधेजु की ओर देखती है….

तो श्यामाजु डाँटने के लिए श्यामसुन्दर का बाँया कान पकड लेती है,किंतु सखी का मन रखने को केवल पकडती है,खीचती नही.तब भी श्यामसुन्दर बडा बुरा सा मुह बना लेते है…

सखी तो चिढाने को उनकी ओर देखती है,किंतु उन्हे यू देख…प्रेमवश होकर,अपने प्रेमभावो को छिपाते हुए,मुह बिचकाकर कहती है….जाने दो राधे…ये तो है ही निर्लज्ज…..उहहहह…मुह बना चली जाती है.

अब युगल भोजन के लिए बैठे है,भोजन प्रारंभ हुआ….किंतु तभी…एक आश्चर्य हुआ…बायी ओर श्यामाजु बैठी थी दायी ओर श्यामसुंदर…

किंतु अब तो दोनो ओर ही राधेजु बैठी है…पीछे पंखा कर रही सखी आँखे खोल खोल देख रही.तभी भोजन सामग्री लेकर कोई आयी….

अरे!ये तो श्यामसुन्दर…देखते ही देखते,हर ओर श्यामसुन्दर…सब काम करते हुए और दो राधे भोजन करते हुए…यहाँ तक की पंखा करती हुई जो सखि ये सब देख रही,

वह स्वयं भी श्यामसुन्दर ही हो गयी…..दोनो राधे एक ही थाली मे भोजन कर रही.दोनो एक दूसरे को देख मुस्कुरायी फिर सखी की ओर देख….

सखि मन ही मन प्रार्थना करती है तो सब पहले जैसा हो गया.आहा!युगल एक साथ एक ही थाल मे भोजन कर रहे…श्यामसुन्दर छोटे छोटे टूक बनाकर प्रियाजु को खिलाते है

व प्रियाजु उनको…..कभी कभी तो एक दूसरे को देखते ही रह जाते है,टूक अधरो तक ही रह जाता…..

तभी श्यामसुन्दर चंचलता दिखाते हुए एक बडा सा लड्डू उठाकर पीछे पंखा कर रही सखि की ओर बढाते है,ले सखि तू भी खा ले न…..सखि मना कर देती है,पुनः आग्रह करते है…

श्यामाजु भी कहती है…..,तब सखि स्वीकृति देती हुई मुख आगे करती है.वह थोडा सा काटने की सोचती है किंतु मोहन पूरा का पूरा जबरन उसके मुख मे रख देते है.ये आधा तो बाहर ही निकला है.

अब सखी परेशान,हाथ से बाहर निकाले तो पंखे की सेवा मे विघ्न हो,भीतर ले जा नही सकती…..बडी दुखी हुई,उपर से ये नयी नयी आडी तिरछी मुखाकृति बनाते उसकी ओर…..

सखि का मुख वानर के जैसा हो गया है सब अपनी अपनी हसी को दबाये रही.

किंतु राधे जु एक सखी को इशारा करती है तो वो पंखा कर रही सखि के मुख के आगे हथेली कर देती है….सखी न मे गरदन हिलाती है.

इतने मे श्यामसुन्दर भी भोजन कर चुके है.वो हाथ धो,सखि की ओर बढकर उसके आगे हथेली कर देते है.सखि श्यामसुन्दर को भी मना ही करती है….

तब श्यामसुन्दर आगे बढकर अपने मुख से उसके मुख का आधा लड्डू ले लेते है….मोहन का ऐसा काम देख सखी स्तम्भित हो जाती है……

और श्यामसुन्दर के हटते ही ज्यो की त्यो भूमि पर गिर पडती है….नयन खुले हुए है,हिल डुल नही रही….

.प्रियाजु भी उठकर आती है व एक सखी को पानी लाने का संकेत करती है.

सखी पानी के छीटे देकर उसे उठाती है.

चेतन होते ही वह अति लज्जा से सकुचायी सी होकर नयन झुका बैठ जाती है फिर जैसे ही नयन उठा सबकी ओर देखती है….सब अपनी रूकी हुई हसी को मुक्त कर देते है.

युगल व सखिया जोर जोर से हसने लगते है…सखि उसी प्रकार बैठी रह गयी.

सुनने वाले, सुनाने वाले दोनों का कल्याण

सुनने वाले, सुनाने वाले दोनों का कल्याण – मनुष्य को जप-ध्यान करते हुए मरना चाहिये | यह मरना काशी में मरने से भी बढ़कर है | भगवान् कहते हैं –

भगवान् कहते हैं जो पुरुष अन्तकाल में ही मेरे को स्मरण करता हुआ शरीर को त्याग कर जाता है, वह मेरे साक्षात स्वरूप को प्राप्त होता है, इसमें कुछ भी संशय नहीं है | (गीता. ८/५) |

प्रभो ! मैं साक्षात दर्शन का पात्र नहीं हूँ, हे प्रभो ! अन्तकाल में अपनी स्मृति दें | सारे जन्म के किये हुए शुभ कर्मों के बदले में यह सौदा होता हो तो कर लो | भगवान् से कुछ नहीं माँगना चाहिये, पर माँगो तो यह माँग लो | बाली की बात आती है –

जेहिं जोनि जन्मौं कर्म बस तहँ राम पद अनुरागऊँ || 

‘अब तो प्रभु यही कृपा करें कि जिस-जिस योनि में अपने कर्मों के अनुसार जन्म लूँ, उस-उस योनि में आप में प्रेम हो और आपके चरणों में अनुराग हो |

’ बाली में कितना स्वार्थ-त्याग है, इसलिये भगवान् ने बाली को परमधाम भेज दिया |

अन्त-समय में मरने वाले भाई-बहन को जाकर भगवन्नाम सुनावे |

उस नाम सुनने के कारण मरने वाले के प्राण भगवान् को याद करते हुए निकलें तो उसका बेड़ा पार है,

सुनाने वाले भाई का काम हो गया | अन्तकाल की यह गति काशी में मरने से भी बढ़कर है |

सप्तपुरियों में (अयोध्या, मथुरा, मायापुरी [कनखल से लक्ष्मण झूला तक] काशी, काँची, उज्जैन, द्वारकापुरी) मृत्यु से भी बढ़कर है काशी में जो पापी मरता है

उसे पाप का दण्ड भुगताकर मुक्ति दी जाती है, वहाँ छतीस हजार वर्ष तक की पाप भुगतने की अवधि है |

पर जो भगवान् के नाम, रूप, गुण, प्रभाव, तत्व और रहस्य को याद करता हुआ जाता है, वह तत्काल ही मुक्त हो जाता है |

उसकी स्द्योमुक्ति हो जाती है | चाहे वह काशी में न मरकर किसी गर्हित स्थान में मरे | यह कोई रियायत की बात नहीं है, यह भगवान् का सामान्य क़ानून है |

जय जय श्री राधे

शालिग्राम पूजा महात्म्य

भक्तो की अनेक प्रकार की इच्छाये अपने ठाकुर जी के प्रति होती है, किसी भक्त ने इच्छा की, कि भगवान सगुण साकार बनकर आये तो भगवान राम, कृष्ण का रूप लेकर आ गये.

किसी भक्त ने कहा मेरे बेटे के रूप में आये तो भगवान कश्यप अदिति के पुत्र के रूप में आ गए किसी भक्त कि इच्छा हुई कि भगवान मेरे सखा बनकर आये, तो वृंदावन में सखा बनकर ग्वाल बाल के साथ खेलने लगे.

किसी कि भगवान के साथ लडने की इच्छा हुई तो भगवान ने उसके साथ युद्ध किया. इसी प्रकार किसी भक्त की भगवान को खाने की इच्छा हुई तो भगवान शालिग्रामके रूप में प्रकट हो गए.

जो नेपाल में पहाडो के रूप में होते है वहाँ एक विशेष प्रकार के कीड़े उन पहाडो को खाते है और वह पहाड़ टूट टूटकर टुकडो के रूप में गंडकी नदी में गिरते जाते है.

नेपाल में गंडकी नदी के तल में पाए जाने वाले काले रंग के चिकने, अंडाकार पत्थर को शालिग्राम कहते हैं. इसमें एक छिद्र होता है तथा पत्थर के अंदर शंख, चक्र, गदा या पद्म खुदे होते हैं.

कुछ पत्थरों पर सफेद रंग की गोल धारियां चक्र के समान होती हैं. इस पत्थर को भगवान विष्णु का रूप माना जाता है तथा इसकी पूजा भगवान शालिग्राम के रूप में की जाती है.

पुराणों में तो यहां तक कहा गया है कि जिस घर में भगवान शालिग्राम हो, वह घर समस्त तीर्थों से भी श्रेष्ठ है.

इसके दर्शन व पूजन से समस्त भोगों का सुख मिलता है.

भगवान शिव ने भी स्कंदपुराण के कार्तिक माहात्मय में भगवान शालिग्राम की स्तुति की है.

प्रति वर्ष कार्तिक मास की द्वादशी को महिलाएं प्रतीक स्वरूप तुलसी और भगवान शालिग्राम का विवाह कराती हैं.

तुलसी दल से पूजा करता है,ऐसा कहा जाता है कि पुरुषोत्तम मास में एक लाख तुलसी दल से भगवान शालिग्राम की पूजा करने से वह संपूर्ण दान के पुण्य तथा पृथ्वी की प्रदक्षिणा के उत्तम फल का अधिकारी बन जाता है.

ऐसा कहा जाता है कि पुरुषोत्तम मास में एक लाख तुलसी दल से भगवान शालिग्राम की पूजा करने से समस्त तीर्थो का फल मिल जाता है

मृत्युकाल में इसका जलपान करने वाला समस्त पापों से मुक्त होकर विष्णुलोक चला जाता है.

                                                                              

सदना कसाई का प्रसंग 

एक सदना नाम का कसाई था,मांस बेचता था पर भगवत भजन में बड़ी निष्ठा थी एक दिन एक नदी के किनारे से जा रहा था रास्ते में एक पत्थर पड़ा मिल गया.

उसे अच्छा लगा उसने सोचा बड़ा अच्छा पत्थर है क्यों ना में इसे मांस तौलने के लिए उपयोग करू.

उसे उठाकर ले आया.और मांस तौलने में प्रयोग करने लगा.

जब एक किलो तौलता तो भी सही तुल जाता, जब दो किलो तौलता तब भी सही तुल जाता,

इस प्रकार चाहे जितना भी तौलता हर भार एक दम सही तुल जाता,

अब तो एक ही पत्थर से सभी माप करता और अपने काम को करता जाता और भगवन नाम लेता जाता.

एक दिन की बात है उसी दूकान के सामने से एक ब्राह्मण निकले ब्राह्मण बड़े ज्ञानी विद्वान थे

उनकी नजर जब उस पत्थर पर पड़ी तो वे तुरंत उस सदना के पास आये और गुस्से में बोले ये तुम क्या कर रहे हो क्या तुम जानते नहीं जिसे पत्थर समझकर तुम तौलने में प्रयोग कर रहे हो वे शालिग्राम भगवान है

इसे मुझे दो जब सदना ने यह सुना तो उसे बड़ा दुःख हुआ और वह बोला हे ब्राह्मण देव मुझे पता नहीं था कि ये भगवान है

मुझे क्षमा कर दीजिये.और शालिग्राम भगवान को उसने ब्राह्मण को दे दिया.

ब्राह्मण शालिग्राम शिला को लेकर अपने घर आ गए और गंगा जल से उन्हें नहलाकर, मखमल के बिस्तर पर, सिंहासन पर बैठा दिया, और धूप, दीप,चन्दन से पूजा की.

जब रात हुई और वह ब्राह्मण सोया तो सपने में भगवान आये और बोले ब्राह्मण मुझे तुम जहाँ से लाए हो वही छोड आओं मुझे यहाँ अच्छा नहीं लग रहा.

इस पर ब्राह्मण बोला भगवान ! वो कसाई तो आपको तुला में रखता था जहाँ दूसरी ओर मास तौलता था उस अपवित्र जगह में आप थे.

भगवान बोले – ब्रहमण आप नहीं जानते जब सदना मुझे तराजू में तौलता था तो मानो हर पल मुझे अपने हाथो से झूला झूला रहा हो जब वह अपना काम करता था तो हर पल मेरे नाम का उच्चारण करता था.

हर पल मेरा भजन करता था जो आनन्द मुझे वहाँ मिलता था वो आनंद यहाँ नहीं.इसलिए आप मुझे वही छोड आये.

तब ब्राह्मण तुरंत उस सदना कसाई के पास गया ओर बोला मुझे माफ कर दीजिए.वास्तव में तो आप ही सच्ची भक्ति करते है.ये अपने भगवान को संभालिए.

सार

भगवान बाहरी आडम्बर से नहीं भक्त के भाव से रिझते है.उन्हें तो बस भक्त का भाव ही भाता है.

“जय जय श्री राधे “

Shree Ji Barsana Mandal Trust (SJBMT)

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