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ग्रहण में भोजन क्यों नही करते ?जानें

सूर्य-चन्द्र ग्रहण के समय भोजन क्यों वर्जित है ?

ग्रहण काल में भोजन  –  
सूर्य और चंद्रग्रहण के समय भोजन निषिद्ध है. प्राचीन ऋषियों के अनुसार, ग्रहण के दौरान खाद्य पदार्थो तथा जल आदि में सूक्ष्म जीवाणु एकत्रित होकर उन्हें दूषित कर देते है जिससे विभिन्न रोग होने की संभावना रहती है

सूर्य-चंद्र ग्रहण के समय मनुष्य के पेट की पाचन-शक्ति कमजोर हो जाती है, जिसके कारण इस समय किया गया भोजन अपच, अजीर्ण आदि शिकायतें पैदा कर शारीरिक या मानसिक हानि पहुँचा सकता है.

सूतक काल –

भारतीय धर्म विज्ञानवेत्ताओं का मानना है कि सूर्य-चंद्र ग्रहण लगने से १२ घंटे पूर्व से ही इसका कुप्रभाव शुरू हो जाता है.अंतरिक्षीय प्रदूषण के समय को सूतक काल कहा गया है। इसलिए “सूतक काल” और ग्रहण के समय में भोजन तथा पेय पदार्थों के सेवन की मनाही की गई है. बूढ़े, बालक और रोगी एक प्रहर पूर्व खा सकते हैं.

स्कंद पुराण’ के अनुसार ग्रहण के अवसर पर दूसरे का अन्न खाने से बारह वर्षो का एकत्र किया हुआ सब पुण्य नष्ट हो जाता है. देवी भागवत में आता हैः सूर्यग्रहण या चन्द्रग्रहण के समय भोजन करने वाला मनुष्य जितने अन्न के दाने खाता है, उतने वर्षों तक अरुतुन्द नामक  नरक में वास करता है.

ग्रहण काल 

ग्रहण से हमारी जीवन शक्ति का हास होता है और तुलसी दल (पत्र) में विद्युत शक्ति व प्राण शक्ति सबसे अधिक होती है, इसलिए सौर मंडलीय ग्रहण काल में ग्रहण प्रदूषण को समाप्त करने के लिए भोजन तथा पेय सामग्री में तुलसी के कुछ पत्ते डाल दिए जाते हैं। जिसके प्रभाव से न केवल भोज्य पदार्थ बल्कि अन्न, आटा आदि भी प्रदूषण से मुक्त बने रह सकते हैं.

पुराणों की मान्यता के अनुसार राहु चंद्रमा को तथा केतु सूर्य को ग्रसता है. चन्द्र ग्रहण में मन की शक्ति क्षीण होती है, जबकि सूर्य ग्रहण के समय जठराग्नि, नेत्र तथा पित्त की शक्ति कमजोर पड़ती है.

गर्भवती स्त्री के लिए 

गर्भवती स्त्री को सूर्य-चंद्र ग्रहण नहीं देखने चाहिए, क्योंकि उसके दुष्प्रभाव से शिशु अंगहीन होकर विकलांग बन सकता है, गर्भपात की संभावना बढ़ जाती है.  इसके लिए गर्भवती के उदर भाग में गोबर और तुलसी का लेप लगा दिया जाता है, जिससे कि राहु-केतु उसका स्पर्श न करें.

ग्रहण काल में वर्जित चीजे

1. – सूर्यग्रहण मे ग्रहण से चार प्रहर पूर्व और चंद्र ग्रहण मे तीन प्रहर पूर्व भोजन नहीं करना चाहिये । बूढे बालक और रोगी एक प्रहर पूर्व तक खा सकते हैं ग्रहण पूरा होने पर सूर्य या चंद्र, जिसका ग्रहण हो,

2. – ग्रहण के दिन पत्ते, तिनके, लकड़ी और फूल नहीं तोडना चाहिए. बाल तथा वस्त्र नहीं निचोड़ने चाहिये व दंत धावन नहीं करना चाहिये.

3. – ग्रहण के समय  तेल लगाना,मालिश या उबटन किया तो व्यक्ति कुष्‍ठ रोगी होता है ,ग्रहण के समय सोने से रोग पकड़ता है, लघुशंका करने से घर में दरिद्रता आती है, मल त्यागने से पेट में कृमि रोग पकड़ता है,  मैथुन  करना और भोजन करना जल पीना, – ये सब कार्य वर्जित हैं.

4. –  ग्रहण के समय गायों को घास, पक्षियों को अन्न, जरुरतमंदों को वस्त्र दान से अनेक गुना पुण्य प्राप्त होता है.

5. – भागवत’ में आता है कि भूकंप एवं ग्रहण के अवसर पृथ्वी को खोदना नहीं चाहिये.

 

ग्रहण के पूर्व

1.
 – ग्रहण लगने के पूर्व नदी या घर में उपलब्ध जल से स्नान करके भगवान्‌ का पूजन, यज्ञ, जप करना चाहिए. भजन-कीर्तन करके ग्रहण के समय का सदुपयोग करें.

2. – भगवान वेदव्यास जी ने परम हितकारी वचन कहे हैं- चन्द्रग्रहण में किया गया पुण्यकर्म (जप, ध्यान, दान आदि) एक लाख गुना और सूर्य ग्रहण में दस लाख गुना फलदायी होता है. यदि गंगा जल पास में हो तो चन्द्रग्रहण में एक करोड़ गुना और सूर्यग्रहण में दस करोड़ गुना फलदायी होता है।

3. – ग्रहण के दौरान कोई कार्य न करें। ग्रहण के समय में मंत्रों का जाप करने से सिद्धि प्राप्त होती है.

ग्रहण समाप्ति पर 

1. – ग्रहण समाप्त हो जाने पर स्नान करके ब्राह्‌मण को दान देने का विधान है.
2. – पुराना पानी, अन्न नष्ट कर नया भोजन पकाया जाता है और ताजा भरकर पिया जाता है.

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