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हम सीधे-सीधे परमात्मा की ओर क्यों नहीं जाते

उस समय का प्रसंग है जब श्रीरामजी स्वयंवर में शिव जी के धनुष का भंजन करते है,

तब क्रोधित होकर परशुराम जी सभा में आते है,सभी उनके क्रोध को देखकर थर-थर काँपने लगते है.

और अंत में श्रीराम जी अपने कोमल वचनों से उनके क्रोध को शांत करते है. जब श्रीराम अंत में कहते है –

“बिप्रबंस कै असि प्रभुताई,अभय होई जो तुम्हहि डेराई

सुनि मृदु गूढ बचन रघुपति के,उघरे पटल परसुधर मति के”


अर्थात –
ब्राह्मण वंश की ऐसी प्रभुता (महिमा)है कि जो आपसे डरता है वह सबसे निर्भय हो जाता है श्री रघुवीर जी के कोमल और रहस्यपूर्ण वचन सुनकर परशुराम जी की बुद्धि के परदे खुल गए.

तब परशुराम जी कहते है –

“राम रमापति कर धनु लेहू, खैचहु मिटै मोर संदेहू

    देत चापु चलि गयऊ परशुराम मन बिसमय भयऊ”

अर्थात – परशुराम जी ने कहा –  हे राम! हे लक्ष्मीपति! धनुष को हाथ में लीजिए, और इसे खीचिये,

जिससे मेरा संदेह मिट जाए परशुराम जी धनुष देने लगे तब वह आप ही चला गया,तब परशुराम जी के मन में बड़ा आश्चर्य हुआ.

किसी ने धनुष से पूंछा –  क्यों रे धनुष! तुझे राम जी के पास जाने की इतनी जल्दी क्या थी? परशुराम जी तो तुझे, श्रीराम जी को दे ही रहे थे ना.

तब धनुष बोला –  अभी अभी श्री रघुनाथ जी ने शंकर जी के धनुष को तोडा, शंकर जी का धनुष अकड दिखा रहा था

इसलिए रघुवीर जी ने उस धनुष के दो टुकड़े कर दिए,यदि में स्वयं उनके पास ना गया तो मेरे तो ४ टुकड़े कर देगे,इसलिए मै सहज ही उनकी ओर चला गया.

मानो धनुष हम सब को शिक्षा देने के लिए कह रहा हो कि सीधे-सीधे भगवान के पास क्यों नहीं जाते,

भाई ! संत बार-बार कहते है, परमात्मा की ओर जाओ,पर हम संसार में ऐसे उलझे रहते है,

उनकी बात पर ध्यान ही नहीं देते, हम परमात्मा की ओर जाते तो है परन्तु कब ?

सुंदरकाण्ड का प्रंसग – जब संसार की लात हमको पड़ती है तब हम जाते है,

हनुमान जी ने भी सुंदरकाण्ड में यही बात विभीषण जी से भी कहते है पर विभीषण जी भी तब हनुमान जी की बात नहीं मानते,

और जब रावण लात मारकर लंका से बाहर निकाल देता है तब भगवान की शरण में जाते है.

श्रीमद्भागवत का प्रसंग – श्रीमद्भागवत के महत्व में गोकर्ण उपाख्यान आता है जिसमे आत्म देव जी नाम के ब्राह्मण थे उनके पास सब कुछ था केवल पुत्र नहीं था,

पहले पुत्र ना होने के कारण रोते थे और जब पुत्र मिल गया,तो पुत्र के कुकर्मो के कारण रोते थे.

तब गोकर्ण जी उन्हें उपदेश करते है और वे ६० वर्ष की उम्र में घरबार छोड़कर वन की ओर चले जाते है.

और श्रीमद्भागवत के दशम स्कंध का पाठ करते हुए, भगवान को ही प्राप्त होते है,

परन्तु उनकी पत्नी धुंधली अपने पुत्र की लात खाकर भी संसार को नहीं छोड़कर परमात्मा की ओर नहीं जाती,और अंत में उसे आत्महत्या ही करनी पड़ती है.

इन दोनो प्रसंगों में आत्मदेव और विभीषण दोनों ने ही देर करी,एक ने अपने पुत्र की लात खाई और दूसरे ने अपने भाई की लात खायी,

तब भगवान की शरण में गए.पर अच्छी बात ये थी कि दोनों पर संत कृपा थी एक पर गोकर्ण जी कि कृपा हुई

और दूसरे पर हनुमान जी की कृपा हुई,इसलिए दोनों ने अंत में भगवान को पाया.

इस प्रसंग का सार

इसी प्रकार हम भी करते है जब हमारे अपने ही हमें ठुकरा देते है तब हम परमात्मा की ओर बढते है,

और संसार की रीति भी यही है,इसलिए समय रहते, हुम स्वयं ही संसार की लात पड़ने से पहले परमात्मा की ओर चले जाए.

शास्त्रों में ऐसे उदाहरण इसी लिए दिए जाते है ताकि हम केवल उसे पढ़े ही नहीं बल्कि उसे समझे भी क्योकि वे सभी प्रंसग हमारी ओर ही इशारा करते है.

जब चित्त स्वंय परमात्मा में लग जाता है

प्रसंग उस समय का है जब विश्वामित्र जी राजा दशरथ के पास से राम और लक्ष्मण जी को लेकर अपने यज्ञ शाला में जाते है.

विश्वामित्र में आश्रम से लेकर जनकपुर तक ताडका वध ,अहिल्या उद्धार ,धनुष का टूटना ,परशुराम जी का आगमन,ये चार चीजे हुई.

१. ताडका वध – भगवान श्री राम ने ताडका और कृष्ण ने सबसे पहले पूतना को मारा,

क्योकि ये ही सारी बुराईयों की जननी है,यदि बाकि के राक्षसों को मरते रहते तो ये दोनों और राक्षसों को पैदा करती रहती,

ताडका अर्थात “मन” की वासना को पहले मारा,जब वासना ही नहीं रहेगी तो बुराईयां जन्म ही नहीं लेगी.


२. अहिल्या उद्धार –
अहिल्या सुन्दर थी,हमारी “बुद्धि” भी ऐसी ही होती है रहती तो है सुन्दर

पर यदि उसमे घमंड आ जाए तो वह जड़ हो जाती है.और जड़ बुद्धि को भगवान ही चैतन्य बना सकते है.

३. धनुष का टूटना – स्वयंवर में रखा धनुष “अहंकार” का प्रतीक था ,जब सारे राजा अहंकार से उठे तो अहंकार रूपी धनुष और भारी हो गया ,

परन्तु जब भगवान उठे तो उन्होंने पहले गुरु विश्वामित्र को प्रणाम किया.और सहज भाव से चले है,

गुरु की कृपा मिलते ही अहंकार हल्का हो गया,और भगवान का हाथ लगते ही स्वयं टूट गया,

क्योकि एक तो गुरु कृपा है दूसरा परमात्मा को अहंकार और अहंकारी अच्छे नहीं लगते,

और जिसे परमात्मा स्वयं चलकर स्पर्श कर ले फिर वह अहंकार कैसे रह सकता है.

४. परशुराम जी का आना – जब परशुराम जी आये तो उनके पास जो धनुष था

वह  स्वयं ही भगवान राम के पास चला गया ये धनुष “चित्त” स्वरुप है

जब ‘मन’, ‘बुद्धि’, ‘अहंकार’, तीनो चीजे सही हो गई तब ‘चित्त’ अपने आप भगवान में लग गया.

संत दोगुना करके ही लौटाते है

जब विश्वामित्र जी अयोध्या आये है उनके आने की सूचना सुनकर राजा दशरथ जी संत ब्राह्मणों को लेकर उनको लेने गए है.

राजा के यहाँ यू तो बहुत से दास, मंत्री थे परन्तु राजा दशरथ जी यहाँ बता रहे है

कि हमारे पास कितने भी दास-दासी,मंत्री सेवक हो परन्तु संत महापुरुष को लेने उनका स्वागत करने स्वयं जाना चाहिये.

मुनि को दंडवत प्रणाम किया है फिर सुन्दर आसन दिया है,उनके चरण धोए और पूजा करी है,

फिर अनेक प्रकार के भोजन उन्हें करवाए है,फिर अपने पुत्रो को लाकर मुनि के चरणों के डाल दिया है.

अर्थात आते ही साथ सीधा प्रश्न नहीं किया,कि किस कारण से आये हो?ये भी एक शिष्टाचार है.

जब मुनि सब भाँती संतुष्ट हो गए तब उनसे आने का कारण पूँछा है.

विश्वामित्र जी ने कहा – मुझे यज्ञ करने में राक्षस बहुत सताते है इसलिए आपके पास आया हूँ.

“अनुज समेत देहु रघुनाथा ,निसिचर वध मै होब सनाथा”


अर्थात – 
हे राजन! असुर समूह मुझे सताते है इसलिए यज्ञ की रक्षा के लिए छोटे भाई सहित श्री रघुनाथ जी को मुझे दो.राक्षसों के मारे जाने पर मै सनाथ हो जाऊँगा.

जब राजा दशरथ जी ने मुनि की ऐसी अप्रिय वाणी सुनि तो वे काप उठे और बोले – हे ब्राह्मण ! मैंने चौथेपन में चार पुत्र पाए है आपने विचारकर बात नहीं कही.

“मगहूँ भूमि धेनु धन कोसा ,सर्वस देऊ आजु सहरोसा

देह प्रान तें प्रिय कछु नाहीं सोऊ मुनि देउ निमिष एक माही”


अर्थात –
हे मुनि ! गौ,पृथ्वी धन और खजाना मांग लीजिए मै आज बड़े हर्ष के साथ अपना सर्वस्व दे दूँगा देह और प्राण से अधिक प्यारा कुछ भी नहीं होता मै उसे भी एक पल में दे दूँगा.

यहाँ एक बात बड़ी विचारणीय है,राजा दसरथ जी “गृहस्थ” है,और विश्वामित्र जी “संत” है.

पर दोनों ही अपना धन श्री राम को मानते है. राजा कह रहे है धन,पृथ्वी, खजाना, यहाँ तक कि देह और प्राण भी ले जाओ, पर राम को नहीं दूँगा.

और संत कह रहे है धन, पृथ्वी, खजाना, कुछ भी नहीं चाहिये केवल राम चाहिये.

अर्थात गृहस्थ का धन भी राम ही होना चाहिये और संत अर्थात संन्यासी का परम धन भी राम ही होना चाहिये.गृहस्थी और संत ऐसे होने चाहिये.

दोनों अपने अपने सिद्धात पर अड़े है और जब दो सिद्धात टकराए तब जरुरत होती है “सद्गुरु” की.

तभी वशिष्ठ जी आ गए.और बोले – राजन ! जिस यज्ञ से तुम्हे चार पुत्र (पुत्र कमेष्ठी यज्ञ करके पर चार पुत्र हुए)मिले है

आज उसी यज्ञ की रक्षा के लिए चार में से दो पुत्रो को यज्ञ की सेवा में तो दे ही सकते हो.

और विश्वामित्र जी स्वयं राक्षसों को मार सकते है पर फिर भी यदि ये किसी भाव को लेकर आपके पास आये है तो इन्हें दे दो.

दशरथ जी को यज्ञ से ही पुत्र प्राप्त हुए थे और आज यज्ञ की रक्षा के लिए ही उन्हें पुत्रो को देने से मना कर रहे है

जबकि विश्वामित्र जी कार्य के पश्चात उन्हें लौटा देते.स्वार्थ और प्रेम में यही तो अंतर है.

स्वार्थ में, पाने पर, वस्तु के मिल जाने पर व्यक्ति भूल जाता है, और प्रेम में, पाने पर व्यक्ति सबकुछ समर्पित कर देता है.

राजा ने एक अच्छा काम यहाँ किया, गुरु की आज्ञा को माना और श्री राम और लक्ष्मण जी को विश्वामित्र जी को दे दिया,

बड़े या हमारे माता-पिता,गुरु यदि कुछ कह रहे है तो बिना विचार के ही कर देना चाहिये,क्योकि उनसे अच्छा हमारा भला और कौन कर सकता है.

और दशरथ जी ने विश्वामित्र और वशिष्ठ जी की बात मानकर राम और लक्ष्मण जी को दिया तो उन्हें चौगुना फायदा हुआ.

एक तो सारे संसार में राम और लक्ष्मण जी का यश फ़ैल गया. और दूसरा गए थे दो, और लौटे चार.

अर्थात चारो पुत्र के साथ पुत्रवधुएँ भी आ गई.इसलिए साधू संत कुछ मांग रहे है तो अपने लिए नहीं मांग रहे,

जगत की भलाई के लिए मांग रहे है,और संत जब भी लौटायेगे तो दुगुना,चौगुना करके ही लौटाएगे.

परम धन तो केवल राम है

उस समय का प्रसंग है जब विश्वामित्र जी असुरों के सताने पर अयोध्या जाते है,

विश्वामित्र जी अर्थात जो विश्व का मित्र है या सारा विश्व ही जिनका मित्र है ,

जो यज्ञ भी कर रहे है तो विश्व के कल्याण के लिए कर रहे है, क्योकि संत सदा जगत के कल्याण में ही लगा रहता है.

जब विश्वामित्र जी दशरथ जी के पास गए तो दशरथ जी ने सबसे पहले उनका बहुत स्वागत किया है,

चरणों को धोया है,सुन्दर भोजन कराया है अपने चारो पुत्रो को उनके चरणों में डाल दिया.

फिर अंत में आने का कारण पूँछा है यहाँ दशरथ जी बड़ी शिक्षा दे रहे है कि जब कोई संत,महापुरुष,घर में आये तो आते ही आने का कारण मत पूंछो,

स्वयं भी सेवा करो और अपने बेटी बेटे से भी कराओ,वे भी चरण वंदना करे.

जब विश्वामित्र ने राजा से कहा कि हमें असुर बहुत सताते है इसलिए छोटे भाई सहित रघुनाथ को दीजिये,

तो राजा कांप गए,यही गलती हम भी करते है,कोई हमसे कुछ मांगे तो हम भी कहते है चाहे तो मेरा सिर काटकर ले जाओ पर अमुक वस्तु नहीं दे सकता,

साहब सिर का वह व्यक्ति क्या करेंगा सजाकर तो रख नहीं सकता.

दशरथ जी भूल गए की उन्हें चारो पुत्र यज्ञ से ही प्राप्त हुए है,और आज उसी यज्ञ की रक्षा के लिए चारो नहीं केवल दो ही चाहिये है तो उन्हें भी देने से इंकार कर रहे है.

यहाँ के संत इस तरह से भी कहते है कि राजा में जो कहा कि ऋषिवर ! आप पृथ्वी, गौ, धन, देह, प्राण, जो भी चाहे माँग लीजिए,

सर्वस्व दे दूँगा पर राम को नहीं दे सकता.अर्थात यहाँ जितनी भी वस्तुएँ राजा देने को कह रहे है वे भी दो अक्षर की ही है,

वे कहना चाहते है कि दो अक्षर वाली सारी वस्तुए भी ले लीजिए,मेरा सर्वस्व ले लीजिए,पर दो अक्षर वाले राम नहीं.

हमें भी इसी तरह करना चाहिये राजा गृहस्थ है,गृहस्थ के जीवन में धन का बड़ा महत्व है

फिर भी धन की परवाह किये बिना केवल राम को चाहते है.और विश्वामित्र जी कहते है राजा ये सब हमको नहीं चाहिये हमें तो केवल राम ही चाहिये,

एक संत का धन भी केवल राम ही है,उसे बाकि के रत्नों से क्या काम?

दोनों का सिद्धांत सही है.एक गृहस्थ होने पर भी केवल राम ही को चाहता है और दूसरा संत होने पर केवल केवल राम ही को चाहता है.

पुरुषार्थ से सत्ता तो मिल जाती है सत्यनारायण नहीं मिलते

बाल काण्ड में उस समय का प्रसंग है जब विश्वामित्र जी को सुबाहु और मरीचि आदि राक्षस वन में सताने लगे तब विश्वामित्र जी को बड़ी चिंता हुई

   “गाधितनय मन चिंता ब्यापी, हरि बिनु मरहिं न निसिचर पापी

      तब मुनिबर मन कीन्ह बिचारा, प्रभु अवतरेउ हरन महि भारा” 

अर्थात – गाधि के पुत्र विश्वामित्र के मन में चिंता छा गई कि ये पापी राक्षस भगवान के बिना न मरेगे तब श्रेष्ठ मुनि ने मन में विचार किया

कि प्रभु ने पृथ्वी का भार हरने के लिए अवतार लिया है उनके पास जाना चाहिए.

विश्वामित्र कोई साधारण मुनि नहीं थे,विश्वामित्र राजर्षि से ब्रह्मर्षि बने थे,

जिन्होंने त्रिशंकु जैसे राजा को स्वर्ग में भेजा था जिन्होंने नए स्वर्ग की रचना कर दी.

पर पुरुषार्थ से सत्ता तो मिल जाती है पर “सत्यनारायण” नहीं मिलते,भगवान तो प्रसाद स्वरुप मिलते है.

विश्वामित्र जी का वशिष्ठ जी से कुछ पुराना द्वेष था,और जब तक हम जीवन में राग-द्वेष पालकर रखेगे, तब तक भगवान कैसे मिलेगे ?

और जैसे ही विश्वामित्र जी राग-द्वेष छोडा और एक याचक की तरह अयोध्या की ओर चले,

राजा ने राज्य तक देने को कहा,राज्य, खजाना सब कुछ देने को कहा परन्तु विश्वामित्र जी ने राज्य ,संपत्ति सब ठुकरा दिए, साधू को इन सब चीजों से क्या काम?

जब भगवान ने देखा कि राग-द्वेष,लोभ लाभ सबसे परे विश्वामित्र हो गए है

तब श्रीराम रूपी “ज्ञान” और लक्ष्मण रूपी “वैराग्य” अपने आप साथ हो लिए, भगवान के मिलने में देर नहीं लगी.
जय जय श्री राधे

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जो सतत रहते है वही सताते है

बालकाण्ड का उस समय का प्रसंग है जब विश्वामित्र जी वन में शुभ स्थान पर रहते थे.

जहाँ वे मुनि जप,यज्ञ और योग करते थे परन्तु मरीचि और सुबाहु से बहुत डरते थे.

वे उन्हें खूब सताते थे. यज्ञ देखते ही राक्षस दौड पड़ते थे और उपद्रव मचाते थे.जिससे मुनि बहुत दुःख पाते थे.

जहँ जप जग्य जोग मुनि करही ,अति मारीच सुबाहुहि डरही

देखत जग्य निसाचर धावहिं करहिं उपद्रव मुनि दुःख पावहिं”

वास्तव में ये राक्षस हमें भी परेशान करते है.जब जब हम भगवान का जप करते है,ध्यान करते है.

क्योकि इनको हमारा ध्यान करना अच्छा नहीं लगता.जैसे ही हम करने बैठे और ये मरीचि और सुबाहु की तरह दौड़ पड़ते है

और खूब उपद्रव मचाते है.सताता कौन है ? जो अपने साथ सतत है वही सताता है. ये राक्षस कौन है ?

ये है काम,क्रोध,मोह, मद,जो भजन में व्यवधान डालते है.हम कहते है न भजन में मन नहीं लगता

.हम जैसे ही भजन करने बैठे और ये राक्षस आये.जब ये विश्वामित्र जैसे मुनि को परेशान कर सकते है तो फिर हमें क्यों नहीं परेशान करेगे.

और मुनि विश्वामित्र की तरह हम भी इनसे बहुत दुखी है.मुनि ने फिर उपाय निकाला क्या उपाय था ?

गाधितनय मन चिंता ब्यापी, हरि बिनु मरहि न निसिचर पापी “ 


अर्थात – मुनि कह रहे है कि ये पापी राक्षस भगवान के बिना न मरेगे.

और वे दोनों को(राम और लक्ष्मण को) लेने गए है, उनके पास नहीं थे.

इसी तरह हमारे पास भी नहीं है हमें भी उनको लाना होगा.राम और लक्ष्मण कौन है?

राम सत्य और लक्ष्मण त्याग और समर्पण है.जीवन में इनके आते ही इन राक्षसों का नाश हो जाता है,

सभी नहीं मरते.कुछ मर जाते है और कुछ भाग जाते है.

जैसे ही विश्वामित्र जी राम लक्ष्मण को लेकर चले मार्ग मे सबसे पहले ताडका को मारा है ताडका कौन है ?

ये है वासना का प्रतीक और जैसे ताडका राक्षसों की जननी है वैसे ही ये इच्छाए भी क्रोध, मद,मोह की जननी है

जब मन में इच्छा उठेगी और वह पुरी नहीं होगी, तभी तो ये क्रोध, मद, मोह आएगे. इसलिए भगवान ने पहले फसाद की जड़ को ही मारा है.

इसके बाद आश्रम में पहुँचे वहाँ जब यज्ञ करने बैठे,सुबाहु और मरीचि सेना लेकर आ गए.

भगवान ने मरीचि को बाण मारा है जिससे वह सौ योजन के विस्तार वाले समुद्र के पार जा गिरा,

फिर सुबाहू को अग्नि बाण मारा.और लक्ष्मण ने सेना का संहार कर डाला.और ब्राह्मणों को निर्भर कर दिया.

अहंकार कभी नहीं मरता केवल उसे हम दूर हटा सकते है,इसलिए भगवान ने मरीचि को मारा नहीं दूर फेक दिया.

सुबाहु को मारा है.क्रोध का प्रतीक है, इधर लक्ष्मण भईया ने सारी सेना का संहार कर दिया.

अर्थात लोभ और मोह को, त्याग और समर्पण से ही जीता जा सकता है.

श्री राधे 

“श्रील नारायण भट्ट ज़ू जयति”

“श्री नारायण दास गोस्वामी जयति”

??आज की ब्रज रस धारा  

दिनांक 30/06/2018

 

जीवन में संघर्ष नहीं तो कुछ भी नहीं

बालकाण्ड का बड़ासुंदर प्रसंग है.जब भगवान कुमारावस्था के हो गए है तब –


“भय कुमार जबहिं सब भ्राता,दीन्ह जनेऊ गुरु पितु माता

गुरगृहं गए पढन रघुराई ,अलप काल विद्या सब आई”

अर्थात – ज्यो ही सब भाई कुमारावस्था के हुए त्यों ही गुरु पिता और माता ने उनका यज्ञोपवीत संस्कार कर दिया श्री रघुनाथ जी भाईयो सहित गुरु के घर में विद्या पढ़ने गए और थोड़े ही समय में उनको सब विद्याएँ आ गई.

यहाँ राजा दशरथ जी ने चौथेपन में पुत्रो का मुह देखा था, इस पर भी उन्हें राम तो प्राणों से भी अधिक प्रिय थे,

कभी अपनी आँखों से ओझल नहीं होने देते थे, परन्तु राजा दशरथ जी ने गुरु को महलों में अपने बच्चो को पढ़ाने के लिए नहीं बुलाया है,

क्योकि प्यासा कुएं के पास जाता है,कुआ प्यासे के पास नहीं आता. अर्थात गुरु के घर भगवान श्री राम अपने भाईयो सहित पढ़ने के लिए गए.

आज हम बच्चो को परिस्थितियों की कठोरता सहना नहीं सिखाते, आज तो बच्चो की ऐसी आदते हो गई है,

कि यदि कुछ देर के लिए घर में बिजली चली जाए, तो वे कार का A.C चालू करके कार में ही सो जाते है.

बच्चा जब स्कुल से आता है तो उसके जूते के बद भी हम ही खोलते है. और इस तरह बच्चा लल्लू ही रह जाता है.

अधिक सुविधाए बच्चे को बनाती नहीं बिगाड़ती है. बना बनाया मिल गया तो फिर कौन मेहनत करेगा,

लोग कहते है हमने तो इतना कमा लिया कि आने वाली सात पीढियाँ बैठकर खायेगी,

तो क्या आने वाली सभी पीढियाँ हाथ-पैर से लाचार होगी,या अनपढ़ होगी जो वे स्वयं नहीं कमा सकेगी?

इसीलिए संतो ने कहा है –“पूत कपूत तो क्यों धन संचय,पूत सपूत तो क्यों धन संचय”

अर्थात – यदि पुत्र कुपुत्र हुआ तो आपके कमाए हुए धन को बर्बाद कर देगा और यदि सपूत हुआ तो स्वयं ही कमा लेगा,दोनों ही परिस्थितियों में हमें संचय करने रखने कि आवश्कता नहीं है.

गुरु जी को पता था आगे जाकर राम जी को वन में जीवन बिताना है, राजा बनना है,

और यदि ये स्वयं संघर्ष नहीं करेगे तो इन्हें पता कैसे चलेगा कि लोग कैसे जीवन यापन करते है,

इसलिए पहले के समय में राजा का पुत्र हो या ब्राह्मण का सभी को गुरुकुल में समान रूप से रहना.

और आश्रम के सारे काम जैसे – झाड़ू लगाना, साफ सफाई करना, अपने वस्त्र स्वयं धोना,

यज्ञ के लिए समिधा लेने वन जाना, भोजन के लिए अन्न माँगकर लाना, पानी भरकर रखना,

गौ की सेवा करना, पूजा के लिए पुष्प चुनकर लाना, गुरु के चरणों की सेवा करना, और उनके सो जाने के बाद सोना और उनके जागने से पहले जग जाना.

आदि कार्य स्वयं ही करने होते थे.जीवन में यदि बच्चे को संघर्ष करना नहीं सिखाया तो वे आगे जाकर स्वयं कुछ भी नहीं कर सकते.

उदाहरण – एक विद्यालय में एक गुरु जी सभी बच्चो को तितली का कोकून (रेशम का बना होता है जिसके अन्दर तितली का बच्चा होता है)

दिखा रहे थे,वे बोले सब विद्यार्थी ध्यान से देखना किस तरह तितली का बच्चा बाहर निकलता है,

इतना कहकर वे किसी कार्य से कुछ देर के लिए बाहर चले गए.

तभी एक कोकून से तितली का बच्चा धीरे-धीरे बाहर आने लगा, उसे बाहर आने के लिए बड़ा परिश्रम करना पड़ रहा था.

कुछ बच्चो ने सोचा – इसे इतना परिश्रम करना पड़ रहा है फिर भी ये बाहर नहीं पा रहा है

क्यों ना हम ही इसे बाहर निकाल दे ऐसा सोचकर उन्होंने कोकून को तोड़कर उस बच्चे को बाहर निकाल दिया, बच्चा कुछ समय तक छटपटाया और फिर मर गया,

गुरु जी वापस आये,उन्होंने देखा कि तितली का बच्चा मरा पड़ा है तो उन्होंने विद्यार्थियों से पूँछा तो उन्होंने सारी बात बता दी

इस पर गुरु जी बोले – देखो! तुम सबने इसे संघर्ष नहीं करने दिया, जब ये कोकून से बाहर निकलता है

तब इसे बहुत संघर्ष करना पडता है इसी संघर्ष में इसके पंख विकसित हो जाते है,

और जब ये बाहर निकलता है तब तक इसके पंख संघर्ष के कारण पूरे विकसित हो जाते है

और ये बाहर निकलकर उड़ने लगता है,तुम लोगो ने इसे संघर्ष ही नहीं करने दिया इससे इसके पंख विकसित नहीं हुए और ये बाहर निकलकर तुरंत मर गया.


सार 

मनुष्य जीवन संघर्ष का ही नाम है,यदि व्यक्ति स्वयं संघर्ष नहीं करेगा तो आगे उनका विकास नहीं हो सकता.

          “श्री श्याम सुन्दर गोस्वामी जी ”

      सेवाधिकारी श्री राधा रानी मन्दिर बरसाना 

          श्री जी बरसाना मण्डल ट्रस्ट (रजि०)

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श्री रामचन्द्र जी की बाल लीलाये

एक बार जब चारो भईया बाल लीला में थे, तब भगवान श्रीराम अनेक बाल लीलाये करते है.

और दशरथ जी और कौसल्या जी को आनंदित करते है. एक बार प्रभु भरत, लक्ष्मण, शत्रुधन जी, के साथ खेल रहे थे,

और सखा भी बहुत से थे, रामचन्द्र जी ने दो समूह बाँट दिए.

और बोले – जो जिस समूह में जाना चाहे, वह उस समूह में चला जाए.

भरत जी बोले – भईया ! आप जिस समूह में होगे, हम उसके विपरीत समूह में होगे, अब एक ओर राम,लक्ष्मण और बाकि के सखा है,

दूसरी ओर भरत और शत्रुधन है. गेंद का खेल खेल रहे थे, और सबको गेंद अपनी तरफ बचानी थी.

जैसे ही गेंद भरत जी के पास आती, भरत जी प्रभु श्री राम की ओर बढ़ा देते, और ऐसा करके अंत में हार गए,

जब भगवान श्री राम ने पूंछा – भरत!  तुमने ऐसा क्यों किया ? हर बार गेंद को मेरी और क्यों भेज देते थे?

भरत जी बोले – भईया ! जब में खेल रहा था तब मुझे अपन पक्ष संसार के रूप में दिख रहा था,

और गेंद, जीव के रूप में देख रहा था, और मै देखता कि जीव इस संसार में बहुत मार खाता है, बहुत भटक रहा है,

और इसे यदि कही शान्ति मिलेगी तो आपकी शरण में ही मिल सकती है.

इसलिए जब-जब ये गेंद रूपी जीव मेरे पास आता, तो मै इसे आपकी शरण में जाने के लिए आपकी ओर भेज देता हूँ.

ये सुनकर भगवान श्री राम भरत जी से बोले – भरत ! तुम धन्य हो.

प्रसंग २-  इसी तरह एक बार भगवान श्री राम और भरत में किसी बात को लेकर झगड़ा हो रहा था,झगड़ा बढ़ गया,

बात राजा दशरथ तक पहुँच गई.दशरथ जी ने जब सुना तो उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ,

कि राम और भरत में झगड़ा,क्योकि दोनो में इतना प्रेम है कि दोनों में झगड़े की तो बात ही नहीं हो सकती. दशरथ जी झगड़ा सुलझाने आ गए.

और भगवान राम से पूंछा -राम ! क्या बात है ?

भगवान श्री राम बोले – पिता जी ! हम सबने कपड़े का बड़ा सुन्दर एक हंस बनाया था,

और उसे हमने थोड़ी दूरी पर एक वृक्ष पर रखा और हम निशाना लगाने लगे,

और शर्त ये थी कि जिसका निशाना पहले लगेगा,वही हंस उसी का हो जायेगा.

भरत का निशाना पहले लगा, पर भरत कहता है कि भईया आपका निशाना पहले लगा.

मै कहता हूँ भरत का पहले लगा, भरत कहता है – भईया आपका पहले लगा.

इसलिए ये हंस मै कहता हूँ भरत का है, और भरत कहता है में भईया आपका है.

जो ये बात दशरथ जी ने सुनी तो बड़े गदगद हो गए. कि दो भाई भी लड़ते है तो इसलिए कि ये मेरा है,

ये मेरा. पर मेरे पुत्र इसलिए लड़ते है कि ये तेरा है, वो भी तेरा है, एक दूसरे की खुशी के लिए लड़ते है .

वास्तव में भगवान श्रीराम और भरत जी का प्रेम ऐसा ही था, जहाँ दोनों एक दूसरे की खुशी के लिए लड़ते थे.

जब भगवान राम से हो गए रामचन्द्र

जब भगवान का प्राकट्य अयोध्या जी में हुआ तो सूर्य नारायण भगवान बड़े प्रसन्न हुए,

कि मेरे वंश में भगवान का प्राकट्य हो गया, और आनंद में भर कर एक क्षण के लिए रुक गए.

सूर्य कि गति कभी नहीं रुकती परन्तु एक क्षण को रुकी गई,जब देखा राजभवन में अति कोमल वाणी से वेद ध्वनि हो रही है,

अबीर गुलाल उड़ रहा है, अयोध्या में उत्सव को देखकर सूर्य भगवान अपना रथ हाँकना ही भूल गए.

मास दिवस कर दिवस भा मरम ना जनाइ कोइ
रथ समेत रबि थाकेउ निसा कवन विधि होइ 


अर्थात –
महीने भर का दिन हो गया, इस रहस्य को कोई नहीं जानता,

सूर्य अपने रथ सहित वही रुक गए फिर रात किस तरह होती. सब जगह आनंद ही आनंद छाया था परन्तु चंद्रमा रो रहे थे.

भगवान ने पूंछा – चन्द्रमा!  सब ओर आनंद छाया है,क्या मेरे प्राकट्य पर तुम्हे प्रसन्नता नहीं हुई.?

चन्द्रम बोला – प्रभु ! सब तो आपके दर्शन कर रहे है इसलिए प्रसन्न है परन्तु मै कैसे दर्शन करूँ?


प्रभु बोले-
क्यों, क्या बात है ?


चंद्रमा बोले –
आज तो सूर्य नारायण हटने का नाम ही नहीं ले रहे और जब तक वे हटेगे नहीं मै कैसे आ सकता हूँ,

प्रभु बोले थोडा इंतजार कर! अभी सूर्य की बारी है उनके ही वंश में जनम लिया है न इसलिए आनंद समाता नहीं है

उनका, अगली बार चन्द्र वंश में आऊंगा,अभी दिन के बारह बजे आया फिर रात के बारह बजे आऊंगा तब जी भर के दर्शन करना, तब तक आप इंतजार करो.

चंद्र बोले – प्रभु ! द्वापर के लिए बहुत समय है.तब तक मेरा क्या होगा.में तो इंतजार करते-करते मर ही जाऊँगा.

भगवान बोले – कोई बात नहीं में अपने नाम के साथ तुम्हारा नाम जोड़ लेता हूँ.

रामचंद्र, सभी मुझे रामचंद्र कहेगे, सूर्य वंश में जन्म लिया है, फिर भी कोई मुझे रामसिह तो नहीं कहेगा,

और जिसके नाम के आगे मै हूँ, वह कैसे मर सकता है, वह तो अमर हो जाता है,

इसलिए तुम भी अब कैसे मरोगे, इतना सुनते ही चंद्रमा बड़ा प्रसन्न हुआ.

भक्ति की तैयारी नहीं होती

जब भगवान श्री राम के जन्म का समाचार अयोध्या में फैला तो सभी नर नारी जो जिस अवस्था में थे वैसे ही उठकर दौड़ पडे, यहाँ तुलसी दास जी ने ये नहीं कहा कि सभी चलकर गए,

ये कहा दौडकर गए. सहज सिंगार किएँ “उठि धाई”,धाई अर्थात दौड पड़े. किसी लोग लुगाई ने अपने श्रंगार की चिंता नहीं की.

वास्तव में यह बात हम पर भी लागू होती है. हम जहाँ है, जिस अवस्था में है,

वैसे ही परमात्मा की ओर दौड़ पड़े, हम चाहे किसी भी आश्रम में हो ब्रह्मचर्य, गृहस्थ,व्यवस्थित हो,

अव्यवस्थित हो,व्यवसाय में हो,हाल में हो, बेहाल हो,  कैसे भी, अर्थात हम ये सोच लेते है कि अभी तो जिम्मेदारियां है

जब इनसे निवृत हो जाएगे तब बैठकर भजन ही तो करना है, हम बुढापे के लिए बैठे है, गृहस्थ से भगाना नहीं है,कि सबकुछ छोड़कर वन में चले जाए ,

क्योकि भगोडो को भगवान कभी नहीं मिलते, भागो मत जागो. किसी भी अवस्था में हो बस वही से दौड़ पडो,

परमात्मा की ओर. दौड़ने का अर्थ है भजन शुरू कर दो, भक्ति के लिए तैयारी की आवश्यकता नहीं होती.

क्योकि आज हम दौड़ तो रहे है पर परमात्मा कि ओर नहीं, संसार की ओर, बड़ा आदमी कैसे बने, प्रतिष्ठा कैसे बड़े, रात में व्यक्ति सो रहा तो रहा है

परन्तु मन तब भी दौड़ रहा है संसार की ओर, बचपन से ही हमें दौड़ में लगा दिया जाता है, बचपन में खिलौने दूसरे से ज्यादा होना चाहिये ,स्कुल में नंबर दूसरे से ज्यादा आना चाहिये,

कालेज दूसरे से अच्छा मिलना चाहिये , नौकरी दूसरे से अच्छी जगह हमारी हो,बीवी दूसरे से अच्छी सुन्दर हो,

ये सारी चीजे अच्छी मिल भी गई, तो आगे वाले से होड लगी है उससे अच्छी हमारी हो जाए.

हमने बचपन में एक बार दौडाना शुरू किया तो दौड़ते ही रहे और दौड़ते ही चले जाते है अंत तक.

लेकिन परमात्मा की ओर दौडना? चलना, तो दूर हम देखते तक नहीं कि यहाँ हमने कितनी बार उन्हें याद किया?

नाम लिया?  यदि इस सांसारिक दौड़ से बचना है तो तीन बाते व्यक्ति स्वयं से सदा पूंछे.

पहली “हम दुनिया में क्यों आये है”? दूसरी “हम क्या कर रहे है”? और तीसरी “हमें जाना कहाँ है”?

इन तीनो का उत्तर हर व्यक्ति के पास है. जिस दिन व्यक्ति को इन तीनो का उत्तर स्वयं से जान लिए,

उस दिन उसकी दौड़ तो बंद नहीं होगी हा दौडने का रास्ता बदल जायेगा,

संसार के रास्ते से परमात्मा के रास्ते पर दौडने लगेगा, अयोध्या वासियों की तरह,उन्होंने कोई तैयारी नहीं की,जिस अवस्था में थे दौड पड़े.

Shree Ji Barsana Mandal Trust (SJBMT)

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