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आज की बृज रस धारा

श्री राधे 

“श्रील नारायण भट्ट ज़ू जयति”

“श्री नारायण दास गोस्वामी जयति”

??आज की ब्रज रस धारा ??

दिनांक 10/06/2018

 

माधुर्य-रस में स्वकीया परकीया भाव

भगवत सम्बन्धी रसो में प्रधान पाँच रस होते है-  “शांत”, “दास्य”, “सख्य”, “वात्सल्य” और “माधुर्य”. इसमें सबसे श्रेष्ठ माधुर्य भाव है .

माधुर्य भाव के दो प्रकार होते है – “स्वकीया-भाव” और “परकीया-भाव”.

1.स्वकीया-भाव- अपनी स्त्री के साथ विवाहित पति का जो प्रेम होता है उसे स्वकीया भाव कहते है.


2. परकीया-भाव – 
किसी अन्य स्त्री के साथ जो परपुरुष का प्रेम सम्बन्ध होता है उसे परकीया भाव कहते है.

लौकिक (सांसारिक प्रेम ) में इन्द्रिय सुख की प्रधानता होने के कारण परकीया-भाव, पाप है, घृणित है.

अतः सर्वथा त्याज्य है.क्योकि लौकिक परकीया भाव में अंग-संग की घृणित कामना है.

परन्तु भागवत प्रेम के दिव्य कान्तभाव में, परकीयाभाव स्वकीया-भाव से कही श्रेष्ठ है.

क्योकि इसमें अंग-संग या इन्दिय सुख की कोई आकांक्षा नहीं है.

स्वकीया में, पतिव्रता पत्नी अपना नाम, गोत्र, मन, प्राण, धन, धर्म, लोक, परलोक, सभी कुछ पति को अपर्ण करके जीवन का प्रत्येक क्षण पति की सेवा में ही बिताती है.

परन्तु उसमें चार बातो की परकीया की अपेक्षा कमी होती है.

1. प्रियतम का निरंतर चिंतन.

2. मिलन की अत्यंत उत्कट उत्कंठा.

3. प्रियतम में किसी प्रकार का दोष न देखना.

4. कुछ भी न चाहना.

परकीया में ये चार बाते निरंतर एक साथ निवास करती है,इसलिए परकीया भाव श्रेष्ठ है.

भगवान से नित्य मिलन का अभाव न होने पर भी परकीया भाव की प्रधानता के कारण गोपियों को भगवान का क्षण भर का अदर्शन भी असह होता है.

वे प्रत्येक काम करते समय निरंतर कृष्ण का चिंतन करती थी.श्री कृष्ण की प्रत्येक क्रिया उन्हें ऐसी दिव्य गुणमयी दीखती थी

कि एक क्षण भर के लिए भी उनसे उनका चित् हटाये नहीं हटाता था एक बात धयान रखनी चाहिये कि यह परकीया भाव केवल व्रज में है

अर्थात लौकिक विषय वासना से सर्वथा विमुक्त दिव्य प्रेम राज्य में ही संभव है.

इसलिए चैतन्य मह्प्रभु ने कहा है –

“परकीया भावे अति रसेर उल्लास, व्रज बिना इहार अन्यत्र नाही वास ” 


अर्थात –
सर्वाच्च मधुर रस के उच्चतम परकीया भाव का उल्लास व्रज को (अर्थात दिव्यप्रेम राज्य को छोड़कर)अन्यत्र कही भी नही होता.

श्री राधा स्वकीय थी या परकीया यह एक व्यर्थ का प्रश्न है क्योकि जब श्री कृष्ण और राधा स्वरुप नित्य अभिन्न एक ही तत्व है तब उनमे अपने पराये के कल्पना कैसी ?

जैसे भगवान निराकार भी है और साकार भी है और उन दोनों से परे भी है उसी प्रकार राधा जी स्वकीय भी और परकीया भी है और दोनों से परे भी है.

 

          “श्री श्याम सुन्दर गोस्वामी जी ”

      सेवाधिकारी श्री राधा रानी मन्दिर बरसाना 

          श्री जी बरसाना मण्डल ट्रस्ट (रजि०)

            Website:- www.sjbmt.in

Contact Us:-08923563256,07417699169

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