News

श्रीराधा जी के साथ जटिला कुटिला की कुटिल नीति

एक समय माघ मास मेँ श्रीराधा रानी नियम पूर्वक प्रातः यमुना स्नान के लिय जाया करती थी. इससे कुटिला के मन मे सन्देह उत्पन्न हो गया.

एक दिन श्रीराधा जब स्नान करने के लिए घर से बाहर निकली,तब पीछे से कुटिला भी कोई बहाना कर नन्दालय मेँ श्रीकृष्ण हैँ या नहीँ यह जानने के लिए उत्सुक होकर श्री व्रजराज के महल मेँ गयी.

अर्थात वृषभानुकुमारी श्रीराधा इस रास्ते से यमुना मेँ प्रातः स्नान के लिए जाती है या नहीँ.

यह जानने के लिए तथा आकुल चित्त से कृष्ण का दर्शन करने के लिए अति मन्दमति कुटिल किसी छल से व्रजराज के भवन मेँ गयी.

कुटिला को परिजनोँ के द्वारा पता चला कि श्री कृष्ण भी माँ यशोदा की आज्ञानुसार स्नान करने के लिए गये है. यह सुनकर कुटिला का सन्देह और भी बढ़ गया.

तब कुटिला ने श्रीकृष्ण के असाधारण पद चिन्होँ का अनुसरण किया तथा जिस स्थान पर श्रीकृष्ण श्रीराधा के साथ सुन्दर सुन्दर लीला करते हैँ वहाँ जाने की इच्छा से अग्रसर हुई.

कुटिला को निकुंज के निकट आते देख तुलसी नाम की श्रीराधा की सहचरी ने कुंज मेँ प्रवेश करके देखा कि श्रीराधा ललिता आदि परिवेष्टित होकर (घिरकर) प्रियतम के साथ हास-विलास-लीला लावण्य मेँ मग्न चित्त हो रही हैँ.

उस लीला का दर्शन करके तुलसी सखी अत्यन्त आनन्दित होकर कहने लगी:– “अरी गोपियो! कुसुम धनुष अर्थात् कामदेव के जन्म को अत्यधिक सफल करने के लिए तुम सबने जो यह महोत्सव आरम्भ किया हैँ उसके सम्बन्ध मेँ इस समय एक बात सुनो,

इस सुन्दर उत्सव का दर्शन करने के लिए कुटिला मन्दगति से व्रज से इसी ओर आ रही है. वह यहाँ पहुँचने ही वाली है”.

यह सुनकर सब सखियाँ “हाय! वह कहाँ है? बोलो बोलो” ऐसा कहती हूई सशंक नेत्रोँ से प्रत्येक दिशा मेँ देखती हुई तुलसी से पूछने लगीँ.

तुलसी ने कहा:- “मैंने उस समय उसे छट्टीकरा (शकटीकरा) वन के समीप देखा था, लगता है वह इस समय इस स्थान के समीप ही कहीँ होगी”.

यह सुनकर श्रीकृष्ण ने कहा – हे “सखियो! तुम लोग इसी कुञ्ज मेँ क्षण-काल रहकर अदर्क अर्थात सूर्योदय अथवा भावी फल का दर्शन करो.

मैँ यहाँ से निकलकर अभिमन्यु का वेश-धारण करके अपनी प्रतिभा से कुटिला को ठगकर इसकी तुलना मेँ और अधिक कौतुक का विस्तार करुँगा”.

यह कहकर श्रीकृष्ण किसी निकुञ्ज मेँ प्रवेश कर गये तथा वनदेवी-वृन्दा से अभिमन्यु के वेशोपयोगी विभिन्न सामग्रियोँ को ग्रहण किया.

उनके द्वारा अपने चिन्होँ को ढका तथा अभिमन्यु का धारण कर उसी समान कण्ठ स्वर करते हुए कुञ्ज से बाहर आ गये.

वह कुटिला जिस पथ से आ रही थी, उसी पथ पर चल पड़े.अहो! विविध कलाओँ मेँ निपुण व्यक्ति क्या कहीँ भी अपने कार्य को साधने मेँ विचक्षण नहीँ होता अर्थात अवश्य होता है.

अभिमन्यु वेशी श्रीकृष्ण कुछ दूर अग्रसर होने पर कुटिला से मिले और बोले- कुटिले !इस समय तुम व्रज मेँ भ्रमण क्योँ कर रही हो?

कुटिला- वधु को ढूँढ़ने के लिए यहाँ आयी हूँ.

श्रीकृष्ण- वह क्या यहाँ आयी है?

कुटिला- यमुना मेँ मकर स्नान के बहाने से जाकर वह यहीँ किसी स्थान पर आयी है.

श्रीकृष्ण- वह रमणी चोर कहाँ है?

कुटिला- वह भी स्नान करने के लिए इधर ही आया है.इसीलिए माताजी ने मुझे यह सब वृत्तान्त जानने के लिए भेजा है.अब मैँ क्या करूँ? बतलाओ.

अभिमन्यु वेषधारी श्रीकृष्ण ने कहा- हे बहन. आज मेरा एक नया बैल खेत जोतते समय हल से निकलकर भाग गया है, मैँ उसे खोजते हुए यहाँ आया हूँ.

नया बैल चोरी होने पर भी मेरे ह्रदय मेँ इतना दुःख नहीँ है, किन्तु वह रमणी चोर कृष्ण मेरी पत्नी के प्रति भी लामपटय्य प्रकट करता है इससे जो अत्यधिक पीड़ा होती है,उसे क्या कोई सहन कर सकता है?

अतएव इसी समय मथुरा मेँ महाराज कंस के निकट जाकर उसे उचित दण्ड दिलवाऊँगा.

सर्वप्रथम तुम मेरी एक युक्ति सुनो. मैँ इस कुञ्ज मेँ छिप जाता हूँ,तुम शीघ्र ही राधिका को इधर उधर खोजो.यदि वह कृष्ण के बिना अकेली मिल जाय,

तो उसे छलपूर्वक इस कुञ्ज मेँ ले आना यदि वह कृष्ण के निकट हो तो उसे दूर से ही देखकर मुझे अलक्षित भाव से उस जगह ले चलना.

इस बात को सुनकर अत्यन्त कुटिल स्वभाव वाली कुटिला कालियह्रद से आरम्भ करके प्रत्येक कुञ्ज मेँ ढूँढ़ती-ढूँढ़ती केशी-घाट के निकट एक पुष्प वाटिका मेँ आयी.

वहाँ उसने देखा कि निर्मल सुगन्ध से युक्त तथा कीर्त्तिदा की कीर्त्ति को बढ़ाने वाली लता के समान श्रीराधा सखियोँ से परिवेष्टित (घिरी हूई) है और सखियाँ धीरे धीरे उसकी सेवा कर रही हैँ.

ललिता सखि ने कुटिला को वहाँ आयी देखकर पूछा- हे कुटिले. क्या तुम स्नान करने के लिए आयी हो?

कुटिला – नहीं

ललिता –  तो फिर किसलिए आयी हो?

कुटिला – तुम लोगोँ के चरित्र को जानने के लिए आयी हूँ.

ललिता – ठीक है,जान लो.

कुटिला – हे ललिते. मैँ सब कुछ समझ गयी हूँ.

ललिता – समझ गयी हो? जरा अपने मुख से मुझे भी तो बतलाओ क्या समझ गयी हो?

कुटिला – मैँ और क्या बतलाऊँ? ‘हरि’ की गन्ध ने ही सब-कुछ बतला दिया है.

ललिता ‘हरि’ शब्द का सिँह अर्थ करके बोली – कुटिले! यदि तुमने सिँह की गन्ध को पा लिया है, तो अवश्य ही सिँह किसी स्थान पर छिपा होगा.

हमलोग तो अति मुग्ध (भोली भाली) अबला हैँ, अतएव बड़ी भयभीत हो रही हैँ.

अब यहाँ से भागकर शीघ्र ही घर जा रही हैँ.तुमने इस स्थान पर इस प्रकार से आकर हमारे प्रति विमल स्नेह ही प्रकट किया है.

कुटिला क्रोध से भरकर बोली – अरी! धर्मपरायण सखियो! तुम लोग वन वन मेँ दोनोँ कुलोँ की कीर्त्तिकी घोषणा करके ही घर जाओगी.

किन्तु सामने जो नीप अथवा कदम्ब का कुञ्ज है, उसके द्वार को खोलो,मैँ उसके भीतर देखना चाहती हूँ.

ललिता – कोई वनदेवता अपने निकुञ्ज गृह काद्वार शर- शलाका (कुश के तीले से) निर्मित कपाट द्वारा बन्दकर किसी अन्य स्थान पर चला गया है.

अतएव इस कदम्ब-कुञ्ज के द्वार को खोलना युक्तिसंगत नही है. कौन सी ऐसी साहसवती नारी है,जो दूसरे के घर का द्वार खोलकर सम्पूर्ण दोष ग्रहण करने का प्रयास करेगी?.

कुटिला – ललिते! तुमने सत्य ही कहा है! तुम भोली- भाली कुल-कन्या हो! इस जन्म मे ही तुमने कभी दूसरे के घर मेँ प्रवेश नहीँ किया.

किन्तु अपने घर मेँ पर पुरुष को प्रवेश कराना अच्छी तरह से जानती हो और कुल-नारियोँ के घर मेँ पर पुरुष का प्रवेश कराना जिस शास्त्र मेँ लिखा है उसी शास्त्र को पढाने के लिए तुम पृथ्वी पर अवतीर्ण हुई हो.

कुटिला क्रोध से लाल नेत्र करके ऐसी बातोँ को कहती हुई अति शीघ्र गति से कुञ्ज-कुटीर के समीप आयी तथा वेग-पूर्वक पदाघात करके शर-शलाको सेबनी हुई पुष्प- कपाटिका को तोड़कर भीतर प्रवेश कर गयी.

वहाँ साक्षात रूप से कुसुम शय्या पर श्रीहरि की माला तथा श्रीराधा मुक्ताहार देखकर उन दोनोँ वस्तुओँ को लेकर शीघ्र ही बाहर आ गयी.

भगवद भक्ति के पाँच प्रधान रस

भगवान स्वयं रस स्वरुप है उस रस को प्राप्त करनके जीव आनंद मय हो जाता है.

उस रस का आस्वादन किसी न किसी प्रकार के सम्बन्ध से ही किया जा सकता है इसलिए किस सम्बन्ध से उस रस का आस्वादन किया जाए इसके लिए संत जन कहते है. भगवत सम्बन्धी रसो में प्रधान पाँच रस है –


1.शान्त  2.दास्य  3.सख्य  4.वात्सल्य और  5.माधुर्य.

इन पाँचो रसो का प्रयोग लौकिक प्रेम में भी होता है परन्तु भगवान के साथ सम्बन्ध होने से ये पाँचो रस भक्ति के या भगवत प्रेम के उतरोत्तर बढे हुए पाच भाव बन जाते है.

इन पाचो भावो में सबसे ऊँचा रस माधुर्य है- माधुर्य में शांत दास्य सख्य और वात्सल्य चारो रहते है.

इस रस के रसिक लोग भोग मोक्ष सबको तृणवत त्यागकर भगवत प्रेम में मतवाले रहते है इसी से इसका नाम मधुर है.

1. शान्तभाव – शान्त में शुद्धान्तकरण की भगवदभिमुखी वृति का विकास मात्र है.

2. दास्यभाव  – भगवान के प्रति दास्य भाव रखना,बिना दास्य-भाव हुए प्रेम हो ही नहीं सकता,शांत, सख्य, वात्सल्य और मधुर. इन सभी रसो में छिपा हुआ दास्य भाव अवश्य रहता है.

वह अत्यंत पीड़ा के समय व्यक्त होता है.जैसे – नंदबाबा जी का भगवान के प्रति वात्सल्य भाव था

किन्तु जब उद्धव जी संदेसा लेकर लौटेने लगे तब नन्द बाबा ने कहा हे उद्धव हामरे मन की वृति सदा श्री कृष्ण के चरणों का आश्रय करने वाली हो पुत्र की तरह स्नेह करने वाले पिता का दास्य भाव घोर दुख में अपने आप उमड़ पड़ा.

इसी तरह राधारानी जी जिनका भगवान के प्रति कांता भाव था,जब रास के समय भगवान अंतर्धान हो गए तो उनका दास्य भाव प्रफुटित हो उठा

और वे रोते हुए कहने लगी हे सखे ! हम तुम्हारी दासी है भला जो दिन रात्रि प्यारे से मान करती रहे उनके मुझ से ऐसे दास्य भाव के वचन ?

दास्य में भगवत सेवा का तो अधिकार है, परन्तु भगवान इसमें ऐश्वर्यशाली है, स्वामी है. और भक्त दीन-हीन, दास और सेवक है.

इस भाव में “संकोच” है. और अन्य भाव इस भाव की अपेक्षा भगवान अधिकाधिक निकटतम निजजन होते चले जाते है.

3. सख्य-भाव – जिसमे ऐश्वर्य अप्रकट-सा और प्रेम प्रकट सा होता है.सख्य प्रेम में ऐश्वर्य धन मान,सम्मान किसी की भी परवा नहीं रहती.

जैसे – “ग्वाल-बाल” भगवान से नाराज होते थे,उनके कंधे पर चढ़कर दाम लेते थे.उन्हें अखिल ब्रह्माण्ड नायक से किसी भी प्रकार का संकोच नहीं था.

परन्तु सख्य प्रेम सबको प्राप्त नहीं होता ,उसमे दूसरे के प्रेम की अपेक्षा रहती है यदि अज्ञानवश भ्रम हो जाय कि हमारा प्रेमी हमसे उतना प्रेम नहीं करता जितना हम उससे करते है तब स्वाभाविक ही हमारे प्रेम में कुछ न्यूनता आ जायेगी.

4. वात्सल्य भाव – संतान चाहे प्रेम करे या न करे “माता-पिता” का प्रेम उस पर वैसा ही बना रहता है.

श्री हरि कि जैसी कृपा यशोदा जी पर हुई थी वैसी कृपा ब्रहा,शिव की तो बात ही क्या भगवान ने सदा ह्रदय में निवास करने वाली लक्ष्मी पर भी नहीं हुई.

परन्तु इस भाव में छोटे और बडेपन का कुछ अंश रहता है.पूर्ण निर्भरता नहीं रहती,वात्सल्य में ऐश्वर्य की कभी कभी छाया सी आती है.

5. माधुर्य भाव – माधुर्य में भगवान अपने ऐश्वर्य को भुलाकर अपनी विभूति को मिटाकर प्रियतम कान्त रूप से भक्त के सामने प्रकट रहते है.

इस रस में, न प्रार्थना है, न कामना है, न भय है, न संकोच है, और समय विशेष पर चारों रसो के दर्शन होने पर भी प्रधान रस माधुर्य ही रहता है.

इस रस में प्रियतम की जो सेवा होती है वह मालिक की नहीं प्रियतम की ही होती है.

प्रियतम के सुखी होने में ही प्रेमी को अपार सुख है इसलिए सेवा भी अपार ही होती है.

इस रस में जाकर सभी रसो की सभी भावो की और सभी संबंधो की परि समाप्ति हो जाती है.इसे ही “कांताभाव” कहते है.

ये है “साध्यतत्व” जिसे हमने जाना,परन्तु बिना साधना के, साध्यतत्व ज्ञान व्यर्थ है. अर्थात उस “महाभाव” तक कैसे पहुँचे ?

 महाभाव की प्राप्ति

श्री राधारानी जी का प्रेम सामान्य नहीं है, संसारी सुखो में आनंद का अनुभव करने वाले पुरुष तो इसके श्रवण के भी अधिकारी नहीं है,

इसलिए इसे परम गोप्य कहा गया है.इसे तो व्रज की गोपियाँ ही जान सकती है. गोपियों के अतिरिक्त किसी दूसरे का इस रस में प्रवेश नहीं.

गोपियों इंद्रियसुख की अभिलाषिणी नहीं, उन्हें तो श्रीराधिका के साथ कुंजो में केलि करते हुए श्रीकृष्ण की वह कमनीय प्रेम लीला ही अत्यंत प्रिय है,

अपने लिए वे कुछ नहीं चाहती. उनकी सम्पूर्ण इच्छाए, सम्पूर्ण भावनाये, सम्पूर्ण चेष्टाएँ, मन, वाणी और इन्द्रियों की सम्पूर्ण चेष्टाएँ, प्यारे-प्यारी के बिहार के ही निमित्त है.

जो उस अनिर्वचनीय रस का आश्वादन करना चाहता है ,उन्हें अपनी सम्पूर्ण भावनाएं, इसी प्रकार त्यागमय और निस्वार्थ बना लेनी चाहिये.

गोपीभाव को प्राप्त हुए बिना, धारण किये बिना, कोई उस आनंदमृत का पान ही नहीं कर सकता, गोपियों का प्रेम में सांसारिकता नहीं है.वह विशुद्ध, निर्मल, वासना-रहित, इच्छा-रहित है.

कोई चाहे जपसे, तपसे, वेदाभ्यास अथवा यज्ञ-याग द्वारा उस रस सागर में प्रविष्ट होने का अधकारी बन जायेगे, तो यह उसकी भूल है.

उस अमृतसागर के समीप पहुँचने के लिए तो“भक्ति” ही एकमात्र साधन है.

जब रूप गोस्वामी ने राधारानी जी के लटो की उपमा नागिन से की

राधाकुण्ड के पश्चिम में झूलनतला है.एक समय श्रीसनातन गोस्वामी और श्रीरूप गोस्वामी राधाकुण्ड की उत्तर–पूर्वी दिशा में श्रीरघुनाथदास गोस्वामी की भजनकुटी के निकट बैठे हुए कृष्ण कथा में विभोर हो रहे थे.

श्रीसनातन गोस्वामी ने श्रीरूप गोस्वामी से पूछा – रूप ! आजकल क्या लिख रहे हो?

श्रीलरूप गोस्वामी स्वरचित ‘चाटुपुष्पाञ्जलि:’ नामक स्तोत्र उनके हाथों में दे दिया. उसका पहला श्लोक था–

नव–गोरोचना–गौरीं प्रवेरेन्दीवराम्बराम्।

मणि–स्तवक–विद्योति–वेणीव्यालग्ङणाफणां।।

श्रीसनातन गोस्वामी ने उसे पढ़कर कहा –रूप! तुमने ‘वेणीव्यालग्ङणाफणा’ पद के द्वारा राधिका की लहराती हुई काली बंकिम वेणी की तुलना विषधर काली नागिन से की है.

राधिका तो सर्वगुण सम्पन्न, परम लावण्यवती, सुकोमल एवं परम मधुर कृष्ण की प्रिया हैं.उनकी सुन्दर वेणी की यह उपमा मुझे रूचिकर प्रतीत नहीं हो रही हैं.

श्रीरूप गोस्वामी ने मुस्कुराते हुए नम्रतापूर्वक इसमें संशोधन करने के लिए प्रार्थना की.

श्रीसनातन गोस्वामी को उस समय अन्य कोई उपमा सूझी ‘पीछे संशोधन करूँगा’ ऐसा कहकर वे इसी विषय की चिन्ता करते हुए वहाँ से विदा हुए.

जब वे कुण्ड की पश्चिम दिशा में इस स्थल पर पहुँचे, तो उन्होंने कदम्ब वृक्ष की डालियाँ पर एक सुन्दर झूले पर एक गोपकिशोरी की झूलते हुए देखा.

उसकी सहेलियाँ मल्लार राग का गायन करती हुई उसे झुला रही थीं.श्रीसनातन गोस्वामी ने उस झूलती हुई किशोरी की लहराती हुई काली वेणी पर लहराती हुई काली नागिन को देखा

.वे उसे बचाने के लिए उधर ही दौड़ते हुए पुकारने लगे– लाली! लाली! सावधान तुम्हारी वेणी पर काली नागिन है.

किन्तु, जब निकट पहुँचे तो देखा कुछ भी नहीं है.वहाँ न किशोरी है न सखियाँ हैं और न झूला.

वे उस दृश्य का स्मरणकर आनन्द से क्रन्दन करने लगे और उल्टे पाँव रूप गोस्वामी के पास पहुँचे और बोले– रूप! तुम्हारी उपमा सर्वांगसुन्दर है.

किशोरीजी ने मुझ पर अनुग्रह कर अपनी बंकिम वेणी का स्वयं ही दर्शन कराया है.उसमें संशोधन की कोई आवश्यकता नहीं हैं.

निकुंज में जब नारद जी कृष्ण-ललिता की जय गाने लगे.

काम्यक वन में ललिता कुडं है जिसमें ललिता जी स्नान किया करती थी. और जब स्नान करती थी, और सदा राधा और कृष्ण को मिलन की चेष्टा करती थी.

एक दिन ललिता जी बैठे-बैठे हार बनाती है और बनाकर तोड देती, हर बार यही करती फिर बनाती और फिर तोड़ देती.फिर बनाती है फिर तोड़ देती है.नारद जी उपर से ये देखते है.

तो आकर ललिता से पूछते है – कि आप ये क्या कर रही हो ?

ललिता जी कहती है-  कि मै कृष्ण के लिए हार बना रही हूँ.

नारद जी ने कहा – हाँ वह तो मै देख ही रहा हूँ परन्तु आप बार बार बनाती है और तोड़ देती है.ऐसा क्यों ?

ललिता जी कहती है – नारद जी ! मुझे लगता है कि ये हार छोटा होगा कृष्ण को, तो मै तोड कर दूसरा बनाती हूँ, पर फिर लगता है कि ये बडा ना हो, तो उसे भी तोड देती हूँ. इसीलिए में बार-बार बनाकर तोडती हूँ.

तो नारद जी कहते है – इससे तो अच्छा है कि भगवान को बुला लो और उनके सामने हार बना दो.

अब नारद जी जाते है और बालकृष्ण को ले आते है. तो ललिता जी उनके नाप का हार बनाकर पहना देती है.

परन्तु नारद जी तो पहले ही भगवान से कहकर आते है कि आज मुझे ललिता-कृष्ण की लीला देखनी है, कृष्ण और ललिता जी को नायक-नायिका के रूप में देखना है.

तो भगवान ललिता जी से कहते है – आओ!  मेरे साथ झूले पर बैठो.

तो ललिता जी कहती है- कि अभी राधा जी आती होगीं, वे ही बैठेगी. पर भगवान के जिद करने पर ललिता जी बैठ जाती है.

क्योंकि गोपियों का उददेश्य भगवान का सुख है. तेा नारद जी दोंनों को झूले में देखकर बडे प्रसन्न होते है.

और वहाँ से सीधे राधा जी के पास आकर उनसे सामने ही गाने लगते है-  कि कृष्ण-ललिता की जय हो! , कृष्ण-ललिता की जय हो!.

तो राधा जी कहती है – कि क्या बात है नारद जी ? आज कृष्ण-ललिता जी की जय कर रहे है.

तो नारद जी कहते है – अहा ! क्या प्यारी जोडी है, झूले में ललिता और कृष्ण की. देखकर आनन्द आ गया. और नारद जी वहाँ से चले जाते है.

जब राधा रानी ये बात सुनती है तो उन्हें रोष आ जाता है.और वो झट ललिता कुडं में आकर देखती है कि कृष्ण ललिता जी के साथ झूला झूल रहे है और सारी सखियाँ झूला झुला रही है. तो वहाँ से चुपचाप चली जाती है.

जब बहुत देर हो जाती है और राधा रानी आती नहीं है तो भगवान सोचते है, कि राधा जी अभी तक नहीं आई.

तो वे ढूढने जाते है. देखते है कि राधा जी अपने निकुंज मे मान करते हुए बैठी है.

तो कृष्ण मनाते है और राधा जी मान जाती है. फिर वो आकर माधव के साथ झूला झूलती है. और ललिता विशाखा जी सारी सखिया झूलाती है.

ये मान लीला है. राधा जी की. कोई साधारण नहीं है. जब राधा जी को लगता है. कि भगवान मेरे साथ-साथ ललिता जी को भी बिठाए झूले पर, राधा जी का इशारा पाकर भगवान अपनी दूसरी ओर ललिता जी को बिठा लेते है.

अब एक ओर राधा जी बैठी है तो दूसरी ओर ललिता जी है. सभी सखियाँ झूला रही है.

अब फिर कुछ देर बाद राधा रानी की इच्छा होती है कि अब मै झूले से उतार जाऊ और अब दूसरी ओर भगवान विशाखा जी को बैठाए और मै झूला झुलाऊ और भगवान वैसा ही करते है.

एक ओर ललिता जी को ओर दूसरी ओर विशाखा जी को बैठा लेते है,ओर राधा रानी जो झूला झुलाती है.

कहने का अभिप्राय कि ये वास्तव में लीला मात्र है. जब भगवान कृष्ण चाहते है,कि राधा जी मान करें तो राधा रानी मान की लीला करती है.

वरना राधा जी के अंदर मान, द्वेष का लेशमात्र भी नहीं है,कभी किसी भी सखी के प्रति द्वेष या जलन डाह नहीं है,राधा एक भाव है जो प्रेम कि पराकाष्ठा है. सर्वोच्च भाव है.

जब राधारानी के सामने ऐश्वर्य भी नहीं ठहरा

एक बार भगवान कृष्ण अपने सखाओ और गोपियों के साथ यमुना जी के पुलिन पर बैठे बाते कर रहे थे,बातों ही बातों में कृष्ण ने कहा देखो मित्रों और गोपियों हमें साधारण मत समझना हम ही साक्षात् नारायण है.

सखा बोले – अच्छा ! कन्हैया तुम यदि नारायण हो तो यहाँ क्या करा रहे हो अपने वैकुंठ में क्यों नहीं रहते ?

कृष्ण ने कहा – मित्रों मै वैकुंठ में ही रहता हूँ,अभी एक रूप से इस वृंदावन में हूँ ?

सखा – कन्हैया फिर हम सभी को उस वैकुण्ठ के दर्शन करा सकते हो क्या ?

कृष्ण बोले – बिलकुल करा सकता हूँ ,अच्छा तुम सब अपनी आँखे बंद करो,जब सभी सखाओ और गोपियों ने आँखे बंद की तो और जब थोड़ी देर बाद आँखे खोली तो देखा कि सभी एक दिव्य जगह में खड़े हैसामने भगवान विष्णु शेष शैय्या पर विराजमान है.

सभी सखा आश्चर्य करने लगे,सभी आपस में कहने लगे,अरे हम सब तो सचमुच में वैकुंठ में है,जब इसी प्रकार कहने लगे तो वहाँ उपस्थित और भी भक्तो ने कहा –

आप सब चुप हो जाए यहाँ इस तरह से बात करना मना है, सभी हाथ बाँधकर चुपचाप खड़े रहो,सभी आँख बंद करके खड़े हो गए.

थोड़ी देर बाद गोपियाँ आपस में कहने लगी बड़ा विचित्र ये वैकुंठ लोक है.यहाँ तो कोई किसी से बात भी नहीं कर सकता,यहाँ के विष्णु तो किसी से बात भी नहीं करते,

हँसते बोलते ही नहीं है,थोड़ी देर रुकने के बाद सभी गोपियाँ और ग्वाले कृष्ण से बोले -कन्हैया इससे तो अच्छा हमारा वृंदावन है,

तू हमें वही ले चल,कृष्ण बोले अच्छी बात है सब अपने आँखे बंद करो जब सबने आँखे खोली तो स्वयं को वृंदावन में पाया.

गोपियाँ बोली – देखो कृष्ण फिर कभी हमें अब वैकुंठ मत ले जाना.वहाँ किसी कि बोलने कि हिम्मत ही नहीं हो रही थी.वहाँ तो बस हाथ बाँधे स्तुति ही करते रहो.

सच है कृष्ण ने गोपियों को जो आनंद वृंदावन में दिया वह भला वैकुण्ठ में कहाँ मिल सकता है?

वैकुण्ठ में नन्द महोत्सव नहीं होता, वहाँ नारायण का जनम ही नहीं होता, नन्द महोत्सव की बात कैसे हो सकती है.

और उद्धव जी से भी गोपियाँ यही कह देती है कि उद्धव हम ऐसे ब्रह्म कि उपासना करके क्या करगी जो मुरली कि तान हमें सुना न सके ,जो माखन कि चोरी कर न सके,

जो द्वार हमारे आ न सके,छल कर न सके,तड़पा न सके,जो हमारे हिये से लग न सके और हमको हिये से लगा न सके,हमें ऐसा ब्रह्म नहीं चाहिये.

प्रसंग २- एक बार भगवान के मन में आया कि आज गोपियों को अपना ऐश्वर्य दिखाना चाहिये ये सोचकर जब भगवान निकुंज में बैठे थे.

और गोपियाँ उनसे मिलने आ रही थी तब भगवान कृष्ण विष्णु के रूप चार भुजाएँ प्रकट करके बैठ गए,जिनके चारो हांथो में शंख, चक्र, गदा, पद्म, था.

गोपियाँ भगवान को ढूँढती हुई एक निकुंज से दूसरे निकुंज में जा रही थी तभी उस निकुंज में आयी जहाँ भगवान बैठे हुए थे,

दूर से गोपियों ने भगवान को देखा और बोली हम कब से ढूँढ रही है और कृष्ण यहाँ बैठे हुए है,

जब धीरे धीरे पास आई तो और ध्यान से देखा तो कहने लगी अरे ! ये हमारे कृष्ण नहीं है इनकी सूरत तो कृष्ण की ही तरह है परन्तु इनकी तो चार भुजाएँ है ये तो वैकुंठ वासी विष्णु है.

सभी गोपियों ने दूर से ही प्रणाम किया और आगे बढ़ गई,और बोली चलो सखियों कृष्ण तो इस कुंज में भी नहीं है कही दूसरी जगह देखते है .

ये प्रेम है जहाँ साक्षात् भगवान विष्णु भी बैठे है तो ये जानकर के ये तो विष्णु है कृष्ण नहीं गोपियाँ पास भी नहीं गई,

भगवान कृष्ण ने सोचा गोपियों ने तो कुछ कहा ही नहीं,अब राधा रानी जी के पास जाना चाहिये,ये सोचकर भगवान कृष्णा वैसे ही विष्णु के रूप में उस निकुंज में जाने लगे जहाँ राधा रानी बैठी हुई थी,

दूर से ही भगवान ने देखा राधा रानी जी अकेले बैठी हुई है,तो सोचने लगे राधा को अपना ये ऐश्वर्य देखाता हूँ,

और धीरे धीरे उस ओर जाने लगे,परन्तु ये क्या जैसे जैसे कृष्ण राधा रानी जी के पास जा रहे है वैसे वैसे उनकी एक के करके चारो भुजाये गायब होने लगी और विष्णु के स्वरुप से कृष्ण रूप में आ गए,

जबकी भगवान ने ऐशवर्य को जाने के लिए कहा ही नहीं वह तो स्वतः ही चला गया,और जब राधा रानी जी के पास पहुँचे तो पूरी तरह कृष्ण रूप  में आ गए.

अर्थात वृंदावन में यदि कृष्ण चाहे भी तो अपना ऐश्वर्य नहीं दिखा सकते,क्योकि उनके ऐश्वर्य रूप को वहाँ कोई नहीं पूँछता,

यहाँ तक की राधा रानी के सामने तो ठहरता ही नहीं,राधा रानी जी के सामने तो ऐश्वर्य बिना कृष्ण की अनुमति के ही चला जाता है.

श्री राधे 

“श्रील नारायण भट्ट ज़ू जयति”

“श्री नारायण दास गोस्वामी जयति”

??आज की ब्रज रस धारा  

दिनांक 31/07/2018

राधारानी जी को सौ वर्षों का वियोग

जब श्रीदामा जी को श्राप लगा तो भगवान कृष्ण श्रीदामा जी से बोले-  कि तुम एक अंश से असुर होगे और वैवत्सर मनमंतर में द्वापर में अवतार लूगाँ और मै गोपियों के साथ रास करूगाँ,

तो तुम अवहेलना करोगे, तो मै वध करूगाँ. इस प्रकार श्री दामा जी यक्ष के यहाँ शंखचूर्ण  नाम के दैत्य हो गए. कुबेर के सेवक हो गए.

जब द्वापर में भगवान ने अवतार लिए ब्रज की लीलाओं में भगवान ने रासलीला की तो यही शंखचूर्ण नामक दैत्य जो कंस का मित्र था उस समय वह कंस से मिलकर लौट रहा था,

बीच में रास मंडल देखा उस समय राधा कृष्ण की अलौकिक शोभा है. गोपियाँ चवर डूला रही है.भगवान के एक हाथ में बंशी है .सिर पर मोर मुकुट है. गले में मणी है, पैरों में नुपर है.

उसी समय ये शंखचूर्णने गोपियों को हरने की सोची उसका मुख बाघ के समान है,

शरीर से काला है. उसे देखकर गोपियाँ भागने लगी, तो उनमे से एक गोपी शतचंद्र्नना को उसने पकड़ा,

और पूर्व दिशा में ले जाने लगा,गोपी कृष्ण-कृष्ण पुकारने लगी. तो भगवान कृष्ण भी शाल का वृक्ष हाथ में लेकर उसकी ओर दोडे.

अब डर से उसने गोपी को तो छोड़ दिया और भगवान को आते देख अपने प्राण बचाने के लिए भागने लगा.

और हिमालय की घाटी पर पहुँच गया तो भगवान ने एक ही मुक्के में उसमें सिर को तोड दिया और उसकी चूडामणी निकाल ली,

शंखचूड़ के शरीर से एक दिव्य ज्याति निकली और भगवान के सखा श्रीदामा जी में विलीन हो गई तो शंखचूर्ण का वध करके भगवान  ब्रज में आ गए.

ये राक्षस श्रीदामा जी के अंश् था इसलिए शंख चूड़ की आत्मज्योति निकलकर श्री दामा में ही समां गई.

यहाँ जो श्राप श्री राधा रानी जी ने श्री दामा जी को दिया था वह तो पूर्ण हो गया,

अब जो श्राप राधा रानी जो को श्री दामा जी ने दिया था उसका समय भी निकट आ गया था और श्राप वश राधाजी केा सौ वर्ष का विरह हुआ.

तो भगवान ने कहा कि मै अपने भक्त का संकल्प कभी नहीं छोड सकता है.

इसलिए राधा जी को तो वियोग होना ही है. फिर जब भगवान मथुरा चले गए तो वो लौट के नहीं आए सौ वर्ष बाद कुरूक्षेत्र में सारे गोप ग्वालों की भगवान से भेंट हुई राधा जी से मिले.

गौलोक धाम का प्राकट्य

सबसे पहले विशालकाय शेषनाग का प्रादुर्भाव हुआ, जो कमलनाल के समान श्वेतवर्ण के है.

उन्ही की गोद में लोकवंदित महालोक “गोलोक” प्रकट हुआ. जिसे पाकर भक्ति युक्त पुरुष फिर इस संसार में नहीं लौटता.

फिर असंख्य ब्रह्माण्डो के अधिपति गोलोक नाथ भगवान श्रीकृष्ण के चरणारविन्द से“त्रिपथा गंगा” प्रकट हुई.

आगे जब भगवान से ब्रह्माजी प्रकट हुए, तब उनसे देवर्षि नारद का प्राकट्य हुआ.वे भक्ति से उन्मत होकर भूमंडल पर भ्रमण करते हुए भगवान के नाम पदों का कीर्तन करने लगे.

ब्रह्माजी ने कहा – नारद ! क्यों व्यर्थ में घूमते फिरते हो ? प्रजा की सृष्टि करो.

इस पर नारद जी बोले – मै सृष्टि नहीं करूँगा,क्योकि वह “शोक और मोह” पैदा करने वाली है.

बल्कि मै तो कहता हूँ आप भी इस सृष्टि के व्यापार में लगकर दुःख से अत्यंत आतुर रहते है,अतःआप भी इस सृष्टि को बनाना छोड़ दीजिये.

इतना सुनते ही ब्रह्मा जी को क्रोध आ गया और उन्होंने नारद जी को श्राप दे दिया,ब्रह्मा जी बोले -हे दुर्मति नारद तु एक कल्प तक गाने-बजाने में लगे रहने वाले गन्धर्व हो जाओ.

नारद जी गन्धर्व हो गए,और गन्धर्वराज के रूप में प्रतिष्ठित हो गए.

स्त्रियों से घिरे हुए एक दिन ब्रह्मा जी के सामने वेसुर गाने लगे,फिर ब्रह्मा जी ने श्राप दिया तू शूद्र हो जा! दासी के घर पैदा होगा.

और इस तरह नारदजी दासी के पुत्र हुए, और सत्संग के प्रभाव से उस देह हो छोड़कर फिर से ब्रह्मा जी के पुत्र के रूप में प्रकट हुए,और फिर भूतल पर विचरण करते हुए वे भगवान के पदों का गान व कीर्तन करने लगे.

एक दिन बिभिन्न लोको का दर्शन करते हुए,“वेद-नगर” में गए,नारद जी ने देखा वहाँ सभी अपंग है.

किसी के हाथ नहीं किसी के पैर नहीं, कोई कुबड़ा है, किसी के दाँत नहीं है,बड़ा आश्चर्य हुआ.

उन्होंने पूँछा – बड़ी विचित्र बात है ! यहाँ सभी बड़े विचित्र दिखायी पड़ते है?


इस पर वे सब बोले – 
हम सब “राग-रगनियाँ” है ब्रह्मा जी का पुत्र है -“नारद” वह वेसमय धुवपद गाता हुआ इस पृथ्वी पर विचरता है इसलिए हम सब अपंग हो गए है,(जब कोई गलत राग,पद गाता है तो मानो राग रागनियो के अंग-भंग हो जाते है)


नारद जी बोले – 
मुझे शीघ्र बताओ ! नारद को किस प्रकार काल और ताल का ज्ञान होगा ?

राग-रागनियाँ – यदि सरस्वती शिक्षा दे, तो सही समय आने पर उन्हें ताल का ज्ञान हो सकता है.

नारद जी ने सौ वर्षों तक तप किया. तब सरस्वती प्रकट हुई और संगीत की शिक्षा दी, नारद जी ज्ञान होने पर विचार करने लगे की इसका उपदेश किसे देना चाहिये? तब तुम्बुरु को शिष्य बनाया, दूसरी बात मन में उठी, कि किन लोगो के सामने इस मनोहर राग रूप गीत का गान करना चाहिये?

खोजते-खोजते इंद्र के पास गए, इंद्र तो विलास में डूबे हुए थे, उन्होंने ध्यान नहीं दिया, शंकरजी के पास गए,वे नेत्र बंद किये ध्यान में डूबे हुए थे.

तब अंत में नारदजी “गोलोक धाम” में गए,जब भगवान श्रीकृष्ण के सामने उन्होंने स्तुति करके भगवान के गुणों का गान करने लगे, और वाद्य यंत्रो को दबाकर देवदत्त स्वरामृतमयी वीणा झंकृत की.

तब भगवान बड़े प्रसन्न हुए और अंत में प्रेम के वशीभूत हो, अपने आपको देकर भगवान जल रूप हो गए. भगवान के शरीर से जो जल प्रकट हुआ उसे “ब्रह्म-द्रव्य”के नाम से जानते है.

उसके भीतर कोटि-कोटि ब्रह्माण्ड राशियाँ लुढकती है, जिस ब्रह्माण्ड में सभी रहते है, उसे “पृश्निगर्भ” नाम से प्रसिद्ध है जो वामन भगवान के पाद-घात से फूट गया.

उसका भेदन करके जो ब्रह्म-द्रव्य का जल आया, उसे ही हम सब गंगा के नाम से जानते है,गंगा जी को धुलोक में “मन्दाकिनी”,पृथ्वी पर “भागीरथी”,और अधोलोक पाताल में “भोगवर्ती” कहते है.

इस प्रकार एक ही गंगा को त्रिपथ गामिनी होकर तीन नामो से विख्यात हुई.

इसमें स्नान करने के लिए प्रणत-भाव से जाते हुए मनुष्य के लिए पग-पग पर राजसूर्य और अश्वमेघ यज्ञो का फल दुर्लभ नहीं रह जाता.

फिर भगवान के “बाये कंधे” से सरिताओ में श्रेष्ठ – “यमुना जी” प्रकट हुई,भगवान के दोनों “गुल्फो से” दिव्य “रासमंडल” और “दिव्य श्रृंगार” साधनों के समूह का प्रादुर्भाव हुआ.

भगवान की “पिंडली” से “निकुंज” प्रकट हुआ. जो सभा, भवनों, आंगनो गलियों और मंडलों से घिरा हुआ था. “घुटनों” से सम्पूर्ण वनों में उत्तम “श्रीवृंदावन” का आविर्भाव हुआ.


“जंघाओं”
से “लीला-सरोवर” प्रकट हुआ. “कटि प्रदेश” से दिव्य रत्नों द्वारा जड़ित प्रभामायी “स्वर्ण भूमि” का प्राकट्य हुआ.

उनके “उदर” में जो रोमावालिया है, वे विस्तृत “माधवी लताएँ”बन गई. गले की “हसुली” से “मथुरा-द्वारका” इन दो पूरियो का प्रादुर्भाव हुआ,

दोनों “भुजाओ” से “श्रीदामा”आदि. आठ श्रीहरि के “पार्षद” उत्पन्न हुए. “कलाईयों” से “नन्द” और “कराग्र-भाग” से “उपनंद” प्रकट हुए.

“भुजाओ” के मूल भागो से “वृषभानुओं” का प्रादुर्भाव हुआ. समस्त गोपगण श्रीकृष्ण के “रोम” से उत्पन्न हुए. भगवान के “बाये कंधे” से एक परम कान्तिमान गौर तेज प्रकट हुआ,

जिससे “श्री भूदेवी”,”विरजा” और अन्यान्य “हरिप्रियाये”आविभूर्त हुई.

फिर उन श्रीराधा रानीजी के दोनों भुजाओ से “विशाखा” “ललिता” इन दो सखियों का आविभार्व हुआ,

और दूसरी सहचरी गोपियाँ है वे सब राधा के रोम से प्रकट हुई, इस प्रकार मधुसूदन ने गोलोक की रचना की.

          “श्री श्याम सुन्दर गोस्वामी जी ”

      सेवाधिकारी श्री राधा रानी मन्दिर बरसाना 

          श्री जी बरसाना मण्डल ट्रस्ट (रजि०)

            Website:- www.sjbmt.in

Contact Us:-08923563256,07417699169

राधाजी की चिंता का निवारण

गौ लोक धाम में जब देवताओ ने भगवान श्री कृष्ण से पृथ्वी के उद्धार के करने को कहा तो भगवान ने उन्हें आश्वासन दिया में अवतार लूँगा.

जब भगवान श्रीकृष्ण इस प्रकार बाते कर रहे थे उसी क्षण ‘अब प्राणनाथ से मेरा वियोग हो जायेगा ‘ यह समझकर राधिका जी व्याकुल हो गई और मूर्छित होकर गिर पड़ी.

श्री राधिका जी ने कहा – आप पृथ्वी का भार उतारने के लिए अवश्य पधारे परन्तु मेरी एक प्रतिज्ञा है

प्राणनाथ आपके चले जाने पर एक क्षण भी मै यहाँ जीवन धारण नहीं कर सकूँगी मेरे प्राण इस शरीर से वैसे ही उड़ जायेगे जैसे कपूर के धूलिकण

श्री भगवान ने कहा -तुम विषाद मत करो! मै तुम्हारे साथ चलूँगा.

श्री राधिका जी ने कहा – परन्तु प्रभु !जहाँ वृंदावन नहीं है, यमुना नदी नहीं है, और गोवर्धन पर्वत भी नहीं है, वहाँ मेरे मन को सुख नहीं मिल सकता.

तब राधिका जी के इस प्रकार कहने पर भगवान श्रीकृष्ण ने अपने धाम से चौरासी कोस भूमि ,गोवर्धन पर्वत और यमुना नदी को भूतल पर भेजा.

तब ब्रह्मा जी ने कहा – भगवन मेरे लिए कौन सा स्थान होगा. और ये सारे देवता किन ग्रहों में रहेगे और किन-किन नामो से प्रसिद्ध होगे ?

भगवान ने कहा – मै स्वयं वासुदेव और देवकी जी के यहाँ प्रकट होऊँगा.मेरे कालस्वरूप ये शेष रोहिणी के गर्भ से जन्म लेगे.

* साक्षात् “लक्ष्मी” राजा भीष्मक के घर पुत्री रूप से उत्पन्न होगी इनका नाम ‘रुक्मणि’ होगा.

पार्वती – ‘जाम्बवती’ के नाम से प्रकट होगी.

* यज्ञपुरुष की पत्नी “दक्षिणा देवी” –  ‘लक्ष्मणा’ नाम धारण करेगी.

* यहाँ जो “विरजा” नाम की नदी है–  वही ‘कालिंदी’ नाम से विख्यात होगी.

* भगवंती “लज्जा”-  का नाम ‘भद्रा’ होगा.

समस्त पापों का प्रशमन करने वाली “गंगा”-  ‘मित्रविन्दा’ नाम धारण करेगी.

जो इस समय “कामदेव” है वे ही रुक्मिणी के गर्भ से ‘प्रधुम्न’ रूप में उत्पन्न होगे. प्रधुम्न के घर तुम्हारा (ब्रह्मा) अवतार होगा. उस समय तुम्हे ‘अनिरुद्ध’ कहा जायेगा.

* ये वसु जो “द्रोंण” नाम से प्रसिद्ध है व्रज में ‘नन्द‘ होगे, और स्वयं इनकी प्राणप्रिया “धरा देवी” ‘यशोदा’ नाम धारण करेगी.

* “सुचन्द्र” ‘वृषभानु’ बनेगे और इनकी सहधर्मिणी “कलावती” धराधाम पर ‘कीर्ति‘ के नाम से प्रसिद्ध होगी फिर उन्ही के यहाँ इन राधिका जी का प्राकट्य होगा.

*’सुबल’ और ‘श्रीदामा’ नाम के मेरे सखा ‘नन्द’ और ‘उपनन्द’ के घर जन्म धारण करेगे,

इसी प्रकार मेरे और भी सखा जिनके नाम ‘स्तोककृष्ण’ ,’अर्जुन’ और ‘अंशु’ आदि सभी ‘नौ नन्दों’ के यहाँ प्रकट होगे. व्रजमंडल में जो छै वृषभानु है उनके गृह ‘विशाल’  ‘ऋषभ’ ‘तेजस्वी देवप्रस्थ’ और ‘व्ररुथप’ नाम के मेरे सखा अवतीर्ण होगे.

ब्रह्मा जी ने कहा – किसे “नन्द” कहा जाता है? और किसे “उपनन्द” और “वृषभानु” के क्या लक्षण है ?

भगवान ने कहा –  जो गौशालाओ में सदा गौओ का पालन करते रहते है और गौ-सेवा ही जिनकी जीविका है उन्हें मैंने “गोपाल” संज्ञा दी है. अब उनके लक्षण सुनो –

नन्द – गोपालो के साथ “नौ लाख गायों के स्वामी को नन्द” कहा जाता है.

उपनन्द – “पांच लाख गौओ का स्वामी उपनन्द” कहा जाता है.

वृषभानु – वृषभानु नाम उसका पडता है जिसके अधिकार में “दस लाख गौए” रहती है.

नन्दराज– ऐसे ही जिसके यहाँ “एक करोड गौओ की रक्षा” होती है वह “नन्दराज” कहलाता है.

वृषभानुवर– “पचास लाख गौओ के अध्यक्ष” की “वृषभानुवर” संज्ञा है.

सुचन्द्र और द्रोण – ये दो ही व्रज में इस प्रकार के सम्पूर्ण लक्षणों से संपन्न गोपराज बनेगे.

“जय जय श्री राधे “

श्री राधा जी को श्रीदामा का श्राप

श्री हरि की तीन पत्नियाँ हुई, श्री राधा, विजया (विरजा) और भूदेवी. इन तीनो में श्री कृष्ण को श्री राधा ही अधिक प्रिय है एक दिन भगवान श्रीकृष्ण एकांत कुंज में कोटि चन्द्रमाओ की सी कांति वाली विरजा के साथ विहार कर रहे थे.

तभी एक सखी ने राधा जी से आकर कहा – कि कृष्ण, विरजा के साथ है. तब श्री राधिका मन ही मन कुछ खिन्न हो गई.

और सौ योजन विस्तृत, सौ योजन ऊँचे, और करोडो अश्र्विनियो से जुते सूर्य तुल्य कान्तिमान रथ पर, जो सुवर्ण कलशो से मण्डित था,

दस अरब सखियों के साथ आरूढ़ होकर तत्काल श्री हरि को देखने के लिए गई.

उस निकुंज के द्वार पर श्री हरि के द्वारा नियुक्त महाबली श्री दामा पहरा दे रहा था.

उसने श्री राधा को अन्दर जाने से मना कर दिया. बाहर सखियों की आवाज सुनकर श्री हरि वहाँ से अंतर्धान हो गए.

श्री राधा के भय से विरजा सहसा नदी के रूप में परिणत हो कोटि योजन विस्तृत गोलोक मे उसके चारो ओर प्रवाहित होने लगी.श्री हरि चले गए,

और विरजा नदी रूप में परिणत हो गई, यह देखकर राधा जी अपने कुंज को लौट गई.

विरजा को श्री कृष्ण ने शीघ्र ही अपने वर के प्रभाव से मूर्तिमती और विमल वस्त्राभूषणों से बिभूषित दिव्य नारी बना दिया .

फिर श्री राधा को विरह दुःख से व्यथित जान श्यामसुन्दर श्री हरि स्वयं श्रीदामा के साथ उनके निकुंज में आये.

निकुंज के द्वार पर सखा के साथ आये हुए प्राणवल्लभ की ओर देखकर राधा मानवती हो उनसे बोली –

श्री राधा ने कहा – हरे ! वही चले जाओ! जहाँ तुम्हारा नया नेह जुड़ा है. जाओ, उसी कुंज में रहो! मुझसे आपको क्या मतलब?

यह बात सुनकर भगवान विरजा के निकुंज में चले गए तब श्री कृष्ण के मित्र श्री दामा ने राधा से रोषपूर्वक कहा –

श्री दामा बोला – राधे ! श्री कृष्ण साक्षात् परिपूर्ण भगवान है वे स्वय असंख्य ब्रह्माण्डो के अधिपति ओर गौलोक के स्वामी है वे तुम जैसी करोडो शक्तियों को बना सकते है उनकी तुम निंदा करती हो ?ऐसा मान न करो.

राधा बोली – ओ मुर्ख ! अपनी माता की निंदा करता है.राक्षस हो जा. और गोलोक से बाहर चला जा!

श्री दामा बोला – शुभे  !  श्री कृष्ण सदा तुम्हारे अनुकूल रहते है. इसलिए तुम्हे मान हो गया है अतः परिपूर्णतम परमात्मा श्री कृष्ण से भूतल पर तुम्हारा सौ वर्षों के लिए वियोग हो जायेगा.

इस प्रकार परस्पर शाप देकर राधा और श्री दामा अत्यंत चिंता में डूब गए. तब भगवान वहाँ प्रकट हुए.

भगवान ने कहा – राधे !मै अपने निगम स्वरुप वचन को तो छोड सकता हूँ किन्तु भक्तो की बात अन्यथा करने में सर्वथा असमर्थ हूँ. राधे! तुम शोक मत करो.

मेरी बात सुनो! वियोग काल में भी प्रतिमास एक बार तुम्हे मेरा दर्शन हुआ करेगा. वारह कल्प में भूतल का भार उतारने मै तुम्हारे साथ पृथ्वी पर चलूँगा.

श्री दामा !तुम अपने एक अंश से असुर हो जाओ. वैवस्वत मन्वंतर में रासमंडल में आकर जब तुम मेरी अवहेलना करोगे तब मेरे हाथ से तुम्हारा वध होगा फिर तुम अपने पूर्ववत शरीर प्राप्त कर लोगे.

इस प्रकार श्री दामा ने यक्ष लोक में सुधन के घर जन्म लिया वह शंख चूड नाम से विख्यात हो यक्षराज कुबेर का सेवक हो गया .

“जय जय श्री राधे”

गौलोक धाम के दिव्य द्रश्य

गौ लोक का गोवर्धन पर्वत और यमुना

देवताओ ने गौ लोक धाम में प्रवेश किया उन्हें परम सुन्दर गौलोक का दर्शन हुआ वहाँ “गोवर्धन” नामक गिरिराज शोभा पा रहे थे गिरिराज का वह प्रदेश उस समय वसंत का उत्सव मनाने वाली गोपियों और गौओ के समूह से घिरा था.

कल्पवृक्षो और कल्प लताओ के समुदाय से सुशोभित था वहाँ श्याम वर्ण वाली उत्तम “यमुना नदी” स्वछंद गति से बह रही है. नदी में उतरने के लिए वैदूर्य मणि की सुन्दर सीढियाँ बनी है.

गौलोक का वृंदावन –

वहाँ दिव्य वृक्षों और लताओ से भरा हुआ “वृंदावन” अत्यंत शोभा पा रहा है. भांति भांति के विचित्र पक्षियों भ्रमरों और वंशीवट के कारण वहाँ की सुषमा और बढ़ रही है

वृंदावन के मध्य भाग में बत्तीस वनों से युक्त एक “निज-निकुंज” है उसकी चारो दीवारे सुशोभित कर रही है.

उसके आँगन का भाग लाल वर्ण वाले अक्षय वटो से अलंकृत है. पद्मरागादी सात प्रकार की मणियों से बनी दीवारे और आँगन के फर्श बड़ी शोभा बढ़ाते है.

वहाँ बालसूर्य के सद्रश कान्तिमान अरुण-पीत कुंडल धारण करने वाली ललनाएँ शत-शत चन्द्रमाओ के समान गौरवर्ण से उद्भासित होती है वे सुंदरिया मणि रत्नमय भित्तियो में अपना मनोहर मुख देखती हुई रत्नजडित आँगन में भागती फिरती है.

गौ लोक की गौए –

 वहाँ द्वार-द्वार पर कोटि-कोटि मनोहर गौओ के दर्शन होते है.वे दिव्य आभूषणों से विभूषित है और श्र्वेत पर्वत के समान प्रतीत होती है सब की सब दूध देने वाली नयी अवस्था की है

सुशीला सुरुचा सद्गुण वती है सभी सवत्सा और पीली पूंछ वाली है ऐसी भव्य रूप वाली गौए वहाँ सब ओर विचर रही है. उन गौओ के सींगो में सोना मढ़ा गया है

सभी गौए भिन्न भिन्न अंग वाली है -कोई उज्जवल, कोई काली, कोई पीली, कोई हरि, कोई लाल, कोई चितकबरी,दूध देने में समुद्र की तुलना करने वाली उन गायों के शरीर पर तरुणियो के कर चिन्ह शोभित है अर्थात युवतियो के हाथो  के रंगीन छापे दिए गए है.

गौलोक में श्यामा श्याम –

इन दिव्य निकुंज को सम्पूर्ण देवताओ ने प्रणाम किया और भीतर चले गए ”

वहाँ उन्हें हजार दल वाला एक बहुत ही बड़ा कमल दिखायी पड़ा वह ऐसे सुशोभित था मानो प्रकाश् का पुंज हो उसके ऊपर एक सोलह दल का कमल है और उसके ऊपर भी एक आठ दलवाला कमल है उसके ऊपर चमचमाता हुआ एक ऊँचा सिंहासन है तीन  सीढियों से संपन्न वह परम दिव्य सिंहासन कौस्तुभ मणियों से जडित होकर अनुपम शोभा पा रहा है उसी में भगवान श्री कृष्ण राधिका जी के साथ विराजमान है”.

वे युगल रूप भगवान मोहिनी आदि आठ दिव्य सखियों से समन्वित और श्री दामा प्रभृति आठ गोपालो के द्वारा सेवित है उनके ऊपर हंस के समान सफ़ेद रंगवाले पंखे झले जा रहे है

और हीरो से बनी मूंठ वाले चवन डुलाये जा रहे है भगवान स्वेच्छा पूर्वक अपने दाहिने पैर को टेढ़ा कर रखा है वे हाथ में बांसुरी धारण किये हुए है. घुटनों तक लंबी भुजाये और अत्यंत पीले वस्त्र पहने हुए है.

पैरों में घुँघरू ,हाथो में कंगन गले में सुन्दर वनमाल श्रीवत्स चिन्ह बहुमूल्य रत्नों से बने हुए किरीट कुंडल बाजूबंद शोभा बढ़ा रहे है

भगवान के ऐसे दिव्य दर्शन प्राप्त करके सम्पूर्ण देवता आनंद के समुद्र में गोता खाने लगे अत्यंत हर्ष के कारण उनके आँखों से आंसुओ की धारा बह चली सबने श्री कृष्ण चन्द्र को प्रणाम किया.

       “जय जय श्री राधे “

राधाजी की चिंता का निवारण

गौ लोक धाम में जब देवताओ ने भगवान श्री कृष्ण से पृथ्वी के उद्धार के करने को कहा तो भगवान ने उन्हें आश्वासन दिया में अवतार लूँगा.

जब भगवान श्रीकृष्ण इस प्रकार बाते कर रहे थे उसी क्षण ‘अब प्राणनाथ से मेरा वियोग हो जायेगा ‘ यह समझकर राधिका जी व्याकुल हो गई और मूर्छित होकर गिर पड़ी.

श्री राधिका जी ने कहा – आप पृथ्वी का भार उतारने के लिए अवश्य पधारे परन्तु मेरी एक प्रतिज्ञा है

प्राणनाथ आपके चले जाने पर एक क्षण भी मै यहाँ जीवन धारण नहीं कर सकूँगी मेरे प्राण इस शरीर से वैसे ही उड़ जायेगे जैसे कपूर के धूलिकण

श्री भगवान ने कहा -तुम विषाद मत करो! मै तुम्हारे साथ चलूँगा.

श्री राधिका जी ने कहा – परन्तु प्रभु !जहाँ वृंदावन नहीं है, यमुना नदी नहीं है, और गोवर्धन पर्वत भी नहीं है, वहाँ मेरे मन को सुख नहीं मिल सकता.

तब राधिका जी के इस प्रकार कहने पर भगवान श्रीकृष्ण ने अपने धाम से चौरासी कोस भूमि ,गोवर्धन पर्वत और यमुना नदी को भूतल पर भेजा.

तब ब्रह्मा जी ने कहा – भगवन मेरे लिए कौन सा स्थान होगा. और ये सारे देवता किन ग्रहों में रहेगे और किन-किन नामो से प्रसिद्ध होगे ?

भगवान ने कहा – मै स्वयं वासुदेव और देवकी जी के यहाँ प्रकट होऊँगा.मेरे कालस्वरूप ये शेष रोहिणी के गर्भ से जन्म लेगे.

* साक्षात् “लक्ष्मी” राजा भीष्मक के घर पुत्री रूप से उत्पन्न होगी इनका नाम ‘रुक्मणि’ होगा.

पार्वती – ‘जाम्बवती’ के नाम से प्रकट होगी.

* यज्ञपुरुष की पत्नी “दक्षिणा देवी” –  ‘लक्ष्मणा’ नाम धारण करेगी.

* यहाँ जो “विरजा” नाम की नदी है–  वही ‘कालिंदी’ नाम से विख्यात होगी.

* भगवंती “लज्जा”-  का नाम ‘भद्रा’ होगा.

समस्त पापों का प्रशमन करने वाली “गंगा”-  ‘मित्रविन्दा’ नाम धारण करेगी.

जो इस समय “कामदेव” है वे ही रुक्मिणी के गर्भ से ‘प्रधुम्न’ रूप में उत्पन्न होगे. प्रधुम्न के घर तुम्हारा (ब्रह्मा) अवतार होगा. उस समय तुम्हे ‘अनिरुद्ध’ कहा जायेगा.

* ये वसु जो “द्रोंण” नाम से प्रसिद्ध है व्रज में ‘नन्द‘ होगे, और स्वयं इनकी प्राणप्रिया “धरा देवी” ‘यशोदा’ नाम धारण करेगी.

* “सुचन्द्र” ‘वृषभानु’ बनेगे और इनकी सहधर्मिणी “कलावती” धराधाम पर ‘कीर्ति‘ के नाम से प्रसिद्ध होगी फिर उन्ही के यहाँ इन राधिका जी का प्राकट्य होगा.

*’सुबल’ और ‘श्रीदामा’ नाम के मेरे सखा ‘नन्द’ और ‘उपनन्द’ के घर जन्म धारण करेगे,

इसी प्रकार मेरे और भी सखा जिनके नाम ‘स्तोककृष्ण’ ,’अर्जुन’ और ‘अंशु’ आदि सभी ‘नौ नन्दों’ के यहाँ प्रकट होगे.

व्रजमंडल में जो छै वृषभानु है उनके गृह ‘विशाल’  ‘ऋषभ’ ‘तेजस्वी देवप्रस्थ’ और ‘व्ररुथप’ नाम के मेरे सखा अवतीर्ण होगे.

ब्रह्मा जी ने कहा – किसे “नन्द” कहा जाता है? और किसे “उपनन्द” और “वृषभानु” के क्या लक्षण है ?

भगवान ने कहा –  जो गौशालाओ में सदा गौओ का पालन करते रहते है और गौ-सेवा ही जिनकी जीविका है उन्हें मैंने “गोपाल” संज्ञा दी है. अब उनके लक्षण सुनो –

नन्द – गोपालो के साथ “नौ लाख गायों के स्वामी को नन्द” कहा जाता है.

उपनन्द – “पांच लाख गौओ का स्वामी उपनन्द” कहा जाता है.

वृषभानु – वृषभानु नाम उसका पडता है जिसके अधिकार में “दस लाख गौए” रहती है.

नन्दराज– ऐसे ही जिसके यहाँ “एक करोड गौओ की रक्षा” होती है वह “नन्दराज” कहलाता है.

वृषभानुवर– “पचास लाख गौओ के अध्यक्ष” की “वृषभानुवर” संज्ञा है.

सुचन्द्र और द्रोण – ये दो ही व्रज में इस प्रकार के सम्पूर्ण लक्षणों से संपन्न गोपराज बनेगे.

“जय जय श्री राधे “

श्री राधे 

“श्रील नारायण भट्ट ज़ू जयति”

“श्री नारायण दास गोस्वामी जयति”

??आज की ब्रज रस धारा  

दिनांक 30/07/2018

श्री कृष्ण चरणारविन्द

श्री श्याम सुन्दर के चरणारनाविंद 

कृष्ण के पदपयोज का स्मरण मात्र करने से व्यक्ति को समस्त आध्यात्मिक एवं भौतिक संपत्ति, सौभाग्य, सौंदर्य, और सगुण की प्राप्ति होती है.

ये नलिनचरण सर्वलीलाधाम है, कृष्ण के चरणारविन्द हमारा सर्वस्व हो जाये.

(गोविंद लीलामृत)

श्री श्यामसुन्दर का  दायाँ चरण 

श्री श्याम सुन्दर के दाये चरण में “ग्यारह मंगल चिन्ह” है.

पादांगुष्ठ के मूल में एक “जौ ”  का चिन्ह है उसके नीचे एक ‘चक्र’. चक्र के नीचे एक ‘छत्र’ है.

एक ‘उर्ध्वरेखा’ पाँव के मध्य में प्रारंभ होती है, माध्यम के मूल पर एक रुचिर ‘कमल’ कुसुम है,

कमल के नीचे ‘ध्वज’ है ,कनिष्ठा के नीचे एक ‘अंकुश’  है उसके नीचे एक ‘वज्र’ है एड़ी पर एक ‘अष्टभुज’ है

जिसके चारो ओर चार प्रमुख दिशाओ में चार ‘स्वास्तिक’ है हर दो स्वास्तिक के बीच में एक ‘जम्बू फल’ है.

१. जौ- जौ का दाना व्यक्त करता है कि भक्त जन राधा कृष्णके पदार विन्दो कि सेवा कर समस्त भोगो ऐश्वर्य प्राप्त करते है एक बार उनका पदाश्रय प्राप्त कर लेने पर भक्त कि अनेकानेक जन्म मरण कि यात्रा घट कर जौ के दानो के समान बहुत छोटी हो जाती है.

२. चक्र – यह चिन्ह सूचित करता है कि राधा कृष्ण के चरण कमलों का ध्यान काम क्रोध लोभ मोह मद और मात्सर्य रूपी छै शत्रुओ का  नाश करता है ये तेजस तत्व का प्रतीक है जिसके द्वारा राधा गोविंद भक्तो के अंतःकरण से पाप तिमिर को छिन्न भिन्न कर देते है.

३. छत्र – छत्र यह सिद्ध करता है कि उनके चरणों कि शरण ग्रहण करने वाले भक्त भौतिक कष्टों कि अविराम वर्षा से बचे रहते है.

४. उर्ध्व रेखा – जो भक्त इस प्रकार राधा श्याम के पद कमलों से लिपटे रहते है मानो वे उनकी जीवन रेखा हो वे दिव्य धाम को जाएँगे.

५. कमल – सरस सरसिज राधा गोविंद के चरणविंदो का ध्यान करने वाले मधुकर सद्रश भक्तो के मन में प्रेम हेतु लोभ उत्पन्न करता है.

६. ध्वज – ध्वज उन भक्तो कि भय से बचाता और सुरक्षा करता है जो उनके चरण सरसिज का ध्यान करते है विजय का प्रतीक है.

७. अंकुश – अंकुश इस बात का घोतक है कि राधा गोविद के चरणों का ध्यान भक्तो के मन रूपी गज को वश में करता है उसे सही मार्ग दिखाता है.

८. वज्र- वज्र यह बताता है कि श्री कृष्ण के पाद पंकज का ध्यान भक्तो के पूर्व पापों के कर्म फलो रूपी पर्वतो को चूर्ण चूर्ण कर देता है.

९. अष्टकोण – यह बताता है जो श्री कृष्ण के चरणों कि आराधना करते है वे अष्ट दिशाओ से सुरक्षित रहते है.

१०. स्वास्तिक – जो व्यक्ति श्री कृष्ण के चरणों को अपने मन में संजो के रखता है उसका कभी अमंगल नहीं होता.

११. जंबू फल – वैदिक स्रष्टि वर्णन के अनुसार जंबू द्वीप के निवासियों के लिए श्री कृष्ण के लिए राजीव चरण ही एक मात्र आराध्य विषय है.

श्री श्याम सुन्दर के बायाँ चरण- 

श्री श्याम सुन्दर के बाये चरण में “आठ शुभ चिन्ह” है.

पादांगुष्ट के मूल पर एक ‘शंख’ है, मध्यमा के नीचे दो ‘संकेंदो वृत्त’ शोभायमान है,उसके नीचे एक ‘प्रत्यंचा रहित धनुष’‘ है.

धनु के नीचे ‘गाय के खुर’ का चिन्ह अंकित है उसके नीचे चार ‘कुम्भो’ से घिरा एक ‘त्रिकोण’ है त्रिकोण के नीचे एक ‘अर्धचंद्र’है और एड़ी पर एक ‘मीन’ है.

 

१. शंख – शंख विजय का प्रतीक है यह बताता है कि राधा गोविंद के चरणकमलो कि शरण ग्रहण करने वाले व्यक्ति सदैव दुख से बचे रहते है और अभय दान प्राप्त करते है

२. संकेंद्री वृत्त – यह दर्शाता है श्री कृष्ण के चरण सर्वत्र विघमान है श्री कृष्ण हर वस्तु के भीतर है.

३. धनु – यह चिन्ह सूचित करता है कि एक भक्त का मन उनके चरण रूपी लक्ष्य से टकराता है तब उसके फलस्वरूप प्रेम अति वर्धित हो जाता है.

४. गाय का  खुर  – यह इस बात का सूचक है कि जो व्यक्ति श्री कृष्ण के चरणारविंदो कि पूर्ण शरण लेता है उनके लिए भाव सागर गो खुर के चिन्ह में विघमान पानी के समान छोटा एवं नगण्य हो जाता है उसे वह सहज ही पार कर लेता है.

५. कुम्भ  – श्रीकृष्णा के चरण कमल शुद्ध सुधारस का स्वर्ण कलश धारण किये और शरणागत जीव अबाध रूप से उस सुधा रस का पान कर सके.

६. त्रिकोण – कृष्ण के चरणों कि शरण ग्रहण करने वाले भक्त त्रिकोण कि तीन भुजाओ द्वारा त्रितापों और त्रिगुण रूपी जाल से बच जाते है.

७. अर्धचंद्र – यह बताता है कि जिस प्रकार शिव जी जैसे देवताओं ने राधा गोविंद के चरणारविन्दों के तलवो से अपने शीश को शोभित किया है इसी प्रकार जो भक्त इस प्रकार राधा और कृष्ण के पदाम्बुजो द्वारा अपने शीश को सुसज्जित करते है वे शिव जी के समान महान भक्त बन जाते है

८. मीन – जिस प्रकार मछली जल के बिना नहीं राह सकती उसी प्रकार भक्तगण क्षण भर भी राधा शेम सुन्दर के चरणाम्बुजों के बिना नहीं रह सकते.

 

इस प्रकार “उन्नीस शुभ चिन्ह” है.

“जय जय श्री राधे “

          “श्री श्याम सुन्दर गोस्वामी जी ”

      सेवाधिकारी श्री राधा रानी मन्दिर बरसाना 

          श्री जी बरसाना मण्डल ट्रस्ट (रजि०)

            Website:- www.sjbmt.in

Contact Us:-08923563256,07417699169

श्री राधा रानी चरणारविन्द

श्री राधा रानी चरणारविन्द 

राधा रानी जी का दायाँचरण 

राधारानी जी के दायाँचरण “आठ मंगल चिन्हों” से अलंकृत है,

‘शंख’, ‘गिरी’, ‘रथ’, ‘मीन’, ‘शक्ति-अस्त्र’, ‘गदा’, ‘यज्ञकुण्ड’, ‘रत्न-कुंडल’.

पादांगुष्ठ के मूल पर एक ‘शंख’ है. दूसरी एवं माध्यम अँगुली के नीचे एक ‘गिरी’ है. गिरी के नीचे मध्य में एडी की ओर एक ‘रथ’है और एड़ी पर एक ‘मीन’ है,

रथ के समीप पावं के भीतरी किनारे पर एक ‘शक्ति अस्त्र’ है. रथ के दूसरी ओर पावं के बाहरी किनारे के निकट एक ‘गदा’ है. कनिष्ठा के नीचे एक ‘यज्ञकुण्ड’ है.और उसके नीचे एक ‘रत्न कुंडल’ है.

१. शंख – शंख विजय का प्रतीक है यह बताता है कि राधा-गोविंद के चरणकमलो की शरण ग्रहण करने वाले व्यक्ति सदैव दुख से बचे रहते है और अभय दान प्राप्त करते है.

२. गिरी  – यह बताता है यधपि गिरी-गोवर्धन की गिरिवर के रूप में व्रज में सर्वत्र पूजा होती है, तथापि गिरी-गोवर्धन विशेषकर राधिका की  चरण सेवा करते है.

३. रथ – यह चिन्ह बताता है, कि मन रूपी रथ को राधा के चरणकमलों में लगाकर सुगमता पूर्वक नियंत्रित किया जा  सकता है.

४. मीन – जिस प्रकार मछली जल के बिना नहीं रह सकती, उसी प्रकार भक्तगण क्षण भर भी राधा-श्यामसुन्दर के चरणाम्बुजों के बिना नहीं रह सकते.

५. शक्ति  – यह एक भाले का घोतक है, जो व्यक्ति राधा जी कि शरण ग्रहण करता है उनके लिए श्री राधा के चरण प्रकट होकर सांसारिक जीवन के सभी अप्रिय बंधनों को काट डालते है.

६.गदा – यह चिन्ह सूचित करता है कि राधा के चरण पापमय काम रूपी हाथी को प्रताड़ित कर सकते है.

७. होम कुण्ड –  यह घोषित करता है कि राधा के चरणों का ध्यान करने वाले व्यक्ति के पाप इस प्रकार भस्म हो जाते है मानो वे यज्ञ वेदी में विघमान हो.

८. कुंडल – श्री कृष्ण के कर्ण सदा राधा जी के मंजुल नूपुरो कि ध्वनि और उनकी  वीणा के मादक रागों का श्रवण करते है.

राधा रानी जी का बायाँ चरण

राधा रानी जी का बायाँ चरण “ग्यारह शुभ चिन्हों” से सज्जित है.

 जौ, चक्र, छत्र, कंकण, ऊर्ध्वरेखा, कमल, ध्वज,  सुमन, पुष्पलता, अर्धचंद्र, अंकुश.

पादांगुष्ठ के मूल पर “एक जौ” का दाना है उसके नीचे एक “चक्र” है, उसके नीचे एक “छत्र” है, और उसके नीचे एक “कंकण” है.

एक “ऊर्ध्वरेखा” पावं के मध्य में प्रारंभ होती है, मध्यमा के नीचे एक “कमल” है, और उसके नीचे एक “ध्वज”है.

ध्वज के नीचे एक “सुमन” है, और उसके नीचे “पुष्पलता”है, एड़ी पर एक चारु “अर्धचंद्र” है. कनिष्ठा के नीचे एक “अंकुश” अंकित है.

1. जौ का दाना – जौ का दाना व्यक्त करता है कि भक्तजन राधा कृष्ण के पदारविन्दो कि सेवा कर समस्त भोगो ऐश्वर्य प्राप्त करते है.

एक बार उनका पदाश्रय प्राप्त कर लेने पर भक्त की  अनेकानेक जन्म मरण कि यात्रा घट कर, जौ के दानो के समान बहुत छोटी हो जाती है.

2. चक्र – यह चिन्ह सूचित करता है कि राधा कृष्ण के चरण कमलों का ध्यान काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, और मात्सर्य, रूपी छै शत्रुओ का  नाश करता है.

ये तेजस तत्व का प्रतीक है जिसके द्वारा राधा गोविंद भक्तो के अंतःकरण से पाप तिमिर को छिन्न-भिन्न कर देते है.

3. छत्र – छत्र यह सिद्ध करता है कि उनके चरणों कि शरण ग्रहण करने वाले भक्त भौतिक कष्टों कि अविराम वर्षा से बचे रहते है.

4. कंकण  – राधा के चरण सर्वदा कृष्ण के हाथो में रहते है (जब वे मान करती है तो कृष्ण चरण दबाते है) जिस प्रकार कंकण सदा हाथ में रहता है.

5. उर्ध्व रेखा – जो भक्त इस प्रकार राधा श्याम के पद कमलों से लिपटे रहते है, मानो वे उनकी जीवन रेखा हो वे दिव्य धाम को जाएँगे.

6. कमल – सरस सरसिज राधा गोविंद के चरणविंदो का ध्यान करने वाले मधुकर सद्रश भक्तो के मन में प्रेम हेतु लोभ उत्पन्न करता है.

7. ध्वज – ध्वज उन भक्तो कि भय से बचाता और सुरक्षा करता है जो उनके चरण सरसिज का ध्यान करते है विजय का प्रतीक है.

8. पुष्प – पुष्प दिखाता है कि राधा जी के चरणों कि दिव्य कीर्ति सर्वत्र एक सुमन सौरभ कि भांति फैलती है

9. पुष्पलता  – यह चिन्ह बताता है कि किस प्रकार भक्तो की इच्छा लता तब तक बढती रहती है, जब तक वह श्रीमती राधा के चरणों की शरण ग्रहण नहीं कर लेती.

10. अर्धचंद्र – यह बताता है कि जिस प्रकार शिव जी जैसे देवताओं ने राधा गोविंद के चरणारविन्दों के तलवो से अपने शीश को शोभित किया है,

इसी प्रकार जो भक्त इस प्रकार राधा और कृष्ण के पदाम्बुजो द्वारा अपने शीश को सुसज्जित करते है वे शिव जी के समान महान भक्त बन जाते है.

11. अंकुश – अंकुश इस बात का घोतक है कि राधा गोविद के चरणों का ध्यान भक्तो के मन रूपी गज को वश में करता है उसे सही मार्ग दिखाता है.

इस प्रकार राधारानी के चरण सरसिज के “उन्नीस मंगल चिन्हों” का नित्य स्मरण किया जाता है.

“जय जय श्री राधे “

गौलोक धाम – परिचय

जब ये पृथ्वी दानवों असुरों के भार से पीड़ित हो गई तब गौ का रूप रखकर देवताओ के पास गई ,तब ब्रह्मा जी देवताओ को और शिव जी को लेकर,विष्णु जी के पास गए .

तब भगवान विष्णु जी ने कहा – भगवान श्रीकृष्ण ही अगणित ब्रह्मांडो के स्वामी है,उन्की कृपा के बिना यह कार्य कदापि सिद्ध नहीं होगा,आप लोग उनके धाम ही शीघ्र जाओ

तब ब्रह्मा जी ने कहा – प्रभु ! आपके अतिरिक्त कोई दूसरा भी परिपूर्णतम तत्व है यह हम नहीं जानते यदि दूसरा कोई भी परमेश्वर है तो उनके लोक का मुझे दर्शन कराइए.

तब भगवान विष्णु जी ने  सभी देवताओ को ब्रह्मांड शिखर पर विराजमान गौलोक धाम का मार्ग दिखलाया.

वामन जी के बाये पैर के अंगूठे से ब्रह्मांड के शिरोभाग का भेदन हो जाने पर जो छिद्र हुआ वह “ब्रहद्रव्”(नित्य अक्षय नीर ) से परिपूर्ण था.

सब देवता उसी मार्ग से वहाँ के लिए नियत जलयान द्वारा बाहर निकले वहाँ ब्रह्मांड के ऊपर पहुँचकर उन सबने नीचे को ओर उस ब्रह्मांड को देखा इसके अतिरिक्त अन्य भी बहुत से ब्रह्मांड उसी जल में इन्द्रायण फल के सदृश इधर उधर लहरों में लुढक रहे थे, यह देखकर सब देवताओं को विस्मय हुआ वे चकित हो गए.

वहाँ से करोडो योजन ऊपर आठ नगर मिले जिनको चारो ओर दिव्य चाहरदीवारी शोभा बढ़ा  रही थी वही ऊपर  देवताओ ने विरजा नदी का सुन्दर तट देखा देवता उस उत्तम नगर में पहुँचे,

जो अनन्तकोटि सूर्यो की ज्योति का महान पुंज जान पडता था, उसे देखकर देवताओ की आँखे चौधिया गई ओर वे उस तेज से पराभूत होकर जहाँ के तहां खड़े रह गए.

तब ब्रह्मा उस का ध्यान करने लगे. उसी ज्योति के भीतर उन्होंने एक परम शांतिमय साकार धाम देखा उसमे  परम अद्भुत कमलनाल के समान धवल-वर्ण हजारों मुख वाले शेष नाग का दर्शन करके सभी देवताओ ने उन्हें प्रणाम किया उन शेषनाग की गोद में महान “आलोकमय लोकवंदित गोलोकधाम” का दर्शन हुआ

जहाँ धमाभिमानी देवताओ के ईश्वर और गणनाशीलो में प्रधान काल का भी कोई वश नहीं चलता.

वहाँ माया अपना प्रभाव नहीं डाल सकती, मन, चित्त, बुद्धि, अहंकार, सोलह विकार और महतत्व भी वहाँ प्रवेश नहीं कर सकते. फिर तीनो गुणों के विषय में तो कहना ही क्या.

वहाँ कामदेव के समान मनोहर रूप लावण्य शालिनी श्यामसुंदर विग्रहा श्रीकृष्ण पार्षदा द्वारपाल का कार्य करती थी. देवताओ के द्वार के भीतर जाने पर उन्होंने मना किया.

तब देवता बोले – हम सभी ब्रह्मा, विष्णु, शंकर, नाम के लोकपाल और इंद्र आदि देवता है. भगवान श्रीकृष्ण का दर्शन करने आये है.

देवताओ की बात सुनकर उन सखियों ने जो द्वारापालिकाएँ थी अन्तः पुर जाकर सारी बात कह सुनाई तब एक सखी जो “शतचन्द्रनना” नाम से विख्यात थी.

जिसके वस्त्र पीले थे, और जो हाथ में बेत की छड़ी लिए थी,उसने आने का प्रयोजन पूछा शतचन्द्रंनना  ने कहा – आप सब किस ब्रह्मांड के निवासी है बताईये ?

देवताओ ने कहा – बड़े आश्चर्य की बात है क्या अन्य भी ब्रह्मांड है हमने तो कभी नहीं देखा हम तो यही जानते है की एक ही ब्रह्मांड है ,दूसरा है ही नहीं.

शतचन्द्रंनना बोली – यहाँ तो “विरजा नदी” में करोडो ब्रह्मांड इधर-उधर लुढक रहे है. उनमे भी आप जैसे पृथक-पृथक देवता वास करते है.

क्या आप लोग अपना नाम और गाँव नहीं जानते. जान पडता है कभी घर से बाहर नहीं निकले. जैसे गुलर के फलो में रहने वाले कीड़े जिस फल में रहते है,

उसके सिवा दूसरे को नहीं जानते,उसी प्रकार आप जैसे साधारण जन जिसमे उत्पन्न होते है एक मात्र उसी को ब्रह्मांड समझते है.

विष्णु भगवान ने कहा- जिस ब्रह्मांड में विराट रूपधारी वामन के  नख से ब्रहमांड में विवर बन गया था हम वही के निवासी है

फिर शतचन्द्रं नना अंदर गई और शीघ्र ही वापस आकर भीतर आने की आज्ञा देकर चली गई.

“जय जय श्री राधे “

श्री कृष्ण का आनंद – श्री राधा

1. – आनंद कन्द श्री कृष्ण से त्रिभुवन को आनंद प्राप्त होता है परन्तु श्री कृष्ण को आन्दित करती है श्री राधा जी.

2. – श्रीकृष्ण का माधुर्य, उनका रूप कोटि-कोटि कामदेव के सौंदर्य को लजाने वाला है, पर श्रीकृष्ण के नेत्र श्रीराधा के अप्रतिम रूप सौंदर्य का दर्शन करके ही शीतल होते है.

3.- श्रीकृष्ण की कलित-ललित वंशी-ध्वनि चतुर्दश भुवनो को आकर्षित करती है, पर श्रीकृष्ण के कान श्रीराधा के वाक्य सुधा पान से ही तृप्त होते है.

4.- श्रीकृष्ण के दिव्य अंग गंध से जगत सुगन्धित होता है, जगत के समस्त मनमोहक सुगंध श्रीकृष्ण के अंग-गंध से ही सुगन्धित है, परन्तु श्रीकृष्ण के प्राण नित्य श्रीराधा के अंग-सुगंध के लोभी बने रहते है.

5.- साक्षात् रस रूप रसराज शिरोमणि श्रीकृष्ण के रस से जगत सुरसित है, पर श्रीकृष्ण राधारानी के अधर रस के वशीभूत है.

6.- श्री कृष्ण का स्पर्श कोटि-कोटि शशांक (चंद्रमा)सुशीलता ,है किन्तु श्याम सुशीलता प्राप्त करते है श्रीराधा के अंग स्पर्श से इतना सब होने पर भी श्रीराधा के प्रति श्रीकृष्ण की प्रीति अत्यंत प्रबल होने पर भी,

श्रीकृष्ण के प्रति राधा की उज्जवल निर्मल प्रीति कही अधिक है.

वे अपने विचित्र विभिन्न भाव तरंग रूप अनंत सुख समुद्र में श्रीकृष्ण को नित्य निमग्न रखने वाली महाशक्ति है.

ऐसी श्री राधा की महिमा श्रीकृष्ण के अतिरिक्त और कौन कह सकता है.

पर वे भी नहीं कह सकते क्योकि राधा गुण स्मृति मात्र से ही वे इतने विहल हो जाते है, कि उनका कंठ रुध जाता है और शब्दोच्चारण ही संभव नहीं होता.

फिर हम तो कह ही कैसे सकते है ये उनकी लीला उनके गुण के सागर में से मानो एक बूंद ही है.

इतना होने पर भी श्री राधा रानी को देखो न वे विलासमयी रमणी है, न वे कवि ह्रदय की कल्पना है, न उनमे किसी प्रकार का गुण रूप सौंदर्य अभिमान है.

धन्य है वे राधा रानी और उनकी कायव्युह रूपा त्याग प्रेम की जीती जागती प्रतिमा श्री गोपीजन और धन्य है वह दिव्य व्रज जहाँ ऐसी दिव्य लीलाएँ होती है.

 

त्याग की ऐसी पराकाष्ठा ही विशुद्ध प्रेम है.

एक बार किसी ने श्रीराधा के पास आकर श्रीकृष्ण में स्वरुप सौंदर्य का और सद्गुणों का अभाव बतलाया और कहा कि – वे तुमसे प्रेम नहीं करते.

विशुद्धप्रेम रूप, गुण और बदले में सुख प्राप्त करने कि अपेक्षा नहीं करता,”गुणरहितं कामना रहितम“...और वह बिना किसी हेतु के ही प्रतिक्षण सहज ही बढता रहता है –“प्रतिक्षण वर्धमानम्”..

श्री राधा जी सर्वश्रेष्ठ विशुद्ध प्रेम की सम्पूर्ण प्रतिमा है अतः वे बोली –

“असुंदर: सुन्दरशेखरो वा

गुणैविहीनो गुणीनां वरो वा

द्वेषी मयि स्यात करुणाम्बुधिर्वा 

श्याम:स एवाघ गतिर्ममायम”


अर्थात – हमारे प्रियतम श्री कृष्ण असुंदर हो या सुन्दर शिरोमणि हो, गुणहीन हो या गुणियों में श्रेष्ठ हो, मेरे प्रति द्वेष रखते हो या करुणावरुणालय रूप से कृपा करते हो, वे श्यामसुंदर ही मेरी एकमात्र गति है.


महाप्रभु ने भी कहा है –

वे चाहे मुझे ह्रदय से लगा ले या चरणों में लिपटी हुई मुझको पैरों तले रौद डाले अथवा दर्शन से वंचित रख मर्मार्हत कर दे वे जैसे चाहे वैसे करे मेरे प्राणनाथ तो वे ही है दूसरा कोई नहीं

जैसे चातक होता है वह केवल एक मेघ से ही स्वाति की बूंद चाहता है, न दूसरे की ओर ताकता है, न दूसरा जल ही स्पर्श करता है.

चातक कहता क्या है – चाहे तुम ठीक समय पर बरसो, चाहे जीवनभर कभी न बरसो, परन्तु इस चित्त चातक को तो केवल तुम्हारी ही आशा है.

अपने प्यारे मेघ का नाम् रटते-रटते चातक की जीभ लट गई और प्यास के मारे अंग सुख गए, तो भी चातक के प्रेम का रंग तो नित्य नवीन और सन्दुर ही होता जाता है,

समय पर मेघ बरसता तो है नहीं, उलटे कठोर पत्थर, ओले बरसाकर, उसने चातक की पंखो के टुकड़े-टुकड़े कर दिए, इतने पर भी उस प्रेम टेकी चतुर चातक के प्रेम प्रण में कभी चूक नहीं पड़ती.

मेघ बिजली गिराकर,ओले बरसाकर, कड़क-कड़ककर वर्षा की झड़ी लगाकर,और तूफ़ान के झकोरे देकर, चातक पर चाहे जितना बड़ा भारी रोष प्रकट करे, पर चातक को प्रियतम का दोष देखकर क्रोध नहीं आता, उसे दोष दीखता ही नहीं है.

गर्मियों के दिन थे, चातक शरीर से थका था, रास्ते में जा रहा था, शरीर जल रहा था,

इतने में कुछ वृक्ष दिखायी दिए, दूसरे पक्षियों ने कहा इन पर जरा विश्राम कर लो.परन्तु अनन्य प्रेमी चातक को यह बात अच्छी नहीं लगी.क्योकि वे वृक्ष दूसरे जल से सीचे हुए थे.

एक चातक उड़ा जा रहा था किसी बहेलिये ने उसे बाण मारा, वह नीचे गंगाजी में गिर पड़ा,

परन्तु गिरते ही उस अनन्य प्रेम चातक ने चोच को उलटकर ऊपर की ओर कर लिया,चातक के प्रेम रूपी वस्त्र पर मरते दमतक भी खोच नहीं लगी (वह जरा भी कही से नहीं फटा)

प्रेम वास्तव में देना ही जानता है लेना जानता ही नहीं है उसमें लेन-देन का सौदा नहीं है, प्रेमास्पद के दोष प्रेमी को दीखते ही नहीं, उसे तो केवल गुण ही दीखते है.

और निरंतर देते रहने पर भी, देने का भान न हो, अपने को केवल लेने वाला ही माना जाए,केवल माना ही न जाए,ऐसा अनुभव भी हो,त्याग की ऐसी पराकाष्ठा जहाँ है वही विशुद्ध प्रेम है.

राधारानी ने बताया कृष्ण प्राप्ति का गूढ़ रहस्य

एक दिन श्रीराधा जी एकांत में किसी माहं भाव में निमग्न बैठी थी एक श्री कृष्ण प्रेमाभिलाषिणी सखी ने आकर बड़ी ही नम्रता से उनसे प्रियतम श्रीकृष्ण या उनका विशुद्ध अनन्य प्रेम प्राप्त करने का सर्वश्रेष्ठ साधन पूँछा –


सखी बोली – 
हे राधा प्यारी!  कृष्ण का विशुद्ध अनन्य प्रेम प्राप्त करने का सर्व श्रेष्ठ साधन क्या है ?

बस श्रीकृष्ण प्रेम के साधन का नाम सुनते ही श्री राधिकाजी के नेत्रो से आंसुओ की धार बह चली, और वे गदगद वाणी से रोती हुई बोली –

“अरी सखी ! मेरे तन, मन, प्रान –

धन, जन, कुल, ग्रह – सब ही वे है सील, मान, अभिमान|

आँसू सलिल छांडी नहिं कछु धन है राधा के पास|

जाके बिनिमय मिलै प्रेमधन नीलकान्तमनि खास |

जानी लेउ सजनी ! निसचै यह परम सार कौ सार|

स्याम प्रेम कौ मोल अमोलक सुचि अँसुवन की धार|


वे बोली –
अरी सखी ! मै क्या साधन बताऊँ मेरे पास तो कुछ और है ही नहीं मेरे तन, मन,प्राण, धन, जन, कुल, घर, शील, मान, अभिमान- सभी कुछ एक मात्र वे श्यामसुन्दर ही है.

इस राधा के पास अश्रुजल को छोड़कर और कोई धन है ही नहीं जिनके बदले उन प्रेमधन स्वयं नीलकान्तमणि को प्राप्त किया जाए.

सजनी ! तुम यह निश्चित परम सार का सार समझो -अमूल्य श्याम प्रेम का मूल्य केवल “पवित्र आँसुओ की धारा” ही है.सब कुछ उन्ही को समर्पण कर, सबकुछ उन्ही को समझकर, उन्ही के प्रेम से, उन्ही के लिए, जो निरंतर प्रेमाश्रुओं की धारा बहती है, वह पवित्र अश्रुजल ही उनके प्रेम को प्राप्त करने का एकमात्र उपाय है बस यही उनके ‘साधन का स्वरुप’ है.

महाभाव स्वरूप श्री राधारानी जी

श्रीराधा कभी सौंदर्य अभिमान की लीला करती है वे अत्यंत मानिनी बनकर श्री कृष्ण के द्वारा अत्यंत विनय पूर्ण मान भंग लीला कराती है,

तो कभी अपना नितांत दैन्य प्रकट करती हुई कहती है – श्यामसुंदर मुझ सद्गुणहीना कुरूपा पर क्यों अपने सुख का बलिदान कर रहे है ?

अपनी एक् सखी से कहती है – री सखी !मै अवगुणों की दोषों की खान हूँ ,शरीर से गोरी हूँ परन्तु मन से बड़ी काली हूँ मेरे मन में रच भर भी त्याग नहीं है.

अपार अभिमान भरा है,प्रेम का तो लेश भी नहीं है. कभी उनके मथुरा पधार जाने पर उन्हें किसी उनके योग्य भाग्यशालिनी की प्राप्ति से सुख होने की कल्पना करके प्रसन्न होती है.

राधा जी कभी वियोग का अत्यंत दारुण अनुभव करके दहाड़ मारकर रोती है कभी मिलन सुख का महान आनंद प्राप्त करती है

और कभी प्रत्यक्ष मिलन में ही वियोग का अनुभव करके – हा श्यामसुंदर!, हा प्राणप्रियतम !पुकारने लगती है, और कभी कभी अपने को ही श्याम रूप मानकर – हा राधे! हा राधे! की करुणा ध्वनि कर उठती है.

एक बार निकुंज से लौटने पर उन्हें ऐसा भान हुआ कि श्यासुन्दर कही चले गए है.

इसलिए वे वही वन में वनधातु को जल में घोलकर दाड़िम की छोटी-सी पतली डाली को कलम बनाकर प्रियतम को पत्र लिखने बैठी.

इतने में ही अपने आपको भूल गई और – हा राधे ! तुम कहाँ चली गई ? पुकार उठि,  हे प्रानप्रिय!  शीघ्र आओ, फिर राधा को पत्र लिखा.

तभी वहाँ श्यामसुंदर आ गए और मुझे देखते ही ठहाका मारकर हँसने लगे,तब मेरी चेतना जागी, पीछे अपनी ही वाणी से उन्होंने प्रिय सखी ललिता को अपनी यह भूल बतलाई.

सखी ! यह कैसी भूल भई |

लिखन लगी पाती पिय कौ ,लै दाड़िम कलम नई

भूली निज सरूप हौ तुरतहिं बनि धनश्याम गई

बिरह बिकल बोली पुकार – ‘हा राधे’ कितै गई

पाती लिखी – प्रिय ! ह्रदये स्वरि सुमधुर सु रसमयी

प्रंनाधिके ! बेगि आवौ तुम नेह कलह बिजई

ठाढे भये आये मनमोहन, मो तन द्रष्टि दई

हँसे ठठाय, चेतना जागी, हौ सरमाय गई

स्वसुख का सहज विसर्जन राधा का स्वभाव है.

दिव्य प्रेममूर्ति श्रीराधा श्रीश्यामसुंदर के सुख को ही अपना स्वभाव बनाये रहती है इससे वे मथुरा तो जाती नहीं,

वरन श्यामसुन्दर के समीप रहने से भी उन्हें कोई कष्ट न हो जाए, इस कल्पना से काँप उठती है और उनसे दूर बहुत दूर भाग जाना चाहती है. एक संत ने श्री राधा के इस भाव पर कहा है –

वह देश दूर है आज जहाँ मेरे प्रनाधिक है प्रियतम

उससे विपरीत दिशा में ही मै भाग चलूँ अब तो प्रियतम

है तापमान इन श्वासों का प्रतिपल बढता जाता प्रियतम

इनकी गर्मी न लगे जिससे ,उस नीलकलेवर को प्रियतम

मेरे प्राणधिक श्यामसुंदर आज जहाँ है वह देश यहाँ से दूर है परन्तु अब तो मै उसकी विपरीत दिशा में और भी दूर भाग जाना चाहती हूँ

क्योकि मेरे इन श्वासों का तापमान प्रतिक्षण बढता ही जा रहा है कही इनकी गर्मी वहाँ तक पहुँचकर उस नील वदन को न लग जाए

मै चलती थी तब गुनगुनाता हुआ (श्यामसुंदर के गुण गाता हुआ) भ्रमर समुदाय मेरे पीछे-पीछे चलता था,क्योकि वे साथ थे यह उनकी अंग-सुगंध का प्रभाव था.

अब वे चले गए, इससे अब यह सडी-गली (दुर्गन्ध भरी) देह रह गई है. अतएव यहाँ की हवा अब निश्चित ही दुर्गन्ध और अपवित्रता से भर जायेगी, मै और दूर निकल चलूँ, जिससे यह अपवित्र दुर्गन्ध उनके पास तक न पहुँचे.

यह त्रिकाल सत्य है कि मै कभी नहीं मरूंगी पर यह मेरा शरीर तो उन काली लपटों से सदा जलता ही रहेगा इससे आकाश में धुएँ के गोट के गोट फ़ैल जायेगे,

अतः मै इतनी दूर चली जाऊं कि जिससे धुआँ लगकर मेरे प्रियतम के वे कमलदल सदृश नेत्र कही पंकिल न बन जाए.

इस प्रकार “प्रियतम के सुख की स्मृति और स्वसुख का सहज विसर्जन राधा का स्वभाव है”.इसी का सहज स्वभाव अनुकरण श्री व्रज गोपिया करती है.

इसलिए श्रीकृष्ण के परम प्रेम कि पात्री बनकर धन्य होती है. इस परम भगवत प्रेम की साधना का आरंभ होता है –

भगवान के प्रति “अनन्य राग की पवित्र भावना” से, भगवान में राग आरंभ होते ही सहज स्वाभाविक भोग वैराग्य प्रप्रंच की विस्मृति,मन इन्द्रियों की भोगो से उपरति,स्वसुख वासना का त्याग और अहं की विस्मृति होने लगती है.

प्रापंचिक भोगासक्ति तो सहज वैसे ही नष्ट हो जाती है जैसे सूर्योदय होते ही अंधकारमयी रात्रि, सूर्य को प्रयास करके रात्रि का नाश नहीं करना पडता,

सूर्योदय के प्रकाश का आभास होते ही रात्रि का अन्धकार मरने लगता है, इसी प्रकार ह्रदय में इस पवित्र प्रेम का बीज वपन होते ही भोग वासना नष्ट होने लगती है.

Shree Ji Barsana Mandal Trust (SJBMT)

counter