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श्रीराधे 

“श्रील नारायण भट्ट ज़ू जयति”

“श्री नारायण दास गोस्वामी जयति”

??आज की ब्रज रस धारा  

दिनांक 31/08/2018

कैसे रिझाती है मीरा अपने गिरिधर को

मीरा अभी भी तानपुरा ले गिरधर के सम्मुख श्याम कुन्ज में ही बैठी थी, वह दीर्घ कज़रारे नेत्र, वह मुस्कान, उनके विग्रह की मदमाती सुगन्ध और वह रसमय वाणी सब मीरा के स्मृति पटल पर बार-बार उजागर हो रही थी.

                                           

मेरे नयना निपट बंक छवि अटके ।
                                           

 देखत रूप मदनमोहन को  पियत पीयूख न भटके ।
                             

बारिज भवाँ अलक टेढ़ी मनो अति सुगन्ध रस अटके॥
                                 

टेढ़ी कटि टेढ़ी कर मुरली टेढ़ी पाग लर लटके ।
                               

  मीरा प्रभु के रूप लुभानी गिरधर नागर नटके ॥

मीरा को प्रसन्न देखकर मिथुला समीप आई और घुटनों के बल बैठकर धीमे स्वर में बोली -“जीमण पधराऊँ बाईसा (भोजन लाऊँ )? ”

” अहा मिथुला ! अभी थोड़ा ठहर जा ” मीरा के ह्रदय पर वही छवि बार-बार उबर आती थी. फिर उसकी उंगलियों के स्पर्श से तानपुरे के तार झंकृत हो उठे………

                                   

   नन्दनन्दन दिठ (दिख) पड़िया माई,
                                       

साँ…….वरो…….. साँ……वरो ।
                                       

   नन्दनन्दन दिठ पड़िया माई ,
                                         

    छाड़या सब लोक लाज ,
                                 

      साँ……वरो ……… साँ……वरो

                                     

मोरचन्द्र का किरीट, मुकुट जब सुहाई ।
                                     

केसररो तिलक भाल, लोचन सुखदाई ।
                                       

   साँ……वरो …..साँ….वरो ।

                                   

कुण्डल झलकाँ कपोल, अलका लहराई,
                                 

 मीरा तज सरवर जोऊ,मकर मिलन धाई ।
                                   

  साँ……वरो ……. साँ……वरो ।

                                   

नटवर प्रभु वेश धरिया, रूप जग लुभाई,
                                 

   गिरधर प्रभु अंग अंग ,मीरा बलि जाई ।
                                       

साँ……वरो ……. साँ……वरो ।

” अरी मिथुला ,थोड़ा ठहर जा, अभी प्रभु को रिझा लेने दे, कौन जाने ये परम स्वतंत्र हैं …..कब भाग निकले ? आज प्रभु आयें हैं तो यहीं क्यों न रख लें ?”

मीरा जैसे धन्यातिधन्य हो उठी, लीला चिन्तन के द्वार खुल गये और अनुभव की अभिव्यक्ति के भी, दिन पर दिन उसके भजन पूजन का चाव बढ़ने लगा. वह नाना भाँति से गिरधर का श्रृगांर करती, कभी फूलों से, और कभी मोतियों से, सुंदर पोशाकें बना धारण कराती.

भाँति-भाँति के भोग बना कर ठाकुर को अर्पण करती और पद गा कर नृत्य कर उन्हें रिझाती,  शीत काल में उठ-उठ कर उन्हें ओढ़ाती और गर्मियों में रात को जागकर पंखा झलती, तीसरे-चौथे दिन ही कोई न कोई उत्सव होता.
          “श्री श्याम सुन्दर गोस्वामी जी ”

      सेवाधिकारी श्री राधा रानी मन्दिर बरसाना 

          श्री जी बरसाना मण्डल ट्रस्ट (रजि०)

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श्री राधे 

“श्रील नारायण भट्ट ज़ू जयति”

“श्री नारायण दास गोस्वामी जयति”

??आज की ब्रज रस धारा  

दिनांक 30/08/2018

जब नन्ही मीरा ने गिरिधर के लिए प्रथम बार पद गाया

महल के परकोटे में लगी फुलवारी के मध्य गिरधर गोपाल के लिए मन्दिर बन कर दो महीनों में तैयार हो गया.

धूमधाम से गिरधर गोपाल का गृह प्रवेश और विधिपूर्वक प्राण-प्रतिष्ठा हुईं .मन्दिर का नाम रखा गया “श्याम कुन्ज”. अब मीरा का अधिकतर समय श्याम कुन्ज में ही बीतने लगा.

ऐसे ही धीरे-धीरे समय बीतने लगा,मीरा पूजा करने के पश्चात् भी श्याम कुन्ज में ही बैठे बैठे………. सुनी और पढ़ी हुई लीलाओं के चिन्तन में प्रायः खो जाती.

वर्षा के दिन थे,चारों ओर हरितिमा छायी हुई थीं, ऊपर गगन में मेघ उमड़ घुमड़ कर आ रहे थे. आँखें मूँदे हुये मीरा गिरधर के सम्मुख बैठी है.

बंद नयनों के समक्ष उमड़ती हुई यमुना के तट पर मीरा हाथ से भरी हुई मटकी को थामें बैठी है. यमुना के जल में श्याम सुंदर की परछाई देख वह पलक झपकाना भूल गई ।यह रूप -ये कारे कजरारे दीर्घ नेत्र

मटकी हाथ से छूट गई और उसके साथ न जाने वह भी कैसे जल में जा गिरी.

उसे लगा कोई जल में कूद गया और फिर दो सशक्त भुजाओं ने उसे ऊपर उठा लिया और घाट की सीढ़ियाँ चढ़ते हुए मुस्कुरा दिया.

वह यह निर्णय नहीं कर पाई कि कौन अधिक मारक है – दृष्टि याँ मुस्कान ?

निर्णय कैसे हो भी कैसे ? बुद्धि तो लोप हो गई, लज्जा ने देह को जड़ कर दिया और मन ? मन तो बैरी बन उनकी आँखों में जा समाया था.

उसे शिला के सहारे घाट पर बिठाकर वह मुस्कुराते हुए जल से उसका घड़ा निकाल लाये.

हंसते हुये अपनत्व से कितने ही प्रश्न पूछ डाले उन्होंने ब्रज भाषा में- अमृत सी वाणी वातावरण में रस सी घोलती प्रतीत हुईं –

“थोड़ा विश्राम कर ले, फिर मैं तेरो घड़ो उठवाय दूँगो, कहा नाम है री तेरो ? बोलेगी नाय ? मो पै रूठी है क्या ? भूख लगी है का ? तेरी मैया ने कछु खवायो नाय ? ले , मो पै फल है, खावेगी ?”

उन्होंने फट से बड़ा सा अमरूद और थोड़े जामुन निकाल कर मेरे हाथ पर धर दिये – “ले खा .”

मैं क्या कहती , आँखों से दो आँसू ढुलक पड़े. लज्जा ने जैसे वाणी को बाँध लिया था.

” कहा नाम है तेरो ?”

“मी…………रा” बहुत खींच कर बस इतना ही कह पाई.वे खिलखिला कर हँस पड़े ” कितना मधुर स्वर है तेरो री.”

“श्याम सुंदर ! कहाँ गये प्राणाधार ! ” वह एकाएक चीख उठी , समीप ही फुलवारी से चम्पा और चमेली दौड़ी आई और देखा मीरा अतिशय व्याकुल थीं और आँखों से आँसू झर रहे थे, दोनों ने मिल कर शैय्या बिछाई और उस पर मीरा को यत्न से सुला दिया.

सांयकाल तक जाकर मीरा की स्थिति कुछ सुधरी तो वह तानपुरा ले गिरधर के सामने जा बैठी, फिर ह्रदय के उदगार प्रथम बार पद के रूप में प्रसरित हो उठे …………

                                              मेहा बरसबों करे रे ,
                                           आज तो रमैया म्हाँरे घरे रे 
                                         नान्हीं नान्हीं बूंद मेघघन बरसे,
                                              सूखा सरवर भरे रे ॥

                                           घणा दिनाँ सूँ प्रीतम पायो,
                                             बिछुड़न को मोहि डर रे 
                                          मीरा कहे अति नेह जुड़ाओ,
                                             मैं लियो पुरबलो वर रे ॥

पद पूरा हुआ तो मीरा का ह्रदय भी जैसे कुछ हल्का हो गया.  पथ पाकर जैसे जल दौड़ पड़ता है वैसे ही मीरा की भाव सरिता भी शब्दों में ढलकर पदों के रूप में उद्धाम बह निकली.

          “श्री श्याम सुन्दर गोस्वामी जी ”

      सेवाधिकारी श्री राधा रानी मन्दिर बरसाना 

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श्री राधे 

“श्रील नारायण भट्ट ज़ू जयति”

“श्री नारायण दास गोस्वामी जयति”

??आज की ब्रज रस धारा  

दिनांक 29/08/2018

मीरा ने अपने ठाकुर का नाम क्या रखा और क्योँ

कृपण के धन की भाँति मीरा ठाकुर जी को अपने से चिपकाये माँ के कक्ष में आ गई.वहाँ एक झरोखे में लकड़ी की चौकी रख उस पर अपनी नई ओढ़नी बिछा ठाकुर जी को विराजमान कर दिया.

थोड़ी दूर बैठ उन्हें निहारने लगी.रह-रह कर आँखों से आँसू झरने लगे.

आज की इस उपलब्धि के आगे सारा जगत तुच्छ हो गया. जो अब तक अपने थे, वे सब पराये हो गये, और आज आया हुआ यह मुस्कुराता हुआ चेहरा ऐसा अपना हुआ जैसा अब तक कोई न था.

सारी हंसी खुशी और खेल तमाशे सब कुछ इन पर न्यौछावर हो गया. ह्रदय में मानों उत्साह उफन पड़ा कि ऐसा क्या करूँ, जिससे यह प्रसन्न हो.

अहा, कैसे देख रहा है मेरी ओर ? अरे मुझसे भूल हो गई. तुम तो भगवान हो और मैं आपसे तू तुम कर बात कर गई.

आप कितने अच्छे हैं जो स्वयं कृपा कर उस संत से मेरे पास चले आये, मुझसे कोई भूल हो जाये तो आप रूठना नहीं , बस बता देना अच्छा बताओ उन महात्मा की याद तो नहीं आ रही? वह तो तुम्हें मुझे देते रो ही पड़े थे .

मैं तुम्हें अच्छे से रखूँगी- स्नान करवाऊँगी, सुलाऊँगी और ऐसे सजाऊँगी कि सब देखते ही रह जायेंगे,मैं बाबोसा को कह कर तुम्हारे लिए सुंदर पलंग, तकिये, गद्दी ,और बढ़िया वागे (पोशाक) भी बनवा दूँगी.

फिर कभी मैं तुम्हें फुलवारी में और कभी यहाँ के मन्दिर चारभुजानाथ के दर्शन को ले चलूँगी ।वे तो सदा ऐसे सजे रहते है जैसे अभी-अभी बींद (दूल्हा) बने हो.

मीरा ने अपने बाल सरल ह्रदय से कितनी ही बातें ठाकुर जी का दिल लगाने के लिए कर डाली, न तो उसे कुछ खाने की सुध थीं और न किसी और काम में मन लगता था.

 मीरा के ठाकुर का नाम गिरिधर 

माँ ने ठाकुर जी को देखा तो बोली – “क्या अपने ठाकुर जी को भी भूखा रखेगी? चल उठ भोग लगा और फिर तू भी प्रसाद पा

मीरा:-  अरे हाँ, यह बात तो मैं भूल ही गई, फिर उसने भोग की सब व्यवस्था की.दूदा जी का हाथ पकड़ उन्हें अपने ठाकुर जी के दर्शन के लिए लाते मीरा ने उन्हें सब बताया.

मीरा: – बाबोसा उन्होंने स्वयं मुझे ठाकुर जी दिए और कहा – कि स्वप्न में ठाकुर जी ने कहा कि अब मैं मीरा के पास ही रहूँगा.

दूदाजी ने दर्शन कर प्रणाम किया तो बोले – ” भगवान को लकड़ी की चौकी पर क्यों ? मैं आज ही चाँदी का सिंहासन मंगवा दूंगा.

मीरा:- हाँ बाबोसा और मखमल की गादी तकिये, चाँदी के बर्तन ,वागे और चन्दन का हिंडोला भी.

दूदाजी :-  अवश्य बेटा, सब सांझ तक आ जायेगा.

मीरा:-  पर बाबोसा, मैं उन महात्मा से ठाकुर जी का नाम पूछना भूल गई.

दूदाजी:- मनुष्य के तो एक नाम होता है, पर भगवान के जैसे गुण अनन्त है वैसे उनके नाम भी,तुम्हें जो नाम प्रिय लगे, चुन ले

मीरा:-  हाँ आप नाम लीजिए.

ठीक है,  कृष्ण , गोविंद , गोपाल , माधव, केशव, मनमोहन , गिरधर………….बस, बस बाबोसा, मीरा उतावली हो बोली, यह गिरधर नाम सबसे अच्छा है, इस नाम का अर्थ क्या है?

दूदाजी ने अत्यंत स्नेह से ठाकुर जी की गिरिराज धारण करने की लीला सुनाई,बस तभी से इनका नाम हुआ गिरधर..

मीरा भाव विभोर हो मूर्छित हो गई.

          “श्री श्याम सुन्दर गोस्वामी जी ”

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श्री राधे 

“श्रील नारायण भट्ट ज़ू जयति”

“श्री नारायण दास गोस्वामी जयति”

??आज की ब्रज रस धारा  

दिनांक 28/08/2018

गौरी पंडित – श्रीवृन्दावन लीला में द्वादश गोपालों में से एक हैं.

श्रील गौरीदास पण्डित जी –भगवान श्रीकृष्ण की लीला में जो श्रीसुबल सखा हैं, वे ही भगवान श्रीचैतन्य महाप्रभु की लीला में श्रील गौरीदास पण्डित बन कर आये.

आप श्रीवृन्दावन लीला में द्वादश गोपालों में से एक हैं.श्रीकंसारी मिश्र आपके पिताजी व श्रीमती कमला देवी आपकी माताजी हैं. श्रीगौरीदास पण्डित जी के शिष्य थे श्रीहृदय चैतन्य जी.

श्रीमन्महाप्रभु एक बार श्रीनिताई चाँद को साथ लेकर अम्बिका-कालना (बंगाल)जा पहुँचे जहां श्रीगौरीदास पण्डित रहते थे.श्रीगौरीदास श्रीश्रीनिताई गौर को आनन्दपूर्वक अपने घर ले गये.

श्रीमहाप्रभु ने एक चप्पू श्रीगौरीदास को दिया और बोले-”गौरीदास ! यह लो चप्पू अब तुम जीवों को संसार रूपी नदी से पार लगाते रहना.”दो-चार दिन बाद जब श्रीश्रीनिताई गौर वहाँ से चलने लगे.

तो गौरीदास जी ने कहा – प्रभो ! अब यदि आप यहाँ से गये तो मेरे प्राणों को साथ ले जाना. श्रीमहाप्रभु ने एक नीम के वृक्ष से अपनी और श्रीनित्यानन्द जी की दो मूर्तियाँ तैयार करायीं और श्रीगौरीदास जी को दे दीं.

श्रीमहाप्रभु ने कहा-‘गौरीदास ! हम इन विग्रहों के रूप में सदा तुम्हारे पास ही रहेंगे.श्रीगौरीदास के विश्वास के लिये उन श्रीविग्रहों के साथ मिलकर महाप्रभु और निताई-चाँद सिंहासन पर बैठ गये और चारों ने मिलकर भोजन किया.

श्रीगौरीदास जी अब भ्रम में पड़ गये कि कौन से दो स्वयं स्वरूप हैं और कौन से विग्रहस्वरूप.

आचमन-ताम्बूल लेकर श्रीश्रीमहाप्रभु-नित्यानन्द चलने को तैयार हुये तो चारों ही स्वरूप उठकर चल दिये. पण्डित ने दो स्वरूपों को पकड़ कर रोक लिया और दो को जाने दिया.

तब श्रीचैतन्य महाप्रभु जी ने श्रील गौरीदास पण्डित जी से कहा –कि आप इन विग्रहों की सेवा करना, इनमें और हममें कोई अन्तर नहीं है.

श्रीपण्डित उन स्वरूपों की अति प्रेम-श्रद्धा से सेवा करते रहे. वे प्रतिदिन श्रीगौर-नित्यानन्द को आनंद प्रदान करने के लिए विभिन्न प्रकार के खाद्य पदार्थ बनाकर उन्हें भोग लगाते थे.

आज भी श्री गौरीदास पंडित निवास स्थान पर मंदिर है जहां श्रीगौर-नित्यानंद के वही विग्रह स्थापित हैं.

आज भी जो लोग अम्बिका जाते हैं, उन्हें श्रीमहाप्रभुजी के हाथों से श्रील गौरीदास जी को दी गयी श्रीमद्भगवद् गीता व नाव का चप्पू के दर्शन करने का सौभाग्य मिलता है.

          “श्री श्याम सुन्दर गोस्वामी जी ”

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श्री राधे 

“श्रील नारायण भट्ट ज़ू जयति”

“श्री नारायण दास गोस्वामी जयति”

??आज की ब्रज रस धारा  

दिनांक 27/08/2018

श्रीरुप गोस्वामी जी पर राधारानी जी की कृपा

बरसाना में श्री रुप गोस्वामी चेतन्य महाप्रभु के छः शिष्यो में से एक.एक बार भ्रमण करते-करते अपने शिष्य श्री जीव गोस्वामी जी के यहाँ बरसाना आए.

जीव गोस्वामी जी ठहरे फक्कड़ साधू फक्कड़ साधू को जो मिल जाये वो ही खाले जो मिल जाये वो ही पी ले. आज उनके गुरु आए तो उनके मन भाव आया की में रोज सूखी रोटी, पानी में भिगो कर खा लेता हूं. मेरे गुरु आये हैं क्या खिलाऊँ..

एक बार अपनी कुटिया में देखा किंचित तीन दिन पुरानी रोटी बिल्कुल कठोर हो चुकी थी, मैं साधू पानी में गला गला खा लूं.

यद्यपि मेरे गुरु साधुता की परम स्थिति को प्राप्त कर चुके है फिर भी मेरे मन के आनन्द के लिए, कैसे मेरा मन संतुष्ट होगा. एक क्षण के भक्त के मन में सँकल्प आया की अगर समय होता तो किसी बृजवासी के घर चला जाता.

दूध मांग लेता, चावल मांग लाता. मेरे गुरु पधारे जो देह के सम्बंध में मेरे चाचा भी लगते हैं. लेकिन भाव साम्रज्य में प्रवेश कराने वाले मेरे गुरु भी तो हैं. उनको खीर खिला देता…

रूप गोस्वामी ने आकर कहा – जीव भूख लगी है तो जीव गोस्वामी उन सूखी रोटीयो को अपने गुरु को दे रहे है.अँधेरा हो रहा है.जीव गोस्वामी की आँखों में अश्रु आ गए.

और रुप गोस्वामी जी ने कहा – तू क्यों रो रहा है हम तो साधू हैं ना. जो मिल जाय वही खा लेते हैं. में खा लूंगा.

श्री जीव गोस्वामी जी ने कहा- नहीं बाबा मेरा मन नहीं मान रहा.आप की यदि कोई पूर्व सूचना होती तो मेरे मन में कुछ था. यह चर्चा हो ही रही थी की कोई अर्द्धरात्रि में दरवाजा खटखटाता है. ज्यो ही दरवाजा खटखटाया है. जीव गोस्वामी जी ने दरवाजा खोला.

एक किशोरी खड़ी हुई है 8 -10 वर्ष की हाथ में कटोरा है. कहा, बाबा मेरी माँ ने खीर बनाई है और कहा जाओ बाबा को दे आओ. जीव गोस्वामी ने उस खीर के कटोरे को ले जाकर रुप गोस्वामी जी के पास रख दिया.

बोले बाबा – पाओ…ज्यों ही रूप गोस्वामी जी ने उस खीर को स्पर्श किया… उनका हाथ कांपने लगा. जीव गोस्वामी को लगा बाबा का हाथ कांप रहा है.

पूछा – बाबा कोई अपराध बन गया है?

रूप गोस्वामी जी ने पूछा-  जीव! आधी रात को यह खीर कौन लाया…??

बाबा पड़ोस में एक कन्या है मैं जानता हूं उसे, वो लेके आई है.नहीं जीव इस खीर को मैने जैसे ही चख के देखा और मेरे में ऐसे रोमांच हो गया.

नहीं जीव् तू पता कर यह कन्या मुझे मेरे किशोरी जी के होने अहसास दिला रही है. नहीं बाबा,  वह कन्या पास की है, मैं जानता हूं उसको. अर्ध रात्रि में दोनों गए है उस के घर और दरवाजा खटखटाया, अंदर से उस कन्या की माँ निकल कर बाहर आई.

जीव गोस्वामी जी ने पूछा – आपको कष्ट दिया, परन्तु आपकी लड़की कहां है?

उस महिला ने कहा, – का बात है गई बाबा..

आपकी लड़की है कहाँ…?? वो तो उसके ननिहाल गई है गोवेर्धन, 15 दिन हो गए हैं.

रूप गोस्वामी जी तो मूर्छित हो गए. जीव गोस्वामी जी ने पैर पकडे और जैसे तेसे श्रीजी के मंदिर की सीढ़िया चढ़ने लगे.  जैसे एक क्षण में चढ़ जायें. लंबे-लंबे पग भरते हुए मंदिर पहुचे.

वहां श्री गोसाई जी से कहा-  बाबा! एक बात बताओ आज क्या भोग लगाया था श्रीजी श्यामा प्यारी को?

गोसांई जी जानते थे श्री जीव गोस्वामी को, कहा क्या बात है गई बाबा…कहा क्या भोग लगाया था… गोसाई जी ने कहा, आज श्रीजी को खीर का भोग लगाया था.

रूप गोस्वामी तो श्री राधे श्री राधे कहने लगे, उन्होंने गोसाई जी से कहा – बाबा एक निवेदन और है आप से, यद्दपि यह मंदिर की परंपरा के विरुद्ध है कि एक बार जब श्री जी को शयन करा दिया जाये तो उनकी लीला में जाना अपराध है.

प्रिया प्रियतम जब विराज रहे हों तो नित्य लीला है उनकी,अपराध है फिर भी आप एक बार यह बता दीजिये की जिस पात्र में भोग लगाया था वह पात्र रखो है के नहीं रखो है…गोसाई जी मंदिर के पट खोलते हैं और देखते हैं की वह पात्र नहीं है वहां पर.

गोसांई जी बाहर आते हैं और कहते हैं –
बाबा! वह पात्र नहीं है वहां पर ! न जाने का बात है गई है…रूप गोस्वामी जी ने अपना दुप्पटा हटाया और वह चाँदी का पात्र दिखाया, बाबा यह पात्र तो नहीं है?

गोसांई जी ने कहा – हां बाबा यही पात्र तो है…

रूप गोस्वामी जी ने कहा- श्री राधा रानी 300 सीढ़ी उतरकर मुझे खीर खिलाने आई, किशोरी पधारी थी, राधारानी आई थी. उस खीर को मुख पर रगड़ लिया सब साधु संतो को बांटते हुए श्री राधे श्री राधे करते हुऐ फिर कई वर्षो तक श्री रूप गोस्वामी जी बरसाना में ही रहे.

हे करुणा निधान ! इस अधम, पतित-दास को ऐसी पात्रता और ऐसी उत्कंठा अवश्य दे देना कि इन रसिकों के गहन चरित का आस्वादन कर अपने को कृतार्थ कर सकूँ। इनकी पद धूलि की एक कनिका प्राप्त कर सकूँ.

          “श्री श्याम सुन्दर गोस्वामी जी ”

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दिनांक 26/8/2018

क्या है दही-चिवडा उत्सव?

चिड़ा-दही महोत्सव, श्रील श्रीरघुनाथ दास गोस्वामी एवं श्री नित्यानंद प्रभु की एक लीला का वार्षिकोत्सव है. यह उत्सव पानिहाटी चिवड़ा उत्सव के नाम से भी विख्यात है. यह अद्भुत लीला बंगाल में कलकत्ता के निकट गंगा के तट पर स्थित पानिहाटी नामक स्थान पर हुई थी.

चिड़ा-दही महोत्सव पर यह स्मरण किया जाता है कि कैसे श्रीमन्चैतन्य महाप्रभु ने श्रीनित्यानंद प्रभु एवं श्रील रघुनाथ दास गोस्वामी के माध्यम से अपने भक्तों के संग अादान-प्रदान किया, जिसमे सभी ने हर्षोल्लास के साथ दही, चिवड़ा एवं कई अमृतमय खाद्य सामग्री का भोज अायोजित किया था.

एक बार श्रील रघुनाथ दास गोस्वामी जी को खबर मिली कि श्री नित्यानंद प्रभु उनके क्षेत्र सप्तग्राम के अंतरगत पानिहाटी आएं हैं. उनके साथ श्रीरामदास, श्रीगदाधर, श्रीपुरंदर पण्डित आदि भी पार्षद है.

श्रीमन् महाप्रभु ने उन्हें घर-घर जाकर कृष्णप्रेम बांटने का आशीर्वाद दिया है.

श्रीनित्यानंद प्रभु जिसे एक बार देख लेते हैं उनमें अश्रु , कंप ,पुलक,हुंकार आदि सात्विक गुण प्रकट होने लगते हैं. श्री रघुनाथ को लगा इस बार मुझ पर अवश्य कृपा होगी तथा वे श्री नित्यानंद प्रभु के पास पहुँच गये.

                                     रघुनाथदास जी को मिला अदभुद दंड 

श्री नित्यानंद प्रभु कीर्तन-नर्तन के पश्चात वट वृक्ष के नीचे चबूतरे पर बैठे थे. श्री रघुनाथ ने आते ही श्री नित्यानंद प्रभु को साष्टांग प्रणाम किया.

श्री नित्यानंद प्रभु ने उनके शीश पर अपने चरण कमल रखकर फिर उन्हें उठाकर ह्रदय से लगा लिया. फिर प्रेम से श्रीरघुनाथ को देखते हुए बोले – ” चोर, इतने दिनों बाद आया. तुझे दंड मिलेगा.

अरे ! भगवान तो भक्तों की सम्पत्ति होते हैं और तुम भक्तों को पूछे बगैर सीधा महाप्रभु जी के पास चले गये.”

                                     श्री रघुनाथ दास जी का दही चिवडा उत्सव 

श्री रघुनाथ दास जी समझ गये कि इसीलिये प्रभु ने उन्हें वापस घर क्यों भेजा. सिर झुकाकर अपनी गलती स्वीकार करी. दंड के लिए श्री रघुनाथ दास तैयार थे,

श्री नित्यानंद प्रभु ने उन्हें दंड स्वरुप सभी भक्तों के लिए दही चिवडा खिलाने का आदेश दिया. श्री रघुनाथ दास जी को दंड सुनकर ख़ुशी हुई.

धन और सेवकों की उन्हें कमी नही थी. अल्प समय में सारा इंतज़ाम हो गया. इतना सारा चिवडा, केला, गुड़, दूध, दही मंगवाया गया. केला और गुड़ को मिलकर मिश्रित द्रव्य बनाया गया. फिर चिवड़े के दो हिस्से किये गये.

एक हिस्से में चिवड़े और दही तथा गुड़ केले का मिश्रण डाला गया. दूसरे हिस्से में चिवडों में दूध तथा गुड़ केले का मिश्रण डाला गया. सभी भक्तों को एक-एक दोना दही चिवडा व एक दोना दूध चिवडा दिया गया.

                                           जब गौरांग महाप्रभु प्रकट हो गए 

फिर श्री रघुनाथ दास जी ने वट वृक्ष के नीचे आसन बिछाकर दो-दो दोने श्री गौरांग महाप्रभु एवं श्री नित्यानंद प्रभु के लिए रख दिए. श्री निताई चाँद ने ध्यानस्त होकर श्री गौरहरि को पुकारा एवं प्रेम पुकार सुनकर गौरांग महाप्रभु वहां आये.

महाप्रभु के साथ श्री नित्यानंद जी सभी लोगों के बीच गये. सभी के दोने में से एक-एक कण उठाकर श्री गौरांग महाप्रभु को खिलाने लगे.

अंत में श्री नित्यानंद गौरांग महाप्रभु के साथ चबूतरे पर आकर बैठ गये. श्री गौरांग महाप्रभु वहां प्रकट हो गये थे, यह दृश्य सभी को नही दिखा.

जिन्होंने प्रेम चक्षुओं से उन्हें देखा, उन्हें ही श्री महाप्रभु दिखे. श्री नित्यानंद प्रभु ने अपना एवं श्री गौरांग का अवशिष्ट प्रसाद श्री रघुनाथ दास जी को दिया. दंड महोत्सव समाप्त हुआ.

आज भी  जाह्नवी तट पर बसे पानिहाटी (उड़ीसा-बंगाल) में उसी वट वृक्ष के नीचे “ज्येष्ठ शुक्ल त्रयोदशी” के दिन हजारों साधु संत एकत्र होकर चिड़ा-दही महोत्सव मनाते हैं.

          “श्री श्याम सुन्दर गोस्वामी जी ”

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श्री राधे 

“श्रील नारायण भट्ट ज़ू जयति”

“श्री नारायण दास गोस्वामी जयति”

??आज की ब्रज रस धारा  

दिनांक 25/08/2018

श्री रघुनाथ दास गोस्वामी जी

श्री रघुनाथ दास गोस्वामी, वृंदावन में चैतन्य महाप्रभु द्वारा भेजे गए छः षणगोस्वामी में से एक थे. इन्होंने युवा आयु में ही गृहस्थी का त्याग किया, और गौरांग महाप्रभु के साथ हो लिए थे.

गौरांग महाप्रभु जी के तिरोभाव के उपरांत ये वृंदावन चले आए, व सनातन गोस्वामी जी और रूप गोस्वामी जी  के साथ अत्यंत सादगी के साथ भग्वन्नाम का जाप करते रहे, व चैतन्य महाप्रभु जी की शिक्षाओं का प्रचार किया.

ये अपनी पिता के एक लौती संतान थे जिनके आगे पीछे हजारों दास दासी हाथ बाँधे खड़े रहते,छप्पन भोग की थाली सदा जिनके लिए लगी रहती, वे यदि अपने घर के बगीचे में भी जाते तो पालकी मै बैठकर जाते,

कभी घर से बाहर पैदल नहीं चले उन रघुनाथ दास जी को जब वैराग्य चरम पर आया तो नंगे पैर मीलो जंगल में, काटो पर चलकर महाप्रभु के पास गए, उन रघुनाथ दास जी ने इस तरह त्यागमय जीवन यापन किया.

जन्म – रघुनाथ दास जी चौबीस घंटे में केवल एक बार थोडा सा मट्ठा पीकर ही रहते थे ये सदा प्रेम में विभोर होकर राधे राधे चिल्लते रहते,इनका जन्म १४१६ शकाब्द बताया जाता है १५१२ रघुनाथ दास गोस्वामी का नित्य निकुंज लीला में प्रवेश हुआ.इनका त्याग और वैराग्य बड़ा ही अद्भुत और अलौकिक था.

इन्होने जीवन भर कभी भी जिव्हा का स्वाद नहीं लिया, सुन्दर वस्त्र नहीं पहने और किसी भी प्रकार के संसारी सुख का उपभोग नहीं किया लगभग सौ वर्षों तक ये अपने त्याग वैराग्यमय श्रवासो से इस संसार के वातावरण को पवित्रता प्रदान करते रहे एक जमीदार के एक लौते राजपुत्र होकर भी इतना त्याग !शब्दों में व्यक्त करना भी कठिन है.

जगन्नाथपुरी में मंदिरों में चावल का भोग लगता था, जब चावल बिकने के बाद जो चावल नहीं बिकते थे वे दो तीन दिन में सड जाते थे दुकानदार उन्हें फेक देते थे उन चावलों को गाय भी नहीं खाती थी,दास जी उन्ही चावलों को लाकर पानी में धोकर साफ़ चावल निकाल लेते और उन्ही चावलों को चौबीस घंटे में एक बार खाकर निरंतर भजन में मस्त रहते थे.

उन्हें लगता था शरीर के लिए किसी के दरवाजे पर जाकर खड़े रहना या किसी से मांगने के लिए मंदिर के बाहर खड़े रहने में वह समय व्यर्थ हो गया इसलिए मांगने के जगह इस तरह से खाते थे,ताकि भजन का छूटे. ऐसे संत इस धरा-धाम पर कभी कभी ही अवतरित होते है,उनके चरणों में अनंत कोटि वंदन.

प्रसंग १. – एक समय मुग़ल सम्राट अकबर अपनी सेना के साथ ब्रजमंडल के रास्ते कहीं जा रहा था. मार्ग में श्री राधाकुंड पड़ा जहाँ पूज्यपाद श्रील रघुनाथदास गोस्वामीजी श्री राधारानी के ध्यान में बैठे थे. बादशाह के सैनिक और उसकी सेना के हाथी-घोड़े सब प्यास से व्याकुल हो रहे थे, तब अकबर ने गोस्वामीजी से जल के विषय में पूछा.

तो गोस्वामीजी ने श्री राधाकुंड की ओर इशारा किया, अकबर ने जब श्री राधाकुंड का दर्शन किया तो सोच में पड़ गया की इतने छोटे से कुंड से इस विशाल सेना की प्यास कैसे बुझेगी.

परन्तु अकबर यह देखकर आश्चर्य में पड़ गया की संपूर्ण सेना और हाथी-घोड़ों के जल पी लेने के बाद भी राधाकुंड का जल स्तर जरा भी नहीं गिरा.

श्रीरघुनाथ गोस्वामी की भजन कुटी 

श्रीरघुनाथदास गोस्वामीजी  जगन्नाथपुरी से आकर श्रीराधाकुण्ड के समीप जगमोहन कुण्ड पर रहते थे. यहाँ एक समय होली के दिन राधिका सहेलियों के साथ बैठी हुई थीं और शंखचूड़ अकस्मात उन्हें हरण कर ले जाने लगा.

कृष्ण ने उसका वधकर उसके मस्तक से मणि निकाल ली और उसे श्रीबलदेव जी को दे दिया. बलदेव जी ने धनिष्ठा के हाथों से राधिका के पास भिजवा दिया. यद्यपि श्रीदास गोस्वामी पहले उक्त जगमोहन कुण्ड पर रहते थे, किन्तु बाद में वे श्रीराधाकुण्ड के तट पर भजन करने लगे.

                     श्री राधा रानी जी अपने आचंल से उनके सिर पर छाया करके खड़ी हो गई 

एक दिन श्रीरघुनाथदास गोस्वामी इस स्थान पर खुले आकाश के नीचे भजन कर रहे थे. वे भजन में ऐसे आविष्ट थे कि उन्हें तन मन की भी सुध नहीं थी. आँखों से अविरल अश्रु धारा प्रवाहित हो रही थी. उनके मुख से कभी-कभी हा राधे! हा राधे! शब्द निकल पड़ते थे.

उसी समय श्रीसनातन गोस्वामी उनके निकट आ रहे थे. श्रीसनातन गोस्वामी जी ने कुछ दूर से देखा एक खूंखार बाघ एवं बाघिनी का जोड़ा रघुनाथदास जी के बगल से होता हुआ कुण्ड में जलपान कर पुन: उसी मार्ग से लौट गया,

मानो उस जोड़े ने रघुनाथदास गोस्वामी जी को देखा ही नहीं.वे देखते है कि रघुनाथ जी भजन में लीन है और श्री राधा रानी जी अपने आचंल से उनके सिर पर छाया करके खड़ी है.

श्री सनातम गोस्वामी श्री दास गोस्वामी जी के निकट आये और उन्हें छोटे भाई की भाँति बड़े प्यार से एक भजन कुटी निर्माण कर भजन करने का परामर्श दिया. उन्होंने कहा यदि आप कुटी बनायेगे तो राधा रानी जी को स्वयं परेशान नहीं होना पडेगा.

उन्होंने स्वयं ही एक पर्णकुटी बनवा दी. और उसी में उनको भजन करने का निर्देश दिया. अब वह भजन कुटी तो रही नहीं, उसके स्थान पर पक्की भजन कुटी बना दी गई है. इस भजन कुटी के पास ही युधिष्ठर, भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव, और दोपदी वृक्ष रूप धारणकर भजन करते थे. अभी कुछ ही दिन पहले वे वृक्ष अप्रकट हो गये हैं.

इस भजन कुटी एवं श्रीगोपाल भट्ट गोस्वामी जी की भजन कुटी के बीच में भूगर्भ गोस्वामी जी , दास गोस्वामी जी एवं कविराज जी की भजन कुटी हैं कविराज जी ने श्रीचैतन्य चरितामृत का कुछ अंश यहाँ भी लिखा था.

अधिकांश भाग वृन्दावन में श्रीराधादामोदर मन्दिर की भजन कुटी में लिखा था. पास ही ईशानकोण में श्रीगदाधर जी का मन्दिर है. इस मन्दिर के वायुकोण में श्रीराधागोविन्दजी का मन्दिर है. इसी मन्दिर के प्रवेश द्वार के पास श्रीगोवर्द्धन की जिह्वा शिला का दर्शन है.

                  साढ़े बाइस घंटे से अधिक भक्ति में बिताते

* रघुनाथ दास गोस्वामी राधाकुण्ड के पास भक्ति करते.
* एकमात्र चिन्ता भगवान के पवित्र नाम का जप करना था.
* नित्य प्रति भगवान को हजार बार नमस्कार करते.
* भगवान के एक लाख नाम जपते.
* दो हजार वैष्णवों को प्रणाम करते.
* तीन घंटे प्रतिदिन श्रीचैतन्य महाप्रभु के चरित्र के विषय में चर्चा करते.
* अपने मन में दिनरात राधाकृष्ण की सेवा करते.
* राधा – कुण्ड में तीन बार स्नान करते.
* ज्योही वृन्दावन में रहने वाला वैष्णव मिलता उसका आलिंगन करते, आदर करते.
* दिन में साढ़े बाइस घंटे से अधिक भक्ति में बिताते.
* दो घंटे से कम सोते.
* तीन पुस्तकें भी लिखी हैं.

ये शुद्ध भक्त हैं इनका हम अनुकरण नहीं कर सकते है परन्तु कुछ बातों का अनुसरण करने का प्रयास कर सकते हैं.

          “श्री श्याम सुन्दर गोस्वामी जी ”

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श्री राधे 

“श्रील नारायण भट्ट ज़ू जयति”

“श्री नारायण दास गोस्वामी जयति”

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दिनांक 24/08/2018

श्री जीव गोस्वामी

श्री जीव गोस्वामी(1513-1598), वृंदावन में चैतन्य महाप्रभु द्वारा भेजे गए छः षडगोस्वामी में से एक थे. उनकी गणना  गौडीय संप्रदाय के सबसे महान दार्शनिकों एवं सन्तों में होती है. उन्होने भक्ति योग, वैष्णव वेदान्त आदि पर अनेकों ग्रंथों की रचना की.

श्री जीव गोस्वामी का जन्म श्री वल्लभ अनुपम के यहां पौष शुक्ल तृतीया, संवत् 1568(सन् 1511)को बंगाल के रामकेलि ग्राम में हुआ था श्री सनातन गोस्वामी और श्री रूप गोस्वामी तथा श्री वल्लभ अनूपम  गोस्वामी, ये तीनों भाई नवाब हुसैन शाह के दरबार में उच्च पदासीन थे.

बादशाह की सेवाओं के बदले इन लोगों को अच्छा भुगतान होता था, जिसके कारण इनका जीवन अत्यंत सुखमय था. और इनके एकमात्र पुत्र के लिए किसी वस्तु की कमी न थी.

श्री जीव के चेहरे पर सुवर्ण आभा थी, इनकी आंखें कमल के समान थीं, व इनके अंग-प्रत्यंग में चमक निकलती थी.वे रूप गोस्वामी और सनातन गोस्वामी के भतीजे थे.और श्री रूप गोस्वामी जी से दीक्षा ग्रहण की.


श्री राधा दामोदर जी का प्राकट्य 

एक रात्रि जब श्रील रूप गोस्वामी सो रहे थे तब ठाकुर राधा दामोदर ने उन्हें यह स्वप्न दिया कि तुम अपने शिष्य व मेरे भक्त जीव गोस्वामी के लिए दामोदर स्वरूप को प्रकट करो.

तुम मेरे प्रकट विग्रह को मेरी नित्य सेवा हेतु जीव गोस्वामी को दे देना.इस घटना के तुरन्त बाद जब रूप गोस्वामी यमुना स्नान करके आ रहे थे,

तो उन्हें रास्ते में श्याम रंग का विलक्षण शिलाखण्ड प्राप्त हुआ. तत्पश्चात ठाकुर राधा दामोदर ने उन्हें अपने प्रत्यक्ष दर्शन देकर शिलाखण्ड को दामोदर स्वरूप प्रदान किया. यह घटना माघ शुक्ल दशमी, संवत् 1599(सन् 1542)की है.

यह दिन वृंदावन में ठाकुर राधा दामोदर प्राकट्य महोत्सव के रूप में अत्यन्त धूमधाम के साथ मनाया जाता है. स्वप्नादेशके अनुसार रूप गोस्वामी ने दामोदर विग्रह को अपने शिष्य जीव गोस्वामी को नित्य सेवा हेतु दे दिया.

जीव गोस्वामी ने इस विग्रह को विधिवत् ठाकुर राधा दामोदर मंदिर के सिंहासन पर विराजितकर दिया. जीव गोस्वामी को अपने ठाकुर राधा दामोदर के युगल चरणों से अनन्य अनुराग था. उनके रसिक लाडले ठाकुर राधा दामोदर भी उन्हें कभी भी स्वयं से दूर नहीं जाने देते थे.

वह यदि कभी उनसे दूर चले भी जाएं, तो उनके ठाकुर उन्हें अपनी वंशी की ध्वनि से अपने समीप बुला लेते थे. श्रीलजीव गोस्वामी श्रृंगार रस के उपासक थे.

सम्राट अकबर ने गंगा श्रेष्ठ है या यमुना, इस वितर्क को जानने के लिए जीव गोस्वामी को अपने दरबार में बडे ही सम्मान के साथ बुलाया था.

इस पर उन्होंने शास्त्रीय प्रमाण देते हुए यह कहा कि गंगा तो भगवान का चरणामृत है और यमुना भगवान् श्रीकृष्ण की पटरानी. अतएव यमुना, गंगा से श्रेष्ठ है. इस तथ्य को सभी ने सहर्ष स्वीकार किया था.

जीव गोस्वामी जी के द्वारा रचित ग्रन्थ – जीव गोस्वामी के द्वारा रचित ग्रंथ “सर्व संवादिनी”,”षट्संदर्भ” एवं “श्री गोपाल चम्पू” आदि विश्व प्रसिद्ध हैं.

षट् संदर्भ न केवल गौडीयसम्प्रदाय का अपितु विश्व वैष्णव सम्प्रदायों का अनुपम दर्शन शास्त्र है. . षट् संदर्भ ग्रंथ का अध्ययन, चिन्तन व मनन उन व्यक्तियों के लिए परम आवश्यक है, जो भक्ति के महारससागर में डुबकी लगाना चाहते हैं.

नित्य लीला में प्रवेश – गौडीयवैष्णव सम्प्रदाय की बहुमूल्य मुकुट मणि श्रीलजीव गोस्वामी का अपने जन्म की ही तिथि व माह में पौषशुक्ल तृतीया, संवत् 1653(सन् 1596)को वृंदावन में निकुंज गमन हो गया.

वे ६५ वर्ष तक श्री वृंदावन में वास करते हुए ८५ वर्ष तक इस धरा धाम पर प्रकट रहे.

वृंदावन के सेवाकुंज स्थित ठाकुर राधा दामोदर मंदिर में जीव गोस्वामी का समाधि मंदिर स्थापित है. यहां उनकी वह याद प्रक्षालन स्थली भी है, जिसकी रज का नित्य सेवन करने से प्रेम रूपी पंचम पुरुषार्थ की प्राप्ति होती है.

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श्री राधे 

“श्रील नारायण भट्ट ज़ू जयति”

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दिनांक 23/08/2018

श्री सनातन गोस्वामी जी

सनातन का जन्म सं. 1523 के लगभग हुआ था सनातन गोस्वामी जी को संस्कृत के साथ फारसी अरबी की भी अच्छी शिक्षा पाई थी. सन् 1483 ई. में पितामह की मृत्यु पर अठारह वर्ष की अवस्था में यह उन्हीं के पद पर नियत किए गए और बड़ी योग्यता से कार्य सँभाल लिया.

हुसेन शाह के समय में यह प्रधान मंत्री हो गए तथा इन्हें दरबारे खास उपाधि मिली. गोस्वामी जी तीन भाई थे, सबसे बड़े “सनातन जी” ही थे, फिर “रूप गोस्वामी” और सबसे छोटे ‘अनूप गोस्वामी जी” थे. तीनो भाई राजकार्य में लगे रहते थे. थे तो ब्राह्मण कुल के परन्तु हुसेन शाह के यहाँ काम करते करते उसके जैसा ही रहन सहन हो गया था.

श्री चैतन्य महाप्रभु का जब प्रकाश हुआ तब यह भी उनके दर्शन के लिए उतावले हुए, पर राजकार्य से छुट्टी नहीं मिली. इसलिए उन्हें पत्र लिखकर रामकेलि ग्राम में आने का आग्रह किया. श्री चैतन्य जब वृंदावन जाते समय रामकेलि ग्राम में आए तब इन तीनों भाइयों ने उनके दर्शन किए

और सभी ने सांसारिक जंजाल से मुक्ति पाने का दृढ़ संकल्प किया. सभी राजपद पर थे. पर सनातन इनमें सबसे बड़े और मंत्रीपद पर थे अत: पहले श्री रूप तथा अनुपम सारे कुटुंब को स्वजन्मस्थान फतेहाबाद में सुरक्षित रख आए और रामकेलि ग्राम में सनतान जी के लिए कुसमय में काम आने को कुछ धन एक विश्वसनीय पुरुष के पास रखकर वृंदावन की ओर चले गए. जब सनातन जी ने राजकार्य से हटने का प्रयत्न किया तब नवाब ने इन्हें कारागार में बंद करा दिया. अंत में घूस देकर यह बंदीगृह से भागे और काशी पहुँच गए.

स. 1572 में यहीं श्रीगौरांग से भेंट हुई और दो मास तक वैष्णव भक्ति शास्त्र पर उपदेश देकर इन्हें वृंदावन भेज दिया कि वहाँ के लुप्त तीर्थों का उद्धार, भक्तिशास्त्र की रचना तथा प्रेमभक्ति एवं संकीर्तन का प्रचार करें.यहाँ से वृंदावन चले गए पर कुछ दिनों बाद श्रीगौरांग के दर्शन की प्रबल इच्छा से जगन्नाथपुरी की यात्रा की.

वहाँ कभी जगन्नाथ भगवान के दर्शन करने नहीं जाते थे,उनका ऐसा मानना था कि यवनों के संसर्ग से हम दूषित हो गए है,जगन्नाथ जी के मंदिर के पास भी कही कोई भक्त हम से स्पर्श न कर जाए,इसलिए मंदिर दूर से ही मंदिर कि धवजा के दर्शन कर लिया करते थे,कुछ दिन रहकर यह पुन: वृंदावन लौट आए.

 “श्री सनातन गोस्वामी जी” जब वृंदावन आये और द्वादश टीला जो कलिदेह के निकट है वही पर एक कुटिया में निवास करते थे उस समय वृंदावन घोर जंगल के रूप में परिणित हो गया यहाँ किसी गृहस्थ का वास नहीं था.अतः सनातन जी मथुरा से भिक्षा माँग कर लाते थे श्री सनातन जी प्रातः काल वृंदावन से सोलह मील चलकर चौदह मील गोवर्धन की परिक्रमा करते थे वहाँ से सोलह मील चलकर मथुरा में मधुकरी करते और पुन:वृंदावन में अपनी भजन कुटी पर लौट आते.


सनातन जी का मदनमोहन को चौबाईन के घर से लाना 

प्रसंग १. – एक दिन मथुरा में एक चौबे के घर में श्री सनातन जी ने श्यामकांति वाले मदन नामक बालक को देखा, जो चौबे के घर में स्थित मंदिर से निकलकर चौबे के बालक के साथ गुल्ली डंडा खेल रहे थे. उन श्याम कांति वाले मदन बालक ने चौबाईन के बालक को पराजित कर दिया, मदन ने पराजित चौबे बालक के कंधे पर बैठकर घोड़े क का आनंद लिया.

किन्तु दूसरी बार पराजित होने पर जब मदन के कंधे पर, चौबे बालक को चढ़ने की बारी आई तो मदन भागकर मंदिर में प्रवेश कर गया. ऐसा देखकर चौबे का बालक क्रोध से गली देता हुआ उसके पीछे दौड़ा, वह मंदिर में प्रवेश करना चाहता था किन्तु पुजारी जी ने उसे डाट-डपटकर भगा दिया, अतः विग्रह बने मदन को दूर से ही तर्जनी अँगुली दिखाते हुए चौबे बालक ने कहा – अच्छा कल तुझे देख लूँगा.

श्री सनातन जी इस द्रश्य को देखकर आश्चर्य चकित रह गए दूसरे दिन वे कुछ पहले ही दर्शनों की पिपासा लेकर पहुँच गए कलेवे का समय था अतः चौबाईन दोनों बालको के कलेबे के लिए खिचड़ी पका रही थी, अभी उसने स्नान आदि नहीं किया था दोनों बालक कलेवे की प्रतीक्षा कर रहे थे. मैया दातुन करती जा रही थी और उसके दूसरे सिरे से खिचड़ी को भी चलाती जा रही थी. खिचड़ी पक जाने पर कटोरी में गर्म-गर्म खिचड़ी बालको के सामने रखकर फूँक कर उसे ठंडा भी करने लगी. और दोनों बालको ने बड़े प्रेम से खिचड़ी का रसास्वादन करने लगे.

सनातनजी से ये चौबाईन का अनाचार सहन नहीं हुआ उन्होंने कहा – माई! इन बालको को बिना स्नान किये दातुन से खिचड़ी चलाकर अपवित्र कलेवा देना उचित नहीं है, चौबा ईन अपनी भूल समझ गई. बोली – बाबा कल से शुद्ध रूप से बनाकर ही दूँगी.

सनातन जी तो रोज ही मधुकरी के लिए आते थे तीसरे दिन फिर पहुच गए तो देखा की माई के स्नान पूजन में विलम्ब के कारण दोनों बालक भूख लगने के कारण कलेबा के लिए मचल रहे है. माँ बर्तन धोकर खिचड़ी पका रही है. दोनों उसके वस्त्र पकड़कर मचल रहे थे.

तब सनातन जी ने फिर कहा – माई!  आपको स्नान करने की कोई आवश्यकता नहीं है आप पूर्ववत ही बनाये .मैंने आपके चरणों का अपराध किया है, उस बालक के दर्शन हेतु सनातन जी नियम से चौबे के घर आने लगे,और घंटो खड़े उसे देखते और रोते रहते.

एक दिन रात में स्वप्न में श्री मदनमोहन जी ने श्री सनातन जी से कहा – कि तुम मुझे मथुरा से यहाँ ले आओ, और उधर चौबाईन को भी स्वप्न में कहा – कि मुझे उन बाबा को दे देना,अगले दिन चौबाईन ने मदनमोहन जी को श्री सनातन जी को सौप दिया. बोली ये तो बहुत छलिया है जिस यशोदा ने इतना लाड लड़ाया उसे ही छोडकर मथुरा चला गया. इसका कोई सगा नहीं है, इसे मेरी चाह नहीं है तो मै भी क्यों इसके लिए मरू,जाये मेरी बला से, इस तरह प्रेम में रोष करने लगी. बाहर से तो गुस्सा दिखा रही थी और अन्दर से प्रेम के कारण आँसू निकल रहे थे,

श्री सनातन जी  भिक्षा के द्वारा प्राप्त आटे से अलौनी बाटी बनाकर अपने मदन मोहन का भोग लगाकर खुद पाते थे एक दिन मदन मोहन जी  ने कहा बोले – बाबा ये अलौनी बाटी मेरे गले के नीचे नहीं उतरती थोडा सा नमक क्यों नहीं डालते सनातन जी बोले नमक कहा से लाऊ ?बोले मधुकरी मागकर लाते हो वही से, अब सनातन जी नमक लगाकर बाटी बनाने लगे.

अब कुछ दिनों बाद मदनमोहन जी फिर बोले –बाबा ये बिना घी कि बाटी हमसे नहीं खायी जाती अब तो सनातन जी बोले – देखो मै ठहरा वैरागी, अगर इतना ही स्वादिष्ट भोजन करना चाहते थे तो किसी सेठ के पास क्यों नहीं गए यहाँ तो ऐसे ही मिलेगा, कभी कहते हो नमक नही, कभी कहते हो घी नहीं, कल ५६ भोग मांगोगे, कहा से लाऊंगा ? अपनी व्यवस्था स्वयं कर लो.

प्रसंग २-  एक दिन पंजाब में मुल्तान का रामदास खत्री – जो कपूरी नाम से अधिक जाना जाता था, आगरा जाता हुआ व्यापार के माल से भरी नाव लेकर जमुना में आया किन्तु कालीदह घाट के पास रेतीले तट पर नाव अटक गयी. तीन दिनों तक निकालने के असफल प्रयासों के बाद वह स्थानीय देवता को खोजने और सहायता माँगने लगा. वह किनारे पर आकर पहाड़ी पर चढ़ा. वहाँ उसे सनातन मिले. और सारा वृतांत कहा.

सनातन जी बोले – मै तो एक संन्यासी हूँ क्या कर सकता हूँ अन्दर मदन मोहन जी है उनसे प्रार्थना करो व्यापारी से मदनमोहन से प्रार्थना करने लगा,और तत्काल नाव तैरने लग गई. जब वह आगरे से माल बेचकर लौटा तो उसने सारा पैसा सनातन को अर्पण कर दिया और उससे वहाँ मंदिर बनाने की विनती की. मंदिर बन गया और लाल पत्थर का घाट भी बना .


भगवान के चरण चिन्ह अंकित गोवर्धन शिला 

सनातन गोस्वामी का नियम था गिरि गोवर्द्धन की नित्य परिक्रमा करना. अब उनकी अवस्था 90 वर्ष की हो गयी थी. नियम पालन  मुश्किल हो गया था. फिर भी वे किसी प्रकार निबाहे जा रहे थे. तब श्री मदन मोहन जी को दया आई और छोटे से बालक के रूप में प्रकट होकर कहने लगे.-


सनातन, तुम्हारा कष्ट मुझसे नहीं देखा जाता. तुम गिरिराज परिक्रमा का अपना नियम नहीं छोड़ना चाहते तो इस गिरिराज शिला की परिक्रमा कर लिया करो. इस पर मेरा चरण-चिन्ह अंकित है. इसकी परिक्रमा करने से तुम्हारी गिरिराज परिक्रमा हो जाया करेगी.”

इतना कह मदनगोपाल अन्तर्धान हो गये. सनातन गोस्वामी मदनगोपाल-चरणान्कित उस शिला को भक्तिपूर्वक सिर पर रखकर अपनी कुटिया में गये. उसका अभिषेक किया और नित्य उसकी परिक्रमा करने लगे. आज भी मदगोपाल के चरणचिन्हयुक्त वह शिला वृन्दावन में श्रीराधादामोदर के मन्दिर में विद्यमान हैं,

ऐसी मान्यता है कि राधा दामोदर मंदिर की चार परिक्रमा लगाने पर गिरिराज गोवर्धन की परिक्रमा का फल मिल जाता है.आज भी कार्तिक सेवा में श्रद्धालु बड़े भाव से मंदिर की परिक्रमा करते है.

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श्री राधे 

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दिनांक 22/08/2018

श्री रूप गोस्वामी जी

इनका जन्म 1493 ई (तदनुसार 1415शक.सं.) को हुआ था. इन्होंने २२ वर्ष की आयु में गृहस्थाश्रम त्याग कर दिया था. बाद के 51 वर्ष ये ब्रज में ही रहे. इन्होंने श्री सनातन गोस्वामी से दीक्षा ली थी. इन्हें शुद्ध भक्ति सेवा में महारत प्राप्त थी, अतएव इन्हें भक्ति-रसाचार्य कहा जाता है.

ये गौरांग के अति प्रेमी थे. ये अपने अग्रज श्री सनातन गोस्वामी सहित नवाब हुसैन शाह के दरबार के उच्च पदों का त्याग कर गौरांग के भक्ति संकीर्तन में हो लिए थे.

इन्हीं के द्वारा चैतन्य ने अपनी भक्ति-शिक्षा तथा सभी ग्रन्थों के आवश्यक सार का प्रचार-प्रसार किया. महाप्रभु के भक्तों में से इन दोनों भाइयों को उनके प्रधान कहा जाता था. यू तो सनातन जी बड़े थे,और उनका भक्ति-ज्ञान भी अपार था, परन्तु फिर भी रूप जी उनसे भी आगे थे, इसलिए गौडीय संप्रदाय में सभी “रूप-सनातन” कहते थे, सनातन-रूप नहीं कहा जाता था.

सन 1564 ई (तदा० 1486 शक. की शुक्ल द्वादशी) को 73 वर्ष की आयु में इन्होंने परम धाम को प्रस्थान किया.वृंदावन में “श्रीराधा दामोदर मंदिर” , श्री रूपगोस्वामी जी सेवाकुंज के अन्तर्गत यहीं भजन कुटी में वास करते थे. मन्दिर के उत्तर भाग में श्रीपाद रूपगोस्वामी की भजन-कुटी और समाधि मन्दिर स्थित हैं. पास ही श्रीभूगर्भ गोस्वामी की समाधि है.

श्रीरुप गोस्वामीजी सेवाकुञ्ज के अन्तर्गत यहीं भजन कुटी में वास करते थे. यहीं पर श्री रूप गोस्वामी ने श्री “भक्तिरसामृतसिन्धु”, “उज्जवलनीलमणि” एवं अन्यान्य भक्ति ग्रंथों का संकलन किया  . सन् 1541 में भक्तिरसामृतसिन्धु की रचना समाप्त हुई. इसके एक वर्ष बाद सन् 1542 में रूप गोस्वामी ने जीव गोस्वामी को पृथक् रूप से सेवा करने के लिए राधादामोदर की जुगलमूर्ति प्रदान की.

प्रसंग १. – राधाकुण्ड के पश्चिम में झूलनतला है.एक समय श्रीसनातन गोस्वामी और श्रीरूप गोस्वामी राधाकुण्ड की उत्तर–पूर्वी दिशा में श्रीरघुनाथदास गोस्वामी की भजनकुटी के निकट बैठे हुए कृष्ण कथा में विभोर हो रहे थे.

श्रीसनातन गोस्वामी ने श्रीरूप गोस्वामी से पूछा – रूप ! आजकल क्या लिख रहे हो?

श्रीलरूप गोस्वामी स्वरचित ‘चाटुपुष्पाञ्जलि:’ नामक स्तोत्र उनके हाथों में दे दिया. उसका पहला श्लोक था–

                                                नव–गोरोचना–गौरीं प्रवेरेन्दीवराम्बराम्।

                                              मणि–स्तवक–विद्योति–वेणीव्यालग्ङणाफणां।।

श्रीसनातन गोस्वामी ने उसे पढ़कर कहा –रूप! तुमने ‘वेणीव्यालग्ङणाफणा’ पद के द्वारा राधिका की लहराती हुई काली बंकिम वेणी की तुलना विषधर काली नागिन से की है. राधिका तो सर्वगुण सम्पन्न, परम लावण्यवती, सुकोमल एवं परम मधुर कृष्ण की प्रिया हैं.उनकी सुन्दर वेणी की यह उपमा मुझे रूचिकर प्रतीत नहीं हो रही हैं.

श्रीरूप गोस्वामी ने मुस्कुराते हुए नम्रतापूर्वक इसमें संशोधन करने के लिए प्रार्थना की. श्रीसनातन गोस्वामी को उस समय अन्य कोई उपमा सूझी ‘पीछे संशोधन करूँगा’ ऐसा कहकर वे इसी विषय की चिन्ता करते हुए वहाँ से विदा हुए.

जब वे कुण्ड की पश्चिम दिशा में इस स्थल पर पहुँचे, तो उन्होंने कदम्ब वृक्ष की डालियाँ पर एक सुन्दर झूले पर एक गोपकिशोरी की झूलते हुए देखा.उसकी सहेलियाँ मल्लार राग का गायन करती हुई उसे झुला रही थीं.श्रीसनातन गोस्वामी ने उस झूलती हुई किशोरी की लहराती हुई काली वेणी पर लहराती हुई काली नागिन को देखा.वे उसे बचाने के लिए उधर ही दौड़ते हुए पुकारने लगे– लाली! लाली! सावधान तुम्हारी वेणी पर काली नागिन है.

किन्तु, जब निकट पहुँचे तो देखा कुछ भी नहीं है.वहाँ न किशोरी है न सखियाँ हैं और न झूला.वे उस दृश्य का स्मरणकर आनन्द से क्रन्दन करने लगे और उल्टे पाँव रूप गोस्वामी के पास पहुँचे और बोले– रूप! तुम्हारी उपमा सर्वांगसुन्दर है.किशोरीजी ने मुझ पर अनुग्रह कर अपनी बंकिम वेणी का स्वयं ही दर्शन कराया है.उसमें संशोधन की कोई आवश्यकता नहीं हैं.

                                             

                                               राधा दामोदर जी का प्राकट्य

प्रसंग २- श्री जीव गोस्वामी वृन्दावन में अपने गुरु श्री रूप गोस्वामी के अनुगत होकर भजन में तल्लीन रहते थे . एक समय उनके हृदय में ठाकुर श्री दामोदर जी का विरह भाव जाग उठा. इस भाव में आतुर रहने के कारण वे क्षीण-काय (दुबले) होने लगे . किसी भी कार्य में उनका मन नहीं लगता था, हमेशा नेत्रों से अश्रुओं की धारा बहती रहती थी. भगवान श्री कृष्ण के दर्शन की लालसा दृढ़तर होने लगी. ठाकुरजी से जीव की यह दशा सहन नहीं हुई और उन्होंने अदभुत ढंग से कृपा की.

एक समय श्री रूप गोस्वामी शयन कर कर रहे थे. उसी समय स्वप्न में उनको श्री कृष्ण के दर्शन हुए कितना अदभुत रूप था प्रभु का.

प्रभु हँसते हुए श्री रूप गोस्वामी से बोले – ” तुम मेरे दामोदर विग्रह को अपने हाथों से बनाओ.

श्रीरूप गोस्वामी बोले – ” मैं आपके दामोदर विग्रह को कैसे बना सकता हूँ ? मैंने कभी भी अपने हाथों से छोटे से पत्थर को नहीं तोड़ा है तो फिर कैसे आपके सुन्दर श्री विग्रह दामोदर का मैं निर्माण कर सकता हूँ ?

प्रभु ने कहा – कि जैसे भी हो, तुम मेरे विग्रह का अपने हाथों से ही निर्माण करो, कारण – मैं तुम्हारे हाथों से ही प्रकट होना चाहता हूँ. मेरे उस दामोदर विग्रह का निर्माण करके तुम अपने प्रिय शिष्य एवं मेरे अति प्रिय भक्त जीव को प्रदान करना.

उसके द्वारा ही मैं आराधित और पूजित होना चाहता हूँ. वह मेरा अति ही प्रिय भक्त है. प्रभु ने अपने दामोदर विग्रह को किस प्रकार और किस रूप में निर्माण करना है, श्री रूप गोस्वामी को बताया और उस विग्रह के स्वप्न में ही दर्शन कराये तत्पश्चात् श्री रूप गोस्वामीजी की निद्रा भंग हो गयी.

श्री रूप गोस्वामी को यह भली-भाँति बोध हो गया की प्रभु भक्तों के ऊपर कृपा करने के लिए ही प्रकट होते हैं. अगर वो स्वयं प्रकट होना चाहते हैं तो उनको कौन रोक सकता है ? श्री रूप गोस्वामी जी समझ गये की वह तो केवल निमित्त मात्र हैं. वास्तविकता तो यह है कि प्रभु स्वयं ही प्रकट होंगे.

इस प्रकार विचार करके वे यमुना जी में स्नान करने गये. स्नान करके आते वक्त उन्हें एक काले रंग का सुलक्षण शिलाखंड प्राप्त हुआ. उस शिलाखंड को लाकर वे मूर्ति निर्माण में लग गये. मूर्ति निर्माण कार्य बड़ा अदभुत था.

भगवान दामोदर का प्रकट कार्य माघ शुक्ला दशमी को पूरा हुआ उस दिन समस्त भक्त्वृन्दों एवं गोस्वामीगणों के सामने श्री रूप गोस्वामीजी ने अपने शिष्य श्रीजीव को भगवान दामोदर का विग्रह सेवा हेतु प्रदान किया, इस पावन दिवस को श्री राधा दामोदर मन्दिर में सिंहासन यात्रा के रूप में मनाया जाता है. श्रीरूप गोस्वामी ने ठाकुरजी को श्री सिंहासन पर विराजमान कराया एवं समस्त वैष्णवजनों ने संकीर्तन आरंभ किया जो कई दिनों तक निरंतर चलता रहा.
 

                                                श्रीगोविंद देव जी का प्राकट्य

प्रसंग ३ –  श्रीरूप गोस्वामी, श्रीचैतन्य महाप्रभु के आदेश से शास्त्र-प्रमाण अनुसार लुप्त तीर्थों को प्रकट करना चाहते थे . शास्त्रों में उल्लेख था कि महाराज बज्रनाभ द्वारा स्थापित “श्रीगोविन्ददेव जी” वृन्दावन के योगपीठ में विराजमान हैं. रूप गोस्वामी प्रतिदिन पञ्चकोसी वृन्दावन की परिक्रमा भी करते थे और ब्रज के वनों, उपवनों और ग्रामों में घूम-घूम कर योगपीठ को ढूंढा करते.

वे हर समय इसी चिंता में रहते थे की मेरे प्रभु कहाँ हो सकते हैं और उन्हीं के प्रेम में रोते रहते थे. एक दिन परिक्रमा करते समय श्रीगोविन्द विग्रह की चिंता करते-करते बड़े अधीर हो गए तथा यमुनातट पर एक वृक्ष के नीचे बैठकर सोचने लगे- भगवान की खोज करने की शक्ति मनुष्य में कहाँ? सूर्य जैसे किसी कि चेष्टा से नहीं, स्वयं ही प्रकाशित होते हैं. यह सोचते-सोचते वे मन ही मन, “हा, गोविन्द, हा, गोविन्द!” कह इष्टदेव से प्रार्थना करने लगे. उनके नेत्रों से अश्रुधार प्रवाहित होने लगी.

उसी समय एक परम सुन्दर ब्रजवासी गोप बालक भी परिक्रमा करते करते उधर से निकला. और मधुर स्वर में उनसे बोला-“स्वामीजी, आप उदास क्यों बैठे हैं?” पहले तो श्रीरूप गोस्वामीजी ने कुछ नहीं कहा. किन्तु बालक के बार-बार अनुरोध करने पर उन्होंने अपने ह्रदय की व्यथा कह सुनाई.

इस पर बालक ने कहा-“आप चिंता बिल्कुल न करें. मैं जो कहता हूँ उसे सुनें. वृन्दावन में केशीतीर्थ के “गोमाटिला” नाम से जो स्थान प्रसिद्ध है, वही योगपीठ है. वहाँ प्रतिदिन पूर्वाह्न में एक श्रेष्ठ गाय आती है. बड़े प्रेम और उल्लास से अपने थनों के दूध से उस स्थान को सींच जाती है . गोविन्ददेव वहीं गुप्त रूप से विराजमान हैं. चलो मैं तुम्हें उस स्थान पर लिए चलता हूँ”. उस स्थान पर उन्हें ले जाकर व्रजवासी अंतर्ध्यान हो गया.

श्री रूप गोस्वामी को इस रहस्य को समझने में देर न लगी. श्री रूप गोस्वामी उस बालक के रूप और मधुर बोली को स्मरण कर मुर्च्छित हो भूमि पर गिर पड़े. ब्रह्य ज्ञान होने पर उनके हृदय में आनंद नहीं समा रहा था और आनंद अश्रु बहाते वे पास की व्रजवासियों की बस्ती में गये और उन्हें यह शुभ संवाद दिया.

व्रजवासियों ने मिलकर बड़े उल्लास के साथ उस टीले पर दुग्ध-धारा से भीगे स्थान का खनन किया. कुछ दूर खुदाई करने के पश्चात गोविन्ददेव का श्रीविग्रह प्राप्त कर उनके आनन्द की सीमा न रही. उनकी हर्ष ध्वनि और गोविन्ददेव की जय-जय कार से आकाश गूंज गया.

रूप गोस्वामी ने शास्त्र वाक्य द्वारा प्रमाणित किया कि गोमाटिला द्वापर युग का योगपीठ है और श्रीविग्रह वज्रनाभ महाराज द्वारा प्रतिष्ठित और पूजित गोविन्ददेव हैं. गोविन्ददेव के प्राकट्य की बात सुन असंख्य नर-नारी दूर-दूर से उनके दर्शन करने आने लगे. कई दिन तक अपूर्व हर्षोल्लास के साथ महोत्सव होता रहा.

          “श्री श्याम सुन्दर गोस्वामी जी ”

      सेवाधिकारी श्री राधा रानी मन्दिर बरसाना 

          श्री जी बरसाना मण्डल ट्रस्ट (रजि०)

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