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श्री राधे 

“श्रील नारायण भट्ट ज़ू जयति”

“श्री नारायण दास गोस्वामी जयति”

??आज की ब्रज रस धारा  

दिनांक 06/08/2018

नाम से नामी वश में हो जाते है

जब हम हनुमान चालीसा का पाठ करते है तो गाते है “महावीर विक्रम बजरंगी, कुमति निवार सुमति के संगी” यहाँ तुलसी बाबा जी ने हनुमान जी के लिए “वीर” शब्द उपयोग नहीं किया“महावीर” कहा.

एक है वीर और एक है महावीर. वीर वह है जो अपनी शक्ति से,बल से, सामर्थ से, संसार को अपने वश में कर ले.

हनुमान जी वीर तो है ही, परन्तु महावीर भी है और महावीर वह है जो भगवान को वश में कर ले.कैसे ? तो आगे तुलसी बाबा कहते है राम नाम का स्मरण करके ही भगवान को अपने वश में किया जा सकता है.

सुमिरि पवनसुत पावन नामू, अपने बस करि राखे रामू”


भावार्थ:-
ध्रुवजी ने ग्लानि से (विमाता के वचनों से दुःखी होकर सकाम भाव से) हरि नाम को जपा और उसके प्रताप से अचल अनुपम स्थान (ध्रुवलोक) प्राप्त किया.

हनुमान्‌जी ने पवित्र नाम का स्मरण करके श्री रामजी को अपने वश में कर रखा है.

नाम जप का अर्थ यही है कि नामी को अपने वश में कर ले. जैसे स्वामी के पीछे सेवक चलता है, उसी प्रकार नाम के पीछे नामी चलते हैं.

राम नाम मनिदीप धरु जीह देहरीं द्वार।

तुलसी भीतर बाहेरहुँ जौं चाहसि उजिआर


भावार्थ:-
तुलसीदासजी कहते हैं, यदि तू भीतर और बाहर दोनों ओर उजाला चाहता है, तो मुख रूपी द्वार की जीभ रूपी देहली पर रामनाम रूपी मणि-दीपक को रख

“भायँ कुभायँ अनख आलस हूँ,नाम जपत मंगल दिसि दसहूँ

सुमिरि सो नाम राम गुन गाथा, करउँ नाइ रघुनाथहि माथा”


भावार्थ:-
अच्छे भाव (प्रेम) से, बुरे भाव (बैर) से, क्रोध से या आलस्य से, किसी तरह से भी नाम जपने से दसों दिशाओं में कल्याण होता है.

भगवान राम का नाम जप में “भाव” हो, “कुभाव” हो, परन्तु“अभाव” नहीं हो.क्योकि यदि भाव से,प्रेम से भगवान को भजा तो उनके मिलने में देर नहीं.

यदि कुभाव से भजा,जैसे रावण आदि राक्षसों ने भजा भगवान का स्मरण तो किया परन्तु मन में बैर भाव लेकर परन्तु फिर भी तर गए.

लेकिन भगवान कहते है कि “अभाव” मत रखना.क्योकि अभाव में प्रभु कैसे आयेगे,

और जब व्यक्ति भाव से कुभाव से भजता है तो फिर संसार का “प्रभाव” उस पर नहीं पडता,और जीवन के अभाव को प्रभु मिटा देते है.

जो वीर को भी अपने वश में कर ले वो महावीर है

श्री हनुमान चालीसा की अगली चौपाई में गोस्वामी जी लिखते है –


“महावीर विक्रम बजरंगी, कुमति निवार सुमति के संगी”


अर्थात –
आप महान वीर और बलवान हैं, वज्र के समान अंगों वाले, ख़राब बुद्धि दूर करके शुभ बुद्धि देने वाले हैं,

हनुमान जी युद्ध में गदा का प्रयोग नहीं करते थे,मुक्के का प्रयोग करते थे,हनुमान जी को महावीर कहा गया है,वीर शब्द भी बहुतो के लिए आया है – भीष्म पितामह, अर्जुन,मेघनाथ.

पर “महावीर” शब्द केवल हनुमान जी के लिए आता है.महावीर. जिसमे पाँच लक्षण हो – विद्यावीर ,धर्मवीर,दानवीर,आदि…वह वीर है

और जो पाँच लक्षण से युक्त वीर को भी अपने वश में करके रखे वो महावीर.भगवान में ये पाँच लक्षण थे और हनुमान जी ने उन्हें भी अपने वश में कर रखा था.

      “सुमिर पवन सुत पावन नामु!अपने वस करि राखे रामू “

महाबीर विक्रम बजरंगी शब्द आया है,विक्रम का अर्थ है –

10,000 हाथियों के बराबर बल  – इंद्र के “1 एरावत” में होता है.

10,000 एरावत जितना बल – “1 दिग्पाल” में होता  है.

10,000 दिग्पाल का बल –  1 इंद्र में होता  है.

10,000 इंद्र का बल – हनुमान जी की सबसे छोटी उगली में होता है.

कितना भी वजन उनके ऊपर हो जो ची भी न करे, न उत्तेजित हो, न बेचेन, व्याकुल हो.ऐसे श्री हनुमान जी महाराज जिनके मुक्के से मेघनाथ बहुत डरता था,हनुमान जी को देखते ही भाग जाता था

जिनके एक कान में कथा दूसरे में कीर्तन है

श्री हनुमान चालीसा की अगली चौपाई है –

कंचन वरन वीराज सुवेसा , कानन कुण्डल कुंचित केशा, 

अर्थात –हनुमान जी  स्वर्ण के समान रंग वाले, स्वच्छ और सुन्दर वेश वाले हैं, आपके कान में कुंडल शोभायमान हैं और आपके बाल घुंघराले हैं.

हनुमान जी के वेश की चर्चा है,सेवक का वेश कैसा होना चाहिये,ताकि सेवा में कोई विघ्न न पड़े.कंचन वर्ण है अर्थात सोने के समान वर्ण है, गोस्वामी जी ने सोने से ही उपमा क्यों दी ?

जैसे सोने के गहने होते है, कोई 23 करेट का, कोई 24 केरेट का, कोई 18 केरेट का, कोई पालिश वाला. परन्तु जब उसे गलाया जाता है

तो सबकी असलियत सामने आ जाती है,कि ये कितना शुद्ध है,पालिश वाला तो पालिश उतरते ही अपने असली रूप लोहे में आ जाता है.

परन्तु जो 24 केरेट का होता है,वह सबसे शुद्ध होता है. उसे कितना भी तपाते रहो उसके अंदर से भी सोना ही सोना निकलेगा,क्योकि वह तो एकदम शुद्ध है.

हनुमान जी भी ऐसे ही है जिनके भीतर भगवान राम बसे है,और तपाने पर राम ही निकलेगे,

और बाकी 23,18, केरेट तो हम सब है जो तपाने पर अपने असली रूप लोहे में आ जायेगे.इसलिए गोस्वामी जी ने कंचन वरन कहा केवल ऊपर से ही नहीं अन्दर से भी कंचन वर्ण के है.

फिर कहा कानन कुंडल,अर्थात उनके कानो में कुंडल है. बच्चा जब गलती करता है तो मास्टर जी या माँ उसके कान ही खीचती है,

हम भी यदि गलती करते है तो कान ही पकड़ते है,क्योकि कान में एक्यूप्रेशर (acupressure point)का पोइंट होता है जिसे खीचते ही बुद्धि आ जाती है.

हनुमान जी कानो में कुंडल पहने हुए है.सदा सर्तक है सावधान है.

कौन से कुंडल हनुमान जी पहने हुए है – उनके एक कान में “कथा” का कुंडल और दूसरे कान में “कीर्तन” का कुंडल है वे कह रहे है यही मेरे आभूषण है.क्योकि –

जिन्ह हरि कथा सुनी नहीं काना , श्रवण रंध्र अहि भवन समाना।।

अर्थात – जिस व्यक्ति ने जीवन में कभी सत्संग नहीं सुना, भगवान की कथा नहीं सुनी. उसके कान का छेद सांप के बिल के समान व्यर्थ है.

          “श्री श्याम सुन्दर गोस्वामी जी ”

      सेवाधिकारी श्री राधा रानी मन्दिर बरसाना 

          श्री जी बरसाना मण्डल ट्रस्ट (रजि०)

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श्री हनुमान जी ज्ञान और गुण के सागर है

श्री हनुमान चालीसा की पहली चौपाई है – जय हनुमान ज्ञान गुन सागर, जय कपीस तिहुं लोक उजागर


अर्थात –
श्री हनुमान की जय हो जो ज्ञान और गुण के सागर हैं, तीनों लोकों में जिनका यश फैला हुआ है ऐसे श्री हनुमान की जय हो.

इन्हें ज्ञान, गुण का सागर कहा है मंदिर नहीं. एक फर्क है मंदिर में पवित्र होकर जाया जाता है.

जबकि सागर में स्वच्छ और पवित्र होने जाते है, एक बात और है कि जैसे सागर होता है गंभीर,विशाल, अथाह है, इसी प्रकार हनुमान जी के भी ज्ञान और गुण की कोई सीमा नहीं है.दोनों ही अथाह है.

तीन लोक (स्वर्ग, भू और पाताल) आपसे प्रकाशमान हैं. अत: आप कपीस यानी वानरों के राजा हैं.

इनका पहला नाम हनुमान लिखा है. “जय हनुमान”, जब इन्होंने सूर्य को मुंह में रख लिया था तब इन्द्र ने वज्र का प्रहार कर सूर्य को मुक्त कराया था,

प्रहार से इनकी ठोढ़ी टूट गई थी. संस्कृत में ठोढ़ी को हनु कहा है, अत: इनका एक नाम हनुमान पड़ा. ये इसका भौतिक अर्थ है.

लेकिन हनुमान शब्द का एक महत्वपूर्ण आध्यात्मिक पक्ष ये है कि जो अपने मान का हनन कर दे वो श्रीहनुमानजी है. हनुमान जी के भक्त को निराभिमानी होना चाहिए.

परमात्मा अहंकार शून्य चित्त में ही उतरते हैं. योग्यता मनुष्य की पहचान कैसे बन जाती है देखें, हनुमानजी को कपीस लिखा है, लेकिन वानरों के राजा सुग्रीव थे,

श्री हनुमान जी तो उनके मंत्री थे. परन्तु तुलसीदासजी का मानना है जो लोगों के दिल पर राज करे वो असली राजा है.

इसलिए उन्होंने हनुमानजी को राजा संबोधित किया. श्री हनुमानजी पद से नहीं, पद हनुमानजी के नाम से जाना जा रहा है.

योग्यता से प्रतिष्ठा को किस प्रकार जोड़ा जा सकता है यह इस चौपाई से पता चलता है, तिहुंलोक उजागर का अर्थ है अपने सद्कर्मों से प्रतिष्ठा अर्जित की जाए तथा उसे सीमित न रखें,

उसका विस्तार हो ताकि अधिक से अधिक लोग उससे प्रेरित हो सकें.श्री हनुमान जी केवल पूजनीय नहीं प्रेरक भी हैं.

मै केवल राम का दास हूँ.

श्री हनुमान चालीसा की अगली चौपाई में गोस्वामी जी लिखते है –

“रामदूत अतुलित बल धामा, अंजनी पुत्र पवन सुता नामा” 

अर्थात – आप श्रीराम के दूत, अपरिमित शक्ति के धाम,जिनके बल की कही तुलना भी नहीं की जा सकती. श्री अंजनि के पुत्र और पवनपुत्र नाम से जाने जाते हैं.

यहाँ रामदूत शब्द आया है,दूत तो अन्तरंग होता है स्वामी का संदेशवाहक होता है जो दुश्मनों में मन में भय पैदा कर दे और स्वजनों के मन में विश्वास पैदा कर दे वो दूत है और हनुमान जी ने ये दोनों की काम किये,

भगवान राम की इतनी प्रशंसा की कि रावण का मनोबल तो पहले ही टूट गया.और युद्ध से पहले ही दुश्मन का मनोबल यदि तोड़ दिया जाए तो आधा युद्ध तो वैसे ही जीत लिया समझो.

लंका में पहुँचकर रावण ने, जानकी जी ने, और विभीषण जी ने हनुमान जी से पूँछा-  तुम कौन हो ?और हनुमान जी ने अपना नाम नहीं बताया,यही कहा में तो रामदूत हूँ.

“रामदूत मैं मातु जानकी, सत्य सपथ करुनानिधान की”

अर्थात – हे माता! जानकी मैं श्री रामजी का दूत हूँ, करुणानिधान की सच्ची शपथ करके कहता हूँ.

रावण ने पूँछा – तुम कौन हो ?

हनुमान जी – “जाके बल लवलेस तें जितेहूँ चराचर झारि

                    तासु दूत मै जा करि आनेहू प्रिय नारी”

अर्थात – जिनके लेशमात्र बल से तुमने चराचर जगत को जीत लिया, और जिनकी प्रिय पत्नी को तुम हर लाए हो, मै उन्ही का दूत हूँ.

हनुमान जी सोचते है मेरे बारे में ये रावण पूँछता है? प्रभु श्री राम के बारे में पूँछता तो बताता. क्योकि मै अंजनेय हूँ, नहीं ? मै पवनपुत्र हूँ, नहीं ? मै हनुमान हूँ, नहीं ? इन सबसे पहले भी मै कुछ था.

हनुमान जी अपना नाम पता नहीं बताते,भगवान श्री राम की महिमा बताते है और कहते है -मै उनका ही दास हूँ.

दूत हूँ, पर जरा अपनी तरफ नजर उठकर तो देख तू कौन है ? तू काम का दास है ,तू नाम का दास है, तू दाम का दास है, और मै केवल राम का दास हूँ.

फिर कहा – अंजनी पुत्र, पवन सुत नामा”  


अर्थात –
श्री अंजनी के पुत्र और पवन पुत्र नाम से आप जाने जाते है.

यहाँ पहले माता अंजनी का नाम आया है,क्योकि पिता से ज्यादा माँ से बच्चे में संस्कार आते है.

इसलिए जब हम स्तुति गाते है तो तो शुरुवात भी मात पिता तुम मेरे …,त्वमेव माता च पिता त्वमेव…,माता रामौ च पिता रामचन्द्र….

माता अंजनी ने तीन देवो की आराधना की, और सूर्यदेव से तेज,शिव जी से दिव्य भक्त, और पवन देव से बल, ऐसे गुणों से संपन्न पुत्र हो, ऐसा माँगा.

वे यदि बाल हनुमान जी को दूध पिलाती तो पिलाते-पिलाते भगवान की कथाये सुनाती,जब भगवान रावण वध के बाद अयोध्या लौंटने लगे तो रास्ते में हनुमान जी ने रास्ते में अंजनी माँ के दर्शन की लालसा भगवान के समक्ष रखी,

भगवान बोले हनुमान जिस का तुम्हारे जैसा पुत्र को उस माँ के तो मै भी दर्शन करूँगा.

हनुमान जी ने प्रणाम किया,माँ ने गले से लगाया,और पूँछा – पुत्र हनुमान ! रावण,कुम्भकर्ण,मेघनाथ को किसने मारा ?


हनुमान जी –
माता! रावण और कुम्भकर्ण को प्रभु श्रीराम ने मारा.और मेघनाथ को लक्ष्मन जी ने मारा.इतना सुनते ही अंजनी माँ ने हनुमान जी को एक थप्पड़ मारा.और बोली तुमने मेरे दूध को लजा दिया यदि इन सब को श्री राम ने मारा तो तुमने क्या किया ?

हनुमान जी तो चुप खड़े रहे, पर भगवान बोले – माँ! वास्तव में तो केवल देखने के लिए मैंने रावण और अन्य राक्षसों को मारा वास्तव में तो हनुमान ने ही मारा है

हनुमान सभी राक्षसों को मौत की कगार पर लाकर फिर मेरे पास लाते क्योकि इन सभी राक्षसों को मेरे हाथो से मुक्ति मिलनी थी, ये बात हनुमान जानते थे,

इसलिए ये पूरी तरह से नहीं मारते, मेरे पास भेज देते.और मै उनकी मुक्ति कर देता.इसमें हनुमान का दोष नहीं है.हनुमान चाहते तो अकेले ही युद्ध जीत सकते थे.

वास्तव में ये देश माताओं के बलिदान के कारण ही ऊँचा उठा है,सुमित्रा जी ने अपने पुत्र लक्ष्मण जी से भी यही कहा जहाँ श्री राम है, वही तुम्हारी अयोध्या है,

और जब लक्ष्मण जी को शक्ति लगी और हनुमान जी संजीवनी लेकर लौटे तो, लौटते हुए अयोध्या बीच में पड़ी तब सभी को पता चला कि लक्ष्मण जी को शक्ति लगी है.

तब कौसल्या जी बोली –बिना लक्ष्मण के राम को अयोध्या आने कि आवश्यकता नहीं है, इस पर सुमित्रा जी बोली – हनुमान श्री राम से जाकर कहना लक्ष्मण नहीं है तो क्या हुआ अभी शत्रुध्न बाकी है,

उन्हें में भेजती हूँ. ये भारत की संस्कृति है जहाँ माँ के संस्कार और विचार ऐसे उच्च है.

हमारे देश में पत्नी को धर्म पत्नी कहा जाता है पति को नही क्योकि माताओं के कारण धर्म है.उनके त्याग और बलिदान पर धर्म खड़ा हुआ है.

गुरु चरणों की रज से मन रूपी दर्पण साफ़ करे

हनुमान चालीसा की शुरुवात में पहला दोहा गुरु की वंदना से शूरु हुआ है. –

               “श्री गुरु चरण सरोज रज, निज मन मुकुर सुधारी”

अर्थात – गुरु के चरणों से की रज् से अपने मन को सुधारने की बात कही गई है.क्योकि मन शुद्ध जरुरी है क्योकि  परमात्मा को बसाने के लिए एकमात्र स्थान है “हृदय”

हृदय से स्वभाव बनता है और मस्तिष्क से व्यवहार. बाहरी संसार मनुष्य के व्यवहार से संचालित होता है और भीतरी जगत मनुष्य के स्वभाव से नियंत्रित होता है.

पहली श्रेणी में वे लोग होते हैं, जो “व्यवहार से स्वभाव” को बनाते हैं, जबकि दूसरी श्रेणी के लोग “स्वभाव से व्यवहार” बनाते हैं.

दोनों ही प्रकार के लोग अलग-अलग परिणाम देते हैं. पहली श्रेणी के लोग कुशल होते हैं,

किंतु उनके कार्यकलाप स्वार्थ से प्रेरित होंगे. दूसरी श्रेणी के लोग सर्वप्रिय रहेंगे और उनकी कार्यशैली में ईमानदारी रहेगी. ऐसे लोग “स्वयं का मंगल तथा दूसरों का कल्याण” करेंगे.

आप दूसरों के संकट तभी हर सकते हैं, जब आपके भीतर शुभ करने की वृत्ति हो. इसलिए अपना स्वभाव साधें.

इसलिए गुरु चरणों की रज बड़ी महत्त्वपूर्ण है. रज दो प्रकार की होती है पहली संसार की रज और दूसरी गुरु के चरणों की रज,रज की विशेषता क्या ?रज से बर्तन साफ़ भी होता है और मैला भी होता है.

इसी तरह मन रूप बर्तन भी संसार की विषय वासनाओ से मैला हो जाता है तो गुरु चरणों की रज से ही मन रूपी बर्तन को साफ़ करना चाहिये.

जैसे दर्पण होता है बोलता कुछ नहीं है सब संकेत कर देता है,चेहरे पर कुछ लगा हो,कालर मुडी हुई हो,आँख में कीचड लगा हो सब का केवल संकेत कर देता है कहता कुछ भी नहीं है.

इसी तरह गुरु होते है गुरु कम बोलते है,केवल संकेत कर देते है.

रघुनाथ जी के पावन चरित्रों का वर्णन ही आनंद देने वाला है

हनुमान चालीसा की अगली चौपाई में गोस्वामी जी कहते है – “वरनऊ रघुवर विमल यश, जो दयाक फलचारी”

यहाँ “वरनऊ” शब्द के गोस्वामी जी दो अर्थ बताते है पहला वरनऊ अर्थात “वर्णन करना”. गुरु के द्वारा जब मन निर्मल हो गया अर्थात मन में से ईर्ष्या, राग, द्वेष, विकार, निकल गए,

तब मन निर्मल हो गया. और अब निर्मल मन से जो भी वर्णन होगा वह बड़ा ही सुन्दर होगा.

और जो वर्णन आनंद, उमंग दे, जो वर्णन सेवा, धर्म, परमार्थ में लगाये, भजन पैदा करे, वह वर्णन ईश्वरीय है.

इसलिए यहाँ गोस्वामी जी ने कहा “रघुवर विमल यश” अर्थात रघुनाथ जी के पावन चरित्रों,उनके यश का वर्णन ही आनंद देने वाला है.

वही सबसे अच्छा वर्णन है.वरना संसार में दिन-रात हम न जाने किन-किन व्यर्थ की बातो का वर्णन करते रहते है.

दूसरा वरनऊ का अर्थ है.“वरण करना”,विवाह करना,जैसे विवाह होता है और दूल्हा के साथ दुल्हन फेरे लगाती है फिर विवाह होने पर निश्चिंत हो जाती है कि अब मेरे पति मेरी रक्षा करेगे,

उनपर मेरा सारा दायित्व है इसी तरह जब हम मंदिर जाते है तब सबसे पहले भगवान के दर्शन करते है फिर परिक्रमा अर्थात फेरे लगाते है,

फिर कुछ देर मंदिर में बैठते है.इसका यही अर्थ होता है कि भक्त का विवाह भगवान से हो गया,अब भक्त निश्चिंत सबकुछ ठाकुर जी के ऊपर छोड़कर बैठ जाता है.

जब विवाह होता है तब दोनों वर और वधु पक्ष के जब वर और वधु ढूंढते है तो घर, वार, गुण, संस्कार, देखते है और भगवान से अच्छा वर और कौन होगा.और भगवान भी देखते है और वे किसे अपनाते है ?


“निर्मल मन जन सो मोहि पावा मोहे कपट छल छिद्र न भावा”


अर्थात –
 जिनका मन निर्मल होता है , वही आनंद स्वरूप ईश्वर को पा सकते हैं ,क्योंकि परमात्मा को छल कपट आदि दुर्गुणों की गदंगी नहीं भाती. अपने कल्याण की कामना करने वालों को इसीलिए इनसे सदैव दूर ही रहना चाहिए.

बल विद्या बुद्धि तीनो परोपकारी चाहिये

हनुमान चालीसा की अगली चौपाई में गोस्वामी जी कह रहे है –

 ” बुद्धिहीन तनु जानिके सुमिरौ पवन कुमार,

     बल, बुद्धि, विद्या देहु मोंही हरहु कलेसा विकार, 


अर्थात –
 स्वयं को बुद्धिहीन जानते हुए, मैं पवनपुत्र श्रीहनुमान का स्मरण करता हूँ जो मुझे बल, बुद्धि और विद्या प्रदान करेंगे और मेरे मन के दुखों का नाश करेंगे.

यहाँ गोस्वामी जी बहुत बड़ी बात कह रहे है अपने को “बुद्धिहीन” कह रहे है जिन्होंने रामचरित मानस की रचना की और इसी तरह के अन्य ग्रन्थ लिखे वे अपने को बुद्धिहीन कह रहे है.

आज यदि किसी से कहे कि आपके पास पैसा कम है तो शायद स्वीकार कर ले परन्तु यदि ये कहा कि आपकी बुद्धि उससे कम है तो शायद झगड़ा ही हो जायेगा,

सभी अपने को बुद्धिमान मानना कहलाना चाहते है,और जो अपने को बुद्धमान माने वह उसका अहंकार है, कोई नहीं चाहता कि हम बुद्धिहीन हो.कम बुद्धि के हो.

लेकिन वास्तव में बुद्धिहीन कौन है ? जिसे अपने भीतर का अँधेरा दिखायी दे जाए जिसे ये देख जाए कि मै किस अँधेरे में खड़ा हूँ वह बुद्धिमान है विद्वान है.

वरना लोगो को कुछ ज्ञान की बात बताने पर लोगो की प्रतिक्रिया क्या होती है – हमको मत बताओं,हमें सब मालूम है,हमको कुछ आता नहीं क्या.

जिसने ऐसा कहा समझ लो वह आदमी बुढा हो गया.और दूसरी बुद्धि हीनता क्या है? हमने अपने को शरीर मान रखा है ये बुद्धिहीनता है.

  ” ईश्वर अंश, जीव अविनाशी, चेतन अमल सहज सुख राशि”

अर्थात – प्रत्येक जीव ईश्वर का अंश है और यह अंशरूपी आत्मा ही अविनाशी है. शरीर को दुख हो सकता है, लेकिन आत्मा को नहीं होता.
फिर आगे कहा – “सुमिरौ पवन कुमार” व्यक्ति जब जहाँ जैसे है केवल हनुमान जी का सुमिरन कर ले उन्हें याद कर ले,मंदिर भी जाने की जरुरत नहीं है.

क्योकि याद का उल्टा होता है दया यहाँ हमने याद किया सुमिरन किया वही तुरंत कृपा आ जायेगी.

फिर आगे की चौपाई में कहा – बल, बुद्धि, विद्या देहु मोंही हरहु कलेसा विकार”


अर्थात –
 मुझे बल, बुद्धि और विद्या प्रदान करें और मेरे मन के दुखों का नाश करें.तीन चीजे यहाँ माँगी है “बल”,”बुद्धि” और “विद्या”

बल तो हो पर कैसा बल हो साधना का बल हो, संकल्प का बल हो, सदाचार का बल हो, शुभ कार्यों को करने का आत्म बल हो, विद्या कैसी हो ?

जो ज्ञान की ओर ले जाए, प्रकाश की ओर ले जाए, भक्ति की ओर ले जाए, भगवान की ओर ले जाए.

बुद्धि कैसी हो ?जो चिंतन करने वाली हो, विचारवाली हो, प्रवाही हो, तरल हो, शीतल हो.जडवत न हो.हनुमान जी बहुत सोच विचार कर कार्य करते है,

इतने बड़े-बड़े कार्य उन्होंने किये, पर कही भी उनसे चूक नहीं हुई.क्यों ?पहले विचार करते है फिर कार्य करते है,ऐसी विचारवान बुद्धि होनी चाहिये,

और हम कार्य पहले करते है विचार बाद में करते है,इसलिए अंत में पछताना पडता है.

इसलिए तीनो बल, विद्या, और बुद्धि परमार्थ में लगी होनी चाहिये,परोपकारी स्वभाव की चाहिये.

क्योकि बल का प्रयोग विद्या का प्रयोग, और बुद्धि का प्रयोग, यदि परमार्थ में, परोपकार में न किया गया, तो तीनो व्यक्ति के विनाश का कारण भी बन सकती है.

श्री हनुमान चालीसा – हनुमान जी महाराज का वांगमय स्वरुप

श्री गुरु चरण सरोज रज, निज मन मुकुर सुधारी,

वरनऊ रघुवर विमल यशो जो दयाक फलचारी,

बुद्धिहीन तनु जानिके सुमिरौ पवन कुमार,

     बल, बुद्धि, विद्या देहु मोंही हरहु कलेसा विकार,


अर्थात –
सद्गुरु के चरण कमलों की धूल से अपने मन रूपी दर्पण को स्वच्छ कर, श्रीराम के दोषरहित यश का वर्णन करता हूँ जो धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष रूपी चार फल देने वाला है। स्वयं को बुद्धिहीन जानते हुए, मैं पवनपुत्र श्रीहनुमान का स्मरण करता हूँ जो मुझे बल, बुद्धि और विद्या प्रदान करेंगे और मेरे मन के दुखों का नाश करेंगे.

   जय हनुमान गयान गुन सागर, जय कपीस तिहूँ लोक उजागर  1.

    राम दूत अतुलित बल धामा, अंजनी – पुत्र पवन सुता नामा  2.


अर्थात –
श्री हनुमान की जय हो जो ज्ञान और गुण के सागर हैं, तीनों लोकों में वानरों के ईश्वर के रूप में विद्यमान श्री हनुमान की जय हो,आप श्री राम के दूत अपरिमित शक्ति के धाम श्री अजनी के पुत्र और पावन पुत्र नाम से जाने जाते है.

महावीर विक्रम बजरंगी, कुमति निवार सुमति के संगी   3. 

कंचना वरना वीराज सुवेसा , कानन कुण्डल कुंचित केसा  4. 


अर्थात – 
आप महान वीर और बलवान हैं, वज्र के समान अंगों वाले, ख़राब बुद्धि दूर करके शुभ बुद्धि देने वाले हैं,आप स्वर्ण के समान रंग वाले, स्वच्छ और सुन्दर वेश वाले हैं, आपके कान में कुंडल  शोभायमान हैं और आपके बाल घुंघराले हैं

हाथ वज्र अरु ध्वजा विराजे, कंधे मूंज जनेवु साजे   5. 

संकरा सुवना केसरी नंदनतेजा प्रताप महा जग बंदन  6. 


अर्थात – 
आप हाथ में वज्र (गदा) और ध्वजा धारण करते हैं, आपके कंधे पर मूंज का जनेऊ शोभा देता है,आप श्रीशिव के अंश और श्रीकेसरी के पुत्र हैं, आपके महान तेज और प्रताप की सारा जगत वंदना करता है

विद्यावान गुनी अति चातुर, राम काज करिबे को आतुर  7. 

प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया, राम लखन सीता मन बसिया  8. 

अर्थात – आप विद्वान, गुणी और  अत्यंत बुद्धिमान हैं, श्रीराम के कार्य करने के लिए सदैव उत्सुक रहते हैं,आप श्रीराम कथा सुनने के प्रेमी हैं औरआप श्रीराम, श्रीसीताजी और श्रीलक्ष्मण के ह्रदय में बसते हैं.

 

सुक्ष्म रूपधरी सिया ही दिखावा, विकट रूप धरी लंक जरावा   9.

       भीम रूप धरी असुर संहारे, रामचंद्र के काज सवारे      10.

 

अर्थात – आप सूक्ष्म रूप में श्रीसीताजी के दर्शन करते हैं, भयंकर रूप लेकर लंका का दहन करते हैं, विशाल रूप लेकर राक्षसों का नाश करते हैं और श्रीरामजी के कार्य में सहयोग करते हैं

लाए सजीवन लखन जियाये, ,श्री रघुवीर हरषी उर लाये   11.

 रघुपति किन्ही बहुत बडाई, तुम मम प्रिय भरत समा भाई  12.

अर्थात – आपने संजीवनी बूटी लाकर श्रीलक्ष्मण की प्राण रक्षा की, श्रीराम आपको हर्ष से हृदय से लगाते हैं। श्रीराम आपकी बहुत प्रशंसा करते हैं और आपको श्रीभरत के समान अपना प्रिय भाई मानते हैं. आपका यश हजार मुखो से गाने योग्य है ऐसा कहकर श्री राम आपको गले लगाते है.  

सहस्त्र वदन तुम्हारो यश गावे, ,अस कही श्रीपति कंठ लगावे    13. 

  सनाकादिका ब्रह्मादी मुनीषा  ,नारद शारद सहित अहीसा      14.

अर्थात –  आपका यश हजार मुखों से गाने योग्य है, ऐसा कहकर श्रीराम आपको गले से लगाते हैं। सनक आदि ऋषि, ब्रह्मा आदि देव और मुनि, नारद, सरस्वती जी और शेष जी –

यम कुबेर दिगपाल जहाँ ते,कवि कोविद कहि सखी काहाँ ते  15.

 तुम उपकार सुग्रीव ही कीन्हा, राम मिलाये राजपद दीन्हा  16.


अर्थात – 
यम, कुबेर आदि दिग्पाल भी आपके यश का वर्णन नहीं कर सकते हैं, फिर कवि और विद्वान कैसे उसका वर्णन कर सकते हैं. आपने सुग्रीव का उपकार करते हुए उनको श्रीराम से मिलवाया जिससे उनको राज्य प्राप्त हुआ.

 तुम्हारो मंत्र विभीषन माना, लंकेश्वर भये सब जग जन. 17.

   युग सहस्र योजन पर भानु, लील्यो ताहि मधुर फल जानू 18.


अर्थात – 
आपकी युक्ति विभीषण माना और उसने लंका का राज्य प्राप्त किया, यह सब संसार जानता है. आप सहस्त्र योजन दूर स्थित सूर्य को मीठा फल समझ कर खा लेते हैं.

 प्रभु मुद्रिका मेली मुख माहि, ,जलधि लांघी गए अचरज नही   19.

           दुर्गम काज जगत के जेते, सुगम अनुग्रह तुम्हारे तेते       20.

अर्थात – प्रभु श्रीराम की अंगूठी को मुख में रखकर आपने समुद्र को लाँघ लिया, आपके लिए यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है। इस संसार के सारे कठिन कार्य आपकी कृपा से आसान हो जाते हैं.

राम दुलारे तुम रखवारे,होत आज्ञा बिनु पैसारे      21.

 सब सुख है तुम्हारी शरण, तुम रक्षक कहू को डरा न  22.

अर्थात – श्रीराम तक पहुँचने के द्वार की आप सुरक्षा करते हैं, आपके आदेश के बिना वहाँ प्रवेश नहीं होता है, आपकी शरण में सब सुख सुलभ हैं, जब आप रक्षक हैं तब किससे डरने की जरुरत है.

आपन तेज सम्हारो आपे, ,तीनो लोक आप ते कापे    23.

भूत पिशाच निकट नहीं आव, महाबीर जब नाम सुनावे  24.

अर्थात – अपने तेज को आप ही सँभाल सकते हैं, तीनों लोक आपकी ललकार से काँपते हैं. केवल आपका नाम सुनकर ही भूत और पिशाच पास नहीं आते हैं.

    नासे रोग हरे सब पीरा जपत निरंतर हनुमत बीरा          25.

संकट से हनुमान छुडावे , मन, क्रम, वचन, ध्यान जो लावे   26.


अर्थात –
 महावीर श्री हनुमान जी का निरंतर नाम जप करने से रोगों का नाश होता है और वे सारी पीड़ा को नष्ट कर देते हैं. जो श्री हनुमान जी का मन, कर्म और वचन से स्मरण करता है, वे उसकी सभी संकटों से रक्षा करते हैं.

सब पर राम तपस्वी राजा ,तिनके काज सकल तुम साजा 27.

     और मनोरथ जो कोई लावे, सोई अमित जीवन फल पावे   28.


अर्थात – 
सबसे पर, श्रीराम तपस्वी राजा हैं, आप उनके सभी कार्य बना देते हैं. उनसे कोई भी इच्छा रखने वाले, सभी लोग अनंत जीवन का फल प्राप्त करते हैं.

चारों युग परताप तुम्हारा, है प्रसिद्धि जग उजियारा   29.

साधू संत के तुम रखवारे, असुर निकंदन राम दुलारे   30.

अर्थात – आपका प्रताप चारों युगों में विद्यमान रहता है, आपका प्रकाश सारे जगत में प्रसिद्ध है. आप साधु- संतों की रक्षा करने वाले, असुरों का विनाश करने वाले और श्रीराम के प्रिय हैं.

 अष्टसिद्धि , नौ निधि के, दाता  असवर दीं जानकी माता    31.

   राम रसायन तुम्हारे पासा, सदा रहो रघुपति के दासा     32.


अर्थात – 
आप आठ सिद्धि और नौ निधियों के देने वाले हैं, आपको ऐसा वरदान माता सीताजी ने दिया है. आपके पास श्रीराम नाम का रसायन है, आप सदा श्रीराम के सेवक बने रहें.

      तुमरे भजन राम को पावे,  जन्म जन्म के दुख विसरावे    33.

     अन्तकाल रघुपति पुर जाई, जहाँ जन्म हरी–भक्त कहाई    34. 

अर्थात – आपके स्मरण से जन्म- जन्मान्तर के दुःख भूल कर भक्त श्रीराम को प्राप्त करता है. और अंतिम समय में श्रीराम धाम (वैकुण्ठ) में जाता है और वहाँ जन्म लेकर हरि का भक्त कहलाता है.

         और देवता चित्त न धरई, हनुमत से ही सर्व सुख कराई   35.         

संकट कटे मिटे सब पीरा, जो सुमिरि हनुमंत बल्बीरा    36. 


अर्थात – 
दूसरे देवताओं को मन में न रखते हुए, श्री हनुमान से ही सभी सुखों की प्राप्ति हो जाती है। जो महावीर श्रीहनुमान जी का नाम स्मरण करता है, उसके संकटों का नाश हो जाता है और सारी पीड़ा ख़त्म हो जाती है॥

   जय जय जय हनुमान गोसाई,कृपा करहु गुरुदेव की नीई   37.

     जो सत् बार पाठ कर कोई , छूटे बंदी महा सुख होई    38.


अर्थात – 
भक्तों की रक्षा करने वाले श्री हनुमान की जय हो, जय हो, जय हो, आप मुझ पर गुरु की तरह कृपा करें. जो कोई इसका सौ बार पाठ करता है वह जन्म-मृत्यु के बंधन से छूटकर महासुख को प्राप्त करता है.

जो यह पढ़े हनुमान चालीसा, होय सिद्ध साखी गौरीसा 39.
तुलसीदास सदा हरि चेरा, कीजै नाथ हृदय मह डेरा 40.


अर्थात – 
जो इस श्री हनुमान चालीसा को पढ़ता है उसको श्री शंकर भगवान के समान सिद्धि प्राप्त होती है. श्री तुलसीदास जी कहते हैं, मैं सदा श्रीराम का सेवक हूँ, हे स्वामी! आप मेरे हृदय में निवास कीजिये.

                                                      “पवन तनया संकट हरन, मंगला मूर्ति रूपा,

 राम लखन सीता सहित हृदय बसहु सुरभूप” 


अर्थात –
पवनपुत्र, संकटमोचन, मंगलमूर्ति श्री हनुमान आप देवताओं के ईश्वर श्रीराम, श्रीसीता जी और श्रीलक्ष्मण के साथ मेरे हृदय में निवास कीजिये.

राम राज्य – जहाँ इंसान से लेकर जीव जंतु सभी को न्याय मिलता था

एक दिन श्री राम ने एक कुत्ते को रोते हुए सुना,भगवान ने तुरंत लक्ष्मण जी को बुलाया और कहा जाकर देखो कि कुत्ता क्यों रो रहा है,लक्ष्मण जी कुत्ते के पास गए और सारा वृतांत सुनकर उसे भगवान श्री राम के पास लाये.

भगवान श्री राम ने कहा – तुम क्यों रो रहे थे ? हमें कारण बताओ?


कुत्ता बोला –
प्रभु ! में एक गली में था तभी एक साधू आया और उसने मुझे पत्थर मारकर घायल कर दिया. देखिए मेरे शरीर पर लगे घाव से अभी भी रक्त बह रहा है.

वह साधू अभी भी गली में ही होगा. कृपया मेरे साथ न्याय कीजिए और अन्यायी को, उसके दुष्कर्म का दंड दीजिए.श्रीराम के आदेश पर साधु को दरबार में बुलाया गया.

भगवान श्रीराम ने साधू से पूंछा – आपने इस कुत्ते को पत्थर मारा ?

साधू ने कहा – जी महाराज ! जब मै गली से होकर जा रहा था तब ये मुझे देखकर भोकने लगा. जब ये चुप नहीं हुआ तो मैंने इसे पत्थर मारा.

श्रीराम ने साधु से कहा – इसका तो स्वभाव ही है भोकना, सो ये तो भोकता ही, पर एक साधू होने के नाते तुम्हें किंचित भी हिंसा नहीं करनी चाहिए थी. तुमने गंभीर अपराध किया है और इसके लिए दंड के भागी हो.

श्रीराम ने साधू को दंड देने के विषय पर दरबारियों से चर्चा की. दरबारियों ने एकमत होकर निर्णय लिया – चूंकि इस बुद्धिमान कुत्ते ने यह वाद प्रस्तुत किया है अतएव दंड के विषय पर भी इसका मत ले लिया जाए.

कुत्ते ने कहा – राजन, इस नगरी से पचास योजन दूर एक अत्यंत समृद्ध और संपन्न मठ है जिसके महंत की दो वर्ष पूर्व मृत्यु हो चुकी है.

कृपया इस साधू को उस मठ का महंत नियुक्त कर दें.श्रीराम और सभी दरबारियों को ऐसा विचित्र दंड सुनकर बड़ी हैरानी हुई. उन्होंने कुत्ते से ऐसा दंड सुनाने का कारण पूछा.

कुत्ते ने कहा – “मैं ही दो वर्ष पूर्व उस मठ का महंत था. ऐसा कोई सुख, प्रमाद, या दुर्गुण नहीं है जो मैंने वहां रहते हुए नहीं भोगा हो.

इसी कारण इस जन्म में मैं कुत्ता बनकर पैदा हुआ हूं. इसलिए इसे भी उसी मठ का महंत बना दीजिये.

इस तरह श्रीराम उस कुत्ते कि बुद्धिमानी से और उसके पश्चाताप से बड़े प्रसन्न हुए और उन्होंने उस कुत्ते को न्याय दिया.राम राज्य ऐसा ही था जहाँ कोई दुखी पीड़ित नहीं था,सभी को बराबर से न्याय मिलता था.

राम कथा जीवन के दोष मिटाती है

राम राज्य के लिए कहा उत्तर काण्ड में कहा गया है-


अल्प मृत्यु नहिं कवनिउ पीरा,सब सुन्दर सब बिरुज सरीरा 

नहिं दरिद्र कोउ दुखी ना दीना नहिं कोउ अबुध ना लच्छन हीना”


अर्थात – छोटी अवस्था में मृत्यु नहीं होती ना किसी को कोई पीड़ा होती है सभी के शरीर सुन्दर और नीरोग है ना कोई दरिद्र है न दुखी है और न दीन ही है ना कोई मूर्ख है और ना शुभ लक्षणों से हीन ही है.

सब कुछ राम राज्य में है पर जब तक दोष है तब तक दरिद्रता मिट जाए भूख दीनता हीनता सब मिल जाए पर दोष नहीं मिटा तो सब बेमानी है

और राम के रहते भी दोष थे जगन्माता जानकी में ही लोगो में दोष ढूँढ लिए,भगवान जानते थे जानकी जी निर्दोष है पर लोगो के मुह बंद नहीं कर सकते थे.इसलिए जीवन निर्दोष चाहिये.

ये सारी चीजे तो रावण के राज्य में भी थी लोगो के तो घर में सोना हुआ करता है परन्तु रावण की लंका में तो सभी के घर सोने के थे.

कोई दरिद्र,भूखा,नहीं था,दैहिक दैविक भौतिक तप किसी को नहीं थे क्योकि सारे देवता तो रावण के सेवक बने हुए थे,जब चाहे पानी बरसा ले,जब चाहे जो करे.

 

राम राज्य तो केवट से पूँछो – नाथ आजु मै काह न पावा,मिटे दोष दुःख दारिद दावा”


अर्थात – हे नाथ ! आज मैंने क्या नहीं पाया मेरे दोष” ,दुःख और दरिद्रता की आग आज बुझ गई है.

शान्ति मौन रहने से नहीं मिलती बाजार से खरीदी नहीं जाती,गुरु के पास भी नहीं मिलती, शान्ति माँगी नहीं जाती खरीदी नहीं जाती,

शान्ति की तो फसल उगाई जाती है त्याग और तपस्या से प्रेम के जल से यदि अशांति है तो ये चिंता मत करो कि शान्ति कैसे आये ?

चिंतन ये करो कि अशांति हो क्यों रही है कारण खोजिये?कही मन दोष पूर्ण तो नहीं ? जीवन में कही दोष तो नहीं ?

जिसके जीवन में सब कुछ है पर दोष नहीं मिटा तो अभी बहुत कुछ सुधारने की जरुरत है,क्या ?मन को दोष मुक्त करना है,मन जब तक दोष पूर्ण रहता है तब तक अशुद्ध रहता है मन शुद्ध चाहिये

,आनंदित चाहिये. और मन भजन से शांत नहीं होता, बल्कि जब मन शांत होता है तब भजन होता है अशांत मन से तो माला केवल उगलियों पर फिरती है और भगवान को निर्मल मन ही चाहिये-

निर्मल मन जन सो मोहि पावा, मोहि कपट, छल चित्त न भावा”

इसलिए जब जीवन,मन दोषपूर्ण होता है तो राम कथा जीवन के दोष मिटाती है.

श्री राधे 

“श्रील नारायण भट्ट ज़ू जयति”

“श्री नारायण दास गोस्वामी जयति”

??आज की ब्रज रस धारा  

दिनांक 05/08/2018

संत का सानिध्य ही कल्याणकारी होता है

जब भगवान श्री राम ने लीला में मेघनाथ के हाथो अपने को बांध लिया तब नारद जी ने गरुड़ को भेजा सर्पो के भक्षक गरुड़ जी बंधन काटकर गए तब उनके ह्रदय में बड़ा भारी विषाद उत्पन्न हुआ.

वे सोचने लगे जो व्यापक विकाररहित वाणी के पति और माया मोह से परे ब्रह्म परमेश्वर है.

उन्ही ने श्री राम के रूप में अवतार लिया है परन्तु इन्हें देखने से लगता है कि क्या ये वही हैजिनका नाम जपकर मनुष्य संसार बंधन से छूट जाते है उन्ही राम को एक तुच्छ राक्षस ने नाग पाश में बाँध लिया.                             

 “ब्यापक ब्रहा बिरज बागीसा ,माया मोह पार परमीसा                                    

सो अवतार सुनेहूँ जग माहीं ,देखेउँ सो प्रभाव कछु नाहीं “

गरुड़जी व्याकुल होकर नारद जी के पास गए और मन का संदेह कह सुनाया,वास्तव में गरुड़ जी को मोह और अभिमान दोनों हो गए थे,

इसलिए नारद जी को प्रणाम भी नहीं किया नारद जी समझ गए कि जब सिर पर गागर रखी हो तो व्यक्ति झुक नहीं सकता,इस समय गरुड़ जी के सिर पर मोह और अभिमान कि गागर रखी है.

नारद जो सोचने लगे – भगवान कि जिस माया ने मुझे अनेको बार नचाया वही माया गरुड़ जी मै भी व्याप गई है.

ब्रह्मा जी के पास भेज दिया.क्योकि यदि मोह अकेला होता तो शायद कथा सुनाकर दूर भी कर देते परन्तु मोह के साथ अभिमान भी था,एक तो मैंने बंधन काटे है और दूसरा मै तो भगवान का वाहन हूँ.

ब्रह्मा जी के पास गए,प्रणाम नहीं किया और मन में विचार कर रहे है मै पंख फडफडाता हूँ तो वेदों की ध्वनि निकलती है,वेद यदि इन्हें आता है तो मुझे भी आता है,

मै तो विष्णुजी का वाहन हूँ , ब्रह्मा जी भी समझ गए,जब मै सृष्टि कि रचना करता हुआ भगवान कि माया के वश में आकर नाचने लगता है,

तो पक्षिराज गरुड़ को मोह होना कोई आश्चर्य की बात नहीं है. फिर कहने लगे – श्री राम की महिमा को महादेव जानते है.आप उन्ही के पास जाईये.

अंत में शिव जी के पास गए उन्हें प्रणाम किया,और जो मन में संदेह था उसे सुनाया,उस समय भगवान शिव कही जा रहे थे रास्ते में थे, इसलिए बोले राह चलते,

तुम्हे किस प्रकार समझाऊ ?इन संदेहों का तो तभी नाश होगा जब दीर्घ काल तक सत्संग किया जाए,और सुन्दर हरि कथा सुनी जाए,

क्योकि सत्संग के बिना हरि कथा सुनने को नहीं मिलती और उसके बिना मोह नहीं भागता और मोह गए बिना श्री राम चन्द्र के चरणों में दृढ प्रेम नहीं होता.

भगवान शिव भी समझ गए कि इनको काकभुशुण्डी जी के पास भेजना चाहिये,क्योकि ये पक्षिराज है,

और अपने से नीचे दर्जे के पक्षी काकभुशुण्डी जी से  (कौए को पक्षियों में निकृष्ट माना जाता है)जब ये कथा और सत्संग करेगे तब इनका मोह और अभिमान दोनों का ही नाश हो जायेगा.पक्षी ही पक्षी कि भाषा अच्छी तरह समझ सकते है.

भगवान शिवजी, रघुनाथ जी के इस मर्म को जानते थे,कि कभी गरुड़जी ने अभिमान किया था,

जिसको भगवान श्री राम नष्ट करना चाहते थे, इसलिए उन्होंने उसे स्वयं नहीं समझाया. जैसे ही गरुड़ जी काकभुशुण्डिजी जी के आश्रम में पहुँचे, तो संत का सानिध्य पाकर ही उनका मोह,संदेह भ्रम सब दूर हो गए,


“सुनत गरुड़ कै गिरा बिनीता, सरल सुप्रेम सुखद सुपुनीता


भयउ तासु मन परम उछाह, लाग कहै रघुपति गुण गाहा “


अर्थात –
गरुड़ जी विनम्र सरल सुन्दर प्रेम युक्त सुख प्रद और अत्यंत पवित्र वाणी सुनते ही भुशुण्डि जी के मन में परम उत्साह हुआ और वे कथा कहने लगे.

कहने का अभिप्राय संत का यदि सानिध्य ही मिल जाए तो व्यक्ति का कल्याण हो जाता है.

नारदजी, ब्रह्माजी, शिवजी, इनमे से किसी ने भी कथा नहीं सुनाई,सभी कथा सुना सकते थे.नारद जी परम भागवत है. भगवान शिव परम भक्त है.

फिर भी कथा नहीं सुनाई क्योकि जब तक व्यक्ति झुकता नहीं तब तक उसे कथा कैसे मिल सकती है.

हम भजन कैसे कर रहे है

नाम चाहे कैसे भी लिया जाए उसका फल तो निश्चित है यदि कोई कहे श्रद्धा से नाम लो तो नाम हम श्रद्धा के कारण ले रहे है नाम के कारण नहीं,

इसलिए नाम चाहे कैसे भी लिया गया हो,जैसे बिजली का तार, चाहे अनजाने में छू जाए, या जानबूझ कर छू ले,करंट तो लगेगा ही,अग्नि में हाथ चाहे जानबूझकर हाथ डाल दे या अनजाने में हाथ पड़ जाए जलन तो होगी ही.
 

 “भाव -कुभाव अनख आलस हूँ -नाम जपत मंगल दिसि दसहूँ

   कलियुग केवल नाम अधारा -सुमिर-सुमिर जन उतरहिं पारा “

भोजन चाहे मन से किया गया हो या वे मन से किया गया हो क्षुधा तो मिटेगी ही,हाँ यदि मन से खाया जाएगा तो स्वाद भी मिलेगा और यदि वेमन से खाया जाए,

तो पेट तो भरेगा परन्तु स्वाद नहीं आएगा.रेल पटरी पर है तो कितने भी सिग्नल न मिले ,पेसेंजर भी क्यों न हो,एक दिन मंजिल पर जरुर पहुंचेगी,परन्तु पटरी पर होना जरुरी है,

जैसे हर मौसम का भोजन अलग होता है,हर मौसम के वस्त्र अलग होते है इसी तरह हर युग में भजन अलग होता है,

सतयुग में ध्यान,समाधि से,त्रेता में यज्ञ-हवन से, द्वापर में सेवा से, और कलयुग में नाम संकीर्तन से,भजन से, भगवान की प्राप्ति हो जाती है.

और भजन हम क्या गा रहे है ये जरुरी नहीं है, कैसे गा रहे है ये जरुरी है.आज भी हमारे घरों में हम देखते है कि जब छोटे बच्चे को भूख लगती है तो वह माँ से कहता है अम्मा हप्पा चाहिये,

माँ तुरंत समझ जाती है और उसे चावल या रोटी दे देती है,दुनिया की किसी डिक्शनरी में हप्पा का अर्थ रोटी या खाना नहीं लिखा है,

फिर भी बच्चे के मांगने पर, बोलने पर, माँ समझ लेती है और दे देती है,तो क्या जब हम भाव कि वाणी से भजन गायेगे, तो दुनिया के माता-पिता उसे नहीं समझेगे? जरुर समझेगे.

          “श्री श्याम सुन्दर गोस्वामी जी ”

      सेवाधिकारी श्री राधा रानी मन्दिर बरसाना 

          श्री जी बरसाना मण्डल ट्रस्ट (रजि०)

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ये तीन बाते होने पर समझना भजन सही दिशा में है

यदि हमें कोई रोग हो और हम डाक्टर के पास जाए तो वह हमें चार दिन की दवा देता है,कुछ परहेज भी बता देता है,

और कहता है कि चार दिन बाद फिर आकर बताओ कि दवा से फायदा हुआ कि नहीं,क्योकि यदि दवा लाभ नहीं दे रही है तो दवा लंबे समय तक खाने से कोई लाभ नहीं है.

दवा फायदा कर रही है कैसे पता चले?तो संत कहते है यदि शरीर में तीन घटनाएँ होनी शुरू हो जाए तो समझना चाहिये कि दवा फायदा कर रही है.

१. – नीद अच्छी आनी शुरू हो जाए.

२. – अच्छी भूख लगनी शुरू हो जाए.

३. – टहलने को मन करने लगे.कमजोरी चली गई.

इसी तरह हम भजन कर रहे है.भजन सही मार्ग में ले जा रहा है कि नहीं, ये कैसे पता चले? ये भी तब जान सकते है जब तीन चीजे होना शुरू हो जाए.

“जानिअ तब मन बिरुज गोसाई ,जब उर बल बिराग अधिकाई  

     सुमति छूधा बाढ़इ नित नई,विषय आस दुर्बलता गई “

१. – नीद अच्छी आने लगे,अर्थात जब से भजन किया तब से निश्चिन्त हो गए,मन में कोई भय ही नहीं रहा कि बुढ़ापे के कौन सेवा करेगा?बहू बेटा रखेगा कि नहीं ?

मृत्यु के समय क्या होगा ?सब तरफ से निश्चिंतता आ गई भगवान आपके सहारे आ गए है अब मै क्यों चिंता करूँ .


२. –
भूख लगनी शुरू हो जाए,अर्थात धर्म तो किया पर और करना है,माता पिता की सेवा तो की पर अभी और करना है,

दीन दुखियों की सेवा तो करि पर अभी और बहुत करनी है,जब ये शुभ की और और भूख बढती ही जाए तो समझना भजन सही दिशा में हो रहा है.


३. –
कमजोरी चलि गई ,अर्थात विषय आस दुर्बलता गई,विषयों को देखकर जो मन उसी ओर चला जाता था,किसी का अच्छा मकान बना,किसी की बड़ी गाड़ी देखी

तो मन में विचार आता था कि इसके पास इतना सब है ओर हम तो झोपड़ी में ही रह रहे है,

ये विचारों की दुर्बलता चलि जाए.वस्तुए आकर्षण से मन हट जाए जो मन ये सब देखकर गिर जाता था अब नहीं गिरता हम तो अपनी झोपडी में भी आनंद से है ये विचार आने लगे.

संयम ही परहेज है. जब ये तीनो होने लगे तो समझना,भजन सही दिशा में हो रहा है.न औषधि बदलिए न डॉक्टर.

क्या हम सबको भी है ये मानस रोग ?

जैसे असावधानी से शरीर में रोग हो जाता है हमें पता भी नहीं चलता कि कब और कैसे रोग हमारे शरीर में आ जाता है,इसी तरह “मानस रोग” भी कहे गए है.

सब रोगों की जड़ “अज्ञान”है.जिन विषयों के मनोरथ बड़ी कठिनता से पूरे होते है.वे ही “कष्टदायक रोग” है.

“ममता” दाद है. एक बार किसी से ममता हो जाए तो जैसे दाद का रोग फैलता ही जाता है वैसे ही ये ममता बढ़ती ही जाती है. “ईर्ष्या” खुजली है.

खुजली करने पर बार-बार करने की इच्छा होती है इसी तरह ईर्ष्या है,किसी दूसरे की वस्तु को देखकर, सुख को देखकर, बार-बार हम उसमे दोष निकालने लग जाते है.

“हर्ष-विषाद” गले के रोगों की अधिकता है जैसे गले में गलगंड, घेंघा रोग, हो जाता है,

तो गला बहुत बड़ा दिखायी देने लग जाता है उसी प्रकार हमें यदि सुख मिलता है या दुःख मिलता है तो हम उसे बहुत बड़ा मानकर कभी प्रसन्न होते है

कभी दुखी होते रहते है.जैसे क्षय रोग होता है जिसमे व्यक्ति का शरीर दिन प्रतिदिन क्षीण होता रहता है,

वैसे ही पराये सुख को देखकर जो “जलन”होती है उससे भी व्यक्ति जलन के मारे अन्दर ही अंदर सूखता रहता है.

जैसे शरीर में यदि कोढ़ हो जाए तो धीरे-धीरे शरीर गलने लगता है,वैसे ही “दुष्टता” और “मन की कुटिलता” कोढ़ ही है,जो व्यक्ति को अन्दर ही अंदर गलाती रहती है.

जैसे हमें यदि कभी थोडा सा भी सिर दर्द या पेट में दर्द हो जाए तो हमारा किसी काम में मन नहीं लगता,हमारा सारा ध्यान उसी रोग दर्द में लगा रहता है,

यहाँ तक कि एक रोग के वश में होकर मनुष्य मर तक जाता है फिर ये तो बहुत से असाध्य रोग है.जो जीव को निरंतर कष्ट देते रहते है.

जैसे मानस के ये रोग है उसी तरह उनकी औषधि भी है. नियम, धर्म, उत्तम आचरण, तप, ज्ञान, यज्ञ, जप, दान, और करोडो औषधियाँ है.

पर इन औषधियों से रोग जाते नहीं है कुछ क्षीण अवश्य हो जाते है उनका नाश नहीं होता.इसका एक ही उपाय है- “भगवान की कृपा और सद्गुरु रूपी वैध के वचन में विश्वास”.

रघुनाथ जी की भक्ति “संजीवनी जड़ी” है,जैसे दवा को हम शहद के साथ खाते है वैसे ही “श्रद्धा से भरी हुई बुद्धि” ही मानो शहद है इस प्रकार का संयोग हो जाए तो रोग नष्ट हो सकता है,

नहीं तो करोडो प्रयत्नों से भी नहीं जा सकता. जब रोगों से छूट जाता है तो मनुष्य निर्मल ज्ञान रूपी जल में स्नान कर लेता है तब उसके ह्रदय में राम भक्ति छा जाती है.क्योकि रघुनाथ जी की भक्ति के बिना सुख नहीं है.

परिवार को भगवान के सम्बन्ध से ही ग्रहण करे

परिवार, कुटुम्भ, मकान, जमीन, स्त्री, पुत्र, आदि सब भगवान के सम्बन्ध से ही इनको ग्रहण करो इसी में कल्याण है ऐसा भक्तो का सिद्धांत है हम लोग भगवान का सम्बन्ध नहीं देखते तभी माया में फसे है,

बिना भगवान को अर्पित किया कुछ मत लो. यहाँ तक कहा गया है कि बिना भगवान को खिलाये और पिलाया कुछ भी मत ग्रहण करो और जो भगवान् का सुमिरन करता हो वही प्रेम करने योग्य है वरना प्रेम करने के योग्य नहीं है.

  “जाके प्रिय न राम वैदेही
तजिये ताहि कोटि बैरी समयद्यपि परम सनेही.

अर्थात – जिसको भगवान प्रिय नहीं है चाहे वह कितना भी स्नेही क्यों न हो उसे कोटि बैरी के समान त्याग देना चाहिये.

यही बात विभीषण जी और हनुमान जी ने कर दिखायी, विभीषण ने अपने भाई को छोड़ दिया.

हनुमान जी ने कहा कि जिस वस्तु में भगवान का नाम नहीं या सम्बन्ध नहीं वो नहीं चाहिये,

माला के मणियों को तोडना एक लीला थी वरना सम्बन्ध तो था स्वयं सीता माता ने दिया था, इससे बड़ा सम्बन्ध और क्या होगा. लेकिन हनुमान जी ने शिक्षा दी.

आगे सबने पूछा कि क्या आपके शरीर में भगवान हैं या उनका नाम है इस मणि को तो आप तोड़ कर फेंक रहे है. आप के शरीर में कहा लिखा है राम-नामकही भी दिखाई तो नहीं दे रहा,

हनुमान जी ने कहा देखो! और दोनों हाथो से पकड कर छाती को चीर दिया. भीतर भगवान राम व् सीता बैठे हुए थे. तो ये वो ही दिखा सकता है जिसके अंदर सच्चाई है, भक्ति है जो पूर्णतः समर्पित है.

विभीषण लंका छोड़कर राम की शरण में आ गए हैंविभीषण ने भगवान से कहा कि मैं अपनी पत्नी और पुत्रों को आपके भरोसे लंका में छोड़कर आपकी शरण में आ गया हूं.

भगवान ने यहां एक बड़ी सुंदर बात कही हैउन्होंने विभीषण को समझाया कि मुझे पाने के लिए परिवार छोडऩे की आवश्यकता नहीं है.

मुझे परिवार के केंद्र में रखोतुलसीदासजी ने इस प्रसंग में लिखा है

      जननी जनक बंधु सुत दारा. तनु धनु भवन सुहृद परिवारा..
          सबकें ममता ताग बटोरी. मम पद मनहिं बांधि बरि डोरी.

भगवान कह रहे हैं कि परिवार के सारे रिश्ते मातापितापुत्रभाईपत्नीतनधनमित्र और कुटुंब को प्रेम के धागे में बांधकर उस धागे का एक सिरा मेरे चरणों से बांध दो.

(अर्थात केन्द्र मुझे बना दोफिर परिवार चलाने में कोई परेशानी नहीं होगीहमेशा प्रेम बना रहेगाकभी बिखराव नहीं होगापरमात्मा को पाने के लिए भी कभी परिवार का त्याग नहीं करना पड़ेग

तेरे दरवार की हाजरी सबसे बढ़िया है सबसे खरी

उत्तर काण्ड में उस समय का प्रसंग है जब भगवान राम का राज्य अभिषेक होने के बाद सभी वानर ,विभीषण आदि सभी को भगवान विदा करते है.

उस समय भगवान राम सबको वस्त्र, आभूषण से स्वयं पहना रहे थे, विभीषण जी नील, जाम्बवान सबको प्रभु ने गहने कपड़े पहनाये.

परन्तु अंगद जी एकदम शांत बैठे है,अपनी जगह से हिलते भी नहीं है.अंगद जी भगवान से कहते है,हे सर्वज्ञ सुनिये! मेरे पिता ने मरते समय आपकी गोद में मुझे डाला था.

“मोरे तुम्ह प्रभु गुर पितु माता जाऊ कहाँ तजि पद जलजाता” 

अर्थात – अंगद जी कह रहे है कि – हे भक्तो के हितकारी ! अपना अशरण शरण विरद (बाना)याद करके मुझे त्यागिये नहीं, मेरे तो स्वामी, गुरु,पिता, माता सब कुछ आप ही है, आपके चरण कमलों को छोड़कर मै कहाँ जाऊं ?


“तुम्हहि बिचारि कहहु नरनाहा ,प्रभु तजि भवन काज मम काहा 

बालक ग्यान बुद्धि बल हीना,राखहु सरन नाथ जन दीना”

अर्थात – हे प्रभु -आप ही विचारकर कहिये, आप को छोडकर घर में मेरा क्या काम है ? हे नाथ! इस ज्ञान और बुद्धि और बल से हीन बालक,दीन सेवक को शरण में रखिये.

“नीचि टहल गृह कै सब करिहउ,पद पंकज बिलोकि भव तरिहउ

अस कहि चरन परेउ प्रभु पाही, अब जनि नाथ कहहु गृह जाही “

कहते है – मै घर की सब नीचि से नीचि सेवा करूँगा, और आपके चरण कमलों को देख देखकर भव सागर से तर जाऊँगा और ऐसा कहते कहते प्रभु के चरणों में गिर पड़े हे प्रभु! हे नाथ !अब यह न कहिये कि तू घर जा.

अंगद जी का कितना सुन्दर भाव है,कि नीच से नीच काम भी करने को तैयार है पर किसी भी तरह भगवान से दूर नहीं जाना चाहते.अंगद जी कहते है जब पिता ने आपको सौपा तो अब सब कुछ आप ही है.

जहाँ भक्त कह रहा है प्रभु अब कहाँ जाऊ, बस यही शरणागति प्रभु को बड़ी प्यारी लगती है.

अंगद की बात सुनकर भगवान उन्हें उठाकर ह्रदय से लगा लेते है,और स्वयं भी रोने लगते है.जहाँ भक्त ही नहीं भगवान भी रो रहे है.

अपने वस्त्र आभूषण माला जो उन्होंने स्वयं धारण कर रखी थी,अंगद जी को पहना देते है.

और समझकर विदा कर देते है.जब अंगद चले है तो बार-बार, मुड-मुड कर श्री राम को देखते जाते है,ह्रदय में प्रेम कम नहीं होता,

मन में ऐसा आता है कि राम जी मुझे रहने को कह देगे.भगवान का देखना,चलना,हसना सब याद करते जा रहे है और दोनों नेत्रो से अश्रु बह रहे है.

ये एक भक्त के भाव है इसी तरह हमारे भी भाव ऐसे ही होना चाहिये जब हम भगवान के मंदिर से लौटे, श्रीधाम वृन्दावन से लौटे, तो बार-बार,बाँके बिहारी जी की ओर पलट-पलट कर देखे,

और मन में अंगद जी जैसा भाव हो,प्रभु मुझे अपने चरणों के पास यही रोक लो.जो भी टहल (सेवा)दोगे वही कर लूँगा,

कुछ नहीं तो वृंदावन की गलियों में झाड़ू ही लगा दूँगा,तुम्हारे दासों की सेवा कर दूँगा मुझे नीचे से नीची टहल दे दो पर अपने से दूर मत करो.

और अंगद जी जाते जाते हनुमान जी से कहते है-मै तुमसे हाथ जोड़कर कहता हूँ प्रभु से मेरी दंडवत कहना और रघुनाथ जी को बार बार मेरी याद कराते रहना,

इसी तरह हमें भी यदि कोई संत मिल जाए तो उनसे हम कहे कि हम तो भूल जाते है पर आप ठाकुर जी को हमारी याद कराते रहना.

संत की कृपा प्रसादी से जय ही होती है

किष्किन्धाकाण्ड में उस समय का प्रसंग है जब भगवान सुग्रीव जी को बालि से युद्ध करने के लिए भेजते है.सुग्रीव जी चले तो जाते है

पर बालि के एक ही घूँसे के प्रहार से घायल होकर वापस आ जाते है और भगवान से कहते है प्रभु मैंने तो आपसे पहले ही कहा था बालि मेरा भाई नहीं मेरा काल है

तब श्री राम जी ने कहा – तुम दोनों भाई एक से रूप के हो इसी भ्रम में मैंने उसको नहीं मारा.फिर श्री राम जी ने सुग्रीव के गले में फूलो की माला डाल दी और फिर उसे भेजा.

“मेली कंठ सुमन कै माला,पठवा पुनि बल देइ बिसाला

पुनि नाना बिधि भई लराई बिटप ओट देखहिं रघुराई ” 

यहाँ एक बात बड़ी विचारणीय है भगवान ने पहले बालि को नहीं मारा ,और ये कहा कि तुम दोनों एक जैसे हो अर्थात मानो भगवान कहना चाहते है

अभी तुममें और बालि में कोई अंतर नहीं है फिर संसार में चाहे तुम मरो या कुटो, मै कुछ नहीं कर सकता. मुझे तो ये भी नहीं समझ नहीं आया कि मै बालि को क्यों मारूँ ?

पर जब सुग्रीव वापस आये तो वाल्मीकि रामायण में और अन्य ग्रन्थ में कही-कही ऐसा भी आता है कि हनुमान जी या लक्ष्मण जी ने सुग्रीव जी के गले में माला पहनाई.

अर्थात हनुमान जी संत है और लक्ष्मण जी धर्माचार्य है. इन्होने माला पहनाई माला का एक अर्थ होता है कंठी, संतजन इसे तुलसी की माला भी मानते है.

अर्थात जब संत ने सुग्रीव जी के गले में तुलसी की माला पहनाई और  सुग्रीव जी फिर से बालि से लड़ने गए है,

अब सुग्रीव और बालि में अंतर है- सुग्रीव के गले में संत की पहनाई कंठी माला है अब वे कैसे पराजित हो सकते है.अब संत की कृपा प्रसादी उनके पास है.

जिमि बालक राखइ महतारी

बालि-वध के पश्चात् वानरराज सुग्रीव राज्य पाकर भोग-विलास में इतने डूब गये कि सीताजी की खोज कराना ही भूल गये.

तब श्रीरामजी को क्रोध आ गया, पर लक्ष्मणजी को भेजते हुए कहा-  ‘भय देखाइ लै आवहु तात सखा सुग्रीव ।।‘ श्रीलक्ष्मणजी श्रीरामाज्ञानुसार सुग्रीव को लाते हैं.

तब सुग्रीव विनती करते हैं कि हे प्रभु ! आपकी माया बड़ी प्रबल. वह आपकी दया से ही छूट सकती है. जिसे नारि-नयनरूपी बाण नहीं लगा,

जो क्रोधरूपी घोर अन्धकारमय रात्रि में जागता है और लोभ के फन्दे में नहीं फँसा है, वह मनुष्य आपके ही समान है. पर यह साधन-साध्य नहीं है, आपकी कृपा से ही कोई-कोई पाता है —


अतिसय प्रबल देव तव माया । छूटइ राम करहु जौं दाया ।।
                       

बिषय बस्य सुर नर मुनि स्वामी । मैं पावँर पसु कपि अति कामी ।।
                     

नारि नयन सर जाहि न लागा । घोर क्रोध तम निसि जो जागा ।।
                         

लोभ पास जेहि गर न बँधाया । सो नर तुम्ह समान रघुराया ।।
                         

यह गुन साधन तें नहिं होई । तुम्हरी कृपाँ पाव कोइ कोई ।।
(४/२१/२-६)

इस प्रकार से कल्याणकारी भगवद्भक्ति की प्राप्ति साधना-साध्य न होकर भगवत्कृपा पर आश्रित है और भगवत्कृपा उनका भजन करने से, वह भी निष्कपटता से भजन करने पर प्राप्त होती है । अतः एकमात्र साधन भगवत्-शरणागति ही है.

रामचरितमानस में – भगवान् स्वयं कहते हैं कि हे नारद ! जो अन्य सभी भरोसोंको त्यागकर मेरा हो जाता है, उसकी रखवाली मैं ठीक उसी प्रकार से करता हूँ, जैसे एक माँ अबोध शिशु का ध्यान रखती है —

ये भगवान् का सामान्य क़ानून है

मनुष्य को जप-ध्यान करते हुए मरना चाहिये . यह मरना काशी में मरने से भी बढ़कर है .

“भगवान् कहते हैं जो पुरुष अन्तकाल में ही मेरे को स्मरण करता हुआ शरीर को त्याग कर जाता है, वह मेरे साक्षात स्वरूप को प्राप्त होता है, इसमें कुछ भी संशय नहीं है”. (गीता. ८/५) .

प्रभो ! मैं साक्षात दर्शन का पात्र नहीं हूँ, हे प्रभो ! अन्तकाल में अपनी स्मृति दें .

सारे जन्म के किये हुए शुभ कर्मों के बदले में यह सौदा होता हो तो कर लो . भगवान् से कुछ नहीं माँगना चाहिये, पर माँगो तो यह माँग लो . बाली की बात आती है –

जेहिं जोनि जन्मौं कर्म बस तहँ राम पद अनुरागऊँ 
.. 

‘अब तो प्रभु यही कृपा करें कि जिस-जिस योनि में अपने कर्मों के अनुसार जन्म लूँ,

उस-उस योनि में आप में प्रेम हो और आपके चरणों में अनुराग हो.’ बाली में कितना स्वार्थ-त्याग है, इसलिये भगवान् ने बाली को परमधाम भेज दिया.

अन्त-समय में मरने वाले भाई-बहन को जाकर भगवन्नाम सुनावे. उस नाम सुनने के कारण मरने वाले के प्राण भगवान् को याद करते हुए निकलें तो उसका बेड़ा पार है,

सुनाने वाले भाई का काम हो गया. अन्तकाल की यह गति काशी में मरने से भी बढ़कर है . सप्तपुरियों में (अयोध्या, मथुरा, मायापुरी [कनखल से लक्ष्मण झूला तक] काशी, काँची, उज्जैन, द्वारकापुरी) मृत्यु से भी बढ़कर है.

काशी में जो पापी मरता है उसे पाप का दण्ड भुगताकर मुक्ति दी जाती है, वहाँ छतीस हजार वर्ष तक की पाप भुगतने की अवधि है.

पर जो भगवान् के नाम, रूप, गुण, प्रभाव, तत्व और रहस्य को याद करता हुआ जाता है, वह तत्काल ही मुक्त हो जाता है. उसकी स्द्योमुक्ति हो जाती है

. चाहे वह काशी में न मरकर किसी गर्हित स्थान में मरे . यह कोई रियायत की बात नहीं है, यह भगवान् का सामान्य क़ानून है .

ऐसे भक्त को भगवान अपना स्पर्श और नाम दोनों देते है

किष्किन्धाकाण्ड का उस समय का प्रसंग है जब सारे वानर दल सीता जी की खोज् के लिए निकलते समय सबसे पहले रामचंद्र जी के चरणों में सिर नवाकर हर्षित होकर चलते है.

सबसे पीछे पवनसुत श्री हनुमान जी ने सिर नवाया.प्रभु कार्य का विचार करके उन्हें अपने पास बुलाते है.और अपना सेवक जानकर उन्हें अपने हाथ की अँगूठी उतारकर देते है.

“बहु प्रकार सीतहि समुझाएहु, कहि बल बिरह बेगि तुम्ह आएहु

हनुमत जन्म सुफल करि माना, चलेउ ह्रदयँ धरि कृपानिधाना”

भगवान ने कार्य का विचार किया है फिर अँगूठी हनुमान जी को दी है. भगवान ने अँगूठी हनुमान जी को ही क्यों दी ?

तो संतजन कहते है कि व्यवहार व्यवस्था सबको नहीं दी जाती.जिसकी अपनी कोई समस्या नहीं वही मेरी समस्या को समझ सकता है.

हम संसारी तो खुद ही समस्या में फसे हुए है. हमारे पास कोई समस्या लेकर आता है तो हम पहले ही कह देते है उम तो खुद ही परेशान है,

उसकी तो सुनते नहीं अपनी समस्यों का बखान करने लग जाते है.ऐसे लोगो से समस्या कहने का क्या लाभ?

फिर भगवान ने कहा – हनुमान! सीता को समझना, मेरा बल, विरह कहकर शीघ्र लौट आना. यहाँ “बेगि” शब्द आया है.भगवान ने हनुमान जी सिर का अपने कर कमल का स्पर्श किया है.

मानो हनुमान जो वज्र के समान कर दिया.जब राम जी ने अँगूठी के रूप में अपना नाम और अपना स्पर्श जिसे दे दिया, अब उसे रोकने की समर्थ किसमे है ?

मानो भगवान कह रहे है मैंने दोनों चीजे दे दी इसलिये यहाँ “बेगि” शब्द आया है,कि कितनी भी बाधाये आये, तुम सबको आसानी से पार करने शीघ्र लौट आओगे.

बस यही हमें भी करना है.अपनी सारी समस्याए छोड़कर भगवत कार्य में लग जाना है, क्योकि जो पूरे मन से भगवत कार्य में लग जाता है,उसे भी भगवान व्रज वत बना देते है,

अर्थात उसे कितनी भी बाधाये क्यों न आये,हनुमान जी की तरह वह सबी बाधाओ को आसानी से पार कर जाता है.

भक्त की समाधि तो कही भी लग जाती है

उस समय का प्रसंग है जब सारे वानर सीता जी की खोज करने निकले थे और अंत में समुद्र तट पर निराश खड़े थे सामने अथाह समुद्र था,

और कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा था. तब उन्हें सम्पाति मिलते है उनसे वार्ता होती है और वे अंत में कहते है कि ..

गिरि त्रिकूट ऊपर बस लंका,तहँ रह रावन सहज असंका॥

तहँ असोक उपबन जहँ रहई, सीता बैठि सोच रत अहई


भावार्थ:-
त्रिकूट पर्वत पर लंका बसी हुई है। वहाँ स्वभाव से ही निडर रावण रहता है। वहाँ अशोक नाम का उपवन (बगीचा) है, जहाँ सीताजी रहती हैं। (इस समय भी) वे सोच में मग्न बैठी हैं.मैं देखउँ तुम्ह नाहीं गीधहि दृष्टि अपार।
बूढ़ भयउँ न त करतेउँ कछुक सहाय तुम्हार


भावार्थ:-
मैं उन्हें देख रहा हूँ, तुम नहीं देख सकते, क्योंकि गीध की दृष्टि अपार होती है (बहुत दूर तक जाती है)। क्या करूँ? मैं बूढ़ा हो गया, नहीं तो तुम्हारी कुछ तो सहायता अवश्य करता.

समस्या तो हल हो गई थी पर प्रश्न ये था कि समुद्र को लाघकर लंका जायेगा कौन ?क्योकि किसी में इतना साहस बल नहीं था.

फिर जाम्बवान्‌ हनुमान जी से कहते है,तो हनुमान  उठकर आते है और कहते है यहाँ क्या हुआ ?क्योकि सम्पाति ने क्या बताया हनुमान जी को पता ही नही था.

जब वे लंका जाते है तो अगर उन्हें पता होता तो वे लंका पहुँचकर सीता जी की खोज क्यों करते क्योकि सम्पाति ने पहले ही बता दिया था कि सीता जी अशोक वाटिका में है.

वे सीधे अशोक वाटिका में जाते परन्तु हनुमान जी तो सीता जी को महलों में खोज रहे है.बाद में विभीषण उन्हें सीता जी का पता बताते है.तब हनुमान जी अशोक वाटिका में जाते है.

हनुमान जी इसलिए नहीं सुन पाते क्योकि जब सम्पाति बता रहे थे तब हनुमान जी राम नाम में डूबे हुए थे,क्योकि भक्त को भीड़ या एकांत से कोई मतलब नहीं होता भक्त की समाधि तो कही भी लग जाती है.

इसी तरह जब भगवान शंकर यज्ञ में जाते है तो सब दक्ष को प्रणाम करते है परन्तु भगवान शिव उन्हें प्रणाम नहीं करते क्योकि भगवान शिव भी राम नाम में डूबे हुए थे.समाधि में थे कहने को तो यज्ञ में थे परन्तु डूबे राम नाम में थे.

जो यह तीन काम करता है भगवान उसे अपने साथ रखते है

भगवान श्री राम ने वानरों को अपना साथी बनाया क्योकि वानरों ने तीन काम किये और जो ये तीन काम करता है भगवान उसे हमेशा अपने साथ रखते है.

1. वानरों ने सीता जी कि खोज की थी.

2. सेतु बंध निर्माण किया था और

3. रावण को मारने में सहयोग किया था.

यदि हम इन तीनो कार्यों का अर्थ समझे तो संत कहते है कि वानरों का पहला कार्य सीता जी की खोज.

1. सीता जी की खोज की – सीता अर्थात “भक्ति” “शान्ति” और शुद्धि” की खोज्.जो भक्ति में “डूबा” हो.जिसका “मन” शांत हो,और जिसके “विचारों” में शुद्धि हो.

भक्ति – वानरों ने भगवान को नहीं खोजा भगवान खोजने से मिलते भी नहीं है.भगवान को तो पुकारा जाता है.

जैसे बालक पालने में माँ-माँ करके रो रहा हो तो माँ यदि रोटी भी बना रही होगी तो छोड़कर आ जायेगी और तुरंत बच्चे को गोद में ले लेगी.

हनुमान जी भगवान को खोजने नहीं गए थे भगवान स्वयं किष्किन्धा आये थे.हनुमान जी ने भक्ति रूपी सीता की खोज करने समुद्र पार गए थे.भगवान को ऐसा भक्त चाहिये जो भक्ति में डूबा हो.

शान्ति और शुद्धि – विचारों में शुद्धि चाहिये,मन अशांत कब होता है जब अशुद्ध होता है.ये चिंता मत कीजिये कि मन अशांत क्यों है?ये चिंतन कीजिये कि मन अशांत क्यों हुआ ?अशुद्ध क्यों हुआ ?

पेट यदि खराब है और व्यक्ति यदि चिंता करता जाए कि पेट खराब है खराब है,तो कहने से ठीक नहीं होगा.

पेट तो दवा खाने से ठीक हो जायेगा.पर चिंतन ये कीजिये कि ऐसा क्या खाया कि पेट खराब हो गया,और अब आगे वो वस्तु खाने में न आये.

इसी तरह यदि आँख में कंकड चला जाए तो न आँख खोल सकते है न बंद कर सकते है,

इसी तरह यदि मन में वासनाओ के कंकड तिनके आ जाए तो लाख माला जपिये लगेगा ही नहीं मन में पडोसी की ईर्ष्या के कीड़े बिलबिला रहे है.

ये ईर्ष्या आई कैसे ?ये चिंतन करे जिसने हमारे मन को अशुद्ध कर दिया.मन शुद्ध केवल एक तरीके से होगा-  ‘सत्संग” ,”हरि कथा” 


2. वानरों ने दूसरा काम सेतु बंधन का निर्माण किया- यहाँ सेतु कोई भौतिक वस्तु नहीं है,

सेतु अर्थात समाज की कहई को जो बाँट सके सेतु कर कोई नहीं बना सकता वही सेतु बना सकता है जिसमे जो भक्ति में डूबा हो,जिस्म मन शांत हो और जिसके विचार शुद्ध हो.

3.तीसरा कार्य रावण को मारने में सहयोग किया था – रावण अर्थात निशाचर जो हमको नरक की ओर ले जाए,अंधेरे की ओर ले जाए,इन सारी चीजों से वही जीत सकता है जो भक्ति में डूबा हो,जिस्म मन शांत हो और जिसके विचार शुद्ध हो.

Shree Ji Barsana Mandal Trust (SJBMT)

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