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आज की बृज रस धारा पढ़ें

??आज की ब्रज रस धारा ??

दिनांक 11/01/2018

मीरा चरित्र – गौर कृष्ण की दासी मीरा रसना कृष्ण बसै


एक दिन किसी से पूज्य श्री जीव गोस्वामी पाद का नाम , उनकी गरिमा ,उनकी प्रतिष्ठा सुनकर मीरा उनके दर्शन के लिए पधारी। सेवक के द्वारा उनकी भजन कुटीर में सूचना भेजकर वे बाहर बैठकर प्रतीक्षा करने लगी। सेवक ने कुटिया से बाहर आकर कहा ” गोस्वामी पाद किसी स्त्री का दर्शन नहीं करते।मीरा हँस कर खड़ी होते हुये बोली ,” धन्य हैं श्री गोस्वामी पाद ! मेरा शत शत प्रणाम निवेदन करके उनसे अर्ज़ करें कि मुझ अज्ञ दासी से भूल हो गई जो दर्शन के लिए विनती की। मैंने अब तक यही सुना था कि वृन्दावन में पुरूष तो एकमात्र रसिकशेखर ब्रजेन्द्रनन्दन श्री कृष्ण ही हैं। अन्य तो जीव मात्र प्रकृति स्वरूप नारी है ।आज मेरी भूल को सुधार करके उन्होंने बड़ी कृपा की। ज्ञात हो गया कि वृन्दावन में कोई दूसरा पुरुष भी है !!!” अंतिम वाक्य कहते कहते मीरा ने पीठ फेरकर चलने का उपक्रम किया मीरा द्वारा सेवक को कही गई बात भजन कुटीर में बैठे श्री जीव गोस्वामी जी ने सुनी। ” कृप्या क्षमा करें मातः !” ऐसा कहते हुए गोस्वामी पाद स्वयं कुटिया से बाहर आये और मीरा के चरणों में प्रणाम किया। आप उठे आचार्य ! ” वे इकतारा एक ओर रखकर हाथ जोड़ते हुये झुकी -” मैंने तो कोई नई बात नहीं कही प्रभु ! यह तो सर्वविदित सत्य है कि वृन्दावन में पुरुष केवल एक ही है – ब्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्ण ! और हम सब साधक तो गोपी स्वरूप हैं ! -बस ऐसा ही संतों के मुख से सुना है।” सत्य है , सत्य है ! पर सत्य और सर्वविदित होने पर भी जब तक हम किसी बात को व्यवहार में नहीं उतारते , जानकारी अधूरी रहती है माँ ! और अधूरा ज्ञान अज्ञान से बढ़कर दुखदायी होता है ” उन्होंने दोनों हाथों से कुटिया की ओर संकेत करते हुये विनम्र स्वर में कहा -“पधार कर दास को कृतार्थ करें ऐसी बात न फरमायें श्री गोस्वामी पाद ! आप तो ब्राह्मण कुल-भूषण ही नहीं , श्री चैतन्य महाप्रभु के लाड़ले परिकर हैं ।मेरी क्षत्रिय कुल में उत्पन्न देह आपकी चरण -रज  स्पर्श की अधिकारी है” कहते हुये मीरा ने झुककर श्री जीव गोस्वामी पाद के चरणों के समीप श्रद्धा से मस्तक रखा। श्री पाद ” ना-ना” ही कहते रह गये। अब कृपा करके पधारे। ” श्री पाद ने अनुरोध किया।आगे आप , गुरूजनों के पीछे चलना ही उचित है ” मीरा ने मुस्कराते हुये कहा।

               ” मैं तो बालक हूँ। पुत्र तो सदा माँ के आँचल से लगा पीछेपीछे ही चलता है ” अतिशय विनम्रता से  श्री पाद बोले।इस समय तक कई संत महानुभाव एकत्रित हो गये थे। वे दोनों का विनय -प्रेम -पूर्ण अनुरोध और आग्रह देखकर गदगद हो गये। एक वृद्ध संत के सुझाव पर कुटिया के बाहर चबूतरे पर सब बैठ गये। सबने मीरा से आरम्भ करने का आग्रह किया।मीरा ने श्री जीव गोस्वामी पाद के इष्ट श्री गौरांग महाप्रभु के सन्यास स्वरूप और अपने इष्ट श्रीकृष्ण के स्वरूप का समन्वय बैठाते हुये स्वभाविक ही एक ऐसे पद का गान कर दिया , जिसका श्रवण कर सब भक्तजनों के प्राण झंकृत हो उठे। इस गान में जहाँ चैतन्य महाप्रभु की जीवमात्र के उद्धार के लिये उनकी करूणा थी वहीं श्रीकृष्ण की वृन्दावन लीला का अति भावपूर्ण चित्रण था।आश्चर्य की बात तो यह थी कि मीरा ने पद गाया तो स्वभावतः ही , पर एक एक पंक्ति में दोनों लीलाओं का -गौरलीला और श्रीकृष्ण लीला का अद्भुत समिश्रण भी था और दोनों लीलाओं के प्रधान गुण- गौरलीला के विरह ,करूणा और श्रीकृष्ण लीला की रसिकता भी ।
अब तो हरि नाम लौ लागी ।
सब जग को यह माखन चोरा नाम धर्यो बैरागी ॥
कित छोड़ी वह मोहन मुरली कित छोड़ी वह गोपी।
मूँड़ मुँड़ाई डोरी कटि बाँधे माथे मोहन टो पी॥
मात जसोमति माखन कारन बाँधै जाके पाँव।
स्यामकिसोर भये नव गौरा चैतन्य जाको नाँव॥
पीताम्बर को भाव दिखावै कटि कोपीन कसै।
गौर कृष्ण की दासी मीरा रसना कृष्ण बसै॥
सब बैठे हुये भक्त जनों में से कोई ऐसा न था जो श्री गौरांग महाप्रभु की जीवमात्र के उद्धार के  लिए करूणा अनुभव कर आँसुओं से अभिषिक्त न हुआ हो। ” धन्य हो ! साधु ! अद्भुत ! वाह ! ” सब संत जनों ने प्रशंसा करते हुये अनुमोदन किया। मीरा ने विनम्रता से सबको प्रणाम किया और श्री जीव गोस्वामी पाद से श्री चैतन्य महाप्रभु के सिद्धांत और प्रेम भक्ति के विषय में कुछ सुनाने का आग्रह किया।श्री पाद के साथ अन्य संतों ने भी चर्चा में भाग लिया। एक भक्ति पूर्ण गोष्ठी हो गई । श्री पाद मीरा के विचारों की विशदता , भक्ति की अनन्यता और प्रेम की प्रगाढ़ता से बहुत प्रभावित हुये। पुनः पधारने के आग्रह के साथ कुछ दूर तक मीरा को पहुँचा कर उन्हें विदाई दी ।

          “श्री श्याम सुन्दर गोस्वामी जी “

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