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आज की बृज रस धारा

??आज की ब्रज रस धारा ??

दिनांक १४/०१/२०१९

मीरा चरित्र – अब और विरह नहीं सहा जाता


दिव्य वृन्दावन की एक दिव्य रात्रि में चम्पा और मीरा गिरिराज जी की तरहटी में पहुँची है। पुष्पों से निर्मित एक निकुञ्ज द्वार पर पहुँच मीरा को सब वातावरण पहले से ही पहचाना सा ही लग रहा है।निकुञ्ज द्वार पर खड़ी एक रूपसी ने चम्पा को अतिशय स्नेह के साथ आलिंगन करते हुए पूछा ,- ” अरे चम्पा ! आ गई तू ?” क्यों बहुत दिन हो गये न?” चम्पा ने भी उतने ही स्नेह से गले लगे हुये कहा।” नहीं अधिक कहाँ ? अभी कल परसों ही तो गई थी तू ? यह कौन ? माधवी है न ?”माधवी ? यह सब मुझे माधवी क्यों कहते है ? मीरा के अन्तर में एक क्षण के लिए यह विचार आया और फिर जैसे बुद्धि लुप्त हो गई हो।” श्री किशोरीजू , श्री श्यामसुन्दर ……………..! चम्पा ने बात अधूरी छोड़ कर उसकी ओर देखा।”आओ न। भीतर तुम दोनों की ही प्रतीक्षा हो रही है।मैं तो तुम्हारी अगवानी के लिए ही यहाँ खड़ी थी ।” चलो रूप ! कल और आज दो ही दिन में ऐसा लगता है कि मानों दो युग बीत गये हों ।पर बताओ कि प्रियालाल जी प्रसन्न तो हैं न ? ” चम्पा रूप के साथ चलते हुये बोली।” हाँ ! दोनों बहुत प्रसन्न है। किशोरीजू तो तुम्हारे त्याग और प्रेम की प्रशंसा करती रहती है  ।” मेरी क्या प्रशंसा रूप !और क्या त्याग ? हमारे प्राणधन श्यामसुन्दर और प्राणेश्वरी श्री किशोरीजू जिसमें प्रसन्न रहे वही हमारा सर्वस्व है।इन्हें आते देख बहुत सी सखियाँ हँसती हुई उठ गई-“ चलो ! भीतर किशोरीजू प्रतीक्षा कर रही है।अगले कक्ष में प्रवेश करते ही जैसे मीरा ,मीरा न रही ।प्रेम पीयूष से उसका ह्रदय यों ही सदा छलकता रहता था , पर आज इस क्षण तो जैसे उसका रोम रोम रस- सागर बन गया। सामने विराजित नीलघनद्युति मयूरमुकुटी श्यामसुन्दर और स्वर्ण चम्पकवर्णीया श्री किशोरीजू की दृष्टि उस पर पड़ने से वह आपा भूल गई। रूप और सौरभ की छटा का दर्शन हो वह मुग्ध सी हो अपना अस्तित्व खो बैठी।  नेत्र उस घनश्याम वपु के सौन्दर्य -सिंधु की थाह पाने में असमर्थ -थकित होकर डोलना भूल गये। नासिका सौरभ सिन्धु में खो गई। और कर्ण ? 

तभी आकर्षण की सीमा पार कर वे दीर्घ नेत्र उसकी ओर हुये और कर्णो में मिठास घोलते हुये बोले -” माधवी ! तुझे माधवी कहूँ कि मीरा ?” वह कहते हुये हँसे ,और उनके शब्दों और हँसी की माधुरी चहुँ दिशा में फैल गई।श्री किशोरीजू के संकेत पर चम्पा मीरा को लेकर उनके समीप गई। मीरा और चम्पा दोनों ने राशि राशि के उदगम उन चरणों पर सिर रखा। श्री राधारानी के सौन्दर्य ने तो मीरा की चेतना ही हर ली। जब नेत्र खुले तो प्रियाजी का करकमल उसके मस्तक पर था। मीरा के नेत्रों से आँसुओं की धारायें बह चलीं। सुन माधवी ! ” अतिशय स्नेह से सिक्त सम्बोधन सुन मीरा ने आँसू से भरी आँखें उठाकर ठाकुर की तरफ़ देखा। ” सुन माधवी ! अभी तेरी देह रहेगी कुछ समय तक संसार में ” उन्होंने कहा ।वह ऐसे चौंक पड़ी मानों जलते हुये अंगारों पर पैर पड़ गया हो ।उसने मौन पलकें उठाकर प्रभु की ओर देखा। जैसे पीड़ा का महासागर ही लहरा उठा हो मानों उस दृष्टि में मीरा ने रूदन स्वर में कहा ,- ” मैं जन्म जन्म की अपराधिनी हूँ , पर आप करूणासागर हो ,दया निधान हो, मेरे अपराधों को नहीं , अपनी करूणा को ही देखकर अपनी  माधवी को इन चरणों में पड़ी रहने दो ।जगत की मीरा को मर जाने दो। अब और विरह नहीं सहा जाता ……..नहीं सहा जाता प्रभु। “

          “श्री श्याम सुन्दर गोस्वामी जी “

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