News

श्री राधे 

“श्रील नारायण भट्ट ज़ू जयति”

“श्री नारायण दास गोस्वामी जयति”

??आज की ब्रज रस धारा  

दिनांक 13/06/2018

जहाँ कृष्ण भी असमर्थ है

भगवान श्री कृष्ण गोपियों के नित्य ऋणी है,उन्होंने अपना यह सिद्धात घोषित किया है “ये यथा मां प्रपधन्ते तांस्तथै भजाम्यहम“,अर्थात जो मुझे जैसे भजते है उन्हें मै वैसे ही भजता हूँ.

इसका यह तात्पर्य समझा जाता है कि भक्त जिस प्रकार से और जिस परिमाण के फल को द्रष्टि में रखकर भजन करता है

भगवान उसको उसी प्रकार और उसी परिमाण में फल देकर उसका भजन करते है-

सकाम, निष्काम शांत, दास्य, वात्सल्य, सख्य,आदि कि जिस प्रकार की कामना, भावना, भक्त की होती है, भगवान उसे वही वस्तु प्रदान करते है.

परन्तु गोपियों के सम्बन्ध में भगवान के इस सिद्धात वाक्य कि रक्षा नहीं हो सकी इसके प्रधान तीन कारण है-

१. –  गोपी के कोई भी कामना नहीं है.अतएव श्रीकृष्ण उन्हें क्या दे.

२. –  गोपी के कामना है केवल श्रीकृष्णसुख की, श्रीकृष्ण इस कामना कि पूर्ति करने जाते है तो उनको स्वयं अधिक सुखी होना पडता है अतः इस दान से ऋण और भी बढ़ता है.

३. – जहाँ गोपियों ने सर्व त्याग करके केवल श्री कृष्ण के प्रति ही अपने को समर्पित कर दिया है

वहाँ श्रीकृष्ण का अपना चित्त बहुत जगह बहुत से प्रेमियों के प्रति प्रेम युक्त है अतएव गोपी प्रेम अनन्य और अखंड है कृष्ण प्रेम बिभक्त और खंडित है.

इसी से गोपी के भजन का बदला उसी रूप में श्रीकृष्ण उसे नहीं दे सकते, और इसी से अपनी असमर्थता प्रकट करते हुए वे कहते है – गोपियों तुमने मेरे लिए घर कि उन बेडियो को तोड़ डाला है

जिन्हें बड़े-बड़े योगी-यति भी नहीं तोड़ पाते, मुझसे तुम्हारा यह मिलन, यह आत्मिक संयोग सर्वथा निर्मल और सर्वथा निर्दोष है.

यदि मै अमर शरीर से, अमर जीवन से, अनंत काल तक, तुम्हारे प्रेम,सेवा और त्याग का बदला चुकाना चाहूँ

, तो भी नहीं चूका सकता.मै सदा तुम्हारा ऋणी हूँ तुम अपने सौम्य स्वभाव से ही प्रेम से ही मुझे उऋण कर सकती हो परन्तु मै तो तुम्हारा ऋणी ही हूँ.

इसलिए प्रेममार्गी भक्त को चाहिये कि वह अपनी समझ से तन, मन, वचन से होने वाली प्रत्येक चेष्टा को श्रीकृष्ण सुख के लिए ही करे,जब-जब मन में प्रतिकूल स्थिति प्राप्त हो,

तब-तब उसे श्रीकृष्ण कि सुखेच्छाजनित स्थिति समझकर परमसुख का अनुभव करे, यो करते-करते जब प्रेमी भक्त केवल श्रीकृष्णसुख-काम अनन्यता पर पहुँच जाता है,

तब श्रीकृष्ण के मन की बात भी उसे मालूम होने लगती है गोपियों के श्रीकृष्णानुकुल जीवन में यह प्रत्यक्ष प्रमाण है.

इसलिए भगवान अर्जुन से कहते है – गोपियाँ ,मेरी सहायिका, मेरी गुरु, शिष्या, भोग्या , बान्धव,  स्त्री है अर्जुन मै गोपियाँ मेरी क्या नहीं है,

सबकुछ है मेरी महिमा को ,मेरी सेवा को, मेरी श्रद्धा को, और मेरे मन के भीतरी भावों को गोपियां ही जानती है दूसरा कोई नहीं जानता.

          “श्री श्याम सुन्दर गोस्वामी जी ”

      सेवाधिकारी श्री राधा रानी मन्दिर बरसाना 

          श्री जी बरसाना मण्डल ट्रस्ट (रजि०)

            Website:- www.sjbmt.in

Contact Us:-08923563256,07417699169

श्री राधे 

“श्रील नारायण भट्ट ज़ू जयति”

“श्री नारायण दास गोस्वामी जयति”

??आज की ब्रज रस धारा ??

दिनांक 05/05/2018

श्री राधा रानी चरणारविन्द

श्री राधा रानी चरणारविन्द 

राधा रानी जी का दायाँचरण 

राधारानी जी के दायाँचरण “आठ मंगल चिन्हों” से अलंकृत है,

‘शंख’, ‘गिरी’, ‘रथ’, ‘मीन’, ‘शक्ति-अस्त्र’, ‘गदा’, ‘यज्ञकुण्ड’, ‘रत्न-कुंडल’.

पादांगुष्ठ के मूल पर एक ‘शंख’ है. दूसरी एवं माध्यम अँगुली के नीचे एक ‘गिरी’ है. गिरी के नीचे मध्य में एडी की ओर एक ‘रथ’है और एड़ी पर एक ‘मीन’ है, रथ के समीप पावं के भीतरी किनारे पर एक ‘शक्ति अस्त्र’ है. रथ के दूसरी ओर पावं के बाहरी किनारे के निकट एक ‘गदा’ है. कनिष्ठा के नीचे एक ‘यज्ञकुण्ड’ है.और उसके नीचे एक ‘रत्न कुंडल’ है.

 

१. शंख – शंख विजय का प्रतीक है यह बताता है कि राधा-गोविंद के चरणकमलो की शरण ग्रहण करने वाले व्यक्ति सदैव दुख से बचे रहते है और अभय दान प्राप्त करते है.

 

२. गिरी  – यह बताता है यधपि गिरी-गोवर्धन की गिरिवर के रूप में व्रज में सर्वत्र पूजा होती है, तथापि गिरी-गोवर्धन विशेषकर राधिका की  चरण सेवा करते है.

 

३. रथ – यह चिन्ह बताता है, कि मन रूपी रथ को राधा के चरणकमलों में लगाकर सुगमता पूर्वक नियंत्रित किया जा  सकता है.

 

४. मीन – जिस प्रकार मछली जल के बिना नहीं रह सकती, उसी प्रकार भक्तगण क्षण भर भी राधा-श्यामसुन्दर के चरणाम्बुजों के बिना नहीं रह सकते.

 

५. शक्ति  – यह एक भाले का घोतक है, जो व्यक्ति राधा जी कि शरण ग्रहण करता है उनके लिए श्री राधा के चरण प्रकट होकर सांसारिक जीवन के सभी अप्रिय बंधनों को काट डालते है.

 

६.गदा – यह चिन्ह सूचित करता है कि राधा के चरण पापमय काम रूपी हाथी को प्रताड़ित कर सकते है.

 

७. होम कुण्ड –  यह घोषित करता है कि राधा के चरणों का ध्यान करने वाले व्यक्ति के पाप इस प्रकार भस्म हो जाते है मानो वे यज्ञ वेदी में विघमान हो.

 

८. कुंडल – श्री कृष्ण के कर्ण सदा राधा जी के मंजुल नूपुरो कि ध्वनि और उनकी  वीणा के मादक रागों का श्रवण करते है.

 

राधा रानी जी का बायाँ चरण

राधा रानी जी का बायाँ चरण “ग्यारह शुभ चिन्हों” से सज्जित है.

 जौ, चक्र, छत्र, कंकण, ऊर्ध्वरेखा, कमल, ध्वज,  सुमन, पुष्पलता, अर्धचंद्र, अंकुश.

पादांगुष्ठ के मूल पर “एक जौ” का दाना है उसके नीचे एक “चक्र” है, उसके नीचे एक “छत्र” है, और उसके नीचे एक “कंकण” है. एक “ऊर्ध्वरेखा” पावं के मध्य में प्रारंभ होती है, मध्यमा के नीचे एक “कमल” है, और उसके नीचे एक “ध्वज”है. ध्वज के नीचे एक “सुमन” है, और उसके नीचे “पुष्पलता”है, एड़ी पर एक चारु “अर्धचंद्र” है. कनिष्ठा के नीचे एक “अंकुश” अंकित है.

1. जौ का दाना – जौ का दाना व्यक्त करता है कि भक्तजन राधा कृष्ण के पदारविन्दो कि सेवा कर समस्त भोगो ऐश्वर्य प्राप्त करते है. एक बार उनका पदाश्रय प्राप्त कर लेने पर भक्त की  अनेकानेक जन्म मरण कि यात्रा घट कर, जौ के दानो के समान बहुत छोटी हो जाती है.

2. चक्र – यह चिन्ह सूचित करता है कि राधा कृष्ण के चरण कमलों का ध्यान काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, और मात्सर्य, रूपी छै शत्रुओ का  नाश करता है. ये तेजस तत्व का प्रतीक है जिसके द्वारा राधा गोविंद भक्तो के अंतःकरण से पाप तिमिर को छिन्न-भिन्न कर देते है.

3. छत्र – छत्र यह सिद्ध करता है कि उनके चरणों कि शरण ग्रहण करने वाले भक्त भौतिक कष्टों कि अविराम वर्षा से बचे रहते है.

4. कंकण  – राधा के चरण सर्वदा कृष्ण के हाथो में रहते है (जब वे मान करती है तो कृष्ण चरण दबाते है) जिस प्रकार कंकण सदा हाथ में रहता है.

5. उर्ध्व रेखा – जो भक्त इस प्रकार राधा श्याम के पद कमलों से लिपटे रहते है, मानो वे उनकी जीवन रेखा हो वे दिव्य धाम को जाएँगे.

6. कमल – सरस सरसिज राधा गोविंद के चरणविंदो का ध्यान करने वाले मधुकर सद्रश भक्तो के मन में प्रेम हेतु लोभ उत्पन्न करता है.

7. ध्वज – ध्वज उन भक्तो कि भय से बचाता और सुरक्षा करता है जो उनके चरण सरसिज का ध्यान करते है विजय का प्रतीक है.

8. पुष्प – पुष्प दिखाता है कि राधा जी के चरणों कि दिव्य कीर्ति सर्वत्र एक सुमन सौरभ कि भांति फैलती है

9. पुष्पलता  – यह चिन्ह बताता है कि किस प्रकार भक्तो की इच्छा लता तब तक बढती रहती है, जब तक वह श्रीमती राधा के चरणों की शरण ग्रहण नहीं कर लेती.

10. अर्धचंद्र – यह बताता है कि जिस प्रकार शिव जी जैसे देवताओं ने राधा गोविंद के चरणारविन्दों के तलवो से अपने शीश को शोभित किया है, इसी प्रकार जो भक्त इस प्रकार राधा और कृष्ण के पदाम्बुजो द्वारा अपने शीश को सुसज्जित करते है वे शिव जी के समान महान भक्त बन जाते है.

11. अंकुश – अंकुश इस बात का घोतक है कि राधा गोविद के चरणों का ध्यान भक्तो के मन रूपी गज को वश में करता है उसे सही मार्ग दिखाता है.

इस प्रकार राधारानी के चरण सरसिज के “उन्नीस मंगल चिन्हों” का नित्य स्मरण किया जाता है.

“जय जय श्री राधे “

राधे राधे

??आज की ब्रज रस धारा ??

दिनांक 29/04/2018

 

दरिद्रता दुर्भाग्य का नाश करता है – पीपल का वृक्ष

पुराणों में पीपल के वृक्ष के महत्व का विस्तार से वर्णन किया गया है. आध्यात्मिक ही नहीं पीपल के वृक्ष का वैज्ञानिक भी महत्व है.

* प्रात:स्नान के बाद पीपल का स्पर्श करने से व्यक्ति के समस्त पाप भस्म हो जाते है, और लक्ष्मी की प्राप्ति होती है. पीपल वृक्ष की नित्य तीन बार परिक्रमा करने और जल चढाने पर दरिद्रता, दु:ख और दुर्भाग्य का विनाश होता है और आयु में वृद्धि होती है.

* अश्वत्थ वृक्ष को दूध, नैवेद्य, धूप, दीप,फल-फूल, अर्पित करने से मनुष्य को समस्त सुख वैभव की प्राप्ति होती है.

* पीपल की जड़ के निकट बैठकर जो जप, दान, होम, स्तोत्रपाठ, व अनुष्ठान किया जाता है उनका फल अक्षय होता है.

*जड़ से ऊपर तक का तना नारायण कहा गया है और ब्रह्मा, विष्णु, महेश ही इसकी शाखाओ के रूप में स्थित है. पीपल के पत्ते संसार के प्राणियों के समान है. प्रत्येक वर्ष नए पत्ते निकलते है पतझड़ होता, मिट जाते है, फिर नए पत्ते निकलते है, यही जन्म-मरण का चक्र है.

* पीपल के नीचे किया गया दान अक्षय होकर जन्म-जन्मातर तक फलदायी होता है जिस प्रकार संसार में गौ ब्राह्मण व देवता पूजित है उसी प्रकार पीपल भी पूजा के योग्य है पीपल को रोपने से धन रक्षा करने से पुत्र स्पर्श करने से स्वर्ग और पूजने से मोक्ष की प्राप्ति होती है.

भगवद्गीता में भगवान से कहते हैं – अश्वत्थ: सर्ववृक्षाणाम् (अर्थात् समस्त वृक्षों में मैं पीपल का वृक्ष हूं) कहकर पीपल को अपना स्वरूप बताया है.स्वयं भगवान ने उसे अपनी उपमा देकर पीपल के देवत्व और दिव्यत्व को व्यक्त किया है.

 

इसलिए धर्मशास्त्रों में पीपल के पत्तों को तोडना, इसको काटना या मूल सहित उखाड़ना वर्जित माना गया है. जो व्यक्ति पीपल को काटता है या हानि पहुँचता है उसे एक कल्प तक नरक भोगकर चंडाल की योनि में जन्म लेना पडता है.

रात में पीपल की पूजा को निषिद्ध माना गया है. क्योंकि ऐसा माना जाता है कि रात्री में पीपल पर दरिद्रता बसती है और सूर्योदय के बाद पीपल पर लक्ष्मी का वास माना गया है. वैज्ञानिक दृष्टि से भी पीपल का महत्तव है. पीपल ही एकमात्र ऎसा वृक्ष है जो रात-दिन ऑक्सीजन देता है.

          “श्री श्याम सुन्दर गोस्वामी जी ”

      सेवाधिकारी श्री राधा रानी मन्दिर बरसाना 

          श्री जी बरसाना मण्डल ट्रस्ट (रजि०)

            Website:- www.sjbmt.in

Contact Us:-08923563256,07417699169

राधे राधे

??आज की ब्रज रस धारा ??

दिनांक 27/04/2018

 

विश्व के सबसे लघु आकार और चक्रांकित शालिग्राम

विश्व की अमूल्य दिव्य धरोहर — विश्व के सबसे लघु आकार और चक्रांकित शालिगराम विग्रह श्रीसर्वेश्वर प्रभु । मात्र गुंजा फल के समान आकार ।

 

सर्वप्रथम श्रीसनकादिक ऋषियो ने सेवा की फिर देवर्षि वर्य श्री नारद जी को प्राप्त हुयी और आज से लगभग 5100 वर्ष पूर्व देवर्षि श्रीनारद जी ने अपने शिष्य सुदर्शन चक्रराज के अवतार श्रीनिम्बार्क भगवान को वृज में श्रीगोबर्धन की तरहटी में स्थित नीमगाँव में प्रदान की ।

यह प्रतिमा अत्यन्त प्राचीन है। जिसके बारे में कई पुराणों एवं उपनिषदो में वर्णन मिलता है। जैसे माण्डूक्योपनिषद के मन्त्र में भगवान्‌ सर्वेश्वर श्रीहरि की महिमा का वर्णन करते हुये लिखा गया है :-                                                          एष सर्वेश्वर सर्वज्ञ एषोन्तर्याम्येष:।
                                                      योनि: सर्वस्य प्रभवाप्ययोहि भूतानाम्‌।।

अर्थात्‌ :-यह सर्वेश्वर भगवान्‌ सर्वज्ञ है। यह प्राणी मात्र अर्थात्‌ चराचर जगत्‌ में अन्तर्यामी रूप से व्याप्त हैं। सम्पूर्ण जगत्‌ का यह कारण है। प्राणियों की उत्पत्ति्, उनका पालन और समय पूर्ण होने पर उनका संहार भी उन्हीं सर्वेश्वर श्रीहरि के द्वारा होता हैं।

श्रीसर्वेश्वर प्रभु सलेमाबाद में किस प्रकार पधारे, इस बारे में कथा इस प्रकार है-

एक बार जब ब्रह्मा जी ने सनकादिक ऋषियों से कहा कि वे भगवान्‌ की पूजा करें तो सनकादिक ऋषियों ने ब्रह्मा जी से पूछा कि वे किस भगवान्‌ की पूजा करें।

 

तब ब्रह्मा जी ने उन्हें सूचित किया कि वे गण्डक नदी के उद्गम स्थल पर स्थित दामोदर कुण्ड जो कि वर्तमान में नेपाल में मुक्तिनारायण धाम से आगे स्थित हैं पर जायें, जहा तुलसी पत्र पर भगवान्‌ विष्णु का प्रतिरूप प्राप्त होगा। आप उसी की पूजा करें।

इसके पश्चचात्‌ सनकादि ऋषि दामोदर कुण्ड गये तो वहा उन्हें तुलसी पत्र पर भगवान्‌ विष्णु के प्रतिरूप श्री शालग्राम प्राप्त हुये। इनका नाम श्री सर्वेश्वर प्रभु रखा गया। तथा इस श्रीविग्रह की श्रीसनकादि को द्वारा पूजा अर्चना की गई।

                                 गोर-श्यामावभासं तं सूक्ष्मदिव्यमनोहरम्‌।
                                    वन्दे सर्वेश्वरं देवं श्रीसनकादिसेवितम्‌।।

अर्थात्‌ :- गौर और श्याम इन दो बिन्दुओं से सुशोभित,श्यामल विग्रह, सूक्ष्माकार, दिव्य मनोहर उन शालग्राम स्वरूप श्रीसर्वेश्वर प्रभु की मैं वन्दना करता हूँ। जिनकी आराधना-पूजा महर्षि सनकादिक एवं देवर्षि नारद ने भी की थी।

यही श्रीविग्रह श्री सनकादिको ने देवर्षि नारद जी को प्रदान किया था। नारद जी ने यही श्रीविग्रह भगवान्‌ श्रीनिम्बार्काचार्य जी को प्रदान किया था।

तब से ही परम्परानुसार यह श्रीविग्रह श्रीनिम्बार्काचार्यपीठ, श्रीनिम्बार्कतीर्थ सलेमाबाद में विराजमान है। इसका प्रमाण हमें श्रीनिम्बार्कपादपीठाधीश्वर जगद्गुरु श्रीनिम्बार्कशरण देवाचार्यजी महाराज द्वारा स्वरचित ’’श्रीसर्वेश्वर प्रपत्ति स्तोत्र’’ के प्रथम श्लोक में मिलता है।

’कृष्णं सर्वेश्वरं देवमस्माकं कुलदैवतम्‌’’

अर्थात्‌ :- श्रीसर्वेश्वर प्रभु हमारे कुलदेव है अर्थात्‌ परम्परागत ठाकुर है।

वर्तमान श्रीनिम्बार्कपादपीठाधीश्वर जगद्गुरु श्रीराधासर्वेश्वरशरण् देवाचार्यजी महाराज ने भी इस बारे में लिखा है :-

श्रीसनकादिक सेव्य हैं, श्रीसर्वेश्वर देव।
                              परम्परागत प्राप्त हैं,’’शरण’’ लसत शुभ सेव।।1।।

सर्वेश्वर प्रभु अर्चना, सुरर्षि नारद प्राप्त।

                           सनकादिक सेवित प्रभु,’’शरण’’ निम्बार्क आप्त।।2।।

श्रीसर्वेश्वर प्रभु श्री शालग्राम का यह श्रीविग्रह इतना सूक्ष्म है, कि इनके दर्शन करने के लिये आवर्धक लेन्स की आवयकता पड़ती है। ऐसा माना जाता है कि भगवान्‌ श्री शालिग्राम का स्वरूप जितना ज्यादा सूक्ष्म होता है उसके पूजन का उतना ही महत्व अधिक होता है। पद्मपुराण में भी इसके बारे में वर्णन मिलता है :-

                                  तत्राप्यामलकीतुल्या पूज्या सूक्ष्मैव या भवेत्‌।
                                 यथा यथा शिलासूक्ष्मा तथास्यास्तु महत्फलम्‌।।

अर्थात्‌ – आंवले के बराबर श्री शालिग्राम की मूर्ति पूजा में हो तो उसका बड़ा भारी फल है और यदि उससे भी ज्यों-ज्यों सूक्ष्म मूर्ति प्राप्त हो त्यों-त्यों और भी अधिक फल देने वाली होती है।

 

प्रभु कृपा से आचार्य पीठ में विराजित श्री शालग्राम का श्रीविग्रह तो गुंजाफल चिरमी के ही बराबर है।

इन सबके अतिरिक्त सूक्ष्मतम श्री शालग्राम श्रीविग्रह की एक और विशेषता है कि इस श्रीविग्रह में एक गोलाकार चक्र दिखलाई देता और उस चक्र के मध्य भाग में दो बिन्दु दिखाई देते है।

 

ये दोनों बिन्दु भगवान्‌ श्रीराधाकृष्ण के प्रतीक है। ऐसा सुन्दर एवं सूक्ष्मतम श्री शालग्राम श्रीविग्रह विश्व में और कहीं नही मिलता है। आचार्य श्री जब भी धर्म प्रचारार्थ कहीं भी पधारते है, तब श्रीविग्रह को गले में धारण करके अपने साथ ही ले जाते हैं। जिसके दर्शन मात्र से इस भव के कई कष्टों से मुक्ति मिल जाती है।

राधे राधे

??आज की ब्रज रस धारा ??

दिनांक 26/04/2018

 

शालिग्राम का स्वरूप और महिमा का वर्णन

शालिग्राम का स्वरूप और महिमा का वर्णन

1. – जिस शालिग्राम-शिला में द्वार-स्थान पर परस्पर सटे हुए दो चक्र हों, जो शुक्ल वर्ण की रेखा से अंकित और शोभा सम्पन्न दिखायी देती हों, उसे भगवान “श्री गदाधर का स्वरूप” समझना चाहिये.

2.- “संकर्षण मूर्ति” में दो सटे हुए चक्र होते हैं, लाल रेखा होती है और उसका पूर्वभाग कुछ मोटा होता है.

3.-  “प्रद्युम्न” के स्वरूप में कुछ-कुछ पीलापन होता है और उसमें चक्र का चिह्न सूक्ष्म रहता है.


4. – “अनिरुद्ध की मूर्ति”
गोल होती है और उसके भीतरी भाग में गहरा एवं चौड़ा छेद होता है; इसके सिवा, वह द्वार भाग में नीलवर्ण और तीन रेखाओं से युक्त भी होती है.

5. – “भगवान नारायण” श्याम वर्ण के होते हैं, उनके मध्य भाग में गदा के आकार की रेखा होती है और उनका नाभि-कमल बहुत ऊँचा होता है.

6. – “भगवान नृसिंह” की मूर्ति में चक्र का स्थूल चिह्न रहता है, उनका वर्ण कपिल होता है तथा वे तीन या पाँच बिन्दुओं से युक्त होते हैं. ब्रह्मचारी के लिये उन्हीं का पूजन विहित है. वे भक्तों की रक्षा करनेवाले हैं.

7. – जिस शालिग्राम-शिला में दो चक्र के चिह्न विषम भाव से स्थित हों, तीन लिंग हों तथा तीन रेखाएँ दिखायी देती हों, वह “वाराह भगवान का स्वरूप” है, उसका वर्ण नील तथा आकार स्थूल होता है.

8.-  “कच्छप” की मूर्ति श्याम वर्ण की होती है. उसका आकार पानी की भँवर के समान गोल होता है. उसमें यत्र-तत्र बिन्दुओं के चिह्न देखे जाते हैं तथा उसका पृष्ठ-भाग श्वेत रंग का होता है.

9. – “श्रीधर की मूर्ति” में पाँच रेखाएँ होती हैं,

10.- “वनमाली के स्वरूप” में गदा का चिह्न होता है.

11. – गोल आकृति, मध्यभाग में चक्र का चिह्न तथा नीलवर्ण, यह “वामन मूर्ति” की पहचान है.

12.- जिसमें नाना प्रकार की अनेकों मूर्तियों तथा सर्प-शरीर के चिह्न होते हैं, वह भगवान “अनन्त की” प्रतिमा है.

13. – “दामोदर” की मूर्ति  स्थूलकाय एवं नीलवर्ण की होती है. उसके मध्य भाग में चक्र का चिह्न होता है. भगवान दामोदर नील चिह्न से युक्त होकर संकर्षण के द्वारा जगत की रक्षा करते हैं.

14. – जिसका वर्ण लाल है, तथा जो लम्बी-लम्बी रेखा, छिद्र, एक चक्र और कमल आदि से युक्त एवं स्थूल है, उस शालिग्राम को “ब्रह्मा की मूर्ति” समझनी चाहिये.

15. – जिसमें बृहत छिद्र, स्थूल चक्र का चिह्न और कृष्ण वर्ण हो, वह “श्रीकृष्ण का स्वरूप” है. वह बिन्दुयुक्त और बिन्दुशून्य दोनों ही प्रकार का देखा जाता है.

16. – “हयग्रीव मूर्ति” अंकुश के समान आकार वाली और पाँच रेखाओं से युक्त होती है.

17. – “भगवान वैकुण्ठ” कौस्तुभ मणि धारण किये रहते हैं. उनकी मूर्ति बड़ी निर्मल दिखायी देती है. वह एक चक्र से चिह्नित और श्याम वर्ण की होती है.

18. – “मत्स्य भगवान” की मूर्ति बृहत कमल के आकार की होती है. उसका रंग श्वेत होता है तथा उसमें हार की रेखा देखी जाती है.

19.- जिस शालिग्राम का वर्ण श्याम हो, जिसके दक्षिण भाग में एक रेखा दिखायी देती हो तथा जो तीन चक्रों के चिह्न से युक्त हो, वह भगवान “श्रीरामचंद्र जी” का स्वरूप है, वे भगवान सबकी रक्षा करनेवाले हैं.

20. – द्वारिका पुरी में स्थित शालिग्राम स्वरूप “भगवान गदाधर” को नमस्कार है, उनका दर्शन बड़ा ही उत्तम है.भगवान गदाधर एक चक्र से चिह्नित देखे जाते हैं.


21.- “लक्ष्मीनारायण”
दो चक्रों से,


22. – “त्रिविक्रम”
तीन से,


23.- “चतुर्व्यूह”
चार से,


24. – “वासुदेव”
पाँच से,


25.- “प्रद्युम्न”
छ: से,


26. – “संकर्षण”
सात से,


27. – “पुरुषोत्तम”
आठ से,


28.- “नवव्यूह”
नव से,


29. –  “दशावतार”
दस से,

 

 

          “श्री श्याम सुन्दर गोस्वामी जी ”

      सेवाधिकारी श्री राधा रानी मन्दिर बरसाना 

          श्री जी बरसाना मण्डल ट्रस्ट (रजि०)

            Website:- www.sjbmt.in

Contact Us:-08923563256,07417699169

राधे राधे

??आज की ब्रज रस धारा ??

दिनांक 24/04/2018

 

वैशाख मास

क्या है वैशाख मास – हिंदू पंचांग में चंद्रमास के नाम नक्षत्रों पर आधारित हैं. जिस मास की पूर्णिमा जिस नक्षत्र में होती है उसी के अनुसार माह का नाम पड़ा है. वैशाख मास की पूर्णिमा विशाखा नक्षत्र में होने के कारण इस मास का नाम वैशाख पड़ा.

“मेष संक्रांति” – वैसाख मास के लगते ही जब सूर्य मेष राशि में आते हैं तब मेष संक्रांति मानी जाती है.

 

वैशाख भारतीय पंचांग के अनुसार वर्ष का दूसरा माह है. चैत्र पूर्णिमा के बाद आने वाली प्रतिपदा से वैशाख मास का आरंभ होता है. धार्मिक और सांस्कृतिक तौर पर वैशाख महीने का बहुत अधिक महत्व माना जाता है. वैशाख मास में धार्मिक तीर्थ स्थलों पर स्नानादि का भी महत्व माना जाता है.

वैशाख मास के मुख्य त्यौहार – वैशाख मास का महत्व इसलिये भी माना जाता है क्योंकि इसी मास में भगवान विष्णु के अवतार जिनमें नर-नारायण, भगवान परशुराम, नृसिंह अवतार और ह्यग्रीव आदि अवतार अवतरित हुए थे. मान्यता है कि देवी सीता भी इसी मास में धरती माता की कोख से प्रकट हुई थी.

इस मास में मुख्य त्यौहार है –  अक्षय तृतीया, सीता नवमी,वैशाख अमावस्या,वैशाख पूर्णिमा


वैशाख मास का महत्व – 


न माधव समो मासो न कृतेन युगं समम्।

                           न च वेदसमं शास्त्रं न तीर्थं गंगया समम्।।” 

अर्थात – वैशाख के समान कोई मास नहीं है, सत्ययुग के समान कोई युग नहीं है, वेद के समान कोई शास्त्र नहीं है, और गंगाजी के समान कोई तीर्थ नहीं है.अपने कतिपय वैशिष्ट्य के कारण वैशाख उत्तम मास है.

कथा है—कि नारद जी ने राजा अम्बरीष से कहा – कि वैशाख मास को ब्रह्माजी ने सब मासों में उत्तम सिद्ध किया है। यह माता की भांति सब जीवों को सदा अभीष्ट वस्तु प्रदान करता है। धर्म, यज्ञ, क्रिया और तपस्या का सार है. यह मास संपूर्ण देवताओं द्वारा पूजित है.

जैसे विद्याओं में वेद-विद्या, मंत्रों में प्रणव, वृक्षों में कल्पवृक्ष, धेनुओं में कामधेनु, देवताओं में विष्णु, वर्णों में ब्राह्मण, प्रिय वस्तुओं में प्राण, नदियों में गंगाजी, तेजों में सूर्य, अस्त्र-शस्त्रों में चक्र, धातुओं में स्वर्ण, वैष्णवों में शिव तथा रत्नों में कौस्तुभमणि उत्तम है, उसी प्रकार धर्म के साधनभूत महीनों में वैशाखमास सबसे उत्तम है.

भगवान विष्णु को प्रसन्न करने वाला इसके समान दूसरा कोई मास नहीं है. जो वैशाख मास में सूर्योदय से पहले स्नान करता है, उससे भगवान विष्णु निरंतर प्रीति करते हैं. पाप तभी तक गर्जते हैं, जब तक मनुष्य वैशाख मास में प्रातःकाल जल में स्नान नहीं करता.

 

                            वैशाख मास में ब्रहममुहूर्त में स्नान का महत्व 

राजन्! वैशाख के महीने में सब तीर्थ, देवता आदि (तीर्थ के अतिरिक्त) बाहर के जल में भी सदैव स्थित रहते हैं. भगवान विष्णु की आज्ञा से मनुष्यों का कल्याण करने के लिए वे सूर्योदय से लेकर छह दंड के भीतर वहां उपस्थित रहते हैं. वैशाख सर्वश्रेष्ठ मास है और शेषशायी भगवान विष्णु को सदा प्रिय है.

                                     वैशाख मास में जल दान का महत्व 

जो पुण्य सब दानों से होता है और जो फल सब तीर्थों के दर्शन से मिलता है, उसी पुण्य और फल की प्राप्ति वैशाख मास में केवल जलदान करने से हो जाती है. जो जलदान में असमर्थ है, ऐसे ऐश्वर्य की अभिलाषा रखने वाले पुरुष को उचित है कि वह दूसरे को प्रबोध करे, दूसरे को जलदान का महत्व समझाए. यह सब दानों से बढ़कर हितकारी है.

जो मनुष्य वैशाख मास में मार्ग पर यात्रियों के लिए प्याऊ लगाता है, वह विष्णुलोक में प्रतिष्ठित होता है, नृपश्रेष्ठ ! प्रपादान (पौसला या प्याऊ) देवताओं, पितरों तथा ऋषियों को अत्यंत प्रिय है. जो प्याऊ लगाकर थके-मांदे पथिकों की प्यास बुझाता है, उस पर ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि देवतागण प्रसन्न होते हैं.

राजन् ! वैशाख मास में जल की इच्छा रखने वाले को जल, छाया चाहने वाले को छाता और पंखे की इच्छा रखने वाले को पंखा देना चाहिए. राजेन्द्र ! जो पीड़ित महात्माओं को प्यार से शीतल जल प्रदान करता है, उसे उतनी ही मात्र से दस हजार राजसूय यज्ञों का फल प्राप्त होता है.

ब्राह्मण को पंखा, छाता, पादुका दान  – श्रम से पीड़ित ब्राह्मण को जो “पंखा” डुलाकर शीतलता प्रदान करता है, वह निष्पाप होकर भगवान् का पार्षद हो जाता है. जो मार्ग में थके हुए श्रेष्ठ द्विज को वस्त्र से भी हवा करता है, वह भगवान विष्णु का सायुज्य प्राप्त कर लेता है. जो शुद्ध चित्त से ताड़ का पंखा देता है, उसके सारे पापों का शमन हो जाता है और वह ब्रह्मलोक को जाता है.

जो विष्णुप्रिय वैशाखमास में “पादुका दान” करता है, वह विष्णुलोक को जाता है। जो मार्ग में अनाथों के ठहरने के लिए विश्रामशाला बनवाता है, उसके पुण्य-फलका वर्णन नहीं किया जा सकता.मध्याह्न में आए हुए ब्राह्मण अतिथि को यदि कोई भोजन दे तो उसे अनंत पुण्य की प्राप्ति होती है.

                            वैशाख मास में इन आठ वस्तुओ का त्याग कर देना चाहिए

स्कन्द पुराण के अनुसार – १.वैशाख में तेल लगाना, २.दिन में सोना, ३.कांस्यपात्र में भोजन करना, ४.खाट पर सोना, ५.घर में नहाना, ६.निषिद्ध पदार्थ खाना, ७.दोबारा भोजन करना तथा ८.रात में खाना – इन आठ बातों का त्याग करना चाहिए-

तैलाभ्यघ्गं दिवास्वापं तथा वै कांस्यभोजनम्।

                                                  खट्वानिद्रां गृहे स्नानं निषि(स्य च भक्षणम्।। 

                                                   वैशाखे वर्जयेदष्टौ द्विभुक्तं नक्तभोजनम्।।

वैशाख में व्रत का पालन करने वाला जो पुरुष पद्म पत्ते पर भोजन करता है, वह सब पापों से मुक्त हो विष्णुलोक जाता है. जो विष्णुभक्त वैशाखमास में नदी-स्नान करता है, वह तीन जन्मों के पापों से मुक्त हो जाता है. जो सूर्योदय के समय किसी समुद्रगामिनी नदी में वैशाख-स्नान करता है, वह सात जन्मों के पापों से तत्काल मुक्त जाता है.

सूर्यदेव के मेष राशि में आने पर भगवान विष्णु का वरदान प्राप्त करने के उद्देश्य से वैशाख मास-स्नान का व्रत लेना चाहिए. स्नान के अनंतर भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहिए.

 

          “श्री श्याम सुन्दर गोस्वामी जी ”

      सेवाधिकारी श्री राधा रानी मन्दिर बरसाना 

          श्री जी बरसाना मण्डल ट्रस्ट (रजि०)

            Website:- www.sjbmt.in

Contact Us:-08923563256,07417699169

राधे राधे

??आज की ब्रज रस धारा ??

दिनांक 23/04/2018

 

बाबा माधव दास जी का लीला स्फुरण – वाह! पट्ठे तैने आनंद कर दियौ.

एक बार बाबा माधव दास जी महाराज गोवर्धन की परिक्रमा करते-करते गोविंद कुंड पर चले आये. यहां पर्वत के ऊपर गाय, हिरन आदि पशु घूम रहे थे.

 

माधव दास जी महाराज वन और पर्वतों के बीच में गोविंद कुण्ड के तट पर बैठ गए. थोड़ी देर बाद पद्मासन लगाकर ध्यान मग्न हो गए. एक सुंदर लीला का स्फुरण हुआ.

श्यामसुंदर एक विचित्र वेश धारण किए हुए चंचल साखाओं के साथ खेल रहे हैं. एक और श्याम सुंदर पीतांबर की कमर में फेंट कसे हुए मनसुखा, श्रीदामा आदि के संग है.

 

दूसरी और दाऊ दादा सुबल,सुदामा आदि सखाओं के संग विराजमान है. कबड्डी का खेल प्रारंभ हुआ. कभी श्याम सुंदर हार जाते .कभी बलराम जी हार जाते.

इस प्रकार खेल चल रहा था. श्रीदामा बलराम जी को हराने के लिए चला, बहुत प्रयास किया लेकिन बलराम जी को हरा नहीं सका . तब श्यामसुंदर मनसुखा के पास आकर उसकी पीठ पर हाथ मारते हुए कहा -मेरे शेर ! जा अब की बार दाऊ दादा को हराकर ही आना.

मनसुखा कबड्डी -कबड्डी कहता हुआ श्री बलरामजी में फारे में गया. दारु दादा ने अपने सखाओ से कहा- घेर ले सारे कूँ! बचकै नहिं जानौ चाहिए .

 

सभी सखाओं ने चारों तरफ से मनसुखा को घेर लिया. दाऊ दादा ने थोड़ा झुक कर मनसुखा के पैरों को पकड़कर अपनी ओर खींचा तो मनसुखा धड़ाम से नीचे गिर पड़ा. बाकी सखा मनसुखा के ऊपर चढ़ गए.

मनसुखा फारे की लकीर को छूने के लिए अपने दाहिने हाथ को आगे बढ़ाने लगा. दाऊ दादा ने परिक्र मनसुखा को फारे के अंदर खींचने का प्रयास कर रहे हैं और मनसुखा ताकत लगाकर फारे की लकीर को छूने का प्रयास कर रहा है.

 

तभी श्यामसुंदर अपने फारे में लकीर के पास आकर घुटनों के बल बैठकर मनसुखा का उत्साह बढ़ाने लगे.

श्यामसुंदर कह रहे हैं – शाबास! मनसुखा नैक कसर रह गई है, थोरो सो और जोर लगा, सोई काम बन जायेगो. मनसुखा ने पूरी ताकत लगाय कै अंतिम प्रयास कियो और फारे की लकीर को छू लियौ.

श्यामसुंदर इतने प्रमुदित भयै कि जमीन ते ऊपर उछल पड़े और बोले – वाह! पट्ठे तैने आनंद कर दियौ.

 

बाबा जी सब लीला देख रहे थे. बाबा भी वाह पट्ठे कहकर उछल पड़े. लीला का विश्राम हुआ, तो बाबा ने आंखें खोली. बाबा अचंभित रह गए.

उसी दिन से बाबा बात -बात में वाह पट्ठे कहने लगे. श्याम सुंदर की वह मधुर वाणी हृदय में बस गई थी. कोई भी थोड़ा सा अच्छा काम कर देता तो बाबा सहज भी बोल पड़ते थे- वाह! पट्ठे तैने आनंद कर दियौ.

 

          “श्री श्याम सुन्दर गोस्वामी जी ”

      सेवाधिकारी श्री राधा रानी मन्दिर बरसाना 

          श्री जी बरसाना मण्डल ट्रस्ट (रजि०)

            Website:- www.sjbmt.in

Contact Us:-08923563256,07417699169

राधे राधे

??आज की ब्रज रस धारा ??

दिनांक 21/04/2018

 

जब एक गज की निष्ठा संत चरणामृत में हो गई

रसिक मुरारी जी की संत सेवा की बड़ी अलौकिक रीति थी,संतो के चरणामृत के माट (मटके)भरे हुए वेदिकाओ पर रखते, उन्ही की पूजा, उन्ही को प्रणाम किया करते थे.

 

बस यही उनकी आराधन सेवा पूजा सबकुछ था. हर समय खूब संतो का जमावड़ा लगा ही रहता था.

एक दिन भंडारे में बहुत से संत आये,इन्होने अपने एक शिष्य को आज्ञा दी -कि जाओ!  और अच्छे प्रकार से संतो का चरणामृत उतार लाओ .जब शिष्य चरणामृत उतार लाया तो रसिक मुरारी जी ने पान किया,और पान करते ही बोले – क्या कारण है?

 

कि जैसा स्वाद नित्य आता है,वैसा स्वाद नहीं आया.शिष्यों को दिया और बोले-  तुम लोग भी पान करो और बताओ कि स्वाद है कि नहीं.

वे विचारे चरणामृत की महिमा और स्वाद क्या जाने.आप समझ गए कि किसी संत का चरणामृत लेना छोड़ दिया है.जब उन्होंने पूँछा – तो शिष्य ने कह दिया – कि एक संत थे जिनके शरीर में गलित कोढ़ था,उनका नहीं लिया.

 

तब रसिक मुरारी जी स्वयं गए और उनका चरणामृत लिया और जैसे ही पान किया तो स्वाद पाते ही नेत्रो में प्रेम के अश्रु छलछला उठे.

प्रसंग २-  इनके गुरु श्यामानंद जी थे एक स्थान पर अनाज होता था और उससे संत सेवा होती थी,एक बार एक राजा ने अपना अधिपत्य जमाया और सारा ग्राम ले लिया,श्यामानंद जी ने इन्हों बुलाया,जब ये राजा के पास गए तो उनके मंत्री इनके शिष्य थे,

 

इसलिए उन्होंने इनसे तो कुछ कहा नहीं उलटे राजा को समझाने लगे.ये बात राजा को अच्छी नहीं लगी और राजा ने जिस रास्ते से ये जा रहे थे उस जगह एक बड़ा पागल हाथी छुड़वा दिया.

 

सब भागने लगे,तब रसिक जी ने रसीली वाणी से बोले – हे चेतन तुम हाथी शरीर का तमोगुण तजो और श्री कृष्ण श्री कृष्ण बोलो ! इतना सुनते ही हाथ का ह्रदय भाव से भर गया और वह सूंड आपके चरणों में नवाकर उनको प्रणाम करने लगा.

उसके आँखों से आँसू बहने लगे,रसिक जी ने उसकी श्रद्धा देखकर कान में भगवन्नाम मंत्र सुना दिया और गोपालदास उसका नाम रखा और उसके गले में तुलसी जी की माला पहिना दी.तब राजा ने भी क्षमा माँगी.

 

अब तो गोपालदास हाथी संतो की सेवा करने लगा,संतो को देखकर प्रणाम करता संतो के लिए व्यापारियों से अनाज लेकर आता,उसका नियम था कि संतो के भंडारे में आता संतो का उच्छिष्ट प्रसादी ही पाता था.इससे संतो की भी हाथी में बड़ी प्रीति हो गई,

 

और संतो की जमात फिरने लगी और गोपाल दास को साथ ले जाते,अब  तो सर्वत्र गोपाल दास महंत का नाम तो सर्व विदित हो गया.

एक राजा ने जब सुना तो उसकी इच्छा उस हाथी को देखने की हुई उसने कहा जो भी उस हाथी को पकड़कर लाएगा उसे बहुत सा द्रव्य देगे.यह सुनकर एक दुष्ट संत वेशधारी गया और गोपालदास जी ने जब देखा संत वेषधारी है तो उसके साथ चले आये.

परन्तु गज गोपालदास का नियम था कि चरणामृत और प्रसाद के अलावा कुछ ग्रहण ही नहीं करते थे,इसलिए जल भी नहीं पिया.तीन चार दिन बीत गए, तब वे लोग उसे गंगाजी की धारा में जल पिलाने ले गए,गंगा जी में उतरकर भी गजराज ने अपनी सूंड ऊपर कर ली और अपना शरीर छोड़ दिया.

ऐसी संत प्रसाद और संत चरणामृत में निष्ठा थी,होती भी क्यों नहीं जिनके गुरु की ऐसी संत चरणामृत में निष्ठा थी,कि उनकी साधन उपासना,पूजा,सभी कुछ संत चरणामृत था.

 

ऐसी निष्ठा कि एक गज को भी संत बना दिया,ऐसे संत और उनकी संत चरणामृत में निष्ठा की सदा ही जय हो …

 

          “श्री श्याम सुन्दर गोस्वामी जी ”

      सेवाधिकारी श्री राधा रानी मन्दिर बरसाना 

          श्री जी बरसाना मण्डल ट्रस्ट (रजि०)

            Website:- www.sjbmt.in

Contact Us:-08923563256,07417699169

राधे राधे
??आज की “ब्रज रस धारा”??
दिनांक 09/04/2018

 

“भक्त-पद-रज”“भक्त-पादोदक”और“भक्तोच्छिष्ट द्रव्य”इन तीनो का अत्यन माहात्म्य है सचमुच जिन्हे इन तीनो वस्तुओ में पूर्ण श्रद्धा हो गयी

 

, जिनकी बुद्धि में से भक्तो के प्रति भेदभाव मिट गया, जो भगवत्स्वरूप समझकर सभी भक्तो की पदधूली को श्रद्धा पूर्वक सिर पर चढाने लगे,तथा भक्तो के पादोदक को भक्तिभाव से पान करने लगे,वेनिहाल हो गये.

 

कालिदास जी भी ऐसे भक्त थे, भगवन्नाम में इनकी अनन्य निष्ठा थी, उठते-बैठते, सोते-जागते, हँसते-खेलते तथा बाते करते-करते भी सदा जीव्हा पर भगवन् नाम ही विराजमानरहता .

 

हरे कृष्ण, हरे राम, के बिना ये किसी से बात ही नहीं करते थे.किसी भी भगवत् भक्त का पता पाते वही दौड़ जाते, और यथाशक्ति सेवा करते, भक्तो को खिलाकार उनका उच्छिष्ट महाप्रसाद को पाकर ये अपने को कृतार्थ समझते, भक्तो का पादोदक पान करना उनकी पदधूली को मस्तक पर चढाना, ये ही इनके साधन बल है !

 

इसके अतिरिक्त ये योग, यज्ञ, तप, पूजा, पाठ, अध्ययन आदि कुछ भी नहीं करते थे ! ऐसा ही इनका द्रृढविश्वास था, कि इन्ही साधनों के द्वारा प्रभु पदोंकी प्रीति प्राप्त हो जायेगी.

 

एक बार इनके गाँव में ही एक शूद्र जाति के भक्त थे उनकी पत्नि भी अत्त्यन्त पतिपरायणा सती साध्वी नारी थी,

 

दोंनो ही खूब भक्तिभाव से श्रीकृष्णकीर्तन किया करते थे, एक दिन कालिदास जी उनके दर्शन के निमित्त उनके घर गये.

 

और भेंट के रूप में आम साथ ले गये.उन्हे आया देख दोनो पति-पत्नि के आश्चर्य का ठिकाना ही ना रहा दोनों ने उनका स्वागत किया और एक फटा आसन बैठने को दिया और बड़े लल्जित भाव सेभक्त बोला-आपने अपनी पदधूलि से इस गरीव की कुटिया को पवित्र बना दिया .

 

हम तो शुद्र है, आपकी किस प्रकार सेवा करे.कालिदास जी ने कहा –यदि आप कृपा करके कुछ करना चाहते है तो अपने चरणो को मेरे मस्तक पर रखकर उनकी पावन पराग से मेरे मस्तक को पवित्र बना दीजिये.

 

मुझे सब कुछ मिल जायेगा, वह भक्त बोला – आप ये कैसी भूली-भूली बाते कर रहेहो.हम जाति के शूद्र, धर्म-कर्म से हीन आपके शरीर को स्पर्शकरने तक के अधिकारी नहीं, फिर हम आपको अपने पैर कैसे छुआसकते है हमारी यही प्रार्थना है कि ऐसी पाप चढाने वाली बात फिर आप कभी अपने मुँह से ना निकले.

 

कालिदास जी ने कहा- जो भगवान का भक्त है, उसकी कोई जाति नहीं होती उससे श्रेष्ठ कोई नहीं होता वही सबसे श्रेष्ठ है, आपकी चरणी धूलि से में पावन हो जाऊँगा,आप मेरे ऊपर अवश्य कृपा करे.

 

वे बहुत देर तक आग्रह करते रहे, पर उन्होंने स्वीकार नहीं किया. अंत में दोनों पति-पत्नि ने उन्हे विदा किया, वह भक्त उन्हे बाहर तक छोडकर घर लौट आये.

 

जब वह भक्त घर में घुस गये तब जिस स्थान पर वह भक्त खड़े थे उस स्थान की चरण धूलि उठाकर कालिदास जी ने अपने सम्पूर्ण शरीर पर लगा ली और घर के बाहर छिपकर बैठ गये रात्रि का समय था,

 

उस भक्त की पत्नि ने कहा- कालिदास जी, ये प्रसादी आम देकर गये थे उन्हे भगवान को अर्पण करके पा लो, भक्त का दिया प्रसाद है इसे पाने से कोटि जन्म के पाप कटते है भगवान को अर्पण करके भक्त उन्हे चूसने लगे उनके चूसने के बाद जो बचता उनकी पतिव्रता स्त्री चूसती जाती और गुठली और छिलके को बाहर की ओर फेकती जाती,

 

पीछे छुपे कालिदास जी उन गुठलियों को उठाकर चूसते और उनमे वे अमृतके समान स्वाद का अनुभव करते ! इस प्रकार की इनकी भक्तो के प्रति अनन्य श्रद्धा थी.

 

सच है जिन्होंने सब कुछ त्याग दिया ऐसे परम पूज्य भगवद्ध महापुरुषो के चरणो के नीचे की धूलि को जब तक सर्वाग में लगाकर उसमे स्नान ना किया जाये तव तक किसी को भी प्रभु पादपदों की प्राप्ति नहीं हो सकती.

 

          “श्री श्याम सुन्दर गोस्वामी जी ”

      सेवाधिकारी श्री राधा रानी मन्दिर बरसाना 

          श्री जी बरसाना मण्डल ट्रस्ट (रजि०)

            Website:- www.sjbmt.in

Contact Us:-08923563256,07417699169

राधे राधे
??आज की “ब्रज रस धारा”??
दिनांक 08/04/2018

सचिदानंद दिव्य सुधा रस सिन्धु ब्रजेन्द्र नंदन राधावल्लभ श्यामसुंदर श्री कृष्ण चन्द्र का नित्य निवास है प्रेम धाम ब्रज में और उनका चलना फिरना भी है ब्रज के मार्ग में ही.

 

यह मार्ग चित्त वृति निरोध सिद्ध महा ज्ञानी योगीन्द्र मुनीन्द्रों के लिए भी अत्यंत दुर्गम है. ब्रज का मार्ग तो उन्हीं के लिए प्रकट होता है

 

जिनकी चित्त वृति प्रेम धन रस सुधा सागर आनंदकंद श्री कृष्ण चन्द्र के चर्णारविंदों की ओर नित्य निर्बाध प्रवाहित रहती है जहाँ न निरा निरोध है और न ही उन्मेष ही बल्कि दोनों की चरम सीमा का अपूर्व मिलन है.

 

इस पथ पर अबाध विहरण करती हुई वृष भानु नंदनी रासेश्वरी श्री श्री राधा रानी का दिव्य वसनांचल विश्व की विशिष्ट चिन्मय सत्ता को कृत कृत्य करता हुआ नित्य खेलता रहता है

 

किसी समय उस वसनांचल के द्वारा स्पर्षित धन्यातिधन्य पवन लहरियों का अपने श्री अंग से स्पर्श पाकर योगीन्द्र मुनीन्द्र दुर्लभ गति श्री मधुसुदन पर्यंत अपने को कृतार्थ मानते हैं

 

उन श्री राधारानी के प्रति हमारे मन प्राण आत्मा हमारे अंग अंग से नमस्कार !जो सबके ह्रदय अंतराल में नित्य निरंतर साक्षी और नियंतारूप से विराजमान रहने पर भी सबसे पृथक रहते हैं जो समस्त बन्धनों को तोड़कर सर्वथा उच्च श्रृंखला को प्राप्त हैं ,

 

जिनके स्वरुप का सम्यक ज्ञान ब्रह्मा शंकर शुक नारद भीष्म आदि को भी नहीं है अतएव वे हार मानकर मौन हो जाते हैं उन सर्वनि यमातीत सर्वबंधनविमुक्त नित्य स्ववश परात्पर परम पुरुषोतम को भी जो श्री राधिका चरण रेणु इसी क्षण वश में करने की अनंत शक्ति रखता है

 

उस अनंत शक्ति श्री राधिका चरण रेणुका हम अपने अन्तस्तल से बार बार भक्ति पूर्वक स्मरण करते हैं !विश्व्प्रकृति के प्रत्येक स्पंदन में बिन्दुरूप से जो अनुराग वात्सल्य कृपा लावण्य रूप सौन्दर्य और माधुरी वर्तमान है – रासेश्वरी नित्य निकुंजेश्वरी श्रीवृष भानुनंदनी उन्ही सातों रासो की अनंत अगाध अधिष्टात्री हैं.

 

इस प्रकार नित्य आनंद रसमय सप्त स्मुद्र्वती श्री राधिका श्याम सुन्दर आनंदकंद के नित्य दिव्य रमणानन्द में अनादी काल से उन्मादिनी हैं – नित्य कुल त्यागिनी हैं.

 

इन्हीं के सहज सरल स्वच्छ भाव के शुद्ध रस से इन्हीं के भावानुराग रूप दधिमंड से इन्ही की वात्सल्यमयी दुग्ध धारा से इन्हीं की परम स्निग्ध घृतवत अपार कृपा से इन्हीं की लावण्य मदिरा से इन्हीं के छबिरूप सुन्दर मधुर इक्षुरस से और इन्हीं के केलि विलास विन्यास रूप क्षार तत्व से समस्त अनंत विश्व ब्रह्माण्ड नित्य अनुरक्षित अनुप्राणित और ओतप्रोत है.

 

ऐसी अनंत विचित्र सुधा रसमयी प्राणमयीविश्व रहस्य की चरम तथा सार्थक मीमांसामूर्ति श्री वृष भानु नंदनी का दिव्य स्फुरण जिसके जीवन में नहीं हो पाया उसका सभी कुछ व्यर्थ – अनर्थ है.

 

देवी राधिके अपने ऐसे दिव्य स्फुरण से मेरे ह्रदय को कृतार्थ कर दो !श्री राधिके वह शुभ सौभाग्य क्षण कब होगा जब तुम्हारे नाम सुधा रस का आस्वादन करने के लिए मेरी जिव्हा विह्वल हो जायेगी जब तुम्हारे चरनचिन्हों से अंकित वृंदारन्य की बीथियों में मेरे पैर भ्रमण करेंगे – मेरे सारे अंग उसमे लोट लोट कर कृतार्थ होंगे जब मेरे हाथ केवल तुम्हारी ही सेवा में नियुक्त रहेंगे

 

मेरा ह्रदय तुम्हारे चरण पद्मों के ध्यान में लगा रहेगा और तुम्हारे इन भावोत्सवों के परिणामरूप मुझे तुम्हारे प्राण नाथ के चरणों की रति प्राप्त होगी – मैं तुम्हारे ही सुख साधन के लिए तुम्हारे प्राण नाथ की प्रयेसी बनने का अधिकार प्राप्त करूँगा !

“जय जय श्री राधे”

 

“श्री श्याम सुन्दर गोस्वामी जी ”

      सेवाधिकारी श्री राधा रानी मन्दिर बरसाना 

          श्री जी बरसाना मण्डल ट्रस्ट (रजि०)

            Website:- www.sjbmt.in

Contact Us:-08923563256,07417699169

  • 1
  • 2

Shree Ji Barsana Mandal Trust (SJBMT)

counter