News

श्री राधे 

“श्रील नारायण भट्ट ज़ू जयति”

“श्री नारायण दास गोस्वामी जयति”

??आज की ब्रज रस धारा  

दिनांक 22/06/2018

करवट उत्सव

भगवान कृष्ण के उत्सव इतने है कि साल में ३६५ दिन है और भक्तजन ३७० उत्सव मानते है जब भगवान ने पहली बार छीका,

जब उगली से इशारा किया,जव बोलना शुरू किया,चलना शुरू किया,पहली बार खाया.

इन्ही में से एक है भगवान का ‘करवट उत्सव’, जब भगवान ने करवट बदली.

एक बार यशोदा मैया ने भगवान को चित पलग पर सुलाया, जब मैया काम करके थोड़ी देर बाद आई,

तो उन्होंने देखा की लाला ने स्वयं करवट ली है, तो वे बड़ी प्रसन्न हुई और उसी दिन भगवान का जन्म नक्षत्र भी था.

उस दिन घर में भगवान के करवट बदने का ‘अभिषेक-उत्सव’ मनाया जा रहा था.

घर में बहुत सी स्त्रियों की भीड़ लगी हुई थी,गाना बजाना हो रहा था,

यशोदा जी ने पुत्र का अभिषेक किया.उस समय ब्राह्मण लोग मंत्र पढ़कर आशीर्वाद दे रहे थे,

नंदरानी यशोदा जी ने ब्राह्मणों का खूब पूजन-सम्मान किया,उन्हें अन्न, वस्त्र, माला, गाय, आदि मुँहमाँगी वस्तुएँ दी.

जब यशोदा ने उन ब्राह्मणों द्वारा स्वस्तिवाचन कराकर स्वयं बालक के नहलाने आदि का कार्ये संपन्न कर लिया,

तब ये देखकर कि मेरे लल्ला के नेत्रों में नींद आ रही है,अपने पुत्र को धीरे से शय्या पर सुला दिया,

थोड़ी देर में श्यामसुन्दर की आँखे खुली,तो वे दूध के लिए रोने लगे.

उस समय यशोदा जी उत्सव में आये हुए ब्रजवासियो के स्वागत सत्कार में बहुत ही तन्मय थी .

इसलिए उन्होंने श्रीकृष्ण का रोना सुनायी नहीं पड़ा,तब श्रीकृष्ण रोते-रोते अपने पाँव उछालने लगे,

श्रीकृष्ण एक छकडे़ के नीचे सोये हुए थे उनके पाँव अभी लाल-लाल कोपलों के समान बड़े ही कोमल और नन्हे-नन्हे थे

परन्तु वह नन्हा-सा पाँव लगते ही विशाल छकडा़ उलट गया*

उस छकडे पर दूध दही आदि अनेक रसो से भरी हुई मटकियाँ और दूसरे बर्तन रखे हुए थे

वे सब-के- सब फूट-फाट गये और छकडे़ के पहिये तथा धुरे अस्त-व्यस्त हो गये, उनका जुआ फट गया.

करवट बदलने के उत्सव में जितनी भी स्त्रियाँ आई हुई थी वे सब-के-सब और यशोदा, रोहिणी, नंदबाबा, और गोपगण इस विचित्र घटना को देखकर व्याकुल हो गये वे आपस में कहने लगे

अरे!ये क्या हो गया ?यह छकडा़ अपने-आप कैसे उलट गया ?वे इसका कोई कारण निश्चित ना कर सके

वहाँ खेलते बालको ने कहा इस कृष्ण ने ही रोते-रोते अपने पावँ की ठोकर से इसे उलट दिया है .

परन्तु बालको की बात पर किसी ने विश्वास नहीं किया .

यशोदा जी ने अपने रोते हुए लाडले लाल को गोद में लेकर ब्राह्मणों से वेदमंत्रो के द्वारा शांतिपाठ कराया.

*हिरण्याक्ष का पुत्र था उत्कच .वह बहुत बलवान था,

एक बार उसने लोमश ऋषि के आश्रम के वृक्षों को कुचल डाला लोमश ऋषि ने क्रोध करके शाप दे दिया- अरे दुष्ट ! जा, तू देह रहित हो जा.

उसी समय उसका शरीर गिरने लगा वह ऋषि के चरणों में गिर पड़ा और प्रार्थना की.

तो ऋषि ने कहा -वैवस्वत मन्वंतर में श्रीकृष्ण के चरण-स्पर्श से तेरी मुक्ति हो जायेगी वही असुर छकडे़ में आकर बैठ गया था

और भगवान के चरण स्पर्श मुक्त हो गया .

सार 

यशोदा जी ने दूध-दही की मटकिंयो को तो ऊपर रख दिया

और भगवान को नीचे सुला दिया उसी प्रकार हम भी यह गलती करते है सांसारिक वस्तुओं को ऊपर रखते है

भगवान बाद में रखते है पर भगवान उन सांसारिक वस्तुओं तोड़ देते है.  

“ जय जय श्री राधे ”

          “श्री श्याम सुन्दर गोस्वामी जी ”

      सेवाधिकारी श्री राधा रानी मन्दिर बरसाना 

          श्री जी बरसाना मण्डल ट्रस्ट (रजि०)

            Website:- www.sjbmt.in

Contact Us:-08923563256,07417699169

श्री राधे 

“श्रील नारायण भट्ट ज़ू जयति”

“श्री नारायण दास गोस्वामी जयति”

??आज की ब्रज रस धारा  

दिनांक 14/06/2018

 

राधा रानी जी की अष्टसखियाँ

राधा रानी  भगवान कृष्ण की प्राणप्रिया है. ब्रज मंडल की  अधिष्ठाती देवी है.

उनकी कृपा के बिना कोई ब्रज में प्रवेश नहीं कर सकता है. जिस पर राधा रानी की कृपा कर दें वो ना चाहते हुए भी ब्रज में पहुँच जाता है.

सारी गोपियाँ उनकी कायरूपा व्यूहा है. उनकी कांति से सब प्रकट हुई है. उनकी सखियों मे कई यूथ है.

गोपियों के किंकरी , मंजरी, सहचरी ये अलग-अलग है. सब की आराध्य श्री राधारानी जी है.

भगवान से गोपिया कह देती है. कि हम आपको नहीं पूजते हम तो राधा जी को पूजते है और आपके उनके प्रियतम हो  इसलिए आप हमें प्यारे हो.

और नित्य सखियाँ राधा जी और श्याम सुन्दर की सेवा में लगी रहती है.

सबकी अलग-अलग सेवाँए है. राधा जी के यूथ में मुख्य आठ सखियाँ कही गई है. जो राधारानी जी की “अष्टसखियाँ “ कहलाती है,

राधा की परम श्रेष्ठ सखियाँ आठ हैं-

 १. – ललिता

 २. – विशाखा,

 ३. – चम्पकलता,

 ४. – चित्रा,

 ५. – सुदेवी

 ६. – तुंगविद्या,

 ७. – इन्दुलेखा,

 ८. – रग्डदेवी

और अलग-अलग संमप्रदाय में इनके अलग नाम आते है. इनके नाम जैसे चित्रा जी सुदेवी ,इन्दुलेखा के नाम क्रमशः सुमित्रा, सुंगदेवी इन्दुरेखा के नाम है.

राधा जी ये ही अष्टसखी है. राधा जी के प्रति इन सब की भी प्रधान सेवाँए है.

ये अष्ट सखियाँ पाँच प्रकार की होती हैं-

१. सखी –  (कुसुमिका, विद्या आदि) ,

२. नित्य सखी – (कस्तूरिका, मणिमंजरिका आदि),

३. प्राणसखी – (शशिमुखी, वासन्ती आदि),

४. प्रिय सखी – (कुरगांक्षी, मदनालसा, मंजुकेशी, माली आदि) तथा

५. परम श्रेष्ठ सखी- ये अष्टसखियाँ सब गोपियों में अग्रगण्य है।

इनकी एक-एक सेविका भी हैं, जो मंजरी महलाती हैं। मंजरियों के नाम ये हैं-

१. – रूपमंजरी,

२. – जीवमंजरी,

३. – अनंगमंजरी,

४. – रसमंजरी,

५. – विलासमंजरी,

६. – रागमंजरी,

७. – लीलामंजरी और

८. – कस्तूरीमंजरी।

इनके नाम-रूपादि के विषय में भिन्नता भी मिलती है। ये सखियाँ वस्तुत: राधा से अभिन्न उन्हीं की कायव्यूहरूपा हैं। राधा-कृष्ण-लीला का इन्हीं के द्वारा विस्तार होता है।

कभी वे, जैसे खण्डिता दशा में, राधा का पक्ष-समर्थन करके कृष्ण का विरोध करती है। और कभी, जैसे मान की दशा में, कृष्ण का विरोध करती हैं

और कभी कृष्ण के प्रति प्रवृत्ति दिखाते हुए राधा की आलोचना करती है।

परन्तु उन्हें राधा से ईर्ष्या कभी नहीं होती, वे कृष्ण का संग-सुख कभी नहीं चाहतीं,

क्योंकि उन्हें राधा-कृष्ण के प्रेम-मिलन में ही आत्मीय मिलन-सुख की परिपूर्णता का अनुभव हो जाता है।

अत: वे राधा-कृष्ण के मिलन की चेष्टा करती रहती हैं.

‘ब्रह्मवैवर्त्त’पुराण में अष्टसखियाँ 

पुराणों में विशेषरूप से ‘ब्रह्मवैवर्त्त’ में अष्टसखियों के नाम किंचित् परिवर्तन से इस प्रकार मिलते हैं:-

1. चन्द्रावली, 2.श्यामा, 3.शैव्या, 4.पद्या, 5.राधा, 6.ललिता, 7.विशाखा,  8.भद्रा.

          “श्री श्याम सुन्दर गोस्वामी जी ”

      सेवाधिकारी श्री राधा रानी मन्दिर बरसाना 

          श्री जी बरसाना मण्डल ट्रस्ट (रजि०)

            Website:- www.sjbmt.in

Contact Us:-08923563256,07417699169

श्री राधे 

“श्रील नारायण भट्ट ज़ू जयति”

“श्री नारायण दास गोस्वामी जयति”

??आज की ब्रज रस धारा  

दिनांक 13/06/2018

जहाँ कृष्ण भी असमर्थ है

भगवान श्री कृष्ण गोपियों के नित्य ऋणी है,उन्होंने अपना यह सिद्धात घोषित किया है “ये यथा मां प्रपधन्ते तांस्तथै भजाम्यहम“,अर्थात जो मुझे जैसे भजते है उन्हें मै वैसे ही भजता हूँ.

इसका यह तात्पर्य समझा जाता है कि भक्त जिस प्रकार से और जिस परिमाण के फल को द्रष्टि में रखकर भजन करता है

भगवान उसको उसी प्रकार और उसी परिमाण में फल देकर उसका भजन करते है-

सकाम, निष्काम शांत, दास्य, वात्सल्य, सख्य,आदि कि जिस प्रकार की कामना, भावना, भक्त की होती है, भगवान उसे वही वस्तु प्रदान करते है.

परन्तु गोपियों के सम्बन्ध में भगवान के इस सिद्धात वाक्य कि रक्षा नहीं हो सकी इसके प्रधान तीन कारण है-

१. –  गोपी के कोई भी कामना नहीं है.अतएव श्रीकृष्ण उन्हें क्या दे.

२. –  गोपी के कामना है केवल श्रीकृष्णसुख की, श्रीकृष्ण इस कामना कि पूर्ति करने जाते है तो उनको स्वयं अधिक सुखी होना पडता है अतः इस दान से ऋण और भी बढ़ता है.

३. – जहाँ गोपियों ने सर्व त्याग करके केवल श्री कृष्ण के प्रति ही अपने को समर्पित कर दिया है

वहाँ श्रीकृष्ण का अपना चित्त बहुत जगह बहुत से प्रेमियों के प्रति प्रेम युक्त है अतएव गोपी प्रेम अनन्य और अखंड है कृष्ण प्रेम बिभक्त और खंडित है.

इसी से गोपी के भजन का बदला उसी रूप में श्रीकृष्ण उसे नहीं दे सकते, और इसी से अपनी असमर्थता प्रकट करते हुए वे कहते है – गोपियों तुमने मेरे लिए घर कि उन बेडियो को तोड़ डाला है

जिन्हें बड़े-बड़े योगी-यति भी नहीं तोड़ पाते, मुझसे तुम्हारा यह मिलन, यह आत्मिक संयोग सर्वथा निर्मल और सर्वथा निर्दोष है.

यदि मै अमर शरीर से, अमर जीवन से, अनंत काल तक, तुम्हारे प्रेम,सेवा और त्याग का बदला चुकाना चाहूँ

, तो भी नहीं चूका सकता.मै सदा तुम्हारा ऋणी हूँ तुम अपने सौम्य स्वभाव से ही प्रेम से ही मुझे उऋण कर सकती हो परन्तु मै तो तुम्हारा ऋणी ही हूँ.

इसलिए प्रेममार्गी भक्त को चाहिये कि वह अपनी समझ से तन, मन, वचन से होने वाली प्रत्येक चेष्टा को श्रीकृष्ण सुख के लिए ही करे,जब-जब मन में प्रतिकूल स्थिति प्राप्त हो,

तब-तब उसे श्रीकृष्ण कि सुखेच्छाजनित स्थिति समझकर परमसुख का अनुभव करे, यो करते-करते जब प्रेमी भक्त केवल श्रीकृष्णसुख-काम अनन्यता पर पहुँच जाता है,

तब श्रीकृष्ण के मन की बात भी उसे मालूम होने लगती है गोपियों के श्रीकृष्णानुकुल जीवन में यह प्रत्यक्ष प्रमाण है.

इसलिए भगवान अर्जुन से कहते है – गोपियाँ ,मेरी सहायिका, मेरी गुरु, शिष्या, भोग्या , बान्धव,  स्त्री है अर्जुन मै गोपियाँ मेरी क्या नहीं है,

सबकुछ है मेरी महिमा को ,मेरी सेवा को, मेरी श्रद्धा को, और मेरे मन के भीतरी भावों को गोपियां ही जानती है दूसरा कोई नहीं जानता.

          “श्री श्याम सुन्दर गोस्वामी जी ”

      सेवाधिकारी श्री राधा रानी मन्दिर बरसाना 

          श्री जी बरसाना मण्डल ट्रस्ट (रजि०)

            Website:- www.sjbmt.in

Contact Us:-08923563256,07417699169

श्री राधे 

“श्रील नारायण भट्ट ज़ू जयति”

“श्री नारायण दास गोस्वामी जयति”

??आज की ब्रज रस धारा ??

दिनांक 10/06/2018

 

माधुर्य-रस में स्वकीया परकीया भाव

भगवत सम्बन्धी रसो में प्रधान पाँच रस होते है-  “शांत”, “दास्य”, “सख्य”, “वात्सल्य” और “माधुर्य”. इसमें सबसे श्रेष्ठ माधुर्य भाव है .

माधुर्य भाव के दो प्रकार होते है – “स्वकीया-भाव” और “परकीया-भाव”.

1.स्वकीया-भाव- अपनी स्त्री के साथ विवाहित पति का जो प्रेम होता है उसे स्वकीया भाव कहते है.


2. परकीया-भाव – 
किसी अन्य स्त्री के साथ जो परपुरुष का प्रेम सम्बन्ध होता है उसे परकीया भाव कहते है.

लौकिक (सांसारिक प्रेम ) में इन्द्रिय सुख की प्रधानता होने के कारण परकीया-भाव, पाप है, घृणित है.

अतः सर्वथा त्याज्य है.क्योकि लौकिक परकीया भाव में अंग-संग की घृणित कामना है.

परन्तु भागवत प्रेम के दिव्य कान्तभाव में, परकीयाभाव स्वकीया-भाव से कही श्रेष्ठ है.

क्योकि इसमें अंग-संग या इन्दिय सुख की कोई आकांक्षा नहीं है.

स्वकीया में, पतिव्रता पत्नी अपना नाम, गोत्र, मन, प्राण, धन, धर्म, लोक, परलोक, सभी कुछ पति को अपर्ण करके जीवन का प्रत्येक क्षण पति की सेवा में ही बिताती है.

परन्तु उसमें चार बातो की परकीया की अपेक्षा कमी होती है.

1. प्रियतम का निरंतर चिंतन.

2. मिलन की अत्यंत उत्कट उत्कंठा.

3. प्रियतम में किसी प्रकार का दोष न देखना.

4. कुछ भी न चाहना.

परकीया में ये चार बाते निरंतर एक साथ निवास करती है,इसलिए परकीया भाव श्रेष्ठ है.

भगवान से नित्य मिलन का अभाव न होने पर भी परकीया भाव की प्रधानता के कारण गोपियों को भगवान का क्षण भर का अदर्शन भी असह होता है.

वे प्रत्येक काम करते समय निरंतर कृष्ण का चिंतन करती थी.श्री कृष्ण की प्रत्येक क्रिया उन्हें ऐसी दिव्य गुणमयी दीखती थी

कि एक क्षण भर के लिए भी उनसे उनका चित् हटाये नहीं हटाता था एक बात धयान रखनी चाहिये कि यह परकीया भाव केवल व्रज में है

अर्थात लौकिक विषय वासना से सर्वथा विमुक्त दिव्य प्रेम राज्य में ही संभव है.

इसलिए चैतन्य मह्प्रभु ने कहा है –

“परकीया भावे अति रसेर उल्लास, व्रज बिना इहार अन्यत्र नाही वास ” 


अर्थात –
सर्वाच्च मधुर रस के उच्चतम परकीया भाव का उल्लास व्रज को (अर्थात दिव्यप्रेम राज्य को छोड़कर)अन्यत्र कही भी नही होता.

श्री राधा स्वकीय थी या परकीया यह एक व्यर्थ का प्रश्न है क्योकि जब श्री कृष्ण और राधा स्वरुप नित्य अभिन्न एक ही तत्व है तब उनमे अपने पराये के कल्पना कैसी ?

जैसे भगवान निराकार भी है और साकार भी है और उन दोनों से परे भी है उसी प्रकार राधा जी स्वकीय भी और परकीया भी है और दोनों से परे भी है.

 

          “श्री श्याम सुन्दर गोस्वामी जी ”

      सेवाधिकारी श्री राधा रानी मन्दिर बरसाना 

          श्री जी बरसाना मण्डल ट्रस्ट (रजि०)

            Website:- www.sjbmt.in

Contact Us:-08923563256,07417699169

श्री राधे 

“श्रील नारायण भट्ट ज़ू जयति”

“श्री नारायण दास गोस्वामी जयति”

??आज की ब्रज रस धारा ??

दिनांक 25/05/2018

कृष्ण क्यों राधा जी के चरण दबाते है

ब्रज लीला में मुख्य वस्तु है “प्रेम”, ब्रह्म का सर्वसार ही प्रेम है. श्री कृष्ण राधा रानी के चरण पकड़ते हैं इसे समझने से पहले एक बात समझना जरुरी है कि राधा रानी कौन हैं ?

बहुत थोड़े में समझ लो कि ‘रा’ धातु के बहुत से अर्थ होते हैं. देवी भागवत में इसके बारे में लिखा है कि जिससे समस्त कामनायें, कृष्ण को पाने की कामना तक भी, सिद्ध होती हैं.  सामरस उपनिषद में वर्णन आया है कि राधा नाम क्यों पड़ा ?

भगवान सत्य संकल्प हैं. उनको युद्ध की इच्छा हुई तो उन्होंने जय विजय को श्राप दिला दिया.

तपस्या की इच्छा हुई तो नर-नारायण बन गये. उपदेश देने की इच्छा हुई तो भगवान कपिल बन गये.

उस सत्य संकल्प के मन में अनेक इच्छाएं उत्पन्न होती रहती हैं. भगवान के मन में अब इच्छा हुई कि हम भी आराधना करें. हम भी भजन करें.

अब किसका भजन करें ?   उनसे बड़ा कौन है ?  तो श्रुतियाँ कहती हैं कि स्वयं ही उन्होंने अपनी आराधना की. ऐसा क्यों किया ?  क्योंकि वो अकेले ही तो हैं, तो वो किसकी आराधना करेंगे.  

तो श्रुति कहती हैं कि कृष्ण के मन में आराधना की इच्छा प्रगट हुई तो श्री कृष्ण ही राधा रानी के रूप में आराधना से प्रगट हो गये. 

इसीलिए ये मान आदि लीला में जो कृष्ण चरण पकड़ते है, एक विशेष प्रेम लीला है. राधा रानी को तो छोड़ दो, वो तो उनका ही रूप हैं, उनकी ही आत्मा हैं.

भगवान कहते हैं – कि तुम निरपेक्ष हो जाओ तो मैं तुम्हारे भी चरणों के पीछे घूमुंगा कि जिससे तुम्हारी चरण रज मेरे ऊपर पड़ जाये और  मैं पवित्र हो जाऊं.

भगवान तो रसिक हैं जो भक्तों के चरणों की रज के लिये उनके पीछे दौड़ते हैं.

जब भगवान भक्तों की चरण रज के लिये भक्तों के पीछे दौड़ते हैं तो राधा रानी के चरण पकडें तो इसमें क्या आश्चर्य ?

जब वो श्री जी के चरण छूने जाते हैं तो वो प्रेम से हुंकार करती हैं. तो रसिक श्याम डर जाते हैं कि कहीं ऐसा ना हो लाड़ली जी मान कर लें.

इसीलिए भयभीत होकर पीछे हट जाते हैं.  उन चरणों से ही जो सरस रस बिखरा उस रस को पाकर के गोपीजन ही नहीं स्वयं श्री कृष्ण भी धन्य हुए.

बिहारी जी के प्रकटकर्ता स्वामी हरिदास जी लिखते हैं कि (ता ठाकुर को ठकुराई —–) .

वो बोले कि ये मत समझना कि बांके बीहारी जी सर्वोच्चपति हैं.  सब ठाकुरों के ठाकुर ये बांके बिहारी हैं. लेकिन इनकी भी ठकुराइन हैं श्री राधा रानी. हम उस गाँव में बैठे हैं.

“जय जय श्री राधे “

“श्री श्याम सुन्दर गोस्वामी जी ”

      सेवाधिकारी श्री राधा रानी मन्दिर बरसाना 

          श्री जी बरसाना मण्डल ट्रस्ट (रजि०)

            Website:- www.sjbmt.in

Contact Us:-08923563256,07417699169

श्री राधे 

“श्रील नारायण भट्ट ज़ू जयति”

“श्री नारायण दास गोस्वामी जयति”

??आज की ब्रज रस धारा ??

दिनांक 09/05/2018

 

गौलोक धाम का प्राकट्य

सबसे पहले विशालकाय शेषनाग का प्रादुर्भाव हुआ, जो कमलनाल के समान श्वेतवर्ण के है. उन्ही की गोद में लोकवंदित महालोक “गोलोक” प्रकट हुआ.

जिसे पाकर भक्ति युक्त पुरुष फिर इस संसार में नहीं लौटता.फिर असंख्य ब्रह्माण्डो के अधिपति गोलोक नाथ भगवान श्रीकृष्ण के चरणारविन्द से“त्रिपथा गंगा” प्रकट हुई.

आगे जब भगवान से ब्रह्माजी प्रकट हुए, तब उनसे देवर्षि नारद का प्राकट्य हुआ.वे भक्ति से उन्मत होकर भूमंडल पर भ्रमण करते हुए भगवान के नाम पदों का कीर्तन करने लगे.

ब्रह्माजी ने कहा – नारद ! क्यों व्यर्थ में घूमते फिरते हो ? प्रजा की सृष्टि करो.

इस पर नारद जी बोले – मै सृष्टि नहीं करूँगा,क्योकि वह “शोक और मोह” पैदा करने वाली है. बल्कि मै तो कहता हूँ आप भी इस सृष्टि के व्यापार में लगकर दुःख से अत्यंत आतुर रहते है,अतःआप भी इस सृष्टि को बनाना छोड़ दीजिये.

इतना सुनते ही ब्रह्मा जी को क्रोध आ गया और उन्होंने नारद जी को श्राप दे दिया,ब्रह्मा जी बोले -हे दुर्मति नारद तु एक कल्प तक गाने-बजाने में लगे रहने वाले गन्धर्व हो जाओ.नारद जी गन्धर्व हो गए,और गन्धर्वराज के रूप में प्रतिष्ठित हो गए.स्त्रियों से घिरे हुए एक दिन ब्रह्मा जी के सामने वेसुर गाने लगे,फिर ब्रह्मा जी ने श्राप दिया तू शूद्र हो जा! दासी के घर पैदा होगा.

और इस तरह नारदजी दासी के पुत्र हुए, और सत्संग के प्रभाव से उस देह हो छोड़कर फिर से ब्रह्मा जी के पुत्र के रूप में प्रकट हुए,और फिर भूतल पर विचरण करते हुए वे भगवान के पदों का गान व कीर्तन करने लगे.

एक दिन बिभिन्न लोको का दर्शन करते हुए,“वेद-नगर” में गए,नारद जी ने देखा वहाँ सभी अपंग है.किसी के हाथ नहीं किसी के पैर नहीं, कोई कुबड़ा है, किसी के दाँत नहीं है,बड़ा आश्चर्य हुआ.

उन्होंने पूँछा – बड़ी विचित्र बात है ! यहाँ सभी बड़े विचित्र दिखायी पड़ते है?


इस पर वे सब बोले – 
हम सब “राग-रगनियाँ” है ब्रह्मा जी का पुत्र है -“नारद” वह वेसमय धुवपद गाता हुआ इस पृथ्वी पर विचरता है इसलिए हम सब अपंग हो गए है,(जब कोई गलत राग,पद गाता है तो मानो राग रागनियो के अंग-भंग हो जाते है)


नारद जी बोले – 
मुझे शीघ्र बताओ ! नारद को किस प्रकार काल और ताल का ज्ञान होगा ?

राग-रागनियाँ – यदि सरस्वती शिक्षा दे, तो सही समय आने पर उन्हें ताल का ज्ञान हो सकता है.

नारद जी ने सौ वर्षों तक तप किया. तब सरस्वती प्रकट हुई और संगीत की शिक्षा दी, नारद जी ज्ञान होने पर विचार करने लगे की इसका उपदेश किसे देना चाहिये? तब तुम्बुरु को शिष्य बनाया, दूसरी बात मन में उठी, कि किन लोगो के सामने इस मनोहर राग रूप गीत का गान करना चाहिये?

खोजते-खोजते इंद्र के पास गए, इंद्र तो विलास में डूबे हुए थे, उन्होंने ध्यान नहीं दिया, शंकरजी के पास गए,वे नेत्र बंद किये ध्यान में डूबे हुए थे.

तब अंत में नारदजी “गोलोक धाम” में गए,जब भगवान श्रीकृष्ण के सामने उन्होंने स्तुति करके भगवान के गुणों का गान करने लगे, और वाद्य यंत्रो को दबाकर देवदत्त स्वरामृतमयी वीणा झंकृत की. तब भगवान बड़े प्रसन्न हुए और अंत में प्रेम के वशीभूत हो, अपने आपको देकर भगवान जल रूप हो गए. भगवान के शरीर से जो जल प्रकट हुआ उसे “ब्रह्म-द्रव्य”के नाम से जानते है.

उसके भीतर कोटि-कोटि ब्रह्माण्ड राशियाँ लुढकती है, जिस ब्रह्माण्ड में सभी रहते है, उसे “पृश्निगर्भ” नाम से प्रसिद्ध है जो वामन भगवान के पाद-घात से फूट गया.

उसका भेदन करके जो ब्रह्म-द्रव्य का जल आया, उसे ही हम सब गंगा के नाम से जानते है,गंगा जी को धुलोक में “मन्दाकिनी”,पृथ्वी पर “भागीरथी”,और अधोलोक पाताल में “भोगवर्ती” कहते है. इस प्रकार एक ही गंगा को त्रिपथ गामिनी होकर तीन नामो से विख्यात हुई. इसमें स्नान करने के लिए प्रणत-भाव से जाते हुए मनुष्य के लिए पग-पग पर राजसूर्य और अश्वमेघ यज्ञो का फल दुर्लभ नहीं रह जाता.

फिर भगवान के “बाये कंधे” से सरिताओ में श्रेष्ठ – “यमुना जी” प्रकट हुई,भगवान के दोनों “गुल्फो से” दिव्य “रासमंडल” और “दिव्य श्रृंगार” साधनों के समूह का प्रादुर्भाव हुआ. भगवान की “पिंडली” से “निकुंज” प्रकट हुआ. जो सभा, भवनों, आंगनो गलियों और मंडलों से घिरा हुआ था. “घुटनों” से सम्पूर्ण वनों में उत्तम “श्रीवृंदावन” का आविर्भाव हुआ.


“जंघाओं”
से “लीला-सरोवर” प्रकट हुआ. “कटि प्रदेश” से दिव्य रत्नों द्वारा जड़ित प्रभामायी “स्वर्ण भूमि” का प्राकट्य हुआ.

उनके “उदर” में जो रोमावालिया है, वे विस्तृत “माधवी लताएँ”बन गई. गले की “हसुली” से “मथुरा-द्वारका” इन दो पूरियो का प्रादुर्भाव हुआ, दोनों “भुजाओ” से “श्रीदामा”आदि. आठ श्रीहरि के “पार्षद” उत्पन्न हुए. “कलाईयों” से “नन्द” और “कराग्र-भाग” से “उपनंद” प्रकट हुए.

“भुजाओ” के मूल भागो से “वृषभानुओं” का प्रादुर्भाव हुआ. समस्त गोपगण श्रीकृष्ण के “रोम” से उत्पन्न हुए. भगवान के “बाये कंधे” से एक परम कान्तिमान गौर तेज प्रकट हुआ, जिससे “श्री भूदेवी”,”विरजा” और अन्यान्य “हरिप्रियाये”आविभूर्त हुई.

फिर उन श्रीराधा रानीजी के दोनों भुजाओ से “विशाखा” “ललिता” इन दो सखियों का आविभार्व हुआ,और दूसरी सहचरी गोपियाँ है वे सब राधा के रोम से प्रकट हुई, इस प्रकार मधुसूदन ने गोलोक की रचना की.

 

          “श्री श्याम सुन्दर गोस्वामी जी ”

      सेवाधिकारी श्री राधा रानी मन्दिर बरसाना 

          श्री जी बरसाना मण्डल ट्रस्ट (रजि०)

            Website:- www.sjbmt.in

Contact Us:-08923563256,07417699169

श्री राधे 

“श्रील नारायण भट्ट ज़ू जयति”

“श्री नारायण दास गोस्वामी जयति”

??आज की ब्रज रस धारा ??

दिनांक 08/05/2018

 

राधाजी की चिंता का निवारण

गौ लोक धाम में जब देवताओ ने भगवान श्री कृष्ण से पृथ्वी के उद्धार के करने को कहा तो भगवान ने उन्हें आश्वासन दिया में अवतार लूँगा.

 

जब भगवान श्रीकृष्ण इस प्रकार बाते कर रहे थे उसी क्षण ‘अब प्राणनाथ से मेरा वियोग हो जायेगा ‘ यह समझकर राधिका जी व्याकुल हो गई और मूर्छित होकर गिर पड़ी.

श्री राधिका जी ने कहा – आप पृथ्वी का भार उतारने के लिए अवश्य पधारे परन्तु मेरी एक प्रतिज्ञा है प्राणनाथ आपके चले जाने पर एक क्षण भी मै यहाँ जीवन धारण नहीं कर सकूँगी मेरे प्राण इस शरीर से वैसे ही उड़ जायेगे जैसे कपूर के धूलिकण

श्री भगवान ने कहा -तुम विषाद मत करो! मै तुम्हारे साथ चलूँगा.

श्री राधिका जी ने कहा – परन्तु प्रभु !जहाँ वृंदावन नहीं है, यमुना नदी नहीं है, और गोवर्धन पर्वत भी नहीं है, वहाँ मेरे मन को सुख नहीं मिल सकता.

तब राधिका जी के इस प्रकार कहने पर भगवान श्रीकृष्ण ने अपने धाम से चौरासी कोस भूमि ,गोवर्धन पर्वत और यमुना नदी को भूतल पर भेजा.

तब ब्रह्मा जी ने कहा – भगवन मेरे लिए कौन सा स्थान होगा. और ये सारे देवता किन ग्रहों में रहेगे और किन-किन नामो से प्रसिद्ध होगे ?

भगवान ने कहा – मै स्वयं वासुदेव और देवकी जी के यहाँ प्रकट होऊँगा.मेरे कालस्वरूप ये शेष रोहिणी के गर्भ से जन्म लेगे.

* साक्षात् “लक्ष्मी” राजा भीष्मक के घर पुत्री रूप से उत्पन्न होगी इनका नाम ‘रुक्मणि’ होगा.

पार्वती – ‘जाम्बवती’ के नाम से प्रकट होगी.

* यज्ञपुरुष की पत्नी “दक्षिणा देवी” –  ‘लक्ष्मणा’ नाम धारण करेगी.

* यहाँ जो “विरजा” नाम की नदी है–  वही ‘कालिंदी’ नाम से विख्यात होगी.

* भगवंती “लज्जा”-  का नाम ‘भद्रा’ होगा.

समस्त पापों का प्रशमन करने वाली “गंगा”-  ‘मित्रविन्दा’ नाम धारण करेगी.

जो इस समय “कामदेव” है वे ही रुक्मिणी के गर्भ से ‘प्रधुम्न’ रूप में उत्पन्न होगे. प्रधुम्न के घर तुम्हारा (ब्रह्मा) अवतार होगा. उस समय तुम्हे ‘अनिरुद्ध’ कहा जायेगा.

* ये वसु जो “द्रोंण” नाम से प्रसिद्ध है व्रज में ‘नन्द‘ होगे, और स्वयं इनकी प्राणप्रिया “धरा देवी” ‘यशोदा’ नाम धारण करेगी.

* “सुचन्द्र” ‘वृषभानु’ बनेगे और इनकी सहधर्मिणी “कलावती” धराधाम पर ‘कीर्ति‘ के नाम से प्रसिद्ध होगी फिर उन्ही के यहाँ इन राधिका जी का प्राकट्य होगा.

*’सुबल’ और ‘श्रीदामा’ नाम के मेरे सखा ‘नन्द’ और ‘उपनन्द’ के घर जन्म धारण करेगे, इसी प्रकार मेरे और भी सखा जिनके नाम ‘स्तोककृष्ण’ ,’अर्जुन’ और ‘अंशु’ आदि सभी ‘नौ नन्दों’ के यहाँ प्रकट होगे. व्रजमंडल में जो छै वृषभानु है उनके गृह ‘विशाल’  ‘ऋषभ’ ‘तेजस्वी देवप्रस्थ’ और ‘व्ररुथप’ नाम के मेरे सखा अवतीर्ण होगे.

ब्रह्मा जी ने कहा – किसे “नन्द” कहा जाता है? और किसे “उपनन्द” और “वृषभानु” के क्या लक्षण है ?

भगवान ने कहा –  जो गौशालाओ में सदा गौओ का पालन करते रहते है और गौ-सेवा ही जिनकी जीविका है उन्हें मैंने “गोपाल” संज्ञा दी है. अब उनके लक्षण सुनो –

नन्द – गोपालो के साथ “नौ लाख गायों के स्वामी को नन्द” कहा जाता है.

उपनन्द – “पांच लाख गौओ का स्वामी उपनन्द” कहा जाता है.

वृषभानु – वृषभानु नाम उसका पडता है जिसके अधिकार में “दस लाख गौए” रहती है.

नन्दराज– ऐसे ही जिसके यहाँ “एक करोड गौओ की रक्षा” होती है वह “नन्दराज” कहलाता है.

वृषभानुवर– “पचास लाख गौओ के अध्यक्ष” की “वृषभानुवर” संज्ञा है.

सुचन्द्र और द्रोण – ये दो ही व्रज में इस प्रकार के सम्पूर्ण लक्षणों से संपन्न गोपराज बनेगे.

“जय जय श्री राधे “

 

          “श्री श्याम सुन्दर गोस्वामी जी ”

      सेवाधिकारी श्री राधा रानी मन्दिर बरसाना 

          श्री जी बरसाना मण्डल ट्रस्ट (रजि०)

            Website:- www.sjbmt.in

Contact Us:-08923563256,07417699169

पीपल के वृक्ष की पूजा क्यों करते हैं?

पीपल का वृक्ष सब वृक्षों में पवित्र माना गया है. पीपल को संस्कृत में अश्वत्थ कहते है. हिन्दुओ की धार्मिक आस्था के अनुसार विष्णु का पीपल के वृक्ष में निवास है.

 

श्रीमदभगवत गीता में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने बताया है-“अश्वत्थ: सर्ववृक्षाणां” अर्थात वृक्षों में, मै पीपल हूँ. स्कंध पुराण में बताया गया है.

अर्थात पीपल के वृक्ष में ब्रह्म, विष्णु, महेश तीनो देवताओ का वास होता है, पीपल की जड़ में ‘विष्णुजी’,तने में ‘केशव’ (कृष्णजी), शाखाओ में ‘नारायण’,पत्तों में भगवान ‘हरि’ और फलो में समस्त देवताओं का निवास है.

 

पीपल को प्रणाम करने और उसकी परिक्रमा करने से आयु वृद्धि होती है। पीपल को जल से संचित करने वाला व्यक्ति के सारे पापों से मुक्त हो जाता है.

                               अश्वत्थ: पूजितोयत्र पूजिता:सर्व देवता:।

अर्थात शास्त्रों में वर्णित है कि पीपल की सविधि पूजा-अर्चना करने से सम्पूर्ण देवता स्वयं ही पूजित हो जाते हैं. पीपल का वृक्ष लगाने वाले की वंश परम्परा कभी विनष्ट नहीं होती. पीपल की सेवा करने वाले सद्गति प्राप्त करते हैं.

पीपल में पितरों का वास भी माना गया है. पीपल में सभी तीर्थों का निवास माना गया है शनि की साढे साती में पीपल के पूजन और परिक्रमा का विधान बताया गया है.

 

रात में पीपल की पूजा को निषिद्ध माना गया है.क्योंकि ऎसा माना जाता है कि रात्री में पीपल पर दरिद्रता बसती है और सूर्योदय के बाद पीपल पर लक्ष्मी का वास माना गया है.

वैज्ञानिक द्रष्टिकोण-
पीपल का वृक्ष २४ घंटे ऑक्सीजन छोड़ता है जो प्राणधारियो के लिए प्राण वायु कही जाती है. इस गुण के अतिरिक्त इसकी छाया सर्दियो में गर्मी देती है और गर्मियो में सर्दी, पीपल के पत्तों का स्पर्श होने पर वायु में मिले संक्रामक वायरस नष्ट हो जाते हैं. अतः वैज्ञानिक द्रष्टिकोण से भी यह वृक्ष पूजनीय है.

पीपल की पूजा साक्षात देव शक्तियों के आवाहन और प्रभाव से पितृदोष, ग्रह दोष, सर्पदोष दूर कर लंबी उम्र, धन-संपत्ति, संतान, सौभाग्य व शांति देने वाली मानी गई है.

श्री राधे 

“श्रील नारायण भट्ट ज़ू जयति”

“श्री नारायण दास गोस्वामी जयति”

??आज की ब्रज रस धारा ??

दिनांक 06/05/2018

 

श्री कृष्ण चरणारविन्द

श्री श्याम सुन्दर के चरणारनाविंद 

कृष्ण के पदपयोज का स्मरण मात्र करने से व्यक्ति को समस्त आध्यात्मिक एवं भौतिक संपत्ति, सौभाग्य, सौंदर्य, और सगुण की प्राप्ति होती है. ये नलिनचरण सर्वलीलाधाम है, कृष्ण के चरणारविन्द हमारा सर्वस्व हो जाये.

(गोविंद लीलामृत)

श्री श्यामसुन्दर का  दायाँ चरण 

श्री श्याम सुन्दर के दाये चरण में “ग्यारह मंगल चिन्ह” है.

पादांगुष्ठ के मूल में एक “जौ ”  का चिन्ह है उसके नीचे एक ‘चक्र’. चक्र के नीचे एक ‘छत्र’ है. एक ‘उर्ध्वरेखा’ पाँव के मध्य में प्रारंभ होती है, माध्यम के मूल पर एक रुचिर ‘कमल’ कुसुम है, कमल के नीचे ‘ध्वज’ है ,कनिष्ठा के नीचे एक ‘अंकुश’  है उसके नीचे एक ‘वज्र’ है एड़ी पर एक ‘अष्टभुज’ है जिसके चारो ओर चार प्रमुख दिशाओ में चार ‘स्वास्तिक’ है हर दो स्वास्तिक के बीच में एक ‘जम्बू फल’ है.

१. जौ- जौ का दाना व्यक्त करता है कि भक्त जन राधा कृष्णके पदार विन्दो कि सेवा कर समस्त भोगो ऐश्वर्य प्राप्त करते है एक बार उनका पदाश्रय प्राप्त कर लेने पर भक्त कि अनेकानेक जन्म मरण कि यात्रा घट कर जौ के दानो के समान बहुत छोटी हो जाती है.

२. चक्र – यह चिन्ह सूचित करता है कि राधा कृष्ण के चरण कमलों का ध्यान काम क्रोध लोभ मोह मद और मात्सर्य रूपी छै शत्रुओ का  नाश करता है ये तेजस तत्व का प्रतीक है जिसके द्वारा राधा गोविंद भक्तो के अंतःकरण से पाप तिमिर को छिन्न भिन्न कर देते है.

३. छत्र – छत्र यह सिद्ध करता है कि उनके चरणों कि शरण ग्रहण करने वाले भक्त भौतिक कष्टों कि अविराम वर्षा से बचे रहते है.

४. उर्ध्व रेखा – जो भक्त इस प्रकार राधा श्याम के पद कमलों से लिपटे रहते है मानो वे उनकी जीवन रेखा हो वे दिव्य धाम को जाएँगे.

५. कमल – सरस सरसिज राधा गोविंद के चरणविंदो का ध्यान करने वाले मधुकर सद्रश भक्तो के मन में प्रेम हेतु लोभ उत्पन्न करता है.

६. ध्वज – ध्वज उन भक्तो कि भय से बचाता और सुरक्षा करता है जो उनके चरण सरसिज का ध्यान करते है विजय का प्रतीक है.

७. अंकुश – अंकुश इस बात का घोतक है कि राधा गोविद के चरणों का ध्यान भक्तो के मन रूपी गज को वश में करता है उसे सही मार्ग दिखाता है.

८. वज्र- वज्र यह बताता है कि श्री कृष्ण के पाद पंकज का ध्यान भक्तो के पूर्व पापों के कर्म फलो रूपी पर्वतो को चूर्ण चूर्ण कर देता है.

९. अष्टकोण – यह बताता है जो श्री कृष्ण के चरणों कि आराधना करते है वे अष्ट दिशाओ से सुरक्षित रहते है.

१०. स्वास्तिक – जो व्यक्ति श्री कृष्ण के चरणों को अपने मन में संजो के रखता है उसका कभी अमंगल नहीं होता.

११. जंबू फल – वैदिक स्रष्टि वर्णन के अनुसार जंबू द्वीप के निवासियों के लिए श्री कृष्ण के लिए राजीव चरण ही एक मात्र आराध्य विषय है.

श्री श्याम सुन्दर के बायाँ चरण- 

श्री श्याम सुन्दर के बाये चरण में “आठ शुभ चिन्ह” है.

पादांगुष्ट के मूल पर एक ‘शंख’ है, मध्यमा के नीचे दो ‘संकेंदो वृत्त’ शोभायमान है,उसके नीचे एक ‘प्रत्यंचा रहित धनुष’‘ है. धनु के नीचे ‘गाय के खुर’ का चिन्ह अंकित है उसके नीचे चार ‘कुम्भो’ से घिरा एक ‘त्रिकोण’ है त्रिकोण के नीचे एक ‘अर्धचंद्र’है और एड़ी पर एक ‘मीन’ है.

 

१. शंख – शंख विजय का प्रतीक है यह बताता है कि राधा गोविंद के चरणकमलो कि शरण ग्रहण करने वाले व्यक्ति सदैव दुख से बचे रहते है और अभय दान प्राप्त करते है

२. संकेंद्री वृत्त – यह दर्शाता है श्री कृष्ण के चरण सर्वत्र विघमान है श्री कृष्ण हर वस्तु के भीतर है.

३. धनु – यह चिन्ह सूचित करता है कि एक भक्त का मन उनके चरण रूपी लक्ष्य से टकराता है तब उसके फलस्वरूप प्रेम अति वर्धित हो जाता है.

४. गाय का  खुर  – यह इस बात का सूचक है कि जो व्यक्ति श्री कृष्ण के चरणारविंदो कि पूर्ण शरण लेता है उनके लिए भाव सागर गो खुर के चिन्ह में विघमान पानी के समान छोटा एवं नगण्य हो जाता है उसे वह सहज ही पार कर लेता है.

५. कुम्भ  – श्रीकृष्णा के चरण कमल शुद्ध सुधारस का स्वर्ण कलश धारण किये और शरणागत जीव अबाध रूप से उस सुधा रस का पान कर सके.

६. त्रिकोण – कृष्ण के चरणों कि शरण ग्रहण करने वाले भक्त त्रिकोण कि तीन भुजाओ द्वारा त्रितापों और त्रिगुण रूपी जाल से बच जाते है.

७. अर्धचंद्र – यह बताता है कि जिस प्रकार शिव जी जैसे देवताओं ने राधा गोविंद के चरणारविन्दों के तलवो से अपने शीश को शोभित किया है इसी प्रकार जो भक्त इस प्रकार राधा और कृष्ण के पदाम्बुजो द्वारा अपने शीश को सुसज्जित करते है वे शिव जी के समान महान भक्त बन जाते है

८. मीन – जिस प्रकार मछली जल के बिना नहीं राह सकती उसी प्रकार भक्तगण क्षण भर भी राधा शेम सुन्दर के चरणाम्बुजों के बिना नहीं रह सकते.

 

इस प्रकार “उन्नीस शुभ चिन्ह” है.

“जय जय श्री राधे “

          “श्री श्याम सुन्दर गोस्वामी जी ”

      सेवाधिकारी श्री राधा रानी मन्दिर बरसाना 

          श्री जी बरसाना मण्डल ट्रस्ट (रजि०)

            Website:- www.sjbmt.in

Contact Us:-08923563256,07417699169

सूर्य-चन्द्र ग्रहण के समय भोजन क्यों वर्जित है ?

ग्रहण काल में भोजन  –  
सूर्य और चंद्रग्रहण के समय भोजन निषिद्ध है. प्राचीन ऋषियों के अनुसार, ग्रहण के दौरान खाद्य पदार्थो तथा जल आदि में सूक्ष्म जीवाणु एकत्रित होकर उन्हें दूषित कर देते है जिससे विभिन्न रोग होने की संभावना रहती है

सूर्य-चंद्र ग्रहण के समय मनुष्य के पेट की पाचन-शक्ति कमजोर हो जाती है, जिसके कारण इस समय किया गया भोजन अपच, अजीर्ण आदि शिकायतें पैदा कर शारीरिक या मानसिक हानि पहुँचा सकता है.

सूतक काल –

भारतीय धर्म विज्ञानवेत्ताओं का मानना है कि सूर्य-चंद्र ग्रहण लगने से १२ घंटे पूर्व से ही इसका कुप्रभाव शुरू हो जाता है.अंतरिक्षीय प्रदूषण के समय को सूतक काल कहा गया है। इसलिए “सूतक काल” और ग्रहण के समय में भोजन तथा पेय पदार्थों के सेवन की मनाही की गई है. बूढ़े, बालक और रोगी एक प्रहर पूर्व खा सकते हैं.

स्कंद पुराण’ के अनुसार ग्रहण के अवसर पर दूसरे का अन्न खाने से बारह वर्षो का एकत्र किया हुआ सब पुण्य नष्ट हो जाता है. देवी भागवत में आता हैः सूर्यग्रहण या चन्द्रग्रहण के समय भोजन करने वाला मनुष्य जितने अन्न के दाने खाता है, उतने वर्षों तक अरुतुन्द नामक  नरक में वास करता है.

ग्रहण काल 

ग्रहण से हमारी जीवन शक्ति का हास होता है और तुलसी दल (पत्र) में विद्युत शक्ति व प्राण शक्ति सबसे अधिक होती है, इसलिए सौर मंडलीय ग्रहण काल में ग्रहण प्रदूषण को समाप्त करने के लिए भोजन तथा पेय सामग्री में तुलसी के कुछ पत्ते डाल दिए जाते हैं। जिसके प्रभाव से न केवल भोज्य पदार्थ बल्कि अन्न, आटा आदि भी प्रदूषण से मुक्त बने रह सकते हैं.

पुराणों की मान्यता के अनुसार राहु चंद्रमा को तथा केतु सूर्य को ग्रसता है. चन्द्र ग्रहण में मन की शक्ति क्षीण होती है, जबकि सूर्य ग्रहण के समय जठराग्नि, नेत्र तथा पित्त की शक्ति कमजोर पड़ती है.

गर्भवती स्त्री के लिए 

गर्भवती स्त्री को सूर्य-चंद्र ग्रहण नहीं देखने चाहिए, क्योंकि उसके दुष्प्रभाव से शिशु अंगहीन होकर विकलांग बन सकता है, गर्भपात की संभावना बढ़ जाती है.  इसके लिए गर्भवती के उदर भाग में गोबर और तुलसी का लेप लगा दिया जाता है, जिससे कि राहु-केतु उसका स्पर्श न करें.

ग्रहण काल में वर्जित चीजे

1. – सूर्यग्रहण मे ग्रहण से चार प्रहर पूर्व और चंद्र ग्रहण मे तीन प्रहर पूर्व भोजन नहीं करना चाहिये । बूढे बालक और रोगी एक प्रहर पूर्व तक खा सकते हैं ग्रहण पूरा होने पर सूर्य या चंद्र, जिसका ग्रहण हो,

2. – ग्रहण के दिन पत्ते, तिनके, लकड़ी और फूल नहीं तोडना चाहिए. बाल तथा वस्त्र नहीं निचोड़ने चाहिये व दंत धावन नहीं करना चाहिये.

3. – ग्रहण के समय  तेल लगाना,मालिश या उबटन किया तो व्यक्ति कुष्‍ठ रोगी होता है ,ग्रहण के समय सोने से रोग पकड़ता है, लघुशंका करने से घर में दरिद्रता आती है, मल त्यागने से पेट में कृमि रोग पकड़ता है,  मैथुन  करना और भोजन करना जल पीना, – ये सब कार्य वर्जित हैं.

4. –  ग्रहण के समय गायों को घास, पक्षियों को अन्न, जरुरतमंदों को वस्त्र दान से अनेक गुना पुण्य प्राप्त होता है.

5. – भागवत’ में आता है कि भूकंप एवं ग्रहण के अवसर पृथ्वी को खोदना नहीं चाहिये.

 

ग्रहण के पूर्व

1.
 – ग्रहण लगने के पूर्व नदी या घर में उपलब्ध जल से स्नान करके भगवान्‌ का पूजन, यज्ञ, जप करना चाहिए. भजन-कीर्तन करके ग्रहण के समय का सदुपयोग करें.

2. – भगवान वेदव्यास जी ने परम हितकारी वचन कहे हैं- चन्द्रग्रहण में किया गया पुण्यकर्म (जप, ध्यान, दान आदि) एक लाख गुना और सूर्य ग्रहण में दस लाख गुना फलदायी होता है. यदि गंगा जल पास में हो तो चन्द्रग्रहण में एक करोड़ गुना और सूर्यग्रहण में दस करोड़ गुना फलदायी होता है।

3. – ग्रहण के दौरान कोई कार्य न करें। ग्रहण के समय में मंत्रों का जाप करने से सिद्धि प्राप्त होती है.

ग्रहण समाप्ति पर 

1. – ग्रहण समाप्त हो जाने पर स्नान करके ब्राह्‌मण को दान देने का विधान है.
2. – पुराना पानी, अन्न नष्ट कर नया भोजन पकाया जाता है और ताजा भरकर पिया जाता है.

Shree Ji Barsana Mandal Trust (SJBMT)

counter