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धार्मिक कार्यों में मौलि क्यों बांधते हैं?

हिंदू धर्म में प्रत्येक धार्मिक कर्म यानि पूजा-पाठ, यज्ञ, हवन आदि के पूर्व ब्राह्मण द्वारा यजमान के दाएं हाथ में मौली(एक विशेष धार्मिक धागा) बांधी जाती है. मौली को रक्षा सूत्र, कलावा आदि भी कहते हैं.जिसका अपना धार्मिक और वैज्ञानिक महत्व है.

 

शास्त्रों का ऐसा मत है कि मौलि बांधने से त्रिदेव – ब्रह्मा, विष्णु व महेश तथा तीनों देवियों- लक्ष्मी, पार्वती व सरस्वती की कृपा प्राप्त होती है.

 

ब्रह्मा की कृपा से “कीर्ति”, विष्णु की अनुकंपा से “रक्षा बल” मिलता है तथा शिव “दुर्गुणों” का विनाश करते हैं. इसी प्रकार लक्ष्मी से “धन”, दुर्गा से “शक्ति” एवं सरस्वती की कृपा से “बुद्धि” प्राप्त होती है.


शरीर विज्ञान की द्रष्टि से मौली का महत्व 

शरीर विज्ञान की दृष्टि से अगर देखा जाए तो मौलि बांधना उत्तम स्वास्थ्य भी प्रदान करती है. चूंकि मौलि बांधने से त्रिदोष- वात, पित्त तथा कफ का शरीर में सामंजस्य बना रहता है. शरीर की संरचना का प्रमुख नियंत्रण हाथ की कलाई में होता है, अतः यहां मौली बांधने से व्यक्ति स्वस्थ रहता है.

 

ऐसी भी मान्यता है कि इसे बांधने से बीमारी अधिक नहीं बढती है. ब्लड प्रेशर, हार्ट एटेक, डायबीटिज और लकवा जैसे रोगों से बचाव के लिये मौली बांधना हितकर बताया गया है. मौली शत प्रतिशत कच्चे धागे (सूत) की ही होनी चाहिये.

 

मौलि बांधने की प्रथा तब से चली आ रही है जब दानवीर राजा बलि के लिए वामन भगवान ने उनकी कलाई पर रक्षा सूत्र बांधा था.

शास्त्रों में भी इसका इस श्लोक के माध्यम से मिलता है –

” येन बद्धो बलीराजा दानवेन्द्रो महाबल:
                                                                       

तेन त्वामनुबध्नामि रक्षे मा चल मा चल”..

इस मंत्र का सामान्यत: यह अर्थ लिया जाता है कि दानवों के महाबली राजा बलि जिससे बांधे गए थे, उसी से तुम्हें बांधता हूं. हे रक्षे!(रक्षासूत्र) तुम चलायमान न हो, चलायमान न हो.

 

धर्मशास्त्र के विद्वानों के अनुसार इसका अर्थ यह है कि रक्षा सूत्र बांधते समय ब्राह्मण या पुरोहत अपने यजमान को कहता है कि जिस रक्षासूत्र से दानवों के महापराक्रमी राजा बलि धर्म के बंधन में बांधे गए थे अर्थात् धर्म में प्रयुक्त किए गये थे, उसी सूत्र से मैं तुम्हें बांधता हूं, यानी धर्म के लिए प्रतिबद्ध करता हूं.

 

इसके बाद पुरोहित रक्षा सूत्र से कहता है कि हे रक्षे तुम स्थिर रहना, स्थिर रहना. इस प्रकार रक्षा सूत्र का उद्देश्य ब्राह्मणों द्वारा अपने यजमानों को धर्म के लिए प्रेरित एवं प्रयुक्त करना है.

 

कभी कभी मानव के लिए अशुभ ग्रहों के कुप्रभाव जीवन में कष्ट ले आते हैं. इससे पराजित होकर मनुष्य यत्र-तत्र भटकता रहता है. बड़े-बड़े सेठ, साहूकार एवं सम्राटों के सुनहरे स्वप्न छिन्न भिन्न हो जाते हैं. जीवन आकाश में दुखों के बादल छाए रहते हैं. इन्हीं उलझनों से बचने के लिए रक्षासूत्र सच्चे गुरु के द्वारा मंदिर में प्रभु के आशीर्वाद से धारण करना चाहिए  

 

मौली कब और कैसे धारण करे 

पुरुषों तथा अविवाहित कन्याओं के दाएं हाथ में तथा विवाहित महिलाओं के बाएं हाथ में मौली बांधा जाता है. जिस हाथ में कलावा या मौली बांधें उसकी मुट्ठी बंधी हो एवं दूसरा हाथ सिर पर हो. इस पुण्य कार्य के लिए व्रतशील बनकर उत्तरदायित्व स्वीकार करने का भाव रखा जाए.

 

पूजा करते समय नवीन वस्त्रों के न धारण किए होने पर मोली हाथ में धारण अवश्य करना चाहिए. धर्म के प्रति आस्था रखें. मंगलवार या शनिवार को पुरानी मौली उतारकर नई मोली धारण करें. संकटों के समय भी रक्षासूत्र हमारी रक्षा करते हैं.

                                   व्यापार और घर में मौली का प्रयोग 

वाहन, कलम, बही खाते, फैक्ट्री के मेन गेट, चाबी के छल्ले, तिजोरी पर पवित्र मौली बांधने से लाभ होता है, महिलाये मटकी, कलश, कंडा, अलमारी, चाबी के छल्ले, पूजा घर में मौली बांधें या रखें. मोली से बनी सजावट की वस्तुएं घर में रखेंगी तो नई खुशियां आती है.नौकरी पेशा लोग कार्य करने की टेबल एवं दराज में पवित्र मौली रखें या हाथ में मौली बांधेंगे तो लाभ प्राप्ति की संभावना बढ़ती है.

क्यों लगाते है मंदिरो में घंटा ?

अक्सर जब हम मंदिर जाते है तो सबसे पहले घंटी जरुर बजाते है,और घर में भी पूजा करने पर घंटी बजाते है. क्या कभी सोचा है मंदिर में घंटी क्यों लगी होती है ?

मंदिरों से हमेशा घंटी की आवाज आती रहती है. सामान्यत: सभी श्रद्धालु मंदिरों में लगी घंटी अवश्य बजाते हैं. घंटी की आवाज हमें ईश्वर की अनुभूति तो कराती है साथ ही हमारे स्वास्थ्य के लिए भी फायदेमंद है.

 

घंटी आवाज से जो कंपन होता है उससे हमारे शरीर पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ता है. घंटी की आवाज से हमारा दिमाग बुरे विचारों से हट जाता है और विचार शुद्ध बनते हैं. इसके पीछे ऋषियों का नाद विज्ञान हैं.

पुरातन काल से ही मंदिरों में घंटियां से लगाई जाती हैं. सुबह-शाम मंदिरों में जब पूजा-आरती की जाती है तो छोटी घंटियों, घंटों के अलाव घडिय़ाल भी बजाए जाते हैं. इन्हें विशेष ताल और गति से बजाया जाता है.

 

इन लय युक्त तरंगौं का प्रभाव व्यक्ति के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर भी पडता है ऐसा माना जाता है कि घंटी बजाने से मंदिर में प्राण प्रतिष्ठित मूर्ति के देवता भी चैतन्य हो जाते हैं, जिससे उनकी पूजा प्रभावशाली तथा शीघ्र फल देने वाली होती है.

 

पुराणों के अनुसार मंदिर में घंटी बजाने से हमारे कई पाप नष्ट हो जाते हैं. जब सृष्टि का प्रारंभ हुआ तब जो नाद (आवाज) था, वहीं स्वर घंटी की आवाज से निकलती है. यही नाद ओंकार के उच्चारण से भी जाग्रत होता है.

 

घंटे को काल का प्रतीक भी माना गया है. धर्म शास्त्रियों के अनुसार जब प्रलय काल आएगा तब भी इसी प्रकार का नाद प्रकट होगा.स्कंद पुराण के अनुसार मंदिर में घंटी बजाने से मानव के सौ जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं.

मंदिरों में घंटी बजाने का वैज्ञानिक कारण भी है. अधिक भीड़ के समय भक्तों को संक्रामक बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है,जब घंटी बजाई जाती है तो उससे वातावरण में कंपन उत्पन्न होता है जो वायुमंडल के कारण काफी दूर तक जाता है. इस कंपन की सीमा में आने वाले जीवाणु, विषाणु आदि सूक्ष्म जीव नष्ट हो जाते हैं तथा मंदिर का तथा उसके आस-पास का वातावरण शुद्ध बना रहता है.

एकादशी के दिन चावल क्यों नहीं खाते

                                   एकादशी का व्रत क्यों करते है

शास्त्रों में कहा गया है-आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु. बुद्धिं तु सारथि विद्धि येन श्रेयोअहमाप्नुयाम. अर्थात आत्मा को रथी जानो, शरीर को रथ और बुद्धि को सारथी मानो.

 

इनके संतुलित व्यवहार (आचरण) से ही श्रेय अर्थात श्रेष्ठत्व की प्राप्त होती है. इसमें इंद्रिय रूपी घोड़े तथा मन रूपी की लगाम होना भी जरुरी है. इस प्रकार दस इन्द्रियों के बाद मन को भी ग्यारहवीं इन्द्रिय शास्त्र ने माना है. अतएव इंद्रियों की कुल संख्या एकादश होती है.

एकादशी तिथि को मन:शक्ति का केन्द्र चन्द्रमा क्षितिज की एकादशवीं कक्षा पर अवस्थित होता है. यदि इस अनुकूल समय में मनोनिग्रह की साधना की जाए तो वह फलवती सिद्ध हो सकती है.

 

इसी वैज्ञानिक आशय से ही एकादशेन्द्रियभूत मन को एकादशी तिथि के दिन धर्मानुष्ठान एवं व्रतोपवास द्वारा निग्रहीत करने का विधान किया गया है. यदि सार रूप में कहा जाए तो एकादशी व्रत करने का अर्थ है- अपनी इंद्रियों पर निग्रह करना.

एकादशी में चावल वर्जित क्यों 

एकादशी के दिन चावल न खाने के संदर्भ में यह जानना आवश्यक है कि चावल और अन्य अन्नों की खेती में क्या अंतर है. यह सर्वविदित है कि चावल की खेती के लिए सर्वाधिक जल की आवश्यकता होती है.

 

एकादशी का व्रत इंद्रियों सहित मन के निग्रह के लिए किया जाता है. ऎसे में यह आवश्यक है कि उस वस्तु का कम से कम या बिल्कुल नहीं उपयोग किया जाए जिसमें जलीय तत्व की मात्रा अधिक होती है.

कारण- चंद्र का संबंध जल से है. वह जल को अपनी ओर आकषित करता है. यदि व्रती चावल का भोजन करे तो चंद्रकिरणें उसके शरीर के संपूर्ण जलीय अंश को तरंगित करेंगी. परिणामत: मन में विक्षेप और संशय का जागरण होगा.

 

इस कारण व्रती अपने व्रत से गिर जाएगा या जिस एकाग्रता से उसे व्रत के अन्य कर्म-स्तुति पाठ, जप, श्रवण एवं मननादि करने थे, उन्हें सही प्रकार से नहीं कर पाएगा. ज्ञातव्य हो कि औषधि के साथ पथ्य का भी ध्यान रखना आवश्यक होता है.

पूजा में नैवेध और प्रसाद का महत्व

प्रत्येक देवता का नैवेध निर्धारित होता है लेकिन इसका मतलब ये नहीं होता कि आप इन्ही वस्तुओ का भोग लगाये ईश्वर श्रद्धा को ज्यादा महत्व देते है.भाव के बिना कुछ भी नहीं है.भाव भक्ति होनी जरुरी है.कहते है कि भगवान तो भाव के भूखे है.

लेकिन जैसे आप अपना मन पसंद पदार्थ देखकर खुश होते है इसी प्रकार देवता भी मन पसंद नैवेध देख कर प्रसन्न हो कर आशीर्वाद देते है, प्रिय पदार्थ देवता को आकृष्ट करते है और वह नैवेध अर्थात प्रसाद जब हम ग्रहण करते है तो उसमे विघमान शक्ति हमें प्राप्त होती है.

                                 कौन से देवता को कौन सा नैवेध 


१. –
विष्णु जी को खीर या सूजी हलवा का नैवेध बहुत पसंद है.
२. – गणेश जी को मोदक या लड्डू का नैवेध बहुत पसंद है.
३. – श्री कृष्ण को माखन-मिश्री का नैवेध बहुत पसंद है.
४. – शिव को भांग का नैवेध बहुत पसंद है.
५. – अन्नपूर्णा माता को अन्न के बने पदार्थ,देवी को पायस या खीर बहुत पसंद है.
६. – लक्ष्मी जी को सफ़ेद रंग से मिष्ठान बहुत पसंद होते है.

नैवेध कैसे चढ़ाये 

नैवेध की थाली और भोजन की थाली परोसने कि पद्धति में सिर्फ एक अंतर होता है भोजन की  थाली परोसते समय सबसे पहले नमक परोसा जाता है और नैवेध की थाली में मिष्ठान सबसे महत्वपूर्ण होते है इसके अलावा पकवान रखने चाहिये प्रत्येक खाघान्न पर तुलसी दल रखकर थाली के चारो ओर जल की धार गोल घुमाते हुए घंटी बजानी चाहिये.

नैवेध की थाली तुरंत भगवान के आगे से नहीं हटाना चाहिये. कुछ देर बाद सभी लोगो को इस थाली से प्रसाद बांटना चाहिये. गणेश जी और शिव जी के नैवेध में तुलसी पत्र नहीं रखते गणेश जी के नैवेध में दूर्वा दल और शिव जी के नैवेध में बेल पत्र रखते है.

                                         प्रसाद का महत्व

जब हम भगवान को खाघ पदार्थ अर्पण करते है तो वह “भोग या नैवेध” कहलाता है और भगवान के ग्रहण करने के बाद वह “प्रसाद” बन जाता है.प्रसाद चाहे सूखा हो, बासी हो, अथवा दूर देश से लाया हुआ हो, उसे पाते ही खा लेना चाहिये. उसमे काल के विचार करने की आवश्यकता नहीं है, महा प्रसाद में काल या देश का नियम नहीं है. जिस समय भी महा प्रसाद मिल जाये, उसे वही उसी समय पाते ही जल्दी से खा ले,ऐसा भगवान ने साक्षात् अपने श्री मुख से कहा है.कभी भी प्रसाद का निरादर नहीं करना चाहिये, और ना ही लेने से मना करना चाहिये.

स्वयं भगवान ने कहा है –
                             “पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति

                                  तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मन:”

जो कोई भक्त मेरे लिये प्रेम से पत्र (पत्ती), पुष्प, फल, जल आदि अर्पण करता है, उस शुद्ध बुद्धि निष्काम प्रेमी भक्त का प्रेमपूर्वक अर्पण किया हुआ, वह पत्र-पुष्पादि मैं सगुण रूप से प्रकट होकर प्रीति सहित खाता हूँ.. जब श्रद्धा रूपी पत्र हो ,सुमन अर्थात फूल, हमारा अच्छा मन ही सुमन है,फल अर्थात अपने कर्म फल और जल अर्थात भाव में नैनो से बहें हुए, दो बूंद आँसू हो, इसे ही भगवान ग्रहण करते है.

तो आईये हम भी अपने अपने इष्ट को उनका मन पसंद नैवेध अर्पण करे और उनका आशीर्वाद प्राप्त करे.

                                              “जय जय श्री राधे” 

किस देवता की, कितनी परिक्रमा करे ?

जब हम मंदिर जाते है तो हम भगवान की परिक्रमा जरुर लगाते है. पर क्या कभी हमने ये सोचा है कि देव मूर्ति की परिक्रमा क्यो की जाती है? शास्त्रों में लिखा है जिस स्थान पर मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा हुई हो,

 

उसके मध्य बिंदु से लेकर कुछ दूरी तक दिव्य प्रभा अथवा प्रभाव रहता है,यह निकट होने पर अधिक गहरा और दूर दूर होने पर घटता जाता है, इसलिए प्रतिमा के निकट परिक्रमा करने से दैवीय शक्ति के ज्योतिर्मडल से निकलने वाले तेज की सहज ही प्राप्ती हो जाती है.

                                           कैसे करे परिक्रमा

देवमूर्ति की परिक्रमा सदैव दाएं हाथ की ओर से करनी चाहिए क्योकि दैवीय शक्ति की आभामंडल की गति दक्षिणावर्ती होती है।बाएं हाथ की ओर से परिक्रमा करने पर दैवीय शक्ति के ज्योतिर्मडल की गति और हमारे अंदर विद्यमान दिव्य परमाणुओं में टकराव पैदा होता है, जिससे हमारा तेज नष्ट हो जाता है.जाने-अनजाने की गई उल्टी परिक्रमा का दुष्परिणाम भुगतना पडता है.

                     किस देव की कितनी परिक्रमा करनी चाहिये ?

वैसे तो सामान्यत: सभी देवी-देवताओं की एक ही परिक्रमा की जाती है परंतु शास्त्रों के अनुसार अलग-अलग देवी-देवताओं के लिए परिक्रमा की अलग संख्या निर्धारित की गई है।इस संबंध में धर्म शास्त्रों में कहा गया है कि भगवान की परिक्रमा करने से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है और इससे हमारे पाप नष्ट होते है.सभी देवताओं की परिक्रमा के संबंध में अलग-अलग नियम बताए गए हैं.

1. – महिलाओं द्वारा “वटवृक्ष” की परिक्रमा करना सौभाग्य का सूचक है.

2. –
“शिवजी”
की आधी परिक्रमा की जाती है.है शिव जी की परिक्रमा करने से बुरे खयालात और अनर्गल स्वप्नों का खात्मा होता है।भगवान शिव की परिक्रमा करते समय अभिषेक की धार को न लांघे.

3. –  “देवी मां” की एक परिक्रमा की जानी चाहिए.

4. – “श्रीगणेशजी और हनुमानजी” की तीन परिक्रमा करने का विधान है.गणेश जी की परिक्रमा करने से अपनी सोची हुई कई अतृप्त कामनाओं की तृप्ति होती है.गणेशजी के विराट स्वरूप व मंत्र का विधिवत ध्यान करने पर कार्य सिद्ध होने लगते हैं.

5. –
भगवान विष्णुजी” एवं उनके सभी अवतारों की चार परिक्रमा करनी चाहिए.विष्णु जी की परिक्रमा करने से हृदय परिपुष्ट और संकल्प ऊर्जावान बनकर सकारात्मक सोच की वृद्धि करते हैं.

6. – सूर्य मंदिर की सात परिक्रमा करने से मन पवित्र और आनंद से भर उठता है तथा बुरे और कड़वे विचारों का विनाश होकर श्रेष्ठ विचार पोषित होते हैं.हमें भास्कराय मंत्र का भी उच्चारण करना चाहिए, जो कई रोगों का नाशक है जैसे सूर्य को अर्घ्य देकर “ॐ भास्कराय नमः” का जाप करना.देवी के मंदिर में महज एक परिक्रमा कर नवार्ण मंत्र का ध्यान जरूरी है.इससे सँजोए गए संकल्प और लक्ष्य सकारात्मक रूप लेते हैं.

परिक्रमा के संबंध में नियम

१. – परिक्रमा शुरु करने के पश्चात बीच में रुकना नहीं चाहिए.साथ परिक्रमा वहीं खत्म करें जहां से शुरु की गई थी.ध्यान रखें कि परिक्रमा बीच में रोकने से वह पूर्ण नही मानी जाती

२. – परिक्रमा के दौरान किसी से बातचीत कतई ना करें.जिस देवता की परिक्रमा कर रहे हैं, उनका ही ध्यान करें.

३.- उलटी अर्थात बाये हाथ की तरफ परिक्रमा नहीं करनी चाहिये.

इस प्रकार देवी-देवताओं की परिक्रमा विधिवत करने से जीवन में हो रही उथल-पुथल व समस्याओं का समाधान सहज ही हो जाता है.इस प्रकार सही परिक्रमा करने से पूर्ण लाभ की प्राप्ती होती है.


“जय जय श्री राधे”

श्री राधे 

“श्रील नारायण भट्ट ज़ू जयति”

“श्री नारायण दास गोस्वामी जयति”

??आज की ब्रज रस धारा ??

दिनांक 05/05/2018

श्री राधा रानी चरणारविन्द

श्री राधा रानी चरणारविन्द 

राधा रानी जी का दायाँचरण 

राधारानी जी के दायाँचरण “आठ मंगल चिन्हों” से अलंकृत है,

‘शंख’, ‘गिरी’, ‘रथ’, ‘मीन’, ‘शक्ति-अस्त्र’, ‘गदा’, ‘यज्ञकुण्ड’, ‘रत्न-कुंडल’.

पादांगुष्ठ के मूल पर एक ‘शंख’ है. दूसरी एवं माध्यम अँगुली के नीचे एक ‘गिरी’ है. गिरी के नीचे मध्य में एडी की ओर एक ‘रथ’है और एड़ी पर एक ‘मीन’ है, रथ के समीप पावं के भीतरी किनारे पर एक ‘शक्ति अस्त्र’ है. रथ के दूसरी ओर पावं के बाहरी किनारे के निकट एक ‘गदा’ है. कनिष्ठा के नीचे एक ‘यज्ञकुण्ड’ है.और उसके नीचे एक ‘रत्न कुंडल’ है.

 

१. शंख – शंख विजय का प्रतीक है यह बताता है कि राधा-गोविंद के चरणकमलो की शरण ग्रहण करने वाले व्यक्ति सदैव दुख से बचे रहते है और अभय दान प्राप्त करते है.

 

२. गिरी  – यह बताता है यधपि गिरी-गोवर्धन की गिरिवर के रूप में व्रज में सर्वत्र पूजा होती है, तथापि गिरी-गोवर्धन विशेषकर राधिका की  चरण सेवा करते है.

 

३. रथ – यह चिन्ह बताता है, कि मन रूपी रथ को राधा के चरणकमलों में लगाकर सुगमता पूर्वक नियंत्रित किया जा  सकता है.

 

४. मीन – जिस प्रकार मछली जल के बिना नहीं रह सकती, उसी प्रकार भक्तगण क्षण भर भी राधा-श्यामसुन्दर के चरणाम्बुजों के बिना नहीं रह सकते.

 

५. शक्ति  – यह एक भाले का घोतक है, जो व्यक्ति राधा जी कि शरण ग्रहण करता है उनके लिए श्री राधा के चरण प्रकट होकर सांसारिक जीवन के सभी अप्रिय बंधनों को काट डालते है.

 

६.गदा – यह चिन्ह सूचित करता है कि राधा के चरण पापमय काम रूपी हाथी को प्रताड़ित कर सकते है.

 

७. होम कुण्ड –  यह घोषित करता है कि राधा के चरणों का ध्यान करने वाले व्यक्ति के पाप इस प्रकार भस्म हो जाते है मानो वे यज्ञ वेदी में विघमान हो.

 

८. कुंडल – श्री कृष्ण के कर्ण सदा राधा जी के मंजुल नूपुरो कि ध्वनि और उनकी  वीणा के मादक रागों का श्रवण करते है.

 

राधा रानी जी का बायाँ चरण

राधा रानी जी का बायाँ चरण “ग्यारह शुभ चिन्हों” से सज्जित है.

 जौ, चक्र, छत्र, कंकण, ऊर्ध्वरेखा, कमल, ध्वज,  सुमन, पुष्पलता, अर्धचंद्र, अंकुश.

पादांगुष्ठ के मूल पर “एक जौ” का दाना है उसके नीचे एक “चक्र” है, उसके नीचे एक “छत्र” है, और उसके नीचे एक “कंकण” है. एक “ऊर्ध्वरेखा” पावं के मध्य में प्रारंभ होती है, मध्यमा के नीचे एक “कमल” है, और उसके नीचे एक “ध्वज”है. ध्वज के नीचे एक “सुमन” है, और उसके नीचे “पुष्पलता”है, एड़ी पर एक चारु “अर्धचंद्र” है. कनिष्ठा के नीचे एक “अंकुश” अंकित है.

1. जौ का दाना – जौ का दाना व्यक्त करता है कि भक्तजन राधा कृष्ण के पदारविन्दो कि सेवा कर समस्त भोगो ऐश्वर्य प्राप्त करते है. एक बार उनका पदाश्रय प्राप्त कर लेने पर भक्त की  अनेकानेक जन्म मरण कि यात्रा घट कर, जौ के दानो के समान बहुत छोटी हो जाती है.

2. चक्र – यह चिन्ह सूचित करता है कि राधा कृष्ण के चरण कमलों का ध्यान काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, और मात्सर्य, रूपी छै शत्रुओ का  नाश करता है. ये तेजस तत्व का प्रतीक है जिसके द्वारा राधा गोविंद भक्तो के अंतःकरण से पाप तिमिर को छिन्न-भिन्न कर देते है.

3. छत्र – छत्र यह सिद्ध करता है कि उनके चरणों कि शरण ग्रहण करने वाले भक्त भौतिक कष्टों कि अविराम वर्षा से बचे रहते है.

4. कंकण  – राधा के चरण सर्वदा कृष्ण के हाथो में रहते है (जब वे मान करती है तो कृष्ण चरण दबाते है) जिस प्रकार कंकण सदा हाथ में रहता है.

5. उर्ध्व रेखा – जो भक्त इस प्रकार राधा श्याम के पद कमलों से लिपटे रहते है, मानो वे उनकी जीवन रेखा हो वे दिव्य धाम को जाएँगे.

6. कमल – सरस सरसिज राधा गोविंद के चरणविंदो का ध्यान करने वाले मधुकर सद्रश भक्तो के मन में प्रेम हेतु लोभ उत्पन्न करता है.

7. ध्वज – ध्वज उन भक्तो कि भय से बचाता और सुरक्षा करता है जो उनके चरण सरसिज का ध्यान करते है विजय का प्रतीक है.

8. पुष्प – पुष्प दिखाता है कि राधा जी के चरणों कि दिव्य कीर्ति सर्वत्र एक सुमन सौरभ कि भांति फैलती है

9. पुष्पलता  – यह चिन्ह बताता है कि किस प्रकार भक्तो की इच्छा लता तब तक बढती रहती है, जब तक वह श्रीमती राधा के चरणों की शरण ग्रहण नहीं कर लेती.

10. अर्धचंद्र – यह बताता है कि जिस प्रकार शिव जी जैसे देवताओं ने राधा गोविंद के चरणारविन्दों के तलवो से अपने शीश को शोभित किया है, इसी प्रकार जो भक्त इस प्रकार राधा और कृष्ण के पदाम्बुजो द्वारा अपने शीश को सुसज्जित करते है वे शिव जी के समान महान भक्त बन जाते है.

11. अंकुश – अंकुश इस बात का घोतक है कि राधा गोविद के चरणों का ध्यान भक्तो के मन रूपी गज को वश में करता है उसे सही मार्ग दिखाता है.

इस प्रकार राधारानी के चरण सरसिज के “उन्नीस मंगल चिन्हों” का नित्य स्मरण किया जाता है.

“जय जय श्री राधे “

पूजन में आरती का क्या विधान है ?

हिंदू धर्म में प्रत्येक धार्मिक कर्म-कांड के बाद भगवान की आरती उतारने का विधान है। देखने में आता है कि प्रत्येक व्यक्ति जानकारी के अभाव में अपनी इच्छानुसार भगवान की आरती उतारता है। जबकि भगवान की आरती उतारने के भी कुछ विशेष नियम होते हैं।

आरती के दो भाव है जो क्रमश: ‘आरात्रिक अथवा ‘नीराजन’ और ‘आरती’ शब्द से व्यक्त हुए हैं। नीराजन (नि:शेषेण राजनम् प्रकाशनम्) का अर्थ है- विशेष रूप से, नि:शेष रूप से प्रकाशित हो उठे चमक उठे, अंग-प्रत्यंग स्पष्ट रूप से उद्भासित हो जाय जिसमें दर्शक या उपासक भलीभाँति देवता की रूप-छटा को निहार सके, हृदयंगम कर सके।

दूसरा ‘आरती’ शब्द (जो संस्कृत के आर्तिका प्राकृत रूप है और जिसका अर्थ है- अरिष्ट) विशेषत: माधुर्य- उपासना से संबंधित है। ‘आरती वारना’ का अर्थ है- आर्ति-निवारण, अनिष्ट से अपने प्रियतम प्रभु को बचाना।

      आरती कैसे करे

आरती में पहले मूलमन्त्र (जिस देवता का जिस मन्त्र से पूजन किया गया हो, उस मन्त्र) के द्वारा तीन बार पुष्पांजलि देनी चाहिये और ढोल, नगारे, शंख, घड़ियाल आदि महावाद्यों के तथा जय-जयकार के शब्द के साथ शुभ पात्र में धृत से या कपूर से विषम संख्या की (1,5,7,11,21,101) अनेक बत्तियाँ जलाकर आरती करनी चाहिये-विषम संख्याओ में तीन की संख्या वर्जित है.

तत्श्च मूलमन्त्रेण दत्वा पुष्पांजलित्रयम्।

महानीराजनं कुर्यान्महावाद्यजयस्वनै:।।
प्रज्वलयेत् तदर्थं च कर्पूरेण घृतेन वा।
आरार्तिकं शुभे पात्रे विषमानेकवर्तिकम्।।

साधारणत: पाँच बत्तियों से आरती की जाती है, इसे ‘पंचप्रदीप’भी कहते हैं। एक, सात या उससे भी अधिक बत्तियों से आरती की जाती है। कपूर से भी आरती होती है। पद्मपुराण में आया है-

कुंकुमागुरुकर्पूरघृतचन्दननिर्मिता:
वर्तिका: सप्त वा पंच कृत्वा वा दीपवर्त्तिकाम्।।
कुर्यात् सप्तप्रदीपेन शंखघण्टादिवाद्यकै:।

‘कुंकुम, अगर, कपूर, घृत और चन्दन की सात या पाँच बत्तियाँ बनाकर अथवा दिये की (रुई और घी की) बत्तियाँ बनाकर सात बत्तियों से शंख, घण्टा आदि बाजे बजाते हुए आरती करनी चाहिये।’

‘आरती उतारते समय सर्वप्रथम भगवान् की प्रतिमा के चरणों में उसे चार बार घुमाये, दो बार नाभि देश में, एक बार मुख मण्डल पर और सात बार समस्त अंगों पर घुमाये’इया तरह चौदह बार आरती घुमानी चाहिये.

आदौ चतु: पादतले च विष्णो-
र्द्वौ नाभिदेशे मुखबिम्ब एकम्।
सर्वेषु चांग्ङेषु च सप्तवारा-
नारात्रिकं भक्तजनस्तु कुर्यात्।।

                                        आरती के अंग

आरती के पाँच अंग होते हैंअर्थात केवल आरती करना अकेला नहीं आता बल्कि उसके साथ साथ कुछ और क्रियाए भी होती है जिसे आरती के अंग कहा जाता है –

पंच नीराजनं कुर्यात् प्रथमं दीपमालया।।

 द्वितीयं सोदकाब्जेन तृतीयं धौतवाससा।।

चूताश्चत्थादिपत्रैश्च चतुर्थं परिकीर्तितम्।

पंचमं प्रणिपातेन साष्टांकेन यथाविधि।।

अर्थात – ‘प्रथम दीपमाला के द्वारा, दूसरे जलयुक्त शंख से, तीसरे धुले हुए वस्त्र से, चौथे आम और पीपल आदि के पत्तों से और पाँचवें साष्टांग दण्डवत् से आरती करे।’


१. दीपमाला के द्वारा –
साधारणत: पाँच बत्तियों से आरती की जाती है, इसे ‘पंचप्रदीप’ भी कहते हैं। एक, सात या उससे भी अधिक बत्तियों से आरती की जाती है।

२. सोदकाब्ज – जल युक्त शंख चौदह बार प्रज्वलित ज्योतियो द्वारा आरती करने से इष्ट देव के श्री अंगों को जो ताप पहुँचता है उसके निवारण शीतलीकरण के लिए शंख में जल भरकर बार बार घुमाया जाता है,और बीच बीच में थोडा थोडा जल भूमि पर छोड़ा जाता है शंख के अभाव में शुद्ध पात्र द्वारा भी निर्मच्छन किया जाता है .
३.धौतवास –  अर्थात धुला हुआ वस्त्र, दाये हाथ में शुद्ध स्वच्छ मुलायम और सुखा वस्त्र लेकर उसी प्रकार घुमाया जाता है इसका भाव यह है कि जल से शीतलीकरण करते हुए जो भावमय जल बिंदु इष्ट के श्री अंगों पर पड़ गए हो उन्हें पोछना .

४. चमर – मयूरपिच्छ का पंखा लेकर श्री विग्रह से ऊपर हवा में लहराते हुए धीरे धीरे घुमाना इस प्रकार शीतल मंद पवन से इष्ट को आराम पहुँचाना चमर को जोर से तीव्र गति से पंखे कि भांति नहीं चलाना चाहिये .

५. दंडवत – साष्टांग प्रणाम इसका भाव स्वतः स्पष्ट है आत्म निवेदन–समर्पण और क्षमा प्रार्थना करना.

                      आरती लेने का अर्थ –
ऐसे कहा जाता है कि प्रज्वलित दीपक अपने इष्ट देव के चारों ओर घुमाकर उनकी सारी विघ्र-बाधा टाली जाती है। आरती लेने से भी यही तात्पर्य है- उनकी ‘आर्ति’ (कष्ट) को अपने ऊपर लेना। बलैया लेना, बलिहारी जाना, बलि जाना, वारी जाना, न्योछावर होना आदि सभी प्रयोग इसी भाव के द्योतक हैं यह ‘आरती’ मूलरूप में कुछ मन्त्रोंच्चारण के साथ केवल कष्ट-निवारण के भाव से उतारी जाती रही होगी। आरती के साथ सुन्दर-सुन्दर भावपूर्ण पद्य-रचनाएँ गाये  जाते हैं।

आरती देखने का महत्व

आरती करने का ही नही, आरती देखने का भी बड़ा पुण्य लिखा है। हरि भक्ति विलास में एक श्लोक है-

                     

 नीराजनं च य: पश्येद् देवदेवस्य चक्रिण:।

 सप्तजन्मनि विप्र: स्यादन्ते च परमं पदम्।।

धूपं चारात्रिकं पश्येत् कराभ्यां च प्रवन्दते।

कुलकोटि समुद्धृत्य याति विष्णो: परं पदम्।।२

 

१. अर्थात – ‘जो देवदेव चक्रधारी श्रीविष्णुभगवान् की आरती (सदा) देखता है, वह सात जन्मों तक ब्राह्मण होकर अन्त में परमपद को प्राप्त होता है।’

२. अर्थात – ‘जो धूप और आरती को देखता है और दोनों हाथों से आरती लेता है, वह करोड़ पीढ़ियों का उद्धार करता है और भगवान् विष्णु के परम पद को प्राप्त होता है।’

ध्यान रखने योग्य बाते – १. – पंच नीराजन में जलते हुए दीप युक्त दीप पात्र को आरती से पूर्व और आरती से बाद खाली भूमि पर नहीं रखना चाहिये ,लकड़ी या पत्थर कि चौकी या किसी पात्र में आरती पात्र को रखना चाहिये.

                       “भूमौ प्रदीप यो र्पयति सोन्ध सप्तजन्मसु “

 

२. –  निर्मच्छन हेतु शंख में जल भरने के लिए शंख को जल में डुबोकर कभी नहीं भरना चाहिये.ऊपर से जल डालकर शंख में भरना चाहिये .बजाने वाले (छिद्रयुक्त)शंख में जल भरकर निर्मच्छन नहीं करना चाहिये .शंख चाहे रिक्त हो या जल से भरा कभी खाली भूमि पर नहीं रखना चाहिये.


३. –
निर्मच्छन में उपयुक्त वस्त्र स्वच्छ शुद्ध कोमल हो,उसे अन्य कार्य में ना लिया जावे यहाँ तक कि श्री विग्रह के स्नानोपरांत अंग पोछने के कार्य में भी ना लिया जावे .


४. –
आरती में बजाई जाने वाली घंटी को भी भूमि पर नहीं रखनी चाहिये .

आरती के महत्व को विज्ञानसम्मत भी माना जाता है। आरती के द्वारा व्यक्ति की भावनाएँ तो पवित्र होती ही हैं, साथ ही आरती के दीये में जलने वाला गाय का घी तथा आरती के समय बजने वाला शंख वातावरण के हानिकारक कीटाणुओं को निर्मूल करता है। इसे आज का विज्ञान भी सिद्ध कर चुका है।

  “जय जय श्री राधे”

कौन से पुष्प, किस देवता को चढाते है ?

फूल सुंदरता के प्रतीक हैं, जो जीवन में उत्साह, उल्लास ओर उमंग भरते हैं। फूलों की सुगंध और सौंदर्य से देवी-देवता प्रसन्न होते हैं ऐसी मान्यता है कि भगवान के प्रिय पुष्प अर्पित करने से वे जल्दी प्रसन्न होते हैं और भक्तों को मनावांछित फल प्रदान करते हैं।यही वजह है कि पूजा-अर्चना, व्रत-उपवास या विभिन्न पर्वों पर अपने-अपने इष्ट को पुष्प अर्पित करने का विधान है।

 

भगवान की पूजा-अर्चना में फूल अर्पित करना अति आवश्यक माना गया है। सभी मांगलिक कार्य और पूजन कर्म में फूलों का विशेष स्थान होता है। सभी देवी-देवताओं को अलग-अलग फूल प्रिय हैं। साथ ही कुछ फूल ऐसे है जो नहीं चढ़ाएं जाते। इसी वजह से बड़ी सावधानी से पूजा आदि के लिए फूलों का चयन करना चाहिए।

१. श्रीगणेश – पद्मपुराण, आचार रत्न में लिखा है कि ‘न तुलस्या गणाधिपम्‌’ अर्थात गणेशजी को तुलसी छोड़कर सभी पत्र-पुष्प प्रिय हैं! गणपतिजी को दूर्वा अधिक प्रिय है। अतः सफेद या हरी दूर्वा चढ़ाना चाहिए। दूर्वा की फुनगी में तीन या पाँच पत्ती होना चाहिए। भगवान गणेश को गुड़हल का लाल फूल विशेष रूप से प्रिय होता है। इसके अलावा चाँदनी, चमेली या पारिजात के फूलों की माला बनाकर पहनाने से भी गणेश जी प्रसन्न होते हैं।

 

२. शंकरजी- भगवान शंकर को धतूरे के पुष्प, हरसिंगार, व नागकेसर के सफेद पुष्प, सूखे कमल गट्टे, कनेर, कुसुम, आक, कुश आदि के पुष्प चढ़ाने का विधान है।शिवजी की पूजा में मालती, कुंद, चमेली, केवड़ा के फूल वर्जित किए गए हैं।

 

भगवान शंकर पर फूल चढ़ाने का बहुत अधिक महत्व है। तप, शील, सर्वगुण संपन्न वेद में निष्णात किसी ब्राह्मण को सौ सुवर्ण दान करने पर जो फल प्राप्त होता है, वह शिव पर सौ फूल चढ़ा देने से प्राप्त हो जाता है।

जैसे दस सुवर्ण दान का फल एक आक के फूल को चढ़ाने से मिलता है, उसी प्रकार हजार आक के फूलों का फल एक कनेर से और हजार कनेर के बराबर एक बिल्व पत्र से मिलता है। समस्त फूलों में सबसे बढ़कर नीलकमल होता है।

३. सूर्य नारायण- इनकी उपासना कुटज के पुष्पों से की जाती है। इसके अलावा कनेर, कमल, चंपा, पलाश, आक, अशोक आदि के पुष्प भी प्रिय हैं। सूर्य उपासना में अगस्त्य के फूलों का उपयोग नहीं करना चाहिए।

४. भगवती गौरी- शंकर भगवान को चढऩे वाले पुष्प मां भगवती को भी प्रिय हैं। इसके अलावा बेला, सफेद कमल, पलाश, चंपा के फूल भी चढ़ाए जा सकते हैं।

५. श्रीकृष्ण-
 अपने प्रिय पुष्पों का उल्लेख महाभारत में युधिष्ठिर से करते हुए श्रीकृष्ण कहते हैं- मुझे कुमुद, करवरी, चणक, मालती, नंदिक, पलाश व वनमाला के फूल प्रिय हैं।

६. लक्ष्मीजी-
 इनका सबसे अधिक प्रिय पुष्प “कमल” है।पुष्पों में कमल का विशेष स्थान है। कमल का फूल सभी देवी-देवताओं को अतिप्रिय है। कमल की सुंदरता की महिमा इसी बात से सिद्ध होती है कि भगवान के नेत्रों की तुलना कमल के फूल से की जाती है।

कमल कीचड़ में उगता है और उससे ही पोषण लेता है, लेकिन हमेशा कीचड़ से अलग ही रहता है। कमल का फूल पूर्ण विकास दर्शाता है. सांसारिक और आध्यात्मिक जीवन किस प्रकार जिया जाए. संसाररूपी कीचड़ में रहते हुए भी हमें किस तरह रहना चाहिए यह शिक्षा हम कमल से ले सकते हैं।

कमल की आठ पंखुडिय़ां मनुष्य के अलग-अलग 8 गुणों की प्रतीक हैं, ये गुण हैं दया, शांति, पवित्रता, मंगल, निस्पृहता, सरलता, ईर्ष्या का अभाव और उदारता। इसका आशय यही है कि मनुष्य जब इन गुणों को अपना लेता है तब वह भी ईश्वर को कमल के फूल के समान प्रिय हो जाता है।

७. विष्णुजी-
 इन्हें कमल, मौलसिरी, जूही, कदम्ब, केवड़ा, चमेली, अशोक, मालती, वासंती, चंपा, वैजयंती के पुष्प विशेष प्रिय हैं।

प्रात: काल स्नानादि के बाद भी देवताओं पर चढ़ाने के लिए पुष्प तोड़ें या चयन करें। ऐसा करने पर भगवान प्रसन्न होते हैं।

भगवान को कौन से पुष्प नहीं चढ़ाये 

विष्णु और भगवान शिव को केवल केतकी (केवड़े) का निषेध है।  सूर्य और श्रीगणेश के अतिरिक्त सभी देवी-देवताओं को बिल्व पत्र चढ़ाएं जा सकते हैं। सूर्य और श्री गणेश को बिल्व पत्र न चढ़ाएं। ‘गणेश तुलसी पत्र दुर्गा नैव तु दूर्वाया’ अर्थात गणेशजी की तुलसी पत्र और दुर्गाजी की दूर्वा से पूजा न करें।

किस तरह के फूल पूजा में नहीं चढाने चाहिये?

* कीड़े लगे फूल, बासी फूल भगवान को न चढ़ाएं।

* बिखरे या पेड़ से जमीन पर गिरे फूल भी देव पूजा में ना चढ़ाएं।

* कली या अधखिले फूल भी अर्पित न करें।

* भगवान पर चढ़ा, उल्टे हाथ में रखा, धोती के पल्ले में बांधकर लाया और पानी से धोया फूल भी न चढ़ाएं।

* पौधे पर जिस स्थिति में फूल खिलता है, उसी स्थिति में सीधे हाथ से भगवान को चढ़ाएं।

* फूलों को किसी टोकरी में तोड़कर लाएं।

* सूखे फूल न चढ़ाएं।.

* बिना नहाए पूजा के लिए फूल कभी ना तोड़े।किसी भी देवता के पूजन में केतकी के पुष्प नहीं चढ़ाए जाते।

एक अन्य बात विशेष रूप से उल्लेखनीय है और वह यह कि कमल और कुमुद के पुष्प ग्यारह से पंद्रह दिन तक भी बासी नहीं होते। चंपा की कली के अलावा किसी भी पुष्प की कली देवताओं को अर्पित नहीं की जाती। केतकी के पुष्प किसी भी पूजन में अर्पित नहीं किए जाते। कुशा से मूर्ति पर जल न छिड़के।

                                                 सार

सबसे महत्व की बात यह है हम जो भी चढ़ाये उसमे भाव हो, बिना भाव के कोई भी चीज करना बेकार है. “पत्रं पुष्पं फलं , तोयम , माय भक्त्या प्रयाच्चाती इअदहम भक्त्य्पर्हत्म्श्नामी प्रयात्मनाह” जो भी मुझे प्रेम  से फूल, फल, जल अर्पित करता है मैं उसे स्वीकारता हूँ. और हमारा सुन्दर मन ही सुमन अर्थात पुष्प है. इसी सुन्दर मन को हम बड़े भाव से परमात्मा को अर्पित करे.भगवान इस सुमन से सबसे ज्यादा प्रसन्न होते है.

                                                              “जय जय श्री राधे”

 

सूर्य को अर्ध्य क्यों दिया जाता है ?

सूर्य प्रत्यक्ष देवता है,सम्पूर्ण जगत के नेत्र हैं.इन्ही के द्वारा दिन और रात का सृजन होता है.इनसे अधिक निरन्तर साथ रहने वाला और कोई देवता नही है.

इन्ही के उदय होने पर सम्पूर्ण जगत का उदय होता है,और इन्ही के अस्त होने पर समस्त जगत सो जाता है.इन्ही के उगने पर लोग अपने घरों के किवाड खोल कर आने वाले का स्वागत करते हैं,और अस्त होने पर अपने घरों के किवाड बन्द कर लेते हैं.

सूर्य ही कालचक्र के प्रणेता है.सूर्य से ही दिन-रात ,पल,मास,पक्ष तथा संवत आदि का विभाजन होता है. सूर्य सम्पूर्ण संसार के प्रकाशक हैं,इनके बिना अन्धकार के अलावा और कुछ नही है. सूर्य आत्माकारक ग्रह है,यह राज्य-सुख, सत्ता, ऐश्वर्य, वैभव, अधिकार,आदि प्रदान करता है.

यह सौरमंडल का प्रथम ग्रह है, इसके बिना उसी प्रकार से हम सौरजगत को नही जान सकते थे,जिस प्रकार से माता के द्वारा पैदा नही करने पर हम संसार को नही जान सकते थे. सूर्य सम्पूर्ण सौर जगत का आधार स्तम्भ है                            


स्कन्द पुराण में कहा गया है
– सूर्य को अर्ध्य दिये बिना भोजन करना पाप करने के समान है


वेद घोषणा करते है
– अथ संध्याय यदपः प्रयुक्ते ता विप्रुषा वजीयुत्वा असुरान पाध्नन्ति ||

अर्थात संध्या में जो जल का प्रयोग किया जाता है वे जलकण वज्र बनकर असुरों का नाश करते है सूर्य किरणों द्वारा असुरों का नाश एक अलंकारिक भाषा है मानव जाति के लिये ये असुर है – टाइफाइड, राज्यक्षमा, निमोनिया जिनका विनाश सूर्य किरणों की दिव्य सामथ्र्य से प्राप्त होता है एंन्थेक्स के स्पार जो कई वर्षो के शुष्कीकरण से नहीं मरते सूर्य प्रकाश से ड़ेढ घंटे में मर जाते है !

सूर्यार्ध्य में साधक जलपूरित अंजली लेकर सुर्याभिमुख खड़ा होकर जब जल भूमि पर गिराता है तो नवोदित सूर्य की सीधी पड़ती हुई किरणों से अनुबिद्ध वह जलराशि, मस्तक से लेकर पांव पर्यंन्त साधक के शरीर के समान सूत्र में गिरती हुई, सूर्य किरणो से उतप्त रंगों के प्रभाव को ऊपर से नीची तक समस्त शरीर में प्रवाहित कर देती है इसलिए प्रातः पूर्वाभिमुख,उगते हुए सूर्य के सामने और सायं पश्चिमाभिमुख छुपते हुए सूर्य के सामने खड़े होकर सूर्यार्ध्य देने का विधान है!


सूर्य अर्ध्य विधि –
सूर्य उदय के थोडे ही समय के बाद लोटे को जल से भरकर,उसमे लाल पुष्प, रोली, चावल,डाले  सूर्य की और मुख करके खड़े हो जाये! लोटे की स्थिति छाती के बीच में रहनी चाहिये अब धीरे-धीरे जल की धार छोडनी चाहिये! लोटे के उभरे किनारे पर द्रृष्टिपात करने से आप सूर्य के प्रतिबिंब को बिंदुरूप में देखेगे,उस बिंदुरूप प्रतिबिम्ब में ध्यानपूर्वक देखने में आपको सप्तवर्ण वलय देखने को मिलेगे! लोटा तांबे, पीतल आदि का होना चाहिये! इस तरह तेजवर्धक तथा नेत्रो को लाभान्वित करने वाली शीतल सौम्य रश्मियों को सेवन करने का महर्षियों ने यह एक सरल क्रम प्रदान किया है !

 

अर्ध्य देते समय निम्न मंत्र बोले –

ध्येय:सदा सवितृ मंडल मध्यवर्ती

नारायण:सरसिजासन सन्निविष्ट:

केयुरवान मकर कुंडलवान किरीटि:

हारी हिरण्यमय वपुर्धृत शंख चक्र:

एहि सूर्य सहस्त्रांशो तेजो राशे जगत्पते

अनुकम्पय मां भक्त्या गृहाण अर्ध्य दिवाकर

 

अर्ध्य देते समय इस सूर्य गायत्री मंत्र का उच्चारण भी करना चाहिए।

“ऊं आदित्याय विद्महे भास्कराय धीमहि। तन्नो भानु: प्रचोदयात्। “

पृथ्वी के एक परिक्रमण काल को सूर्य के बारह स्वरूपों में बांटा गया है।

१.- “चैत्र मास”
में सूर्य धाता रूप में रहते हैं जो आठ हजार किरणों के साथ तपते हैं। सूर्य रक्त वर्ण के होते हैं। सूर्य का यह स्वरूप महाकल्याणकारी है। अन्तर्मन के अन्धकार को दूर करने वाला है। चैत्र मास में सूर्य की उपासना का क्ल्याण करता है। आर्यावर्त्त में इस सूर्य का स्वरूप बड़ा ही मनोरम और किरणें शान्ति प्रदान करने वाली होती हैं।


२.- “वैशाख मास”
में सूर्य का आर्यमा रूप होता है जो दस सहस्त्र किरणों के साथ तपते हैं। इनका वर्ण पीत होता है। फलों के पेड़ों में नई पत्तियों दिखाई पड़ने लगती हैं। अन्न के पौधे पकने लगते हैं। किसानों के खुशहाली का दिन होता है। मनुष्य को अपने परिश्रम का फल मिलता प्रतीत होता है।

३. – “ज्येष्ठ मास” में भगवान सूर्य मित्र नाम से जाने जाते हैं। मित्र आदित्य सात सहस्त्र किरणों से तपते हैं। इनका अरुण वर्ण है। सूर्य का यह स्वरूप प्रकृति को रोग मुक्त करता है। रक्त दोष का नाश होता है। शरीर से दोष बाहर निकलता है और शरीर शोधन की क्रिया होती है।


४. –
“आषाढ़ मास ” में  
भगवान सूर्य वरूण रूप में होते हैं और इनका स्वरूप श्याम वर्ण का होता है। ज्येष्ठ मास का अवशोषित जल प्रकृति को सिंचित करने के लिए आषाढ़ मास में बादल का स्वरूप ले लेता है।

५. – “श्रावण मास” में सूर्य का नाम इन्द्र आदित्य है। ये सात सहस्त्र रश्मियों से तपते हैं और इनका वर्ण श्वेत है। प्रकृति हरियाली से आच्छादित हो जाती है। दरिद्रता का नाश होता है। सूखे हुए सरोवर जल से आच्छादित हो जाते हैं। सूर्य के इस इन्द्ररूप की सर्वत्र पूजा होती है।


६ . -“भाद्रपद मास”
में विवस्वान नामक आदित्य हैं। इनका वर्ण भूरा है।

७ . – “आश्विन मास” में पूषा आदित्य का स्वरूप है।


८ . – “
कार्तिक मास” में पर्जन्य आदित्य का रूप है। यह बहुत ही पवित्र मास है। गंगा स्नान और सूर्य को अर्ध्य प्रदान कर मनुष्य पापों से मुक्त होता है। मन पवित्र होकर भगवत अराधना की ओर प्रेरित होता है। सुख और शान्ति प्राप्त होती है। शरीर ऊर्जावान होता है।


९ . – “मार्गशीर्ष मास”
में सूर्य का स्वरूप अंशुमान सूर्य के रूप में होता है।

१० . – “पौष मास” में भग आदित्य के रूप में सूर्य पूजित होते हैं जो सौभाग्य प्रदान करने वाले होते हैं।


११ .  “माघ मास”
में सूर्य का स्वरूप त्वष्टा रूप में होता है जो मनुष्य में शिल्प कला का विकास करता है। मन को कलात्मक कार्यों की ओर प्रेरित करता है।


१२ . – “फाल्गुन मास”
में सूर्य विष्णु आदित्य के रूप में पूजित होते हैं। मनुष्य के जीवन में मोक्ष प्राप्ति की इच्छा सूर्य के इसी स्वरूप से प्राप्त होती है। यह रूप विष्णुलोक गमण का कारक है। अत: हम देखते हैं कि सूर्य उपासना धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष प्राप्त करने के लिए एक महासाधन है।

ताम्र पात्र में जल लेकर और फल और पुष्प से सूर्य को अर्ध्य प्रदान करने से सभी पापों से मुक्त होकर मनुष्य अपने जीवन को सुन्दर, कर्म को निश्चित फल देने वाला, धर्मावलम्बी और अन्त में ईश्वर के सानिध्य को प्राप्त कर सकता है। सूर्य प्रत्यक्ष ईश्वर के स्वरूप हैं, जो मन, कर्म, अर्थ और मोक्ष की कामना को सम्पुष्ट कर ईश्वर की सेवा का मार्ग प्रशस्त करते हैं। चाहे हम किसी वैज्ञानिक दृष्टिकोण की बात करें, कितना भी गहन अन्वेषण करें, ऊर्जा के इस विनिमय को कितना भी परमाणु संलयन का रूप दें, प्रत्यक्ष रूप में यह प्रमाणित होता है कि पृथ्वी पर जीवन तभी तक है जब तक सूर्य है। अत: सूर्य ही जीवन है। जीवन की सम्पूर्ण सार्थकता सूर्य के किरणों में ही समाहित है। क्यों न हम इनका नमन करें। कोई धार्मिक स्वरूप न भी दें तो भी सूर्य उपासना के योग्य हैं और पृथ्वी पर सम्पूर्ण जीवन-लीला के प्रणेता हैं। हर युग में हर काल में सूर्य श्रद्धेय हैं, पूजनीय हैं और आराध्य हैं।


“क्षं सूर्य जगतां नाथं ज्ञान विज्ञान मोक्षदम्।

महापापहरं देवं तं सूर्य प्रणामाम्यहम्॥”

जय-जय श्री राधे  

स्वास्तिक का महत्व

हिंदू धर्म में मांगलिक कार्य शुरू करने से पहले स्वास्तिक चिन्ह का रेखांकन किया जाता है, लेकिन वास्तुकला और शास्त्र में इसकी मान्यता तमाम देशों में बढ़ रही है.स्वस्तिक वास्तु का मूल चिह्न है.स्वस्तिक दिशाओं का ज्ञान करवाने वाला शुभ चिह्न है.बुरी नजर से बचाने व उसमें सुख-समृद्धि के वास के लिए घर के मुख्य द्वार के दोनों तरफ स्वस्तिक बनाया जाता है.

स्वास्तिक का भारतीय संस्कृति में बडा महत्व है.स्वस्तिक पॉजिटिव तथा नेगेटिव दो अलग-अलग शक्ति प्रवाहों के मेल को निरूपित करता है.

 

विघ्नहर्ता गणेश जी की उपासना धन, वैभव और ऎश्वर्य की देवी लक्ष्मी के साथ ही शुभ लाभ, और स्वास्तिक की पूजा का भी विधान है.विभिन्न प्रकार के सुख और समृद्धि का प्रतीक स्वास्तिक घर, द्वार, आंगन आदि में प्रत्येक शुभ एवं मांगलिक कार्य के आरम्भ बनाया जाता है

स्वास्तिक का अर्थ

इसे हमारे सभी व्रत, पर्व, त्यौहार, पूजा एवं हर मांगलिक अवसर पर कुंकुम से अंकित किया जाता है.यह मांगलिक चिन्ह अनादि काल से सम्पूर्ण सृष्टि में व्याप्त रहा है.स्वस्तिक का अर्थ इसका सामान्य अर्थ शुभ, मंगल एवं कल्याण करने वाला है.स्वास्तिक शब्द सु और अस धातु से बना है, सु का अर्थ है शुभ, मंगल और कल्याणकारी, अस का अर्थ है अस्तित्व में रहना.यह पूर्णतः कल्याणकारी भावना को दर्शाता है.


कब ,कैसे और कहाँ बनाये

मुख्य द्वार के ऊपर सिन्दूर से स्वस्तिक का चिह्न बनाना चाहिए. स्वास्तिक बनाने के लिए धन चिन्ह बनाकर उसकी चारों भुजाओं के कोने से समकोण बनाने वाली एक रेखा दाहिनी ओर खींचने से स्वास्तिक बन जाता है.रेखा खींचने का कार्य ऊपरी भुजा से प्रारम्भ करना चाहिए. इसमें दक्षिणवर्त्ती गति होती है. सदैव कुंकुम, सिन्दूर व अष्टगंध से ही अंकित करना चाहिए. यह चिह्न नौ अंगुल लम्बा व नौ अंगुल चौड़ा हो. स्वस्तिक 90 डिग्री के एंगल में सभी भुजाओं को बराबर रखते हुए बनाएँ. केसर से, कुमकुम से, सिन्दूर और तेल के मिश्रण से अनामिका अंगुली से घर में जहां-जहां वास्तुदोष हो, वहां यह चिह्न बनाया जा सकता है. दोनों रेखाओं के सिरों पर बायीं से दायीं ओर समकोण बनाती हुई रेखाएं इस तरह खींची जाती हैं कि वे आगे की रेखा को न छू सकें.

                                             वास्तुशास्त्र में स्वास्तिक

स्वस्तिक को किसी भी स्थिति में रखा जाए, उसकी रचना एक-सी ही रहेगी.स्वस्तिक के चारों सिरों पर खींची गयी रेखाएं किसी बिंदु को इसलिए स्पर्श नहीं करतीं, क्योंकि इन्हें ब्रह्माण्ड के प्रतीक स्वरूप अन्तहीन दर्शाया गया है.

 

देवताओं के चारों ओर घूमने वाले आभामंडल का चिह्न ही स्वास्तिक के आकार का होने के कारण इसे शास्त्रों में शुभ माना जाता है.तर्क से भी इसे सिद्ध किया जा सकता है.स्वास्तिक की गति और दिशा बाईं से दाईं ओर है.

 

पृथ्वी को गति प्रदान करने वाली ऊर्जा की भी यही दिशा है. उसका ऊर्जाचक्र प्रमुख स्रोत उत्तरायण से दक्षिणायण की ओर है., जिससे उसमें चुम्बकीय ऊर्जा व दिव्य शक्तियों का संचार रहे. वास्तुदोष दूर करने के लिए स्वस्तिक को बेहद उपयोगी माना गया है.

 

स्वास्तिक का प्रयोग कहा नहीं करना चाहिये 

स्वास्तिक का प्रयोग शुद्ध, पवित्र एवं सही ढंग से उचित स्थान पर करना चाहिए.शौचालय एवं गन्दे स्थानों पर इसका प्रयोग वर्जित है. ऐसा करने वाले की बुद्धि एवं विवेक समाप्त हो जाता है. दरिद्रता, तनाव एवं रोग एवं क्लेश में वृद्धि होती है.

इसके अपमान व गलत प्रयोग से बचना चाहिए.उलटा स्वास्तिक नहीं बनाना चाहिये और काली शक्तियों में काले रंग के स्वस्तिका का प्रयोग किया जाता है इसलिए काले रंग से नहीं बनाना चाहिये.

हिन्दू समाज में किसी भी शुभ संस्कार में स्वास्तिक का अलग-अलग तरीके से प्रयोग किया जाता है, बच्चे का पहली बार जब मुंडन संस्कार किया जाता है तो स्वास्तिक को बच्चे के सिर पर हल्दी रोली मक्खन को मिलाकर बनाया जाता है,

 

स्वास्तिक को सिर के ऊपर बनाने का अर्थ माना जाता है कि धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों पुरुषार्थों का योगात्मक रूप सिर पर हमेशा प्रभावी रहे, स्वास्तिक के अन्दर चारों भागों के अन्दर बिन्दु लगाने का मतलब होता है कि व्यक्ति का दिमाग केन्द्रित रहे, चारों तरफ भटके नही,

दैविक महत्व

स्वास्तिक 27 नक्षत्रों का सन्तुलित करके सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करता है.यह चिन्ह नकारात्मक ऊर्जा का सकारात्मक ऊर्जा में परिवर्तित करता है..

 

स्वास्तिक को धन-देवी लक्ष्मी का प्रतीक माना जाता है.स्वास्तिक की आकृति श्रीगणेश की प्रतीक है और विष्णु जी एवं सूर्यदेव का आसन मानी जाती है.

इसकी चारों दिशाओं के अधिपति देवताओं, अग्नि, इन्द्र, वरूण एवं सोम की पूजा हेतु एवं सप्तऋषियों के आशीर्वाद को प्राप्त करने में प्रयोग किया जाता है.

स्वास्तिक के प्रयोग से धनवृद्धि, गृहशान्ति, रोग निवारण, वास्तुदोष निवारण, भौतिक कामनाओं की पूर्ति, तनाव, अनिद्रा व चिन्ता से मुक्ति भी दिलाता है.

हल्दी से अंकित स्वास्तिक शत्रु शमन करता है.इसका भरपूर प्रयोग अमंगल व बाधाओं से मुक्ति दिलाता है.सभी देवताओं की प्रतिमा पर रोली का टीका लगाया जाता है.( लाल टीका तेजस्विता, पराक्रम, गौरव और यश का प्रतीक माना गया है.

 

लाल रंग प्रेम, रोमांच व साहस को दर्शाता है.यह रंग लोगों के शारीरिक व मानसिक स्तर को शीघ्र प्रभावित करता है.यह रंग शक्तिशाली व मौलिक है.यह रंग मंगल ग्रह का है जो स्वयं ही साहस, पराक्रम, बल व शक्ति का प्रतीक है.

 

यह सजीवता का प्रतीक है और हमारे शरीर में व्याप्त होकर प्राण शक्ति का पोषक है.मूलतः यह रंग ऊर्जा, शक्ति, स्फूर्ति एवं महत्वकांक्षा का प्रतीक है.स्वास्तिक लाल रंग से ही अंकित किया जाना चाहिए या बनाना चाहिए.गोबर और मिट्टी से बना स्वास्तिक भी मंगल कार्यो में बनाना चाहिए।

 

इसलिए जब भी कोई कार्य करे तब स्वास्तिक का चिन्ह जरुर बनाये .


“जय जय श्री राधे”

Shree Ji Barsana Mandal Trust (SJBMT)

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