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श्री राधे 

“श्रील नारायण भट्ट ज़ू जयति”

“श्री नारायण दास गोस्वामी जयति”

??आज की ब्रज रस धारा ??

दिनांक  04/05/2018

गौलोक धाम – परिचय

जब ये पृथ्वी दानवों असुरों के भार से पीड़ित हो गई तब गौ का रूप रखकर देवताओ के पास गई ,तब ब्रह्मा जी देवताओ को और शिव जी को लेकर,विष्णु जी के पास गए .

 

तब भगवान विष्णु जी ने कहा – भगवान श्रीकृष्ण ही अगणित ब्रह्मांडो के स्वामी है,उन्की कृपा के बिना यह कार्य कदापि सिद्ध नहीं होगा,आप लोग उनके धाम ही शीघ्र जाओ

 

तब ब्रह्मा जी ने कहा – प्रभु ! आपके अतिरिक्त कोई दूसरा भी परिपूर्णतम तत्व है यह हम नहीं जानते यदि दूसरा कोई भी परमेश्वर है तो उनके लोक का मुझे दर्शन कराइए.

तब भगवान विष्णु जी ने  सभी देवताओ को ब्रह्मांड शिखर पर विराजमान गौलोक धाम का मार्ग दिखलाया.

 

वामन जी के बाये पैर के अंगूठे से ब्रह्मांड के शिरोभाग का भेदन हो जाने पर जो छिद्र हुआ वह “ब्रहद्रव्”(नित्य अक्षय नीर ) से परिपूर्ण था. सब देवता उसी मार्ग से वहाँ के लिए नियत जलयान द्वारा बाहर निकले वहाँ ब्रह्मांड के ऊपर पहुँचकर उन सबने नीचे को ओर उस ब्रह्मांड को देखा इसके अतिरिक्त अन्य भी बहुत से ब्रह्मांड उसी जल में इन्द्रायण फल के सदृश इधर उधर लहरों में लुढक रहे थे, यह देखकर सब देवताओं को विस्मय हुआ वे चकित हो गए.

 

 

वहाँ से करोडो योजन ऊपर आठ नगर मिले जिनको चारो ओर दिव्य चाहरदीवारी शोभा बढ़ा  रही थी वही ऊपर  देवताओ ने विरजा नदी का सुन्दर तट देखा देवता उस उत्तम नगर में पहुँचे,जो अनन्तकोटि सूर्यो की ज्योति का महान पुंज जान पडता था, उसे देखकर देवताओ की आँखे चौधिया गई ओर वे उस तेज से पराभूत होकर जहाँ के तहां खड़े रह गए.

 

तब ब्रह्मा उस का ध्यान करने लगे. उसी ज्योति के भीतर उन्होंने एक परम शांतिमय साकार धाम देखा उसमे  परम अद्भुत कमलनाल के समान धवल-वर्ण हजारों मुख वाले शेष नाग का दर्शन करके सभी देवताओ ने उन्हें प्रणाम किया उन शेषनाग की गोद में महान “आलोकमय लोकवंदित गोलोकधाम” का दर्शन हुआ जहाँ धमाभिमानी देवताओ के ईश्वर और गणनाशीलो में प्रधान काल का भी कोई वश नहीं चलता.

 

वहाँ माया अपना प्रभाव नहीं डाल सकती, मन, चित्त, बुद्धि, अहंकार, सोलह विकार और महतत्व भी वहाँ प्रवेश नहीं कर सकते. फिर तीनो गुणों के विषय में तो कहना ही क्या.

वहाँ कामदेव के समान मनोहर रूप लावण्य शालिनी श्यामसुंदर विग्रहा श्रीकृष्ण पार्षदा द्वारपाल का कार्य करती थी. देवताओ के द्वार के भीतर जाने पर उन्होंने मना किया.

 

तब देवता बोले – हम सभी ब्रह्मा, विष्णु, शंकर, नाम के लोकपाल और इंद्र आदि देवता है. भगवान श्रीकृष्ण का दर्शन करने आये है.

देवताओ की बात सुनकर उन सखियों ने जो द्वारापालिकाएँ थी अन्तः पुर जाकर सारी बात कह सुनाई तब एक सखी जो “शतचन्द्रनना” नाम से विख्यात थी.

जिसके वस्त्र पीले थे, और जो हाथ में बेत की छड़ी लिए थी,उसने आने का प्रयोजन पूछा शतचन्द्रंनना  ने कहा – आप सब किस ब्रह्मांड के निवासी है बताईये ?

 

देवताओ ने कहा – बड़े आश्चर्य की बात है क्या अन्य भी ब्रह्मांड है हमने तो कभी नहीं देखा हम तो यही जानते है की एक ही ब्रह्मांड है ,दूसरा है ही नहीं.

 

शतचन्द्रंनना बोली – यहाँ तो “विरजा नदी” में करोडो ब्रह्मांड इधर-उधर लुढक रहे है. उनमे भी आप जैसे पृथक-पृथक देवता वास करते है. क्या आप लोग अपना नाम और गाँव नहीं जानते. जान पडता है कभी घर से बाहर नहीं निकले.

 

जैसे गुलर के फलो में रहने वाले कीड़े जिस फल में रहते है, उसके सिवा दूसरे को नहीं जानते,उसी प्रकार आप जैसे साधारण जन जिसमे उत्पन्न होते है एक मात्र उसी को ब्रह्मांड समझते है.

 

विष्णु भगवान ने कहा- जिस ब्रह्मांड में विराट रूपधारी वामन के  नख से ब्रहमांड में विवर बन गया था हम वही के निवासी है

 

फिर शतचन्द्रं नना अंदर गई और शीघ्र ही वापस आकर भीतर आने की आज्ञा देकर चली गई.

 

“जय जय श्री राधे “

 

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श्री राधे

“श्रील नारायण भट्ट ज़ू जयति”

“श्री नारायण दास गोस्वामी जयति”

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दिनांक 02/05/2018

 

घर में शोक, अशांति का निवास नहीं रहता – अशोक का वृक्ष

 

अशोक  के पेड़ को पवित्र माना जाता है.शोक-दु:ख को दूर करने के कारण ही संभवत: इसे अशोक नाम की उपमा दी गई है.भगवान राम ने खुद ही इसे शोक दूर करने वाले पेड़ की उपमा दी थी.

 

कामदेव के पंच पुष्प बाणों में एक अशोक भी है.कवियों ने भी इसकी महत्ता के बारे में खूब लिखा है.रावण ने सीता हरण के बाद उन्हें अशोक-वाटिका में ही रखा था.चूंकि यहां अशोक के पेड़ अधिक संख्या में थे, इसलिए इसे अशोक-वाटिका कहा गया है.

 

यहीं अशोक के पेड़ पर बैठकर हनुमान जी ने सीता माता के दर्शन किये थे.श्रद्धा, विश्वास, पवित्रता, शोक-निवारण आदि किया था. हुनमान जी ने अशोक वाटिका में पहले फल खाए फिर वाटिका उजाड़ दी,क्योकि  जब तक अशोक वाटिका रावण के महल में थी

 

तब तक वह बिना शोक किये आराम से रहता था हनुमान जी तो परम ज्ञानी और बुद्धिमान है,उन्होंने सोचा माता सीता हो हरण करने लाया और आराम से सो रहा है जब तक यह वाटिका नहीं उजड़ेगी तक तक ये रावण अशोक अर्थात बिना शोक के रहेगा ये सोचकर उन्होंने सारी कि सारी वाटिका उजाड़ डाली.

 

हिंदू समाज में काफी लोकप्रिय एवं लाभकारी है. अशोक का शब्दिक अर्थ है, किसी प्रकार का शोक न होना.अशोक का पेड़ जिस स्थान पर होता है.

 

वहां पर किसी प्रकार शोक व अशान्ति नहीं रहती है.मांगलिक एवं धार्मिक कार्यो में अशोक के पत्तों का प्रयोग किया जाता है.इस वृक्ष पर प्राकृतिक शक्तियों का विशेष प्रभाव रहता है.जिस कारण यह वृक्ष जिस जगह पर लगा होता है.

 

वहां पर सभी कार्य पूर्णतः निर्बाध रूप से सम्पन्न होते है.इसी कारण अशोक वृक्ष भारतीय समाज में काफ़ी प्रासंगिक है

 

          “श्री श्याम सुन्दर गोस्वामी जी ”

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राधे राधे

??आज की ब्रज रस धारा ??

दिनांक 01/05/2018

 

दर्शन करने मात्र से समस्त पापों का नाश हो जाता है तुलसी जी

तुलसी का प्रतिदिन दर्शन करने से पापों से मुक्ति मिलती है. यानी रोजाना तुलसी का पूजन करना मोक्षदायक माना गया है.यही नहीं तुलसीपत्र से पूजा करने से भी यज्ञ, जप, हवन करने का पुण्य प्राप्त होता है.

पर यह तभी संभव है, जब आप पूरी आस्था के साथ तुलसी जी की सेवा कर पाते हैं. पूजा का सही-विधान जानने के साथ-साथ तुलसी के प्रति आदर रखना भी जरूरी है.

 

पद्म पुराण में कहा गया है की नर्मदा दर्शन गंगा स्नान और तुलसी पत्र का संस्पर्श ये तीनो समान पुण्य कारक है वैसे तो प्रतिदिन तुलसी जी की सेवा पूजा की जाती है परन्तु सोमवती अमावस्या, कार्तिक शुक्ला एकादशी” पर तुलसी जी की विशेष पूजा की जाती है 

                         “दर्शनं नार्मदयास्तु गंगास्नानं विशांवर

                           तुलसी दल संस्पर्श: सम्मेत त्त्रयं”

ऐसा भी वर्णन आता है की जो लोग प्रातः काल में गत्रोत्थान पूर्वक अन्य वस्तु का दर्शन ना कर सर्वप्रथम तुलसी का दर्शन करते है उनका अहोरात्रकृत पातक सघ:विनष्ट हो जाता है.

पदम पुराण में कहा गया है –

तुलसी जी के दर्शन मात्र से सम्पूर्ण पापों की राशि नष्ट हो जाती है,उनके स्पर्श से शरीर पवित्र हो जाता है,उन्हे प्रणाम करने से रोग नष्ट हो जाते है,सींचने से मृत्यु दूर भाग जाती है,तुलसी जी का वृक्ष लगाने से भगवान की सन्निधि प्राप्त होती है,और उन्हे भगवान के चरणो में चढाने से मोक्ष रूप महान फल की प्राप्ति होती है.

 

अंत काल के समय ,तुलसीदल या आमलकी को मस्तक या देह पर रखने से नरक का द्वार , आत्मा के लिए बंद हो जाता है

 

धात्री फलानी तुलसी ही अन्तकाले भवेद यदि

मुखे चैव सिरास्य अंगे पातकं नास्ति तस्य वाई —

 

कार्तिक मास की  देव प्रबोधिनी एकादशी को तुलसी विवाह के रूप में मनाया जाता है.उस दिन तुलसी जी का विवाह शलिग्राम भगवान से किया जाता है. इसमें चमत्कारिक गुण मौजूद होते हैं. कार्तिक शुक्ल पक्ष की देवउठनी अथवा देवोत्थान एकादशी के साथ ही विवाह आदि मंगल कार्यों का आरम्भ हो जाता है.

 

प्रत्येक आध्यात्मिक कार्य में तुलसी की उपस्थिति बनी रहती है. वर्ष भर तुलसी का उपयोग होता है. सारे माहों में कार्तिक माह में तुलसी पूजन विशेष रुप से शुभ माना गया है.

वैष्णव विधि-विधानों में तुलसी विवाह तथा तुलसी पूजन एक मुख्य त्यौहार माना गया है. कार्तिक माह में सुबह स्नान आदि से निवृत होकर तांबे के बर्तन में जल भरकर तुलसी के पौधे को जल दिया जाता है.

 

संध्या समय में तुलसी के चरणों में दीपक जलाया जाता है. कार्तिक के पूरे माह यह क्रम चलता है. इस माह की पूर्णिमा तिथि को दीपदान की पूर्णाहुति होती है.

१. – गरुड़ पुराण में कहा गया है कि किसी के मुख मस्तक अथवा कर्णद्वय में तुलसी पत्र को देखकर यमराज अथवा उसके पापों को विदुरित कर देते है.तुलसी भक्षण करने से चंद्रायण, तप्तकृच्छ, ब्रह्कुर्त्य व्रत, से भी अधिक देह शुद्ध होती है.

२. – स्कंध पुराण में कहा गया है – स्वयं श्री विष्णु स्वर्णमय अथवा पद्म राग मनिमय यहाँ तक कि रत्न खचित विविध शुभ पुष्प को परित्याग करके तुलसी पत्र ग्रहण करते है व्याध भी यदि तुलसी पत्र भक्षण करके देह त्याग करता है तो उसके देह्स्थ पाप भस्मीभूत हो जाते है.

 

जिस प्रकार शुक्ल और कृष्ण वर्ण जल अर्थात गंगा और यमुना का जल पातक को विनष्ट करता है उसी प्रकार रामा और श्यामा तुलसी पत्र भक्षण से सर्वभिलाषा सिद्ध होती है .


३. – 
जैसे अग्नि समस्त वन को जला देती है उसी प्रकार तुलसी भक्षण समस्त पापों को जला देता है.अमृत से आवला और तुलसी श्री हरि की वल्लभा है इनदोनो के स्मरण कीर्तन ध्यान और भक्षण करने से समस्त कामनाये पूर्ण होती है

 

४. – मृत्यु काल के समय मुख मस्तक और शरीर में आमलकी की फल और तुलसी पत्र विघमान हो तो कभी भी उसकी दुर्गति नहीं हो सकती. यदि कोई मानव पाप लिप्त होता है और कभी पुण्य अर्जन नहीं किया तो वह भी तुलसी भक्षण करके मुक्त हो जाता है.स्वयं भगवान ने कहा है कि शरीर त्याग करने से पूर्व यदि मुख में तुलसी पत्र डाल दिया जाये तो वह मेरे लोक में जाता है.

 

५. – ऐसा भी वर्णन आता है कि द्वादशी तिथि में उपवास करने पर दिन में  पारण करते समय तुलसी पत्र भक्षण करने से अष्ट अश्वमेघ यज्ञानुष्ठान का फल मिल जाता है.

                                 तुलसी दल और मंजरी चयन समय कुछ बातों का ख्याल रखें

१ . – तुलसी की मंजरी सब फूलों से बढ़कर मानी जाती है। मंजरी तोड़ते समय उसमें पत्तियों का रहना भी आवश्यक माना गया है। तुलसी का एक-एक पत्ता तोड़ने के बजाय पत्तियों के साथ अग्रभाग को तोड़ना चाहिए. यही शास्त्रसम्मत भी है.प्राय: पूजन में बासी फूल और पानी चढ़ाना निषेध है, पर तुलसीदल और गंगाजल कभी बासी नहीं होते। तीर्थों का जल भी बासी नहीं होता।

२ .  – निम्न मंत्र को बोलते हुए पूज्यभाव से तुलसी के पौधे को हिलाए बिना तुलसी के अग्रभाग को तोडे़. इससे पूजा का फल कई गुना बढ़ जाता है.

 

तुलस्यमृतजन्मासि सदा त्वं केशवप्रिया। 

चिनोमि केशवस्यार्थे वरदा भव शोभने।। 

त्वदंगसंभवै: पत्रै: पूजयामि यथा हरिमृ। 

  तथा कुरु पवित्रांगि! कलौ मलविनाशिनि।।

 


३.  – 
 ब्रह्म वैवर्त पुराण में श्री भगवान तुलसी के प्रति कहते है – पूर्णिमा, अमावस्या , द्वादशी, सूर्यसंक्राति , मध्यकाल रात्रि दोनों संध्याए अशौच के समय रात में सोने के पश्चात उठकर, स्नान किए बिना,शरीर के किसी भाग में तेल लगाकर जो मनुष्य तुलसी दल चयन करता है वह मानो श्रीहरि के मस्तक का छेदन करता है.

 

४. – द्वादशी तिथि को तुलसी चयन कभी ना करे, क्योकि तुलसी भगवान कि प्रेयसी होने के कारण हरि के दिन -एकादशी को निर्जल व्रत करती है.अतः द्वादशी को शैथिल्य,दौबल्य के कारण तोडने पर तुलसी को कष्ट होता है.

५. – तुलसी चयन करके हाथ में रखकर पूजा के लिए नहीं ले जाना चाहिये शुद्ध पात्र में रखकर अथवा किसी पत्ते पर या टोकरी में रखकर ले जाना चाहिये.

इतने निषिद्ध दिवसों में तुलसी चयन नहीं कर सकते,और बिना तुलसी के भगवत पूजा अपूर्ण मानी जाती है अतः वारह पुराण में इसकी व्यवस्था के रूप में निर्दिष्ट है कि निषिद्ध काल में स्वतः झडकर गिरे हुए तुलसी पत्रों से पूजन करे.और अपवाद स्वरुप शास्त्र का ऐसा निर्देश है कि शालग्राम कि नित्य पूजा के लिए निषिद्ध तिथियों में भी तुलसी दल का चयन किया जा सकता है.

 

          “श्री श्याम सुन्दर गोस्वामी जी ”

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राधे राधे

??आज की ब्रज रस धारा ??

दिनांक 29/04/2018

 

दरिद्रता दुर्भाग्य का नाश करता है – पीपल का वृक्ष

पुराणों में पीपल के वृक्ष के महत्व का विस्तार से वर्णन किया गया है. आध्यात्मिक ही नहीं पीपल के वृक्ष का वैज्ञानिक भी महत्व है.

* प्रात:स्नान के बाद पीपल का स्पर्श करने से व्यक्ति के समस्त पाप भस्म हो जाते है, और लक्ष्मी की प्राप्ति होती है. पीपल वृक्ष की नित्य तीन बार परिक्रमा करने और जल चढाने पर दरिद्रता, दु:ख और दुर्भाग्य का विनाश होता है और आयु में वृद्धि होती है.

* अश्वत्थ वृक्ष को दूध, नैवेद्य, धूप, दीप,फल-फूल, अर्पित करने से मनुष्य को समस्त सुख वैभव की प्राप्ति होती है.

* पीपल की जड़ के निकट बैठकर जो जप, दान, होम, स्तोत्रपाठ, व अनुष्ठान किया जाता है उनका फल अक्षय होता है.

*जड़ से ऊपर तक का तना नारायण कहा गया है और ब्रह्मा, विष्णु, महेश ही इसकी शाखाओ के रूप में स्थित है. पीपल के पत्ते संसार के प्राणियों के समान है. प्रत्येक वर्ष नए पत्ते निकलते है पतझड़ होता, मिट जाते है, फिर नए पत्ते निकलते है, यही जन्म-मरण का चक्र है.

* पीपल के नीचे किया गया दान अक्षय होकर जन्म-जन्मातर तक फलदायी होता है जिस प्रकार संसार में गौ ब्राह्मण व देवता पूजित है उसी प्रकार पीपल भी पूजा के योग्य है पीपल को रोपने से धन रक्षा करने से पुत्र स्पर्श करने से स्वर्ग और पूजने से मोक्ष की प्राप्ति होती है.

भगवद्गीता में भगवान से कहते हैं – अश्वत्थ: सर्ववृक्षाणाम् (अर्थात् समस्त वृक्षों में मैं पीपल का वृक्ष हूं) कहकर पीपल को अपना स्वरूप बताया है.स्वयं भगवान ने उसे अपनी उपमा देकर पीपल के देवत्व और दिव्यत्व को व्यक्त किया है.

 

इसलिए धर्मशास्त्रों में पीपल के पत्तों को तोडना, इसको काटना या मूल सहित उखाड़ना वर्जित माना गया है. जो व्यक्ति पीपल को काटता है या हानि पहुँचता है उसे एक कल्प तक नरक भोगकर चंडाल की योनि में जन्म लेना पडता है.

रात में पीपल की पूजा को निषिद्ध माना गया है. क्योंकि ऐसा माना जाता है कि रात्री में पीपल पर दरिद्रता बसती है और सूर्योदय के बाद पीपल पर लक्ष्मी का वास माना गया है. वैज्ञानिक दृष्टि से भी पीपल का महत्तव है. पीपल ही एकमात्र ऎसा वृक्ष है जो रात-दिन ऑक्सीजन देता है.

          “श्री श्याम सुन्दर गोस्वामी जी ”

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राधे राधे

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दिनांक 28/04/2018

 

जिसकी उत्पत्ति भगवान विष्णु के मुख से हुई – आंवले का वृक्ष

पुराणों में आंवले के वृक्ष को परम पवित्र तथा भगवान विष्णु को अत्यन्त प्रिय कहा गया है जिस घर में आंवले का पेड़ होता है उस में भूत ,प्रेत ,दैत्य व राक्षस का प्रवेश नहीं होता तथा उसकी छाया में किया गया दीप दान अनंत पुण्य फल प्रदान करने वाला होता है .

 

आँवले के वृक्ष की पूजा “कार्तिक मास में आँवला नवमी “को की जाती है.

                                  आंवले के वृक्ष की उत्पत्ति

विष्णु पुराण के अनुसार एक बार भगवान विष्णु के थूकने के फलस्वरुप उनके मुख से चन्दमा का जैसा एक बिन्दू प्रकट होकर पृ्थ्वी पर गिरा.

 

उसी बिन्दू से आमलक अर्थात आंवले के महान पेड की उत्पति हुई. यही कारण है कि विष्णु पूजा में इस फल का प्रयोग किया जाता है.

 

श्रीविष्णु के श्री मुख से प्रकट होने वाले आंवले के वृ्क्ष को सर्वश्रेष्ठ कहा गया है. इस फल के महत्व के विषय में कहा गया है, कि इस फल के स्मरणमात्र से गऊ दान करने के समान फल प्राप्त होता हे. यह फल भगवान विष्णु जी को अत्यधिक प्रिय है. इस फल को खाने से तीन गुणा शुभ फलों की प्राप्ति होती है.

 

 

आंवले के द्वारा एक चंडाल की मुक्ति 

एक चंडाल शिकार कहलने के लिए वन में गया वहाँ अनेको मरगो और पक्षियों को मरकर जब वह भूख-प्यास से अत्यंत पीड़ित हो गया तब सामने ही उसे एक आंवले का वृक्ष दिखायी दिया. उसमे खूब मोटे-मोटे फल लगे थे.

 

चंडाल साहस वृक्ष के ऊपर चढ गया और उसके उत्तम-उत्तम फल खाने लगा प्रारब्ध वश वह वृक्ष के शिखर से पृथ्वी पर गिर पड़ा और वेदना से व्यथित होकर इस लोक से चल बसा.

फिर सम्पूर्ण प्रेत, राक्षस, भूतगण और यमराज के सेवक बड़ी प्रसन्नता के साथ वहाँ आये किन्तु उसे ले न जा सके, यधपि वे महान बलवान थे तथापि उस मृतक चंडाल कि ओर आँख उठाकर देख भी नहीं सकते थे. जब कोई उसे पकड़कर ले जा न सका. तब वे अपनी असमर्थता देख मुनियों के पास


जाकर बोले –
हे महर्षियो!  चंडाल तो बड़ा पापी था फिर क्या कारण है कि हमलोग और ये यमराज के सेवक उसकी ओर देख भी न सके. क्यों ओर किसके प्रभाव से वह सूर्य कि भांति दुष्प्रेक्ष्य हो गया है?और हमें उसकी ओर दृष्टिपात करना भी कठिन जान पडता.

 

मुनियों ने कहा – हे प्रेत गण ! इस चंडाल ने आँवले के पके हुए फल खाए थे, उसकी डाल टूट जाने से उसके समपर्क में ही इसकी मृत्यु हुई है. मृत्यु काल में इसके आस-पास बहुत से फल बिखरे पड़े थे इन्ही कारणों से आप इसकी ओर देख भी नहीं सके ऑर रविवार आदि निषिद्ध बेला में भी नहीं हुआ इसलिए यह दिव्य लोक को प्राप्त होगा.

 

आंवले का प्रयोग एवम महत्व 

आंवले के सेवन से आयु में वृद्धि ,उसका जल पीने से धर्म का संचय तथा उसके जल में स्नान करने से दरिद्रता दूर हो कर समस्त ऐश्वर्यों की प्राप्ति होती है.आंवले के दर्शन ,स्पर्श एवम उसके नाम के उच्चारण से ही श्री विष्णु प्रसन्न हो जाते है. एकादशी तिथि में भगवान् विष्णु को आंवला अर्पित करने पर सभी तीर्थों के स्नान का फल मिल जाता है .

एकादशी के दिन यदि एक ही आँवला मिल जाए तो उसके सामने गंगा गया कशी और पुष्कर आदि तीर्थ कोई विशेष महत्व नहीं रखते है.

 

एकादशी को आंवले से स्नान करता है उसके सब पाप नष्ट हो जाते है जिस घर में आंवले का वृक्ष या उसका फल रहता है उसमे लक्ष्मी एवम विष्णु का वास होता है. आंवले के रस में स्नान करने पर दुष्ट एवम पाप ग्रहों का प्रभाव नहीं होता .

 

मृत्यु काल में जिसके मुख ,नाक कान या बालों में आंवले का फल रखा जाता है वह व्यक्ति विष्णु लोक को जाता है. सर के बाल नित्य आंवला मिश्रित जल से धोने पर कलियुग के दोषों का नाश होता है .कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को आंवले के वृक्ष का पूजन व प्रदक्षिणा करने से भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है.

 


इन तिथियो में उपयोग वर्जित है –
 रविवार, सप्तमी को, सूर्य-चन्द्र ग्रहण , सक्रांति , शुक्रवार , षष्टी, प्रतिपदा, नवमी तिथि, एवम अमावस्या तिथि को आंवले का त्याग करना चाहिए.

 

          “श्री श्याम सुन्दर गोस्वामी जी ”

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राधे राधे

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दिनांक 26/04/2018

 

शालिग्राम का स्वरूप और महिमा का वर्णन

शालिग्राम का स्वरूप और महिमा का वर्णन

1. – जिस शालिग्राम-शिला में द्वार-स्थान पर परस्पर सटे हुए दो चक्र हों, जो शुक्ल वर्ण की रेखा से अंकित और शोभा सम्पन्न दिखायी देती हों, उसे भगवान “श्री गदाधर का स्वरूप” समझना चाहिये.

2.- “संकर्षण मूर्ति” में दो सटे हुए चक्र होते हैं, लाल रेखा होती है और उसका पूर्वभाग कुछ मोटा होता है.

3.-  “प्रद्युम्न” के स्वरूप में कुछ-कुछ पीलापन होता है और उसमें चक्र का चिह्न सूक्ष्म रहता है.


4. – “अनिरुद्ध की मूर्ति”
गोल होती है और उसके भीतरी भाग में गहरा एवं चौड़ा छेद होता है; इसके सिवा, वह द्वार भाग में नीलवर्ण और तीन रेखाओं से युक्त भी होती है.

5. – “भगवान नारायण” श्याम वर्ण के होते हैं, उनके मध्य भाग में गदा के आकार की रेखा होती है और उनका नाभि-कमल बहुत ऊँचा होता है.

6. – “भगवान नृसिंह” की मूर्ति में चक्र का स्थूल चिह्न रहता है, उनका वर्ण कपिल होता है तथा वे तीन या पाँच बिन्दुओं से युक्त होते हैं. ब्रह्मचारी के लिये उन्हीं का पूजन विहित है. वे भक्तों की रक्षा करनेवाले हैं.

7. – जिस शालिग्राम-शिला में दो चक्र के चिह्न विषम भाव से स्थित हों, तीन लिंग हों तथा तीन रेखाएँ दिखायी देती हों, वह “वाराह भगवान का स्वरूप” है, उसका वर्ण नील तथा आकार स्थूल होता है.

8.-  “कच्छप” की मूर्ति श्याम वर्ण की होती है. उसका आकार पानी की भँवर के समान गोल होता है. उसमें यत्र-तत्र बिन्दुओं के चिह्न देखे जाते हैं तथा उसका पृष्ठ-भाग श्वेत रंग का होता है.

9. – “श्रीधर की मूर्ति” में पाँच रेखाएँ होती हैं,

10.- “वनमाली के स्वरूप” में गदा का चिह्न होता है.

11. – गोल आकृति, मध्यभाग में चक्र का चिह्न तथा नीलवर्ण, यह “वामन मूर्ति” की पहचान है.

12.- जिसमें नाना प्रकार की अनेकों मूर्तियों तथा सर्प-शरीर के चिह्न होते हैं, वह भगवान “अनन्त की” प्रतिमा है.

13. – “दामोदर” की मूर्ति  स्थूलकाय एवं नीलवर्ण की होती है. उसके मध्य भाग में चक्र का चिह्न होता है. भगवान दामोदर नील चिह्न से युक्त होकर संकर्षण के द्वारा जगत की रक्षा करते हैं.

14. – जिसका वर्ण लाल है, तथा जो लम्बी-लम्बी रेखा, छिद्र, एक चक्र और कमल आदि से युक्त एवं स्थूल है, उस शालिग्राम को “ब्रह्मा की मूर्ति” समझनी चाहिये.

15. – जिसमें बृहत छिद्र, स्थूल चक्र का चिह्न और कृष्ण वर्ण हो, वह “श्रीकृष्ण का स्वरूप” है. वह बिन्दुयुक्त और बिन्दुशून्य दोनों ही प्रकार का देखा जाता है.

16. – “हयग्रीव मूर्ति” अंकुश के समान आकार वाली और पाँच रेखाओं से युक्त होती है.

17. – “भगवान वैकुण्ठ” कौस्तुभ मणि धारण किये रहते हैं. उनकी मूर्ति बड़ी निर्मल दिखायी देती है. वह एक चक्र से चिह्नित और श्याम वर्ण की होती है.

18. – “मत्स्य भगवान” की मूर्ति बृहत कमल के आकार की होती है. उसका रंग श्वेत होता है तथा उसमें हार की रेखा देखी जाती है.

19.- जिस शालिग्राम का वर्ण श्याम हो, जिसके दक्षिण भाग में एक रेखा दिखायी देती हो तथा जो तीन चक्रों के चिह्न से युक्त हो, वह भगवान “श्रीरामचंद्र जी” का स्वरूप है, वे भगवान सबकी रक्षा करनेवाले हैं.

20. – द्वारिका पुरी में स्थित शालिग्राम स्वरूप “भगवान गदाधर” को नमस्कार है, उनका दर्शन बड़ा ही उत्तम है.भगवान गदाधर एक चक्र से चिह्नित देखे जाते हैं.


21.- “लक्ष्मीनारायण”
दो चक्रों से,


22. – “त्रिविक्रम”
तीन से,


23.- “चतुर्व्यूह”
चार से,


24. – “वासुदेव”
पाँच से,


25.- “प्रद्युम्न”
छ: से,


26. – “संकर्षण”
सात से,


27. – “पुरुषोत्तम”
आठ से,


28.- “नवव्यूह”
नव से,


29. –  “दशावतार”
दस से,

 

 

          “श्री श्याम सुन्दर गोस्वामी जी ”

      सेवाधिकारी श्री राधा रानी मन्दिर बरसाना 

          श्री जी बरसाना मण्डल ट्रस्ट (रजि०)

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राधे राधे

??आज की ब्रज रस धारा ??

दिनांक 25/04/2018

 

शालिग्राम पूजा महात्म्य

भक्तो की अनेक प्रकार की इच्छाये अपने ठाकुर जी के प्रति होती है, किसी भक्त ने इच्छा की, कि भगवान सगुण साकार बनकर आये तो भगवान राम, कृष्ण का रूप लेकर आ गये.

 

किसी भक्त ने कहा मेरे बेटे के रूप में आये तो भगवान कश्यप अदिति के पुत्र के रूप में आ गए किसी भक्त कि इच्छा हुई कि भगवान मेरे सखा बनकर आये, तो वृंदावन में सखा बनकर ग्वाल बाल के साथ खेलने लगे.

 

किसी कि भगवान के साथ लडने की इच्छा हुई तो भगवान ने उसके साथ युद्ध किया. इसी प्रकार किसी भक्त की भगवान को खाने की इच्छा हुई तो भगवान शालिग्रामके रूप में प्रकट हो गए.

 

जो नेपाल में पहाडो के रूप में होते है वहाँ एक विशेष प्रकार के कीड़े उन पहाडो को खाते है और वह पहाड़ टूट टूटकर टुकडो के रूप में गंडकी नदी में गिरते जाते है. नेपाल में गंडकी नदी के तल में पाए जाने वाले काले रंग के चिकने, अंडाकार पत्थर को शालिग्राम कहते हैं.

 

इसमें एक छिद्र होता है तथा पत्थर के अंदर शंख, चक्र, गदा या पद्म खुदे होते हैं. कुछ पत्थरों पर सफेद रंग की गोल धारियां चक्र के समान होती हैं. इस पत्थर को भगवान विष्णु का रूप माना जाता है तथा इसकी पूजा भगवान शालिग्राम के रूप में की जाती है.

 

पुराणों में तो यहां तक कहा गया है कि जिस घर में भगवान शालिग्राम हो, वह घर समस्त तीर्थों से भी श्रेष्ठ है. इसके दर्शन व पूजन से समस्त भोगों का सुख मिलता है.

 

भगवान शिव ने भी स्कंदपुराण के कार्तिक माहात्मय में भगवान शालिग्राम की स्तुति की है. प्रति वर्ष कार्तिक मास की द्वादशी को महिलाएं प्रतीक स्वरूप तुलसी और भगवान शालिग्राम का विवाह कराती हैं.

तुलसी दल से पूजा करता है,ऐसा कहा जाता है कि पुरुषोत्तम मास में एक लाख तुलसी दल से भगवान शालिग्राम की पूजा करने से वह संपूर्ण दान के पुण्य तथा पृथ्वी की प्रदक्षिणा के उत्तम फल का अधिकारी बन जाता है.

 

ऐसा कहा जाता है कि पुरुषोत्तम मास में एक लाख तुलसी दल से भगवान शालिग्राम की पूजा करने से समस्त तीर्थो का फल मिल जाता है मृत्युकाल में इसका जलपान करने वाला समस्त पापों से मुक्त होकर बैकुंठ की प्राप्ति करता है

  सदना कसाई का प्रसंग 

एक सदना नाम का कसाई था,मांस बेचता था पर भगवत भजन में बड़ी निष्ठा थी एक दिन एक नदी के किनारे से जा रहा था रास्ते में एक पत्थर पड़ा मिल गया.

 

उसे अच्छा लगा उसने सोचा बड़ा अच्छा पत्थर है क्यों ना में इसे मांस तौलने के लिए उपयोग करू. उसे उठाकर ले आया.और मांस तौलने में प्रयोग करने लगा.

 

जब एक किलो तौलता तो भी सही तुल जाता, जब दो किलो तौलता तब भी सही तुल जाता, इस प्रकार चाहे जितना भी तौलता हर भार एक दम सही तुल जाता, अब तो एक ही पत्थर से सभी माप करता और अपने काम को करता जाता और भगवन नाम लेता जाता.

 

एक दिन की बात है उसी दूकान के सामने से एक ब्राह्मण निकले ब्राह्मण बड़े ज्ञानी विद्वान थे उनकी नजर जब उस पत्थर पर पड़ी तो वे तुरंत उस सदना के पास आये और गुस्से में बोले ये तुम क्या कर रहे हो क्या तुम जानते नहीं जिसे पत्थर समझकर तुम तौलने में प्रयोग कर रहे हो वे शालिग्राम भगवान है इसे मुझे दो जब सदना ने यह सुना तो उसे बड़ा दुःख हुआ और वह बोला हे ब्राह्मण देव मुझे पता नहीं था कि ये भगवान है मुझे क्षमा कर दीजिये.और शालिग्राम भगवान को उसने ब्राह्मण को दे दिया.

 

 

ब्राह्मण शालिग्राम शिला को लेकर अपने घर आ गए और गंगा जल से उन्हें नहलाकर, मखमल के बिस्तर पर, सिंहासन पर बैठा दिया, और धूप, दीप,चन्दन से पूजा की.

 

जब रात हुई और वह ब्राह्मण सोया तो सपने में भगवान आये और बोले ब्राह्मण मुझे तुम जहाँ से लाए हो वही छोड आओं मुझे यहाँ अच्छा नहीं लग रहा. इस पर ब्राह्मण बोला भगवान ! वो कसाई तो आपको तुला में रखता था जहाँ दूसरी ओर मास तौलता था उस अपवित्र जगह में आप थे.

 

भगवान बोले – ब्रहमण आप नहीं जानते जब सदना मुझे तराजू में तौलता था तो मानो हर पल मुझे अपने हाथो से झूला झूला रहा हो जब वह अपना काम करता था तो हर पल मेरे नाम का उच्चारण करता था.हर पल मेरा भजन करता था जो आनन्द मुझे वहाँ मिलता था वो आनंद यहाँ नहीं.

 

इसलिए आप मुझे वही छोड आये.तब ब्राह्मण तुरंत उस सदना कसाई के पास गया ओर बोला मुझे माफ कर दीजिए.वास्तव में तो आप ही सच्ची भक्ति करते है.ये अपने भगवान को संभालिए.

सार

भगवान बाहरी आडम्बर से नहीं भक्त के भाव से रिझते है.उन्हें तो बस भक्त का भाव ही भाता है.

“जय जय श्री राधे “

 

          “श्री श्याम सुन्दर गोस्वामी जी ”

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राधे राधे

??आज की ब्रज रस धारा ??

दिनांक 23/04/2018

 

बाबा माधव दास जी का लीला स्फुरण – वाह! पट्ठे तैने आनंद कर दियौ.

एक बार बाबा माधव दास जी महाराज गोवर्धन की परिक्रमा करते-करते गोविंद कुंड पर चले आये. यहां पर्वत के ऊपर गाय, हिरन आदि पशु घूम रहे थे.

 

माधव दास जी महाराज वन और पर्वतों के बीच में गोविंद कुण्ड के तट पर बैठ गए. थोड़ी देर बाद पद्मासन लगाकर ध्यान मग्न हो गए. एक सुंदर लीला का स्फुरण हुआ.

श्यामसुंदर एक विचित्र वेश धारण किए हुए चंचल साखाओं के साथ खेल रहे हैं. एक और श्याम सुंदर पीतांबर की कमर में फेंट कसे हुए मनसुखा, श्रीदामा आदि के संग है.

 

दूसरी और दाऊ दादा सुबल,सुदामा आदि सखाओं के संग विराजमान है. कबड्डी का खेल प्रारंभ हुआ. कभी श्याम सुंदर हार जाते .कभी बलराम जी हार जाते.

इस प्रकार खेल चल रहा था. श्रीदामा बलराम जी को हराने के लिए चला, बहुत प्रयास किया लेकिन बलराम जी को हरा नहीं सका . तब श्यामसुंदर मनसुखा के पास आकर उसकी पीठ पर हाथ मारते हुए कहा -मेरे शेर ! जा अब की बार दाऊ दादा को हराकर ही आना.

मनसुखा कबड्डी -कबड्डी कहता हुआ श्री बलरामजी में फारे में गया. दारु दादा ने अपने सखाओ से कहा- घेर ले सारे कूँ! बचकै नहिं जानौ चाहिए .

 

सभी सखाओं ने चारों तरफ से मनसुखा को घेर लिया. दाऊ दादा ने थोड़ा झुक कर मनसुखा के पैरों को पकड़कर अपनी ओर खींचा तो मनसुखा धड़ाम से नीचे गिर पड़ा. बाकी सखा मनसुखा के ऊपर चढ़ गए.

मनसुखा फारे की लकीर को छूने के लिए अपने दाहिने हाथ को आगे बढ़ाने लगा. दाऊ दादा ने परिक्र मनसुखा को फारे के अंदर खींचने का प्रयास कर रहे हैं और मनसुखा ताकत लगाकर फारे की लकीर को छूने का प्रयास कर रहा है.

 

तभी श्यामसुंदर अपने फारे में लकीर के पास आकर घुटनों के बल बैठकर मनसुखा का उत्साह बढ़ाने लगे.

श्यामसुंदर कह रहे हैं – शाबास! मनसुखा नैक कसर रह गई है, थोरो सो और जोर लगा, सोई काम बन जायेगो. मनसुखा ने पूरी ताकत लगाय कै अंतिम प्रयास कियो और फारे की लकीर को छू लियौ.

श्यामसुंदर इतने प्रमुदित भयै कि जमीन ते ऊपर उछल पड़े और बोले – वाह! पट्ठे तैने आनंद कर दियौ.

 

बाबा जी सब लीला देख रहे थे. बाबा भी वाह पट्ठे कहकर उछल पड़े. लीला का विश्राम हुआ, तो बाबा ने आंखें खोली. बाबा अचंभित रह गए.

उसी दिन से बाबा बात -बात में वाह पट्ठे कहने लगे. श्याम सुंदर की वह मधुर वाणी हृदय में बस गई थी. कोई भी थोड़ा सा अच्छा काम कर देता तो बाबा सहज भी बोल पड़ते थे- वाह! पट्ठे तैने आनंद कर दियौ.

 

          “श्री श्याम सुन्दर गोस्वामी जी ”

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राधे राधे

?☘आज की ब्रज रस धारा ☘?

दिनांक 22/04/2018

 

संत पनहियाँ की महिमा

एक बार गोस्वामी तुलसीदास जी वृन्दावन के कालीदह के निकट रामगुलेला के स्थान में रुके थे. उस समय वृन्दावन भक्तमाल ग्रन्थ के रचियता परम भागवत नाभा जी भी वृंदावन में  निवास कर रहे थे.

 

एक दिन श्री नाभा जी ने वृंदावन के   समस्त संत वैष्णवों के लिए विशाल भंडारे का आयोजन किया.सब जगह भंडारे की चर्चा थी.

तुलसीदास उस समय वृन्दावन में ही ठहरे थे , पर वे ऐसे भंडारों में विशेष रुचि नहीं रखते थे.उनका विचार वहाँ जाने का नहीं था.

 

किन्तु श्री नाभा जी के भंडारे में संत श्रीतुलसी दास जी की उपस्थिति को आवश्यक जानकर, श्रीगोपेश्वर महादेव जी ने स्वयं जाकर उन्हें भंडारे में जाने का अनुरोध किया.

 

तब श्री तुलसी दास जी ने श्री नाभा जी की महिमा को जाना और श्री महादेव जी की कृपा का भी अनुभव किया.

तुलसीदास जी ने भगवान शंकर की आज्ञा का पालन किया और नाभा जी के भंडारे में जाने के लिया चल दिए, जब गोस्वामी जी वहाँ पहुंचे तो थोडा बिलम्ब हो गया था,

 

संतो की पंक्ति बैठ चुकी थी,स्थान खचा खच भरा हुआ था. गोस्वामी जी एक ओर जहाँ संतो की पनहियाँ (जूतियाँ)रखी थी,वही बैठ गए.

अब परोसने वाले ने पत्तल रख दी ओर परोसने वाले ने आकर पुआ, साग, लड्डू, परोस दिए, जब खीर परसने वाला आया तो वह बोला – बाबा! तेरो कुल्ल्हड़ कहाँ है? खीर किसमे लोगे?

श्री गोस्वामी जी ने पास में पड़ी एक संत की पनहियाँ आगे कर दी- और बोले – लो इसमें खीर डाल दो’

तो वो परोसने वाला तो क्रोधित को उठा बोला – बाबा! पागल होए गयो है का इसमें खीर लोगे?उलटी सीधी सुनाने लगा संतो में हल चल मच गई श्री नाभा जी वहाँ दौड़े आये गोस्वामी जी को देखते ही उनके चरणों पर गिर पड़े सर्व वन्ध महान संत के ऐसे दैन्य को देखकर सब संत मंडली अवाक् रह गई सबने उठकर प्रणाम किया उस परोसने वाले ने तो शतवार क्षमा प्रार्थना की.

 

          “श्री श्याम सुन्दर गोस्वामी जी ”

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राधे राधे

??आज की ब्रज रस धारा ??

दिनांक 15/04/2018

 

राधा जी के सोलह नाम

ब्रह्म वैवर्त पुराण में नारद जी ने राधा जी के नाम इस प्रकार है –
 

 राधा , रासेश्वरी, रासवासिनी, रसिकेश्वरी,  कृष्णप्राणाधिका, कृष्णप्रिया, कृष्णस्वरूपिणी ,   कृष्णवामाङ्गसम्भूता परमान्दरूपिणी, कृष्णा, वृन्दावनी, वृन्दा, वृन्दावनविनोदिनी , चन्द्रावली, चन्द्रकान्ता, शतचन्द्रप्रभानना, 

 

१. राधा  – राधेत्येवं च संसिद्धौ राकारो दानवाचकः स्वयं निर्वाणदात्री या सा राधा परिकीर्तिता

. रासेश्वरी – रासेसेश्वरस्य पत्नीयं तेन रासेश्वरी स्मृता रासे च वासो यस्याश्च तेन सा रासवासिनी

३. रासवासिनी – रासेसेश्वरस्य पत्नीयं तेन रासेश्वरी स्मृता रासे च वासो यस्याश्च तेन सा रासवासिनी

४. रसिकेश्वरी – सर्वासां रसिकानां च देवीनामीश्वरी परा प्रवदन्ति पुरा सन्तस्तेन तां रसिकेश्वरीम्

५. कृष्णप्राणाधिका  –प्राणाधिका प्रेयसी सा कृष्णस्य परमात्मनः  कृष्णप्राणाधिका सा च कृष्णेन परिकीर्तिता

६. कृष्णप्रिया –कृष्णास्यातिप्रिया कान्ता कृष्णो वास्याः प्रियः सदा सर्वैर्देवगणैरुक्ता तेन कृष्णप्रिया स्मृता

७. कृष्णस्वरूपिणी –कृष्णरूपं संनिधातुं या शक्ता चावलीलया  सर्वांशैः कृष्णसदृशी तेन कृष्णस्वरूपिणी

८. कृष्णवामाङ्गसम्भूता –वामाङ्गार्धेन कृष्णस्य या सम्भूता परा सती कृष्णवामाङ्गसम्भूता तेन कृष्णेन कीर्तिता

९. परमान्दरूपिणी – परमानन्दराशिश्च स्वयं मूर्तिमती सती  श्रुतिभिः कीर्तिता तेन परमानन्दरूपिणी

१०.कृष्णा –कृषिर्मोक्षार्थवचनो न एतोत्कृष्टवाचकः आकारो दातृवचनस्तेन कृष्णा प्रकीर्तिता

११. वृन्दावनी –अस्ति वृन्दावनं यस्यास्तेन वृन्दावनी स्मृता वृन्दावनस्याधिदेवी तेन वाथ प्रकीर्तिता

१२. वृन्दा -सङ्घःसखीनां वृन्दः स्यादकारोऽप्यस्तिवाचकः सखिवृन्दोऽस्ति यस्याश्च सा वृन्दा परिकीर्तिता

१३. वृन्दावनविनोदिनी –वृन्दावने विनोदश्च सोऽस्या ह्यस्ति च तत्र वै वेदा वदन्ति तां तेन वृन्दावनविनोदिनीम्

१४. चन्द्रावली –नखचन्द्रावली वक्त्रचन्द्रोऽस्ति यत्र संततम्  तेन चन्द्रवली सा च कृष्णेन परिकीर्तिता

१५. चन्द्रकान्ता –कान्तिरस्ति चन्द्रतुल्या सदा यस्या दिवानिशम् सा चन्द्रकान्ता हर्षेण हरिणा परिकीर्तिता

१६.शतचन्द्रप्रभानना –शरच्चन्द्रप्रभा यस्स्याश्चाननेऽस्ति दिवानिशम् मुनिना कीर्तीता तेन शरच्चन्द्रप्रभानना

 

“जय जय श्री राधे “

          “श्री श्याम सुन्दर गोस्वामी जी ”

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