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Radhe Radhe

आज की ब्रज रस धारा

दिनांक 13/04/2018

 

प्रेम में बिना दही के ही माखन निकल आता है

एक बार राधाजी के मन में कृष्ण दर्शन की बड़ी लालसा थी, ये सोचकर महलन की अटारी पर चढ गई और खिडकी से बाहर देखने लगी कि शायद श्यामसुन्दर यही से आज गईया लेकर निकले.अब हमारी प्यारी जू के ह्रदय में कोई बात आये और लाला उसे पूरा न करे ऐसा तो हो ही नहीं सकता.

जब राधा रानी जी के मन के भाव श्याम सुन्दर ने जाने तो आज उन्होंने सोचा क्यों न साकरीखोर से (जो कि लाडली जी के महलन से होकर जाता है)होते हुए जाए,अब यहाँ महलन की अटारी पे लाडली जी खड़ी थी.तब उनकी मईया कीर्ति रानी उनके पास आई.

और बोली –अरी राधा बेटी! देख अब तु बड़ी है गई है, कल को दूसरे घर ब्याह के जायेगी, तो सासरे वारे काह कहेगे, जा लाली से तो कछु नाय बने है, बेटी कुछ नहीं तो दही बिलोना तो सीख ले, अब लाडली जी ने जब सुना तो अब अटारी से उतरकर दही बिलोने बैठ गई.पर चित्त तो प्यारे में लगा है.

लाडली जी खाली मथानी चला रही है,घड़े में दही नहीं है इस बात का उन्हें ध्यान ही नहीं है,बस बिलोती जा रही है.उधर श्याम सुन्दर  नख से शिख तक राधारानी के इस रूप का दर्शन कर रहे है,बिल्वमंगल जी ने इस झाकी का बड़ा सुन्दर चित्रण किया है.

लाला गईया चराके लौट तो आये है पर लाला भी प्यारी जू के ध्यान में खोये हुए है और उनका मुखकमल पके हुए बेर के समान पीला हो गया है.पीला इसलिए हो गया है क्योकि राधा रानी गोरी है और उनके श्रीअंग की कांति सुवर्ण के समान है इसलिए उनका ध्यान करते-करते लाला का मुख भी उनके ही समान पीला हो गया है.

इधर जब एक सखी ने देखा कि राधा जी ऐसे दही बिलो रही है तो वह झट कीर्ति मईया के पास गई और बोली मईया जरा देखो, राधा बिना दही के माखन निकाल रही है, अब कीर्ति जी ने जैसे ही देखा तो क्या देखती है, श्रीजी का वैभव देखो, मटकी के ऊपर माखन प्रकट है.सच है लाडली जी क्या नहीं कर सकती,उनके के लिए फिर बिना दही के माखन निकलना कौन सी बड़ी बात है.

इधर लाला भी खोये हुए है नन्द बाबा बोले लाला – जाकर गईया को दुह लो. अब लाला पैर बांधने की रस्सी लेकर गौ शाला की ओर चले है, गईया के पास तो नहीं गए वृषभ (सांड)के पास जाकर उसके पैर बांध दिए और दोहनी लगाकर दूध दुहने लगे.

अब बाबा ने जब देखा तो बाबा का तो वात्सल्य भाव है बाबा बोले -देखो मेरो लाला कितनो भोरो है, इत्ते दिना गईया चराते है गए, पर जा कू इत्तो भी नाय पता है, कि गौ को दुहो जात है कि वृषभ को, मेरो लाल बडो भोरो है.

और जो बाबा ने पास आकर देखा तो दोहनी दूध से लबालब भरी है बाबा देखते ही रह गए,सच है हमारे लाला क्या नहीं कर सकते,वे चाहे गईया तो गईया, वृषभ को भी दुह सकते है.

          “श्री श्याम सुन्दर गोस्वामी जी ”

      सेवाधिकारी श्री राधा रानी मन्दिर बरसाना 

          श्री जी बरसाना मण्डल ट्रस्ट (रजि०)

            Website:- www.sjbmt.in

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राधे राधे
??आज की “ब्रज रस धारा”??
दिनांक 09/04/2018

 

“भक्त-पद-रज”“भक्त-पादोदक”और“भक्तोच्छिष्ट द्रव्य”इन तीनो का अत्यन माहात्म्य है सचमुच जिन्हे इन तीनो वस्तुओ में पूर्ण श्रद्धा हो गयी

 

, जिनकी बुद्धि में से भक्तो के प्रति भेदभाव मिट गया, जो भगवत्स्वरूप समझकर सभी भक्तो की पदधूली को श्रद्धा पूर्वक सिर पर चढाने लगे,तथा भक्तो के पादोदक को भक्तिभाव से पान करने लगे,वेनिहाल हो गये.

 

कालिदास जी भी ऐसे भक्त थे, भगवन्नाम में इनकी अनन्य निष्ठा थी, उठते-बैठते, सोते-जागते, हँसते-खेलते तथा बाते करते-करते भी सदा जीव्हा पर भगवन् नाम ही विराजमानरहता .

 

हरे कृष्ण, हरे राम, के बिना ये किसी से बात ही नहीं करते थे.किसी भी भगवत् भक्त का पता पाते वही दौड़ जाते, और यथाशक्ति सेवा करते, भक्तो को खिलाकार उनका उच्छिष्ट महाप्रसाद को पाकर ये अपने को कृतार्थ समझते, भक्तो का पादोदक पान करना उनकी पदधूली को मस्तक पर चढाना, ये ही इनके साधन बल है !

 

इसके अतिरिक्त ये योग, यज्ञ, तप, पूजा, पाठ, अध्ययन आदि कुछ भी नहीं करते थे ! ऐसा ही इनका द्रृढविश्वास था, कि इन्ही साधनों के द्वारा प्रभु पदोंकी प्रीति प्राप्त हो जायेगी.

 

एक बार इनके गाँव में ही एक शूद्र जाति के भक्त थे उनकी पत्नि भी अत्त्यन्त पतिपरायणा सती साध्वी नारी थी,

 

दोंनो ही खूब भक्तिभाव से श्रीकृष्णकीर्तन किया करते थे, एक दिन कालिदास जी उनके दर्शन के निमित्त उनके घर गये.

 

और भेंट के रूप में आम साथ ले गये.उन्हे आया देख दोनो पति-पत्नि के आश्चर्य का ठिकाना ही ना रहा दोनों ने उनका स्वागत किया और एक फटा आसन बैठने को दिया और बड़े लल्जित भाव सेभक्त बोला-आपने अपनी पदधूलि से इस गरीव की कुटिया को पवित्र बना दिया .

 

हम तो शुद्र है, आपकी किस प्रकार सेवा करे.कालिदास जी ने कहा –यदि आप कृपा करके कुछ करना चाहते है तो अपने चरणो को मेरे मस्तक पर रखकर उनकी पावन पराग से मेरे मस्तक को पवित्र बना दीजिये.

 

मुझे सब कुछ मिल जायेगा, वह भक्त बोला – आप ये कैसी भूली-भूली बाते कर रहेहो.हम जाति के शूद्र, धर्म-कर्म से हीन आपके शरीर को स्पर्शकरने तक के अधिकारी नहीं, फिर हम आपको अपने पैर कैसे छुआसकते है हमारी यही प्रार्थना है कि ऐसी पाप चढाने वाली बात फिर आप कभी अपने मुँह से ना निकले.

 

कालिदास जी ने कहा- जो भगवान का भक्त है, उसकी कोई जाति नहीं होती उससे श्रेष्ठ कोई नहीं होता वही सबसे श्रेष्ठ है, आपकी चरणी धूलि से में पावन हो जाऊँगा,आप मेरे ऊपर अवश्य कृपा करे.

 

वे बहुत देर तक आग्रह करते रहे, पर उन्होंने स्वीकार नहीं किया. अंत में दोनों पति-पत्नि ने उन्हे विदा किया, वह भक्त उन्हे बाहर तक छोडकर घर लौट आये.

 

जब वह भक्त घर में घुस गये तब जिस स्थान पर वह भक्त खड़े थे उस स्थान की चरण धूलि उठाकर कालिदास जी ने अपने सम्पूर्ण शरीर पर लगा ली और घर के बाहर छिपकर बैठ गये रात्रि का समय था,

 

उस भक्त की पत्नि ने कहा- कालिदास जी, ये प्रसादी आम देकर गये थे उन्हे भगवान को अर्पण करके पा लो, भक्त का दिया प्रसाद है इसे पाने से कोटि जन्म के पाप कटते है भगवान को अर्पण करके भक्त उन्हे चूसने लगे उनके चूसने के बाद जो बचता उनकी पतिव्रता स्त्री चूसती जाती और गुठली और छिलके को बाहर की ओर फेकती जाती,

 

पीछे छुपे कालिदास जी उन गुठलियों को उठाकर चूसते और उनमे वे अमृतके समान स्वाद का अनुभव करते ! इस प्रकार की इनकी भक्तो के प्रति अनन्य श्रद्धा थी.

 

सच है जिन्होंने सब कुछ त्याग दिया ऐसे परम पूज्य भगवद्ध महापुरुषो के चरणो के नीचे की धूलि को जब तक सर्वाग में लगाकर उसमे स्नान ना किया जाये तव तक किसी को भी प्रभु पादपदों की प्राप्ति नहीं हो सकती.

 

          “श्री श्याम सुन्दर गोस्वामी जी ”

      सेवाधिकारी श्री राधा रानी मन्दिर बरसाना 

          श्री जी बरसाना मण्डल ट्रस्ट (रजि०)

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राधे राधे
??आज की “ब्रज रस धारा”??
दिनांक 08/04/2018

सचिदानंद दिव्य सुधा रस सिन्धु ब्रजेन्द्र नंदन राधावल्लभ श्यामसुंदर श्री कृष्ण चन्द्र का नित्य निवास है प्रेम धाम ब्रज में और उनका चलना फिरना भी है ब्रज के मार्ग में ही.

 

यह मार्ग चित्त वृति निरोध सिद्ध महा ज्ञानी योगीन्द्र मुनीन्द्रों के लिए भी अत्यंत दुर्गम है. ब्रज का मार्ग तो उन्हीं के लिए प्रकट होता है

 

जिनकी चित्त वृति प्रेम धन रस सुधा सागर आनंदकंद श्री कृष्ण चन्द्र के चर्णारविंदों की ओर नित्य निर्बाध प्रवाहित रहती है जहाँ न निरा निरोध है और न ही उन्मेष ही बल्कि दोनों की चरम सीमा का अपूर्व मिलन है.

 

इस पथ पर अबाध विहरण करती हुई वृष भानु नंदनी रासेश्वरी श्री श्री राधा रानी का दिव्य वसनांचल विश्व की विशिष्ट चिन्मय सत्ता को कृत कृत्य करता हुआ नित्य खेलता रहता है

 

किसी समय उस वसनांचल के द्वारा स्पर्षित धन्यातिधन्य पवन लहरियों का अपने श्री अंग से स्पर्श पाकर योगीन्द्र मुनीन्द्र दुर्लभ गति श्री मधुसुदन पर्यंत अपने को कृतार्थ मानते हैं

 

उन श्री राधारानी के प्रति हमारे मन प्राण आत्मा हमारे अंग अंग से नमस्कार !जो सबके ह्रदय अंतराल में नित्य निरंतर साक्षी और नियंतारूप से विराजमान रहने पर भी सबसे पृथक रहते हैं जो समस्त बन्धनों को तोड़कर सर्वथा उच्च श्रृंखला को प्राप्त हैं ,

 

जिनके स्वरुप का सम्यक ज्ञान ब्रह्मा शंकर शुक नारद भीष्म आदि को भी नहीं है अतएव वे हार मानकर मौन हो जाते हैं उन सर्वनि यमातीत सर्वबंधनविमुक्त नित्य स्ववश परात्पर परम पुरुषोतम को भी जो श्री राधिका चरण रेणु इसी क्षण वश में करने की अनंत शक्ति रखता है

 

उस अनंत शक्ति श्री राधिका चरण रेणुका हम अपने अन्तस्तल से बार बार भक्ति पूर्वक स्मरण करते हैं !विश्व्प्रकृति के प्रत्येक स्पंदन में बिन्दुरूप से जो अनुराग वात्सल्य कृपा लावण्य रूप सौन्दर्य और माधुरी वर्तमान है – रासेश्वरी नित्य निकुंजेश्वरी श्रीवृष भानुनंदनी उन्ही सातों रासो की अनंत अगाध अधिष्टात्री हैं.

 

इस प्रकार नित्य आनंद रसमय सप्त स्मुद्र्वती श्री राधिका श्याम सुन्दर आनंदकंद के नित्य दिव्य रमणानन्द में अनादी काल से उन्मादिनी हैं – नित्य कुल त्यागिनी हैं.

 

इन्हीं के सहज सरल स्वच्छ भाव के शुद्ध रस से इन्हीं के भावानुराग रूप दधिमंड से इन्ही की वात्सल्यमयी दुग्ध धारा से इन्हीं की परम स्निग्ध घृतवत अपार कृपा से इन्हीं की लावण्य मदिरा से इन्हीं के छबिरूप सुन्दर मधुर इक्षुरस से और इन्हीं के केलि विलास विन्यास रूप क्षार तत्व से समस्त अनंत विश्व ब्रह्माण्ड नित्य अनुरक्षित अनुप्राणित और ओतप्रोत है.

 

ऐसी अनंत विचित्र सुधा रसमयी प्राणमयीविश्व रहस्य की चरम तथा सार्थक मीमांसामूर्ति श्री वृष भानु नंदनी का दिव्य स्फुरण जिसके जीवन में नहीं हो पाया उसका सभी कुछ व्यर्थ – अनर्थ है.

 

देवी राधिके अपने ऐसे दिव्य स्फुरण से मेरे ह्रदय को कृतार्थ कर दो !श्री राधिके वह शुभ सौभाग्य क्षण कब होगा जब तुम्हारे नाम सुधा रस का आस्वादन करने के लिए मेरी जिव्हा विह्वल हो जायेगी जब तुम्हारे चरनचिन्हों से अंकित वृंदारन्य की बीथियों में मेरे पैर भ्रमण करेंगे – मेरे सारे अंग उसमे लोट लोट कर कृतार्थ होंगे जब मेरे हाथ केवल तुम्हारी ही सेवा में नियुक्त रहेंगे

 

मेरा ह्रदय तुम्हारे चरण पद्मों के ध्यान में लगा रहेगा और तुम्हारे इन भावोत्सवों के परिणामरूप मुझे तुम्हारे प्राण नाथ के चरणों की रति प्राप्त होगी – मैं तुम्हारे ही सुख साधन के लिए तुम्हारे प्राण नाथ की प्रयेसी बनने का अधिकार प्राप्त करूँगा !

“जय जय श्री राधे”

 

“श्री श्याम सुन्दर गोस्वामी जी ”

      सेवाधिकारी श्री राधा रानी मन्दिर बरसाना 

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राधे राधे
??आज की “ब्रज रस धारा”??
दिनांक 07/04/2018

एक दिन भगवान ने देखा-कि व्रज में सब गोप और नंदबाब, किसी यज्ञ की तैयारी में लगे है, सारे व्रज में पकवान बन रहे है. भगवान श्रीकृष्ण सबके अंतर्यामी और सर्वज्ञ है, वे सब जानते है.

 

फिर भी उन्होंने नंदबाब आदि बड़े-बूढ़े गोपो से पूंछा–बाबा आपलोगों के सामने यह कौन-सा उत्सव आ पहुँचा है? इसका क्या फल है? किस उद्देश्य से, कौन लोग, किन साधनों केद्वारा, यह यज्ञ किया करते है? आप बताइये मुझे सुनने की बड़ी उत्कंठा है .

 

नंदबाबा ने कहा-बेटा! भगवान इंद्र वर्षा करने वाले मेघों के स्वामी है, ये मेघ उन्ही के अपने रूप है, वे समस्त प्राणियों को तृप्त करने वाले एवं जीवनदान करने वाले जल बरसाते है.

 

हम उन्ही मेघपति इंद्र की यज्ञ के द्वारा पूजा किया करते है उनका यज्ञ करने के बाद जो कुछ बचारहता है उसी अन्न से हम सब मनुष्य अर्थ, धर्म, काम, की सिद्धि के लिए अपना जीवन निर्वाह करते है.

 

भगवान ने कहा–कर्मणा जायते जंतु: कर्मणैव विलीयते. सुखं दु:खं भयं क्षेमं कर्मणैवाभिपधते..“बाबा! प्राणी अपने कर्म के अनुसार ही पैदा होता और कर्म से ही मर जाता है उसे उसके कर्मो के अनुसार ही सुख-दुख भय और मंगलके निमित्तो की प्राप्ति होती है”

 

ये गौए, ब्राह्मण और गिरिराज का यजन करना चाहिये. इंद्र यज्ञ के लिए जो सामग्रियाँ इकठ्ठी की गयी है उन्ही से इस यज्ञ का अनुष्ठान होने दे.अनेको प्रकार के पकवान – खीर, हलवा, पुआ, पूरी, बनायें जाएँ,

 

व्रज का सारा दूध एकत्र कर लिया जाये, वेदवादी ब्राहाणों के द्वारा भलीभांति हवन करवाया जाये फिर गिरिराज को भोग लगाया जाये इसके बादखूब प्रसाद खा-पीकर सुन्दर-सुन्दर वस्त्र पहनकर गोवर्धन की प्रदक्षिणा की जाये, ऐसा यज्ञ गिरिराज और मुझे भी बहुत प्रिय है .भगवान की इच्छा थी कि इंद्र का घमंड चूर-चूर कर दे.

 

नंदबाबा आदि गोपो ने उनकी बात बड़ी प्रसन्नता से स्वीकार कर ली . भगवान जिस प्रकार कायज्ञ करने को कहा था वैसे यज्ञ उन्होंने प्रारंभ कर दिया .

 

सबने गिरिराज और ब्राह्मणों को सादर भेटे दी, और गौओ को हरी-हरी घास खिलाई फिर गोपिया भलीभांति श्रृंगार करके और बैलो से जुटी गाडियों पर सवार होकर भगवान कृष्ण की लीलाओ का गान करती हुई गिरिराज की परिक्रमा करने लगी.

 

भगवान श्रीकृष्ण गिरिराज के ऊपर एक दूसरा विशाल शरीर धारण करके प्रकट हो गये और ‘मै गिरिराज हूँ’ इस प्रकार कहते हुए उन्होंने अपना बड़ा-सा मुहँ खोला और छप्पन भोग और सारी सामग्री पात्र सहित आरोगने लगे.

 

आन्यौर-आन्यौर,और खिलाओ,और खिलाओ इस प्रकार भगवान ने अपने उस स्वरुप को दूसरे ब्रजवासियो के साथ स्वयं भी प्रणाम किया और कहने लगे – देखो कैसा आश्चर्य है, गिरिराज ने साक्षात् प्रकट होकर हम पर कृपा की है.

 

और पूजन करके सब व्रज लौट आये .जब इंद्र को यह पता चला की मेरी पूजाबंद कर दी गयी है तब वे नंदबाबा और गोपो पर बहुत ही क्रोधित हुए इंद्र को अपने पद का बड़ा घमंड था वे स्वयंको त्रिलोकी का ईश्वर समझते थे उन्होंने क्रोध में तिलमिलाकर प्रलय करने वाले मेघों के संवर्तक नामक मेघों को व्रज पर चढ़ाई करने की आज्ञ दी.

 

और स्वयं पीछे-पीछे ऐरावत हाथी पर चढ कर व्रज का नाश करने चल पड़े .इस प्रकार प्रलय के मेघ बड़े वेग से नंदबाबा के व्रज पर चढ़ आये और मूसलाधार पानी बरसाकर सारे ब्रज को पीड़ित करने लगे चारो ओर बिजलियाँ चमकने लगी.

 

बादल आपस में टकराकर कडकने लगे और प्रचण्ड आँधी की प्रेरणा से बड़े-बड़े ओले और दल-के-दल बादल बार-बार आ-आकर खम्भे के समान मोटी-मोटी धाराएँ गिराने लगे.

 

तब व्रजभूमि का कोना-कोना पानी से भर गया और वर्षा की झंझावत झपाटे से जब एक–एक पशु और ग्वालिने भी ठंड केमारे ठिठुरने और व्याकुल हो गयी.

 

तब सब-के-सब भगवान श्रीकृष्ण की शरण में आये, सब बोले – कृष्ण अब तुम ही एकमात्र हमारे रक्षक हो, इंद्र के क्रोध से अब तुम्ही हमारी रक्षा कर सकते हो.

 

भगवान ने देखा तो वे समझ गये कि ये सब इंद्र की करतूत है वे मन-ही-मन कहने लगे हमने इंद्र का यज्ञ भंग कर दिया है इसी से व्रज का नाश करने के लिए बिना ऋतु के ही यह प्रचंड वायु और ओलो के साथ घनघोर वर्षा कर रहे हैमै भी अपनी योगमाया से इसका भालिभाँती जवाव दूँगा .

 

इस प्रकार कहकर भगवान ने खेल-खेल में एक ही हाथ से गिरिराज गोवर्धन को उखाड़ लिया और जैसे छोटा बच्चा बरसाती छत्ते के पुष्प को उखाडकर हाथ में रख लेते है वैसे ही उन्होंने उस पर्वत को धारण कर लिया.

 

इसके बाद भगवान ने कहा –मैया, बाबाऔर व्रजवासी तुम लोग अपनी गौओ और सब सामग्रियों के साथ इस पर्वत के गड्डे में आकर आराम से बैठ जाओ तब सब-के-सब ग्वालबाल छकडे, गोधन लेकर अंदर घुस गये.

 

थोड़ी देर बाद कृष्ण के सखाओ ने अपनी अपनी लाठिया गोवर्धन पर्वत में लगा दी और कृष्ण से कहने लगे कि ये मत समझना कि केवल तुम ही उठाये हुए हो तब कृष्ण जी ने कहा –

 

“कछु माखन को बल बढ्यो कछु गोपन करि सहाय

श्री राधा जू कि कृपा से मेने गिरिवर लियो उठाय ”

 

भगवान ने सब व्रजवासियो के देखते-देखते भूख प्यास की पीड़ा आराम-विश्राम की आवश्यकता आदि सब कुछ भुलाकर सात दिन तक लगातार उस पर्वत को उठाये रखा वे एक पग भी वहाँसे इधर-उधर नही हुये.

 

श्रीकृष्ण की योगमाया का यह प्रभाव देखकर इंद्र के आश्चर्य का ठिकाना नरहा अपना संकल्प पूरा न होने के कारण उनकी सारी हेकड़ी बंद हो गयी.

 

उन्होंने मेघों को अपने-आप वर्षा करने से रोक दिया. जब आकाश में बादल छट गये और सूरज देखने लगे तब सब लोग धीरे-धीरे सब लोग बाहर निकल आये सबके देखते-ही-देखते भगवान ने गिरिराज को पूर्ववत् उसके स्थान पर रख दिया .और व्रज लौट आये .

 

व्रज पहुँचे तो ब्रजवासियों ने देखा कि व्रज की सारी चीजे ज्यो-की-त्यों पहले की तरह है एक बूंद पानी भी कही नहीं है.तब ग्वालो ने श्रीकृष्ण से पूंछा–कान्हा सात दिन तक लगातार इतना पानी बरसा सब का सब पानी कहाँ गया.

 

भगवान ने सोचा – यदि मै इन ग्वालवालो से कहूँगा कि मैने शेष जीऔर सुदर्शन चक्र को व्रज के चारों ओर लगा रखा था ताकि व्रज में पानी न आये.तो ये व्रजवासियो को विश्वास नहीं होगा.इसलिए भगवान ने कहा– तुम लोगो ने गिरिराज जी को इतना भोग लगाया, पर किसी ने पानी भी पिलाया इसलिए वे ही सारा पानी पी गये .

 

तब सब ने कहा – लाला गिरिराज जी ने इतना खाया कि हम लोग उन्हें पानी पिलाना ही भूल गये .एक दिन भगवान जब एकांत में बैठे थे तब गोलोक से कामधेनु और स्वर्ग से इंद्र अपने अपराध को क्षमा माँगने के लिए आये उन्होंने हाथ जोड़कर १० श्लोको में भगवान की स्तुति की .

 

फिरकामधेनु ने अपने दूध से और इंद्र ने ऐरावत की सूंड के द्वारा लाए हुए आकाश गंगा के जल से देवर्षियो के साथ यदुनाथ श्रीकृष्ण का अभिषेक किया और उन्हें ‘गोविन्द’नाम से संबोधित किया इसके बाद वे स्वर्ग चले गये.“जय जय श्री राधे”

 

“श्री श्याम सुन्दर गोस्वामी जी ”

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राधे राधे
??आज की “ब्रज रस धारा”??
दिनांक 25/03/2018

देखा जाता है कि दुनिया में ऐसे बहुत लोग हैं जो धन धान्य से सम्पूर्ण हैं किंतु वो फिर भी खुश नही हैं क्योंकि उनके मन को शांति नही मिल पाती

कुछ इसलिए भी नाखुश हैं कि वो श्री जी के प्रति नित्य अपराध कर रहें कुछ जानकर करते हैं और अनजाने में भी हो जाते हैं उसका कारण यही है कि उन्हें ज्ञान नही हैं कि अपराध कौन कौन से होते हैं ।

नित्य अपराधों में कुछ अपराध यह हैं
श्री जी के सामने कुछ भी खाने की वस्तु ग्रहण करना ,उनके विग्रह की तरफ पैर करना,झूट बोलना,उनके विग्रह के सामने या घर में जो मन्दिर है उसके सामने सो जाना ।

 

यह कुछ अपराध हैं जो नित्य प्रति हो रहे हैं किंतु किसी को इसका ज्ञान नही और मनुष्य इन अपराधों को करता जा रहा है उसका दण्ड भी श्री जी देती हैं।लेकिन तब उन्हें नही समझ आता कि ये कैसे और क्यों हुआ है हमारे साथ।

 

श्री राधा नाम की बहुत बड़ी महिमा है इसका को बखान नही कर सकता न ही इसका सार आजतक किसी ने पाया है क्योंकि अनन्त कोटि ब्रह्माण्ड नायक स्वयं श्री कृष्ण भी उनकी चरण सेवा में विलीन रहते हैं श्री कृष्ण की गुरु हैं हमारी श्री प्रिया जी।

 

और भैयाओं अगर बरसाने पर नन्दगाँव के भाव ते देखो तो या सारे कन्हैया में लट्ठ पड़ें यहां सारे कूँ इतनी गारी दई जावें कि कछु बोले नाहे
ई तो ग्वारिया गवार है ढोरन कूँ चरावों आवे बस यापे।

 

लेकिन हमारो कन्हैया लगे हमे प्राणन हूँ ते प्यारो। क्योकि ई हमारी किशोरी जी को प्यारो है।
जब उन्होंने अपना लिया तो हम कौन है भैया जो श्री जी की बात नाय माने।

“प्यारे राधा राधा रटो, रटो नटनागर आवेगो”
इसी भाव को जीवन में धारण कर जीवन सफल बनायें और श्री जी का नाम लेते रहें ताकि अपराधों से मुक्ति हो सके

 

“श्री श्याम सुन्दर गोस्वामी जी ”

सेवाधिकारी श्री राधा रानी मन्दिर बरसाना
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भाण्डीरवन का रहस्य:

 

भाण्डीरवन, वृन्दावन से लगभग १० किलोमीटर दूर यमुना पार छायरी गाँव के पास तहसील मॉठ, जिला मथुरा में हैं |

 

गर्ग संहिता के आधार पर भाण्डीरवन में ब्रह्मा जी ने राधा कृष्णा का गन्धर्व विवाह कराया था, इसीलिए यहाँ पर मंदिर में श्री कृष्ण के द्वारा राधा रानी की मांग भरते हुए दर्शन हैं |

 

यहाँ एक ऐसा कुंआ है जिसका रंग सोमवती अमावस्या को दूधिया हो जाता है |

लीलायॆं :

• यहाँ पर गोचारण के समय, श्री कृष्ण और बलराम जी का ग्वाल-
बालो के साथ भोजन-क्रीड़ा कौतुका हैं। 

 

• यहाँ विशाल भाण्डीर-वट की लम्बी-लम्बी शाखाओं पर चढ़कर कृष्ण और सखाओं की, यमुना के पार जाने- आने की क्रीड़ा हैं। 

 

• यहाँ ब्रजाड़ग़नाओ के साथ श्री कृष्ण की मल्ल-क्रीड़ा हैं। 

 

• सखाओं के साथ श्री कृष्ण और बलराम की भोजन-क्रीड़ा के समय गायों और ग्वाल- बालो का मुज्ज्वन में प्रवेश और उनकी दावानल से रक्षा की क्रीड़ा हैं। 

 

• यहाँ वत्सासुर बध की पाप की शुद्धि के लिए श्री कृष्ण द्वारा अपने बेणु से बेणु कूप निर्माण कर उसमे समग्र तीर्थो का आवाहन कर, उसमे स्वंय स्नान द्वारा पवित्र होने की लीला हैं। 

 

• यहाँ प्रलम्बासुर की उद्धार-लीला हैं और समीप ही बंशी वट पर रासलीला हैं |

राधे राधे
???आज की “ब्रज रस धारा”???
दिनांक 01/01/2018

एक बार भगवान शंकर के मन में भी विष्णु के बालस्वरूप के दर्शन करने की इच्छा हुई. भादौ शुक्ल द्वादशी के दिन भगवान शंकर अलख जगाते हुए गोकुल में आए.

 

शिव जी द्वार पर आकर खड़े हो गए. तभी नन्द भवन से एक दासीशिवजी के पास आई और कहने लगी कि यशोदाजी ने ये भिक्षा भेजी है इसे स्वीकार कर लें.

 

और लाला को आशीर्वाद दे दें. शिव बोले मैं भिक्षा नहीं लूंगा, मुझे किसी भी वस्तु की अपेक्षा नहीं है, मुझे तो बालकृष्ण के दर्शन करना है. दासी ने यह समाचार यशोदाजी को पहुंचा दिया.”अरी मईया! देखा दे मुख लाल का, तेरेपलने में, पालनहार देखा दे मुख लाल का “यशोदाजी ने खिड़की में से बाहर देखकर कह दिया कि लाला को बाहर नहीं लाऊंगी, तुम्हारे गले में सर्प है जिसे देखकर मेरा लाला डर जाएगा.

 

शिवजी बोले कि माता तेरा कन्हैया तोकाल का काल है, ब्रह्म का ब्रह्म है.वह किसी से नहीं डर सकता, उसे किसी की भी कुदृष्टि नहीं लग सकती और वह तो मुझे पहचानता है.यशोदाजी बोलीं-कैसी बातें कर रहे हो आप? मेरा लाला तो नन्हा सा है आपहठ न करें. शिवजी ने कहा- तेरे लाला के दर्शन किए बिना मैं यहां से नहीं हटूंगा. मै यही समाधी लगा लूगा जब इधर बाल कन्हैया ने जाना कि शिवजी पधारे हैं.

 

और माता वहां ले नहीं जाएंगी,और वे दर्शन न मिलने पर समाधी लगा लेगे क्योकि कन्हैया जानते थे कि भोले बाबा कि समाधी लग गई तो हजारों वर्ष के बाद ही खुलेगी तो उन्होंने जोर से रोना शुरु किया.जब कन्हैया किसी भी प्रकार चुप नहीं हुए तो माता को लगा कि सचमुच वेयोगी परम तपस्वी है, यशोदाजी बालकृष्ण को बाहर लेकर आई.

 

शिवजी ने सोचा कि अब कन्हैया मेरे पास आएंगे, शिवजी ने दर्शन करके प्रणाम किया किन्तु इतने से तृप्ति नहीं हुई. वे अपनी गोद में लेना चाहते थे.

 

शिवजी यशोदाजी से बोले कि तुम बालक के भविष्य के बारे में पूछती हो, यदि इसे मेरी गोद में दिया जाए तो मैं इसकी हाथों की रेखा अच्छी तरह से देख लूंगा. यशोदा ने बालकृष्ण को शिवजी की गोद में रख दिया. जब हरि औरहर एक हो गए तो वहां कौन क्या बोलेगा.”जय जय श्री राधे “

?श्री श्याम सुन्दर गोस्वामी जी ?

आज बृज में होली रे रसिया।
होरी रे रसिया, बरजोरी रे रसिया॥

अपने अपने घर से निकसी,
कोई श्यामल कोई गोरी रे रसिया।

कौन गावं केकुंवर कन्हिया,
कौन गावं राधा गोरी रे रसिया।

नन्द गावं के कुंवर कन्हिया,
बरसाने की राधा गोरी रे रसिया।

कौन वरण के कुंवर कन्हिया, 
कौन वरण राधा गोरी रे रसिया।

श्याम वरण के कुंवर कन्हिया प्यारे,
गौर वरण राधा गोरी रे रसिया।

इत ते आए कुंवर कन्हिया,
उत ते राधा गोरी रे रसिया।

कौन के हाथ कनक पिचकारी,
कौन के हाथ कमोरी रे रसिया।

कृष्ण के हाथ कनक पिचकारी,
राधा के हाथ कमोरी रे रसिया।

उडत गुलाल लाल भए बादल,
मारत भर भर झोरी रे रसिया।

अबीर गुलाल के बादल छाए,
धूम मचाई रे सब मिल सखिया।

चन्द्र सखी भज बाल कृष्ण छवि,
चिर जीवो यह जोड़ी रे रसिया।

??आज की “ब्रज रस धारा”??
दिनांक 30/12/2017

श्री गौडीय षड गोस्वामियो में आप अन्यतम है. ब्रजलीला में आप”अनंग-मंजरी”थे कोई इन्हें श्रीगुण मंजरीभी कहते है.

“अनंगमंजरी यासीत साघ गोपालभट्टक :भट्ट गोवामिनं केचिदाहु: श्रीगुणमंजरी “

 

श्री रंगक्षेत्र में कावेरी के कूल स्थित बेलगुंडी ग्राम में श्री सम्प्रदायी श्रीवैंकटभट्ट के घर में संवत १५५७ में आपका आर्विर्भाव हुआ.जब चैतन्य महाप्रभु संवत १५६८ में दक्षिण यात्रा करते हुए रंग क्षेत्र पधारे और वहाँ श्रीरंगनाथ भगवान के दर्शन किये, तब वहाँ श्रीवैंकटभट्ट जी ने भी महाप्रभु के दर्शन किये.और अपने घर भिक्षा का निमंत्रण दिया.

 

उस समय महाप्रभु ने चातुर्मास इनके ही घर में किया,तब गोपाल भट्ट जी की आयु ११ वर्ष की थी.इन्होने भी महाप्रभु की हर प्रकार से सेवा की और गोपाल जी से महाप्रभु का भी अत्यंत स्नेह हो गया.फिर महा प्रभु ने ही इन्हें वृंदावन जाने की आज्ञादी थी.वृंदावन ने आकर श्रीरूप-सनातनके पास रहने लगे.

 

गोपालभट्ट जी के द्वारा श्रीराधा रमण जी का प्राकट्यएक बार श्रीगोपाल भट्ट गोस्वामी अपनी धर्म प्रचार यात्रा के दौरान जब एक बार गण्डकी नदी में स्नान कर रहे थे, उसी समय सूर्य को अर्घ देते हुए जब अंजुली में जल लिया तो तो एक अद्भुत शलिग्राम शिला आपकी अंजुली में आ गई जब दुबारा अंजलि में एक-एक करके बारह शालिग्राम की शिलायें आ गयीं.जिन्हे लेकर श्री गोस्वामी वृन्दावन धाम आ पहुंचे और यमुना तट पर केशीघाट के निकट भजन कुटी बनाकर श्रद्धापूर्वक शिलाओं का पूजन-अर्चन करने लगे.एक बार वृंदावन यात्रा करते हुए एक सेठ जी ने वृंदावनस्थ समस्त श्री विग्रहों के लिए अनेक प्रकार के बहुमूल्य वस्त्र आभूषण आदि भेट किये.

 

श्री गोपाल भट्ट जी को भी उसनेवस्त्र आभूषण दिए.परन्तु श्री शालग्राम जी को कैसे वे धारण कराते श्री गोस्वामी के हृदय में भाव प्रकट हुआ कि अगर मेरे आराध्य के भी अन्य श्रीविग्रहों की भांति हस्त-पद होते तो मैं भी इनको विविध प्रकार से सजाता एवं विभिन्न प्रकार की पोशाक धारण कराता, और इन्हें झूले पर झूलता.यह विचार करते-करते श्री गोस्वामी जी को सारीरात नींद नहीं आई.प्रात: काल जब वह उठे तो उनके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा, जब उन्होंने देखा कि श्री शालिग्राम जी त्रिभंग ललित द्विभुज मुरलीधर मधुर मूर्ति श्रीव्रजकिशोर श्याम रूप में विराजमान है. श्री गोस्वामी ने भावविभोर होकर वस्त्रालंकार विभूषित कर अपने आराध्य का अनूठा श्रृंगार किया.

 

श्री रूप सनातन आदि गुरुजनों को बुलाया और राधारमणलाल का प्राकटय महोत्सव श्रद्धापूर्वक आयोजित किया गया.यही श्री राधारमण लाल जी का विग्रह आज भी श्री राधारमण देव मंदिर में गोस्वामी समाज द्वारा सेवित है.और इन्ही के साथ गोपाल भट्ट जी के द्वारा सेवित अन्य शालिग्राम शिलाएं भी मन्दिर में स्थापित हैं ।1599 की वैशाख की पूर्णिमा को शालग्राम शिला से राधारमण जी प्रकट हुए थे.हर वर्ष इसी दिन इनका प्राकट्य उत्सव बड़े प्रेम से मनाया जाता है, और उस दिन इनका अभिषेक भी होता है.राधारमण जी का श्री विग्रह वैसे तो सिर्फ द्वादश अंगुल का है, तब भी इनके दर्शन बड़े ही मनोहारी है.

 

श्रीराधारमण विग्रह का श्री मुखारविन्द”गोविन्द देव जी”के समान, वक्षस्थल”श्री गोपीनाथ”के समान तथा चरणकमल”मदनमोहन जी”के समान हैं.इनके दर्शनों से तीनों विग्रहों के दर्शन का फल एक साथ प्राप्त होता है.श्री राधा रमण जी का मन्दिर श्री गौड़ीय वैष्णव सम्प्रदाय के सुप्रसिद्ध मन्दिरों में से एक है.श्री राधा रमण जी उन वास्तविक विग्रहों में से एक हैं, जो अब भी वृन्दावन में ही स्थापित हैं.अन्य विग्रह जयपुर चले गये थे, पर श्री राधा रमणजी ने कभी वृन्दावन को नहीं छोड़ा ।

 

मन्दिर के दक्षिण पार्श्व में श्री राधारमण जी का प्राकट्य स्थल तथा गोपाल भट्ट गोस्वामीजी का समाधि मन्दिर है.गोपालभट्ट द्वारा लिखे ग्रन्थ -श्री सनातन प्रभु के आदेश से श्री गोपाल भट्ट जी ने”लघुहरिभक्ति विलास”नाम से रचना की उसे देखकर श्रीसनातन जी ने उसका परिवर्तन परिवर्धन कर श्रीहरि भक्ति विलास का संपादन किया और उसकी विस्तृत दिग्दर्शिनी नामक टीका लिखी.इस प्रकार अनेक वैष्णव ग्रन्थ प्रणयन में सहायक होकर श्रीमन महाप्रभु के भक्ति रस सिद्धांतों के प्रचार प्रसार के लिए अनेको व्यक्तियों के लिए दीक्षा दी.

 

संवत १६४३ की श्रावण कृष्ण पंचमी को आप नित्य लीला में प्रविष्ट हो गए.श्री राधा रमण जी के प्राकट्य स्थल के पार्श्व में इनकी पावन समाधि का दर्शन अब भी होता है.

?श्री श्याम सुन्दर गोस्वामी जी ?

Shree Ji Barsana Mandal Trust (SJBMT)

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