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श्री राधे 

“श्रील नारायण भट्ट ज़ू जयति”

“श्री नारायण दास गोस्वामी जयति”

??आज की ब्रज रस धारा  

दिनांक 22/06/2018

करवट उत्सव

भगवान कृष्ण के उत्सव इतने है कि साल में ३६५ दिन है और भक्तजन ३७० उत्सव मानते है जब भगवान ने पहली बार छीका,

जब उगली से इशारा किया,जव बोलना शुरू किया,चलना शुरू किया,पहली बार खाया.

इन्ही में से एक है भगवान का ‘करवट उत्सव’, जब भगवान ने करवट बदली.

एक बार यशोदा मैया ने भगवान को चित पलग पर सुलाया, जब मैया काम करके थोड़ी देर बाद आई,

तो उन्होंने देखा की लाला ने स्वयं करवट ली है, तो वे बड़ी प्रसन्न हुई और उसी दिन भगवान का जन्म नक्षत्र भी था.

उस दिन घर में भगवान के करवट बदने का ‘अभिषेक-उत्सव’ मनाया जा रहा था.

घर में बहुत सी स्त्रियों की भीड़ लगी हुई थी,गाना बजाना हो रहा था,

यशोदा जी ने पुत्र का अभिषेक किया.उस समय ब्राह्मण लोग मंत्र पढ़कर आशीर्वाद दे रहे थे,

नंदरानी यशोदा जी ने ब्राह्मणों का खूब पूजन-सम्मान किया,उन्हें अन्न, वस्त्र, माला, गाय, आदि मुँहमाँगी वस्तुएँ दी.

जब यशोदा ने उन ब्राह्मणों द्वारा स्वस्तिवाचन कराकर स्वयं बालक के नहलाने आदि का कार्ये संपन्न कर लिया,

तब ये देखकर कि मेरे लल्ला के नेत्रों में नींद आ रही है,अपने पुत्र को धीरे से शय्या पर सुला दिया,

थोड़ी देर में श्यामसुन्दर की आँखे खुली,तो वे दूध के लिए रोने लगे.

उस समय यशोदा जी उत्सव में आये हुए ब्रजवासियो के स्वागत सत्कार में बहुत ही तन्मय थी .

इसलिए उन्होंने श्रीकृष्ण का रोना सुनायी नहीं पड़ा,तब श्रीकृष्ण रोते-रोते अपने पाँव उछालने लगे,

श्रीकृष्ण एक छकडे़ के नीचे सोये हुए थे उनके पाँव अभी लाल-लाल कोपलों के समान बड़े ही कोमल और नन्हे-नन्हे थे

परन्तु वह नन्हा-सा पाँव लगते ही विशाल छकडा़ उलट गया*

उस छकडे पर दूध दही आदि अनेक रसो से भरी हुई मटकियाँ और दूसरे बर्तन रखे हुए थे

वे सब-के- सब फूट-फाट गये और छकडे़ के पहिये तथा धुरे अस्त-व्यस्त हो गये, उनका जुआ फट गया.

करवट बदलने के उत्सव में जितनी भी स्त्रियाँ आई हुई थी वे सब-के-सब और यशोदा, रोहिणी, नंदबाबा, और गोपगण इस विचित्र घटना को देखकर व्याकुल हो गये वे आपस में कहने लगे

अरे!ये क्या हो गया ?यह छकडा़ अपने-आप कैसे उलट गया ?वे इसका कोई कारण निश्चित ना कर सके

वहाँ खेलते बालको ने कहा इस कृष्ण ने ही रोते-रोते अपने पावँ की ठोकर से इसे उलट दिया है .

परन्तु बालको की बात पर किसी ने विश्वास नहीं किया .

यशोदा जी ने अपने रोते हुए लाडले लाल को गोद में लेकर ब्राह्मणों से वेदमंत्रो के द्वारा शांतिपाठ कराया.

*हिरण्याक्ष का पुत्र था उत्कच .वह बहुत बलवान था,

एक बार उसने लोमश ऋषि के आश्रम के वृक्षों को कुचल डाला लोमश ऋषि ने क्रोध करके शाप दे दिया- अरे दुष्ट ! जा, तू देह रहित हो जा.

उसी समय उसका शरीर गिरने लगा वह ऋषि के चरणों में गिर पड़ा और प्रार्थना की.

तो ऋषि ने कहा -वैवस्वत मन्वंतर में श्रीकृष्ण के चरण-स्पर्श से तेरी मुक्ति हो जायेगी वही असुर छकडे़ में आकर बैठ गया था

और भगवान के चरण स्पर्श मुक्त हो गया .

सार 

यशोदा जी ने दूध-दही की मटकिंयो को तो ऊपर रख दिया

और भगवान को नीचे सुला दिया उसी प्रकार हम भी यह गलती करते है सांसारिक वस्तुओं को ऊपर रखते है

भगवान बाद में रखते है पर भगवान उन सांसारिक वस्तुओं तोड़ देते है.  

“ जय जय श्री राधे ”

          “श्री श्याम सुन्दर गोस्वामी जी ”

      सेवाधिकारी श्री राधा रानी मन्दिर बरसाना 

          श्री जी बरसाना मण्डल ट्रस्ट (रजि०)

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श्री राधे 

“श्रील नारायण भट्ट ज़ू जयति”

“श्री नारायण दास गोस्वामी जयति”

??आज की ब्रज रस धारा  

दिनांक 19/06/2018

सिद्ध सखीदेह धारी – बाबा श्री निवास जी

तीन प्रकार के प्रेमी भक्त होते है – “नित्यसिद्ध”, “कृपासिद्ध” और “साधनसिद्ध”.

नित्यसिद्ध वे है – जो श्री कृष्ण के नित्य परिकर है और श्रीकृष्ण स्वयं लीला के लिए जहाँ विराजते है वही वे उनके साथ रहते है.

कृपासिद्ध वे है – जो श्रीकृष्ण की अहेतु की कृपा से प्रेमियों का संग प्राप्त करके अंत में उन्हें पा लेते है.

और साधनसिद्ध – वे है जो भगवान की कृपा प्राप्त करने के लिए, भगवान की रूचि के अनुसार भगवत प्रीतयर्थ प्रेम साधना करते है.

ऐसे साधको में जो प्रेम के उच्च स्तर पर होते है किसी सखी या मंजरी को गुरुरूप में वरण करके, उनके अनुगत रहते है,

ऐसे पुरुष समय-समय पर प्राकृत देह से निकलकर सिद्धदेह के द्वारा लीला राज्य में पहुँचते है,

और वहाँ श्रीराधा गोविंद की सेवा करके कृतार्थ होते है. ऐसे भक्त आज भी हो सकते है.

ऐसी ही एक कथा “श्री राधामाधव चिंतन” में आती है सिद्ध सखीदेह धारी बाबा श्रीनिवास आचार्य जी की.

महात्मा श्री निवास आचार्य इस स्थिति पर पहुँचे हुए भक्त थे,

वे सिद्ध सखीदेह के द्वारा श्रीराधा-गोविंद की नित्य लीला के दर्शन के लिए अपनी सखी गुरु के पीछे-पीछे श्री व्रजधाम में जाया करते.

एक बार वे ऐसे ही गए हुए थे, स्थूल देह समाधि स्थित की भांति निर्जीव पड़ा था, तीन दिन बीत गए.

आचार्य पत्नी ने पहले तो इसे समाधि समझा, क्योकि ऐसी समाधि उनको प्राय:हुआ करती थी.

परन्तु जब तीन दिन बीत गए, शरीर बिलकुल प्राणहीन प्रतीत हुआ, तब उन्होंने डरकर शिष्य भक्त रामचंद्र हो बुलाया.

रामचंद्र भी उच्च स्तर पर आरूढ़ थे उन्होंने पता लगाया और गुरु पत्नी को धीरज देकर गुरु की खोज के लिए सिद्धदेह में गमन किया.

उनका भी स्थूलदेह वहाँ पड़ा रहा. सिद्धदेह में जाकर रामचन्द्र ने देखा – श्री यमुना जी में क्रीडा करते-करते श्री राधिका जी का एक कर्णकुंडल कही जल में पड़ गया है,

श्रीकृष्ण, सखियों के साथ उसे खोज रहे है परतु वह मिल नहीं रहा है.

रामचंद्र ने देखा सिद्ध देहधारी गुरुदेव श्रीनिवास जी भी सखियों के यूथ में सम्मिलित है,

तब रामचंद्र भी गुरु की सेवा में लग गए. खोजते-खोजते रामचद्र को श्रीजी का कुंडल एक कमलपत्र के नीचे पंक में पड़ा मिला.

उन्होंने लाकर गुरुदेव को दिया उन्होंने अपनी गुरुरूपा सखी को दिया, सखी ने युथेश्वरी को अर्पण किया,

और युथेश्वर ने जाकर श्रीजी की आज्ञा से उनके कान में पहना दिया, सबको बड़ा आनन्द हुआ.

श्री जी ने खोजने वाली सखी का पता लगाकर परम प्रसन्नता से उसे चर्वित ताम्बुल दिया,

बस इधर श्रीनिवास जी और रामचंद्र की समाधि टूटी रामचदं के हाथ में श्रीजी का चबाया हुआ पान देखकर दोनों को बड़ी प्रसन्नता हुई.

          “श्री श्याम सुन्दर गोस्वामी जी ”

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श्री राधे 

“श्रील नारायण भट्ट ज़ू जयति”

“श्री नारायण दास गोस्वामी जयति”

??आज की ब्रज रस धारा  

दिनांक 14/06/2018

 

राधा रानी जी की अष्टसखियाँ

राधा रानी  भगवान कृष्ण की प्राणप्रिया है. ब्रज मंडल की  अधिष्ठाती देवी है.

उनकी कृपा के बिना कोई ब्रज में प्रवेश नहीं कर सकता है. जिस पर राधा रानी की कृपा कर दें वो ना चाहते हुए भी ब्रज में पहुँच जाता है.

सारी गोपियाँ उनकी कायरूपा व्यूहा है. उनकी कांति से सब प्रकट हुई है. उनकी सखियों मे कई यूथ है.

गोपियों के किंकरी , मंजरी, सहचरी ये अलग-अलग है. सब की आराध्य श्री राधारानी जी है.

भगवान से गोपिया कह देती है. कि हम आपको नहीं पूजते हम तो राधा जी को पूजते है और आपके उनके प्रियतम हो  इसलिए आप हमें प्यारे हो.

और नित्य सखियाँ राधा जी और श्याम सुन्दर की सेवा में लगी रहती है.

सबकी अलग-अलग सेवाँए है. राधा जी के यूथ में मुख्य आठ सखियाँ कही गई है. जो राधारानी जी की “अष्टसखियाँ “ कहलाती है,

राधा की परम श्रेष्ठ सखियाँ आठ हैं-

 १. – ललिता

 २. – विशाखा,

 ३. – चम्पकलता,

 ४. – चित्रा,

 ५. – सुदेवी

 ६. – तुंगविद्या,

 ७. – इन्दुलेखा,

 ८. – रग्डदेवी

और अलग-अलग संमप्रदाय में इनके अलग नाम आते है. इनके नाम जैसे चित्रा जी सुदेवी ,इन्दुलेखा के नाम क्रमशः सुमित्रा, सुंगदेवी इन्दुरेखा के नाम है.

राधा जी ये ही अष्टसखी है. राधा जी के प्रति इन सब की भी प्रधान सेवाँए है.

ये अष्ट सखियाँ पाँच प्रकार की होती हैं-

१. सखी –  (कुसुमिका, विद्या आदि) ,

२. नित्य सखी – (कस्तूरिका, मणिमंजरिका आदि),

३. प्राणसखी – (शशिमुखी, वासन्ती आदि),

४. प्रिय सखी – (कुरगांक्षी, मदनालसा, मंजुकेशी, माली आदि) तथा

५. परम श्रेष्ठ सखी- ये अष्टसखियाँ सब गोपियों में अग्रगण्य है।

इनकी एक-एक सेविका भी हैं, जो मंजरी महलाती हैं। मंजरियों के नाम ये हैं-

१. – रूपमंजरी,

२. – जीवमंजरी,

३. – अनंगमंजरी,

४. – रसमंजरी,

५. – विलासमंजरी,

६. – रागमंजरी,

७. – लीलामंजरी और

८. – कस्तूरीमंजरी।

इनके नाम-रूपादि के विषय में भिन्नता भी मिलती है। ये सखियाँ वस्तुत: राधा से अभिन्न उन्हीं की कायव्यूहरूपा हैं। राधा-कृष्ण-लीला का इन्हीं के द्वारा विस्तार होता है।

कभी वे, जैसे खण्डिता दशा में, राधा का पक्ष-समर्थन करके कृष्ण का विरोध करती है। और कभी, जैसे मान की दशा में, कृष्ण का विरोध करती हैं

और कभी कृष्ण के प्रति प्रवृत्ति दिखाते हुए राधा की आलोचना करती है।

परन्तु उन्हें राधा से ईर्ष्या कभी नहीं होती, वे कृष्ण का संग-सुख कभी नहीं चाहतीं,

क्योंकि उन्हें राधा-कृष्ण के प्रेम-मिलन में ही आत्मीय मिलन-सुख की परिपूर्णता का अनुभव हो जाता है।

अत: वे राधा-कृष्ण के मिलन की चेष्टा करती रहती हैं.

‘ब्रह्मवैवर्त्त’पुराण में अष्टसखियाँ 

पुराणों में विशेषरूप से ‘ब्रह्मवैवर्त्त’ में अष्टसखियों के नाम किंचित् परिवर्तन से इस प्रकार मिलते हैं:-

1. चन्द्रावली, 2.श्यामा, 3.शैव्या, 4.पद्या, 5.राधा, 6.ललिता, 7.विशाखा,  8.भद्रा.

          “श्री श्याम सुन्दर गोस्वामी जी ”

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श्री राधे 

“श्रील नारायण भट्ट ज़ू जयति”

“श्री नारायण दास गोस्वामी जयति”

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दिनांक 13/06/2018

जहाँ कृष्ण भी असमर्थ है

भगवान श्री कृष्ण गोपियों के नित्य ऋणी है,उन्होंने अपना यह सिद्धात घोषित किया है “ये यथा मां प्रपधन्ते तांस्तथै भजाम्यहम“,अर्थात जो मुझे जैसे भजते है उन्हें मै वैसे ही भजता हूँ.

इसका यह तात्पर्य समझा जाता है कि भक्त जिस प्रकार से और जिस परिमाण के फल को द्रष्टि में रखकर भजन करता है

भगवान उसको उसी प्रकार और उसी परिमाण में फल देकर उसका भजन करते है-

सकाम, निष्काम शांत, दास्य, वात्सल्य, सख्य,आदि कि जिस प्रकार की कामना, भावना, भक्त की होती है, भगवान उसे वही वस्तु प्रदान करते है.

परन्तु गोपियों के सम्बन्ध में भगवान के इस सिद्धात वाक्य कि रक्षा नहीं हो सकी इसके प्रधान तीन कारण है-

१. –  गोपी के कोई भी कामना नहीं है.अतएव श्रीकृष्ण उन्हें क्या दे.

२. –  गोपी के कामना है केवल श्रीकृष्णसुख की, श्रीकृष्ण इस कामना कि पूर्ति करने जाते है तो उनको स्वयं अधिक सुखी होना पडता है अतः इस दान से ऋण और भी बढ़ता है.

३. – जहाँ गोपियों ने सर्व त्याग करके केवल श्री कृष्ण के प्रति ही अपने को समर्पित कर दिया है

वहाँ श्रीकृष्ण का अपना चित्त बहुत जगह बहुत से प्रेमियों के प्रति प्रेम युक्त है अतएव गोपी प्रेम अनन्य और अखंड है कृष्ण प्रेम बिभक्त और खंडित है.

इसी से गोपी के भजन का बदला उसी रूप में श्रीकृष्ण उसे नहीं दे सकते, और इसी से अपनी असमर्थता प्रकट करते हुए वे कहते है – गोपियों तुमने मेरे लिए घर कि उन बेडियो को तोड़ डाला है

जिन्हें बड़े-बड़े योगी-यति भी नहीं तोड़ पाते, मुझसे तुम्हारा यह मिलन, यह आत्मिक संयोग सर्वथा निर्मल और सर्वथा निर्दोष है.

यदि मै अमर शरीर से, अमर जीवन से, अनंत काल तक, तुम्हारे प्रेम,सेवा और त्याग का बदला चुकाना चाहूँ

, तो भी नहीं चूका सकता.मै सदा तुम्हारा ऋणी हूँ तुम अपने सौम्य स्वभाव से ही प्रेम से ही मुझे उऋण कर सकती हो परन्तु मै तो तुम्हारा ऋणी ही हूँ.

इसलिए प्रेममार्गी भक्त को चाहिये कि वह अपनी समझ से तन, मन, वचन से होने वाली प्रत्येक चेष्टा को श्रीकृष्ण सुख के लिए ही करे,जब-जब मन में प्रतिकूल स्थिति प्राप्त हो,

तब-तब उसे श्रीकृष्ण कि सुखेच्छाजनित स्थिति समझकर परमसुख का अनुभव करे, यो करते-करते जब प्रेमी भक्त केवल श्रीकृष्णसुख-काम अनन्यता पर पहुँच जाता है,

तब श्रीकृष्ण के मन की बात भी उसे मालूम होने लगती है गोपियों के श्रीकृष्णानुकुल जीवन में यह प्रत्यक्ष प्रमाण है.

इसलिए भगवान अर्जुन से कहते है – गोपियाँ ,मेरी सहायिका, मेरी गुरु, शिष्या, भोग्या , बान्धव,  स्त्री है अर्जुन मै गोपियाँ मेरी क्या नहीं है,

सबकुछ है मेरी महिमा को ,मेरी सेवा को, मेरी श्रद्धा को, और मेरे मन के भीतरी भावों को गोपियां ही जानती है दूसरा कोई नहीं जानता.

          “श्री श्याम सुन्दर गोस्वामी जी ”

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श्री राधे 

“श्रील नारायण भट्ट ज़ू जयति”

“श्री नारायण दास गोस्वामी जयति”

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दिनांक 10/06/2018

 

माधुर्य-रस में स्वकीया परकीया भाव

भगवत सम्बन्धी रसो में प्रधान पाँच रस होते है-  “शांत”, “दास्य”, “सख्य”, “वात्सल्य” और “माधुर्य”. इसमें सबसे श्रेष्ठ माधुर्य भाव है .

माधुर्य भाव के दो प्रकार होते है – “स्वकीया-भाव” और “परकीया-भाव”.

1.स्वकीया-भाव- अपनी स्त्री के साथ विवाहित पति का जो प्रेम होता है उसे स्वकीया भाव कहते है.


2. परकीया-भाव – 
किसी अन्य स्त्री के साथ जो परपुरुष का प्रेम सम्बन्ध होता है उसे परकीया भाव कहते है.

लौकिक (सांसारिक प्रेम ) में इन्द्रिय सुख की प्रधानता होने के कारण परकीया-भाव, पाप है, घृणित है.

अतः सर्वथा त्याज्य है.क्योकि लौकिक परकीया भाव में अंग-संग की घृणित कामना है.

परन्तु भागवत प्रेम के दिव्य कान्तभाव में, परकीयाभाव स्वकीया-भाव से कही श्रेष्ठ है.

क्योकि इसमें अंग-संग या इन्दिय सुख की कोई आकांक्षा नहीं है.

स्वकीया में, पतिव्रता पत्नी अपना नाम, गोत्र, मन, प्राण, धन, धर्म, लोक, परलोक, सभी कुछ पति को अपर्ण करके जीवन का प्रत्येक क्षण पति की सेवा में ही बिताती है.

परन्तु उसमें चार बातो की परकीया की अपेक्षा कमी होती है.

1. प्रियतम का निरंतर चिंतन.

2. मिलन की अत्यंत उत्कट उत्कंठा.

3. प्रियतम में किसी प्रकार का दोष न देखना.

4. कुछ भी न चाहना.

परकीया में ये चार बाते निरंतर एक साथ निवास करती है,इसलिए परकीया भाव श्रेष्ठ है.

भगवान से नित्य मिलन का अभाव न होने पर भी परकीया भाव की प्रधानता के कारण गोपियों को भगवान का क्षण भर का अदर्शन भी असह होता है.

वे प्रत्येक काम करते समय निरंतर कृष्ण का चिंतन करती थी.श्री कृष्ण की प्रत्येक क्रिया उन्हें ऐसी दिव्य गुणमयी दीखती थी

कि एक क्षण भर के लिए भी उनसे उनका चित् हटाये नहीं हटाता था एक बात धयान रखनी चाहिये कि यह परकीया भाव केवल व्रज में है

अर्थात लौकिक विषय वासना से सर्वथा विमुक्त दिव्य प्रेम राज्य में ही संभव है.

इसलिए चैतन्य मह्प्रभु ने कहा है –

“परकीया भावे अति रसेर उल्लास, व्रज बिना इहार अन्यत्र नाही वास ” 


अर्थात –
सर्वाच्च मधुर रस के उच्चतम परकीया भाव का उल्लास व्रज को (अर्थात दिव्यप्रेम राज्य को छोड़कर)अन्यत्र कही भी नही होता.

श्री राधा स्वकीय थी या परकीया यह एक व्यर्थ का प्रश्न है क्योकि जब श्री कृष्ण और राधा स्वरुप नित्य अभिन्न एक ही तत्व है तब उनमे अपने पराये के कल्पना कैसी ?

जैसे भगवान निराकार भी है और साकार भी है और उन दोनों से परे भी है उसी प्रकार राधा जी स्वकीय भी और परकीया भी है और दोनों से परे भी है.

 

          “श्री श्याम सुन्दर गोस्वामी जी ”

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दिनांक 25/05/2018

कृष्ण क्यों राधा जी के चरण दबाते है

ब्रज लीला में मुख्य वस्तु है “प्रेम”, ब्रह्म का सर्वसार ही प्रेम है. श्री कृष्ण राधा रानी के चरण पकड़ते हैं इसे समझने से पहले एक बात समझना जरुरी है कि राधा रानी कौन हैं ?

बहुत थोड़े में समझ लो कि ‘रा’ धातु के बहुत से अर्थ होते हैं. देवी भागवत में इसके बारे में लिखा है कि जिससे समस्त कामनायें, कृष्ण को पाने की कामना तक भी, सिद्ध होती हैं.  सामरस उपनिषद में वर्णन आया है कि राधा नाम क्यों पड़ा ?

भगवान सत्य संकल्प हैं. उनको युद्ध की इच्छा हुई तो उन्होंने जय विजय को श्राप दिला दिया.

तपस्या की इच्छा हुई तो नर-नारायण बन गये. उपदेश देने की इच्छा हुई तो भगवान कपिल बन गये.

उस सत्य संकल्प के मन में अनेक इच्छाएं उत्पन्न होती रहती हैं. भगवान के मन में अब इच्छा हुई कि हम भी आराधना करें. हम भी भजन करें.

अब किसका भजन करें ?   उनसे बड़ा कौन है ?  तो श्रुतियाँ कहती हैं कि स्वयं ही उन्होंने अपनी आराधना की. ऐसा क्यों किया ?  क्योंकि वो अकेले ही तो हैं, तो वो किसकी आराधना करेंगे.  

तो श्रुति कहती हैं कि कृष्ण के मन में आराधना की इच्छा प्रगट हुई तो श्री कृष्ण ही राधा रानी के रूप में आराधना से प्रगट हो गये. 

इसीलिए ये मान आदि लीला में जो कृष्ण चरण पकड़ते है, एक विशेष प्रेम लीला है. राधा रानी को तो छोड़ दो, वो तो उनका ही रूप हैं, उनकी ही आत्मा हैं.

भगवान कहते हैं – कि तुम निरपेक्ष हो जाओ तो मैं तुम्हारे भी चरणों के पीछे घूमुंगा कि जिससे तुम्हारी चरण रज मेरे ऊपर पड़ जाये और  मैं पवित्र हो जाऊं.

भगवान तो रसिक हैं जो भक्तों के चरणों की रज के लिये उनके पीछे दौड़ते हैं.

जब भगवान भक्तों की चरण रज के लिये भक्तों के पीछे दौड़ते हैं तो राधा रानी के चरण पकडें तो इसमें क्या आश्चर्य ?

जब वो श्री जी के चरण छूने जाते हैं तो वो प्रेम से हुंकार करती हैं. तो रसिक श्याम डर जाते हैं कि कहीं ऐसा ना हो लाड़ली जी मान कर लें.

इसीलिए भयभीत होकर पीछे हट जाते हैं.  उन चरणों से ही जो सरस रस बिखरा उस रस को पाकर के गोपीजन ही नहीं स्वयं श्री कृष्ण भी धन्य हुए.

बिहारी जी के प्रकटकर्ता स्वामी हरिदास जी लिखते हैं कि (ता ठाकुर को ठकुराई —–) .

वो बोले कि ये मत समझना कि बांके बीहारी जी सर्वोच्चपति हैं.  सब ठाकुरों के ठाकुर ये बांके बिहारी हैं. लेकिन इनकी भी ठकुराइन हैं श्री राधा रानी. हम उस गाँव में बैठे हैं.

“जय जय श्री राधे “

“श्री श्याम सुन्दर गोस्वामी जी ”

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दिनांक 16/05/2018

राधा रानी जी और फूल सखी

बरसाना में फूल सखी नाम का एक मुस्लिम था यद्यपि वो एक मुस्लिम था फिर भी उसकी राधा रानी में अपार श्रद्धा थी और तो और उसकी एक बेटी थी जिसका नाम भी उसने राधा रखा था.

फूलसखी सारंगी बजाने का काम करता था कोई भी उत्सव होता तो वो सारंगी बजाता और उसकी बेटी राधा उसकी धुनों पर नृत्य करती.

इसी तरह देखते ही देखते उसकी बेटी राधा बड़ी हो गयी और उसके विवाह का वक़्त आ पंहुचा राधा रानी की कृपा से उसने अपनी बेटी का विवाह बड़ी धूम धाम से किया.

लेकिन अपनी बेटी के चले जाने के बाद वो निराश सा रहने लगा क्योकि वो राधा रानी के भजनों पर सारंगी बजाया करता और उसकी बेटी राधा नृत्य किया करती थी,

और इन्ही सब से उसका जीवन गुजरा करता था लेकिन अब नृत्य करने वाली राधा तो ससुराल चली गयी थी. इसलिए उसका सारंगी बजाने का भी मन नहीं करता था.

एक दिन रात को पूर्णिमा के दिन वो बहुत ही निराश अवस्था में राधा रानी को याद कर रहा था और कह रहा था – हे लाडली अब तो तेरा भजन भी नहीं होता मेरी सारंगी की धुन पर अब कौन नाचेगी?

तभी उसने अचानक अपनी सारंगी उठा ली और बड़े ही भाव से राधा रानी का भजन करते हुए,मुख से राधा-राधा निरंतर निकल रहा था,भला किशोरी जी को कोई इतने भव से पुकारे और वे न आये ऐसा कैसे हो सकता है.

सखी सारंगी को बजाने लगा वो उसी धुन में इतना डूब गया की उसे कुछ भी याद न रहा, तभी लाडली जी के महल के कपाट खुलते है और उनमे से नेत्रों को अँधा कर देनी वाली अपार उजाले की चमक दिखाई पड़ती है  और उसी उजाले में से एक छोटी सी गौर वर्ण की कन्या आती है और फूल सखी की सारंगी की धुन पर नाचने लगती है.

फूल सखी भी इतना मदहोश हो जाता है कि वो सारंगी बजाये और वो छोटी सी कन्या नाचती ही जाए उसे कुछ भी होश न रहा और नाचते नाचते वो छोटी सी कन्या फूल सखी को महल की एक-एक सीढ़ी चढ़ाती गयी और फूल सखी भी एक-एक करके वो सीढिया चढ़ता ही गया और जैसे ही वो कपाट तक पंहुचा,

तभी महल के कपाट बंद हो जाते है और फूल सखी भी अंदर ही चला जाता है और फूल सखी कहा गया आज तक किसी को मालुम न हुआ भजन करते-करते वो राधा रानी में ही विलीन हो गया.

कहते है किसी संत को बरसाने की परिक्रमा में एक दिन वे फूल सखी दिखायी दिए,उन्होंने पूछा तो फूल सखी बोले -बाबा मै अब इस संसार के काम का नहीं हूँ मुझसे तो किशोरी जी ने कृपा करने अपने परिकर में शामिल कर लिया है.

और इतना कहकर वे झाडियों में कही चले गए,फिर किसी ने उन्हें कभी नहीं देखा.

 

          “श्री श्याम सुन्दर गोस्वामी जी ”

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दिनांक 15/05/2018

 

राधारानी जी का सखी प्रेम

निकुंज में एक बड़ी प्यारी लीला है “झूलन लीला”  एक बार राधा जी भगवान के बाई तरफ बैठी झूला झूल रही थी और सारी सखियाँ राधा माधव को झूला रही है.

इतने में राधा जी को लगता है कि ये सुख मेरी सखियों को भी मिले .उनका तो यहीं व्रत है जो सुख मुझे मिले वो सारी सखियों को मिले.

राधा रानी जी प्रेमकल्पलता है, राधा लता है और पुष्प गोपियों है. जैसे लता अपना रस पुष्प को देकर पुष्प को पुष्ट करती है उनको वो रस देती है. वैसे ही राधा जी कल्पलता है .

गेापियों को रस देती हैं उन्हें प्रफुल्लित करती है . राधा जी के रोम से सखी प्रकट हुई है.

तो झूलन लीला में राधा जी ने कृष्ण को बताया कि मेरी तरह सारी सखियों को झूले में बिठाओ राधा रानी जी के एक इशारे पर सुखदान की लीला श्यामसुदंर ने शुरू कर दी.

पहले तो ललिता जी को दूसरी तरफ भगवान ने बिठा लिया एक ओर राधा रानी जी है ओर दूसरी ओर ललिता जी भगवान बीच में है . इस लीला का चित्रण बड़ा प्यारा है.

निकुंज में कदम के पेड में वो झूला है, झूले पर राधा माधव बैठे है तो ललिता जी को बाये बैठा लिया और उनके कंधे पर अपना हस्त कमल रख दिया और उन्हें राधा की ही भांति सुख देने लगे.

इतने में ही एक सखी कुंदलता जी कहने लगी – कि देखो ! ये कलंकहीन चंद्र आज अपने राधा और अनुराधा को वाम और दक्षिण में लिए हुए शोभा का विस्तार कर रहे है.

भगवान तो पूर्ण चंद है. तो राधा जी का त्याग देखे वो कहती है कि अब दोनों ओर सखियों को बिठाओ जैसे सखिया हम राधा माधव को झुलाती है, और वे स्वयं झूला झुलाने लगी.

तो ऐसे ही सारी सखियों को बारी-बारी बिठाकर सुख देने लगे,कितना त्याग है कितना बड़ा आदर्श राधा रानी जी का.

और सखियो का त्याग देखो निज सुख की कामना से हिडोंलें में आकर नहीं बेठी है . वो तो राधा जी के सुख के लिए झूले में बैठी है . उनको कोई निज स्वार्थ नहीं है.

इस लीला केा भगवान चाहते थे राधा जी के सुख इच्छा को पूर्ण करने के लिए, राधा रानी जी ऐसा चाहती थी. इसलिए गेापियों ने लीला को स्वीकारा किया. ये गोपी प्रेम की पराकाष्ठा है, राधा का सुख कहा ?

“कृष्ण में” और गोपियों का सुख “राधारानी” में जिससे राधा-कृष्ण सुखी हो, वो ही गोपियों के जीवन का उददेष्य है. और राधा जी का महान त्याग उनके प्रेमानुगमन करने वाली सखियों को राधा जी सुख देती है. कैसा अलौकिक और दिव्य सुख है .

गेापियों के प्रेम महत्व की विशेता क्या है? वह है “अभिमान शून्यता” उनमें कोई अहंकार नहीं है.

कृष्ण मेरे अधीन है ये उनको अहंकार नहीं है राधा जी भगवान के पास बैठी है झूला झूल रही है .और गोपियों को भी नहीं है कि कृष्णा हमारे कंधे पर हाथ रखकर बैठे है.

क्योकि साधना में कोई बाधक है. तो वो है “अंहकार” उनके त्याग, प्रेम में, सबसे बडी वस्तु “दैन्य” और “अंहकार” रहित सेवा कर रही है.

भगवन की सब कुछ भगवान को अर्पण कर दिया है . सब कुछ निछावर कर चुकी है पर फिर भी मन में यहीं भाव है कि मै प्रियतम से लेती हूँ, देती कुछ नहीं, बल्कि वो तो सब कुछ तन,मन, धन, शरीर, घर, बार, परिवार, सबो का त्याग कर दिया है .

कृष्ण के चरणों में सब अर्पण कर दिया. ये अभिमान नहीं है कि हम देते है. “अभिमान शून्यता” “दैन्य” और “त्याग” ये तीन ही ही गोपियों के जीवन को महान बनाती है.

ऐसा राधारानी जी का सखियों के प्रति और सखियों का राधारानी जी के प्रति प्रेम है.यही प्रेम उन्हें प्रेम का आदर्श बनाता है.

 

“श्री श्याम सुन्दर गोस्वामी जी ”

      सेवाधिकारी श्री राधा रानी मन्दिर बरसाना 

          श्री जी बरसाना मण्डल ट्रस्ट (रजि०)

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श्री राधे 

“श्रील नारायण भट्ट ज़ू जयति”

“श्री नारायण दास गोस्वामी जयति”

??आज की ब्रज रस धारा ??

दिनांक 12/05/2018

 

राधा रानी जी के माता -पिता

महारानी कीर्ति जी, और वृषभानु जी जिनके यहाँ राधा रानी जन्मी

महारानी कीर्ति मानवीय कन्या नहीं हैं, इनका अवतार हुआ है.  किसी समय में अपने पूर्व जन्म से पहले ये तीन पितरी कन्याये थीं.  ये कथा शिव पुराण में आती है.  जब ये शवेत दीप गयीं तो वहाँ सनकादि आये. इन्होंने उठकर सम्मान नहीं किया तो उन्होंने श्राप दिया कि तुम जाओ मानवी बन जाओ.

भगवान ने कहा – कि ये वरदान है, श्राप नहीं है.  तुम्हें नित्य शक्ति को जन्मने का अवसर मिलेगा.  वो तीनों कन्याओं में से एक सीता जी की माँ बनी, सुनैना, एक पार्वती जी की माँ बनी, नैना और एक राधिका जी की माँ बनी, कलावती.  ये कलावती के रूप में प्रगट हुई थीं. महाराज सुचिन्द्र की स्त्री बनीं.

दोनों ने बड़ा तप किया. ब्रह्मा जी आये और उन्होंने कहा कि वरदान मांगो.

महाराज सुचिन्द्र जी ने कहा – कि हम मोक्ष मांगते हैं. ब्रह्मा जी ने ये वरदान दे दिया. कलावती जी बोली कि ब्रह्मा मैं तुमको श्राप दे दूंगी. तुमने मेरे रहते इनको क्यों मोक्ष दिया. ब्रह्मा जी घबरा गए क्यों कि ये महासती अवतार थीं. वो बोले कि ठीक है, ये कुछ दिन तक यहाँ ऊपर रहेंगे और फिर तुमको गोलोक्ष्वरी की माँ बनने का सौभाग्य मिलेगा. ये तुम्हारे साथ ही धाम में जायेंगे.  वो ही महाराज सुचिन्द्र और वही कलावती फिर से यहाँ प्रगट हुए . कलावती, कीर्ति हुईं और इनकी कोख में राधा, भादों में अष्टमी की तिथि को, आयीं.

 

“जय जय श्री राधे”

 

          “श्री श्याम सुन्दर गोस्वामी जी ”

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श्री राधे 

“श्रील नारायण भट्ट ज़ू जयति”

“श्री नारायण दास गोस्वामी जयति”

??आज की ब्रज रस धारा ??

दिनांक 11/05/2018

राधा रानी जी के वंशज

सूर्यवंशी महाराज दिलीप हुए. वो बड़े गौ भक्त थे .राधा रानी सूर्य वंशी थीं. राम जी भी सूर्य वंशी थे.

इनकी परम्परा इस प्रकार है. महाराज दिलीप तक तो एक ही वंश आता है.  दिलीप ने गाय की भक्ति की क्योंकि उनको कामधेनु गाय का श्राप था.

ये जब एक बार स्वर्ग में गये थे तो जल्दी-जल्दी में गाय को प्रणाम करना भूल गए थे.

कामधेनु ने श्राप दिया कि तुम पुत्र की इच्छा से जा रहे हो तुम्हें पुत्र नहीं होगा.

 

ये श्राप उस समय दिलीप सुन नहीं सके थे क्योंकि आकाश में इंद्र का ऐरावत हाथी क्रीड़ा कर रहा था.

दीघर्काल तक भी प्रयत्न करने पर उनको जब पुत्र की प्राप्ति नहीं हुई तो गुरु वशिष्ठ के पास गए.

उन्होंने ध्यान करके बताया कि राजन तुम्हें तो श्राप है.  तुम्हें पुत्र कभी हो ही नहीं सकता.

ये अमोघ श्राप है कामधेनु गाय का वशिष्ट जी ने कहा कि तुम गाय सेवा करो. कामधेनु की लड़की हमारे पास है वो भी कामधेनु है. सिर्फ वही इस श्राप को नष्ट कर सकती है.

दिलीप ने अद्भुत सेवा की .इनकी परीक्षा भी हुई.  परीक्षा में सिंह ने आक्रमण किया और दिलीप ने अपना शरीर सिंह को दे दिया .

सिंह बोला कि मैं पार्वती से नियुक्त सिंह हूँ, तुम इस साधारण गाय के लिए अपना शरीर क्यों नष्ट करते हो ?

जीवित रहोगे तो अनेक तरह की तपस्या आदि कर सकोगे .

उन्होंने कहा कि ये शरीर जीवित रखने से कोई लाभ नहीं अगर हम गाय को नहीं बचा सकते.

इससे तो मर जाना अच्छा है. मनुष्य को उतनी ही देर जीना चाहिए जब तक मशाल की तरह उस में प्रकाश हो. अगर प्रकाश न रहे तो जीने से कोई लाभ नहीं.

उससे अच्छा है मर जाना. सिंह ने कहा तो फिर तैयार हो जाओ मरने के लिए. वो तैयार हो गए. सिंह आकाश में ऊपर उछला पर ये सिर नीचे करके बैठ गए.

हिले नहीं कि सिंह हमारे ऊपर प्रहार करेगा. तब तक क्या देखते हैं कि एक फूलों की माला आकाश से उनके ऊपर आकर पड़ गयी.

उन्होंने सामने देखा तो गाय मुस्करा रही थी. बोली मैंने तुम्हारी परीक्षा ली थी. तुम इसमें पास हो गये हो.

जाओ मेरी माँ का श्राप मिटता है. तुम्हारा पुत्र होगा बड़ा प्रतापी. उनका नाम रघु होगा.

उस गौ सेवा को देख करके राजा दिलीप के लडकों में से जो धर्म नाम के सबसे छोटे लड़के थे उन्होंने कहा कि हमें राज्य नहीं चाहिए. हमें कुछ नहीं चाहिए हम तो सिर्फ गाय की सेवा करेंगे.

उसी वंश में आगे चलकर अभय कर्ण हुए. शत्रुघ्न जी जब ब्रज में आये तो अभय कर्ण को साथ लाये क्योंकि ये भी बड़े गाय भक्त थे. शत्रुघ्न जी जानते थे कि ये भूमि गाय के लायक है.

जब अभय कर्ण जी यहाँ आये तो बड़े प्रसन्न हुए और गाय सेवा करने लग गए.

इसीलिए रघुवंश का ये एक अलग वंश आता है. इन्हीं के वंश में रशंग जी हुए जिन्होंने बरसाना बसाया है और इन्हीं के वंश में राधा रानी होती हैं.

ये बरसाने का इतिहास है. रशंग जी के वंश में ही राजा वृषभानु और राधा रानी हुई हैं. ये सूर्यवंशी थीं और श्री कृष्ण चंद्रवंशी थे.

“जय जय श्री राधे ” 

 

“श्री श्याम सुन्दर गोस्वामी जी ”

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