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राधे राधे

??आज की ब्रज रस धारा ??

दिनांक 24/04/2018

 

वैशाख मास

क्या है वैशाख मास – हिंदू पंचांग में चंद्रमास के नाम नक्षत्रों पर आधारित हैं. जिस मास की पूर्णिमा जिस नक्षत्र में होती है उसी के अनुसार माह का नाम पड़ा है. वैशाख मास की पूर्णिमा विशाखा नक्षत्र में होने के कारण इस मास का नाम वैशाख पड़ा.

“मेष संक्रांति” – वैसाख मास के लगते ही जब सूर्य मेष राशि में आते हैं तब मेष संक्रांति मानी जाती है.

 

वैशाख भारतीय पंचांग के अनुसार वर्ष का दूसरा माह है. चैत्र पूर्णिमा के बाद आने वाली प्रतिपदा से वैशाख मास का आरंभ होता है. धार्मिक और सांस्कृतिक तौर पर वैशाख महीने का बहुत अधिक महत्व माना जाता है. वैशाख मास में धार्मिक तीर्थ स्थलों पर स्नानादि का भी महत्व माना जाता है.

वैशाख मास के मुख्य त्यौहार – वैशाख मास का महत्व इसलिये भी माना जाता है क्योंकि इसी मास में भगवान विष्णु के अवतार जिनमें नर-नारायण, भगवान परशुराम, नृसिंह अवतार और ह्यग्रीव आदि अवतार अवतरित हुए थे. मान्यता है कि देवी सीता भी इसी मास में धरती माता की कोख से प्रकट हुई थी.

इस मास में मुख्य त्यौहार है –  अक्षय तृतीया, सीता नवमी,वैशाख अमावस्या,वैशाख पूर्णिमा


वैशाख मास का महत्व – 


न माधव समो मासो न कृतेन युगं समम्।

                           न च वेदसमं शास्त्रं न तीर्थं गंगया समम्।।” 

अर्थात – वैशाख के समान कोई मास नहीं है, सत्ययुग के समान कोई युग नहीं है, वेद के समान कोई शास्त्र नहीं है, और गंगाजी के समान कोई तीर्थ नहीं है.अपने कतिपय वैशिष्ट्य के कारण वैशाख उत्तम मास है.

कथा है—कि नारद जी ने राजा अम्बरीष से कहा – कि वैशाख मास को ब्रह्माजी ने सब मासों में उत्तम सिद्ध किया है। यह माता की भांति सब जीवों को सदा अभीष्ट वस्तु प्रदान करता है। धर्म, यज्ञ, क्रिया और तपस्या का सार है. यह मास संपूर्ण देवताओं द्वारा पूजित है.

जैसे विद्याओं में वेद-विद्या, मंत्रों में प्रणव, वृक्षों में कल्पवृक्ष, धेनुओं में कामधेनु, देवताओं में विष्णु, वर्णों में ब्राह्मण, प्रिय वस्तुओं में प्राण, नदियों में गंगाजी, तेजों में सूर्य, अस्त्र-शस्त्रों में चक्र, धातुओं में स्वर्ण, वैष्णवों में शिव तथा रत्नों में कौस्तुभमणि उत्तम है, उसी प्रकार धर्म के साधनभूत महीनों में वैशाखमास सबसे उत्तम है.

भगवान विष्णु को प्रसन्न करने वाला इसके समान दूसरा कोई मास नहीं है. जो वैशाख मास में सूर्योदय से पहले स्नान करता है, उससे भगवान विष्णु निरंतर प्रीति करते हैं. पाप तभी तक गर्जते हैं, जब तक मनुष्य वैशाख मास में प्रातःकाल जल में स्नान नहीं करता.

 

                            वैशाख मास में ब्रहममुहूर्त में स्नान का महत्व 

राजन्! वैशाख के महीने में सब तीर्थ, देवता आदि (तीर्थ के अतिरिक्त) बाहर के जल में भी सदैव स्थित रहते हैं. भगवान विष्णु की आज्ञा से मनुष्यों का कल्याण करने के लिए वे सूर्योदय से लेकर छह दंड के भीतर वहां उपस्थित रहते हैं. वैशाख सर्वश्रेष्ठ मास है और शेषशायी भगवान विष्णु को सदा प्रिय है.

                                     वैशाख मास में जल दान का महत्व 

जो पुण्य सब दानों से होता है और जो फल सब तीर्थों के दर्शन से मिलता है, उसी पुण्य और फल की प्राप्ति वैशाख मास में केवल जलदान करने से हो जाती है. जो जलदान में असमर्थ है, ऐसे ऐश्वर्य की अभिलाषा रखने वाले पुरुष को उचित है कि वह दूसरे को प्रबोध करे, दूसरे को जलदान का महत्व समझाए. यह सब दानों से बढ़कर हितकारी है.

जो मनुष्य वैशाख मास में मार्ग पर यात्रियों के लिए प्याऊ लगाता है, वह विष्णुलोक में प्रतिष्ठित होता है, नृपश्रेष्ठ ! प्रपादान (पौसला या प्याऊ) देवताओं, पितरों तथा ऋषियों को अत्यंत प्रिय है. जो प्याऊ लगाकर थके-मांदे पथिकों की प्यास बुझाता है, उस पर ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि देवतागण प्रसन्न होते हैं.

राजन् ! वैशाख मास में जल की इच्छा रखने वाले को जल, छाया चाहने वाले को छाता और पंखे की इच्छा रखने वाले को पंखा देना चाहिए. राजेन्द्र ! जो पीड़ित महात्माओं को प्यार से शीतल जल प्रदान करता है, उसे उतनी ही मात्र से दस हजार राजसूय यज्ञों का फल प्राप्त होता है.

ब्राह्मण को पंखा, छाता, पादुका दान  – श्रम से पीड़ित ब्राह्मण को जो “पंखा” डुलाकर शीतलता प्रदान करता है, वह निष्पाप होकर भगवान् का पार्षद हो जाता है. जो मार्ग में थके हुए श्रेष्ठ द्विज को वस्त्र से भी हवा करता है, वह भगवान विष्णु का सायुज्य प्राप्त कर लेता है. जो शुद्ध चित्त से ताड़ का पंखा देता है, उसके सारे पापों का शमन हो जाता है और वह ब्रह्मलोक को जाता है.

जो विष्णुप्रिय वैशाखमास में “पादुका दान” करता है, वह विष्णुलोक को जाता है। जो मार्ग में अनाथों के ठहरने के लिए विश्रामशाला बनवाता है, उसके पुण्य-फलका वर्णन नहीं किया जा सकता.मध्याह्न में आए हुए ब्राह्मण अतिथि को यदि कोई भोजन दे तो उसे अनंत पुण्य की प्राप्ति होती है.

                            वैशाख मास में इन आठ वस्तुओ का त्याग कर देना चाहिए

स्कन्द पुराण के अनुसार – १.वैशाख में तेल लगाना, २.दिन में सोना, ३.कांस्यपात्र में भोजन करना, ४.खाट पर सोना, ५.घर में नहाना, ६.निषिद्ध पदार्थ खाना, ७.दोबारा भोजन करना तथा ८.रात में खाना – इन आठ बातों का त्याग करना चाहिए-

तैलाभ्यघ्गं दिवास्वापं तथा वै कांस्यभोजनम्।

                                                  खट्वानिद्रां गृहे स्नानं निषि(स्य च भक्षणम्।। 

                                                   वैशाखे वर्जयेदष्टौ द्विभुक्तं नक्तभोजनम्।।

वैशाख में व्रत का पालन करने वाला जो पुरुष पद्म पत्ते पर भोजन करता है, वह सब पापों से मुक्त हो विष्णुलोक जाता है. जो विष्णुभक्त वैशाखमास में नदी-स्नान करता है, वह तीन जन्मों के पापों से मुक्त हो जाता है. जो सूर्योदय के समय किसी समुद्रगामिनी नदी में वैशाख-स्नान करता है, वह सात जन्मों के पापों से तत्काल मुक्त जाता है.

सूर्यदेव के मेष राशि में आने पर भगवान विष्णु का वरदान प्राप्त करने के उद्देश्य से वैशाख मास-स्नान का व्रत लेना चाहिए. स्नान के अनंतर भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहिए.

 

          “श्री श्याम सुन्दर गोस्वामी जी ”

      सेवाधिकारी श्री राधा रानी मन्दिर बरसाना 

          श्री जी बरसाना मण्डल ट्रस्ट (रजि०)

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राधे राधे
??आज की “ब्रज रस धारा”??
दिनांक 07/04/2018

एक दिन भगवान ने देखा-कि व्रज में सब गोप और नंदबाब, किसी यज्ञ की तैयारी में लगे है, सारे व्रज में पकवान बन रहे है. भगवान श्रीकृष्ण सबके अंतर्यामी और सर्वज्ञ है, वे सब जानते है.

 

फिर भी उन्होंने नंदबाब आदि बड़े-बूढ़े गोपो से पूंछा–बाबा आपलोगों के सामने यह कौन-सा उत्सव आ पहुँचा है? इसका क्या फल है? किस उद्देश्य से, कौन लोग, किन साधनों केद्वारा, यह यज्ञ किया करते है? आप बताइये मुझे सुनने की बड़ी उत्कंठा है .

 

नंदबाबा ने कहा-बेटा! भगवान इंद्र वर्षा करने वाले मेघों के स्वामी है, ये मेघ उन्ही के अपने रूप है, वे समस्त प्राणियों को तृप्त करने वाले एवं जीवनदान करने वाले जल बरसाते है.

 

हम उन्ही मेघपति इंद्र की यज्ञ के द्वारा पूजा किया करते है उनका यज्ञ करने के बाद जो कुछ बचारहता है उसी अन्न से हम सब मनुष्य अर्थ, धर्म, काम, की सिद्धि के लिए अपना जीवन निर्वाह करते है.

 

भगवान ने कहा–कर्मणा जायते जंतु: कर्मणैव विलीयते. सुखं दु:खं भयं क्षेमं कर्मणैवाभिपधते..“बाबा! प्राणी अपने कर्म के अनुसार ही पैदा होता और कर्म से ही मर जाता है उसे उसके कर्मो के अनुसार ही सुख-दुख भय और मंगलके निमित्तो की प्राप्ति होती है”

 

ये गौए, ब्राह्मण और गिरिराज का यजन करना चाहिये. इंद्र यज्ञ के लिए जो सामग्रियाँ इकठ्ठी की गयी है उन्ही से इस यज्ञ का अनुष्ठान होने दे.अनेको प्रकार के पकवान – खीर, हलवा, पुआ, पूरी, बनायें जाएँ,

 

व्रज का सारा दूध एकत्र कर लिया जाये, वेदवादी ब्राहाणों के द्वारा भलीभांति हवन करवाया जाये फिर गिरिराज को भोग लगाया जाये इसके बादखूब प्रसाद खा-पीकर सुन्दर-सुन्दर वस्त्र पहनकर गोवर्धन की प्रदक्षिणा की जाये, ऐसा यज्ञ गिरिराज और मुझे भी बहुत प्रिय है .भगवान की इच्छा थी कि इंद्र का घमंड चूर-चूर कर दे.

 

नंदबाबा आदि गोपो ने उनकी बात बड़ी प्रसन्नता से स्वीकार कर ली . भगवान जिस प्रकार कायज्ञ करने को कहा था वैसे यज्ञ उन्होंने प्रारंभ कर दिया .

 

सबने गिरिराज और ब्राह्मणों को सादर भेटे दी, और गौओ को हरी-हरी घास खिलाई फिर गोपिया भलीभांति श्रृंगार करके और बैलो से जुटी गाडियों पर सवार होकर भगवान कृष्ण की लीलाओ का गान करती हुई गिरिराज की परिक्रमा करने लगी.

 

भगवान श्रीकृष्ण गिरिराज के ऊपर एक दूसरा विशाल शरीर धारण करके प्रकट हो गये और ‘मै गिरिराज हूँ’ इस प्रकार कहते हुए उन्होंने अपना बड़ा-सा मुहँ खोला और छप्पन भोग और सारी सामग्री पात्र सहित आरोगने लगे.

 

आन्यौर-आन्यौर,और खिलाओ,और खिलाओ इस प्रकार भगवान ने अपने उस स्वरुप को दूसरे ब्रजवासियो के साथ स्वयं भी प्रणाम किया और कहने लगे – देखो कैसा आश्चर्य है, गिरिराज ने साक्षात् प्रकट होकर हम पर कृपा की है.

 

और पूजन करके सब व्रज लौट आये .जब इंद्र को यह पता चला की मेरी पूजाबंद कर दी गयी है तब वे नंदबाबा और गोपो पर बहुत ही क्रोधित हुए इंद्र को अपने पद का बड़ा घमंड था वे स्वयंको त्रिलोकी का ईश्वर समझते थे उन्होंने क्रोध में तिलमिलाकर प्रलय करने वाले मेघों के संवर्तक नामक मेघों को व्रज पर चढ़ाई करने की आज्ञ दी.

 

और स्वयं पीछे-पीछे ऐरावत हाथी पर चढ कर व्रज का नाश करने चल पड़े .इस प्रकार प्रलय के मेघ बड़े वेग से नंदबाबा के व्रज पर चढ़ आये और मूसलाधार पानी बरसाकर सारे ब्रज को पीड़ित करने लगे चारो ओर बिजलियाँ चमकने लगी.

 

बादल आपस में टकराकर कडकने लगे और प्रचण्ड आँधी की प्रेरणा से बड़े-बड़े ओले और दल-के-दल बादल बार-बार आ-आकर खम्भे के समान मोटी-मोटी धाराएँ गिराने लगे.

 

तब व्रजभूमि का कोना-कोना पानी से भर गया और वर्षा की झंझावत झपाटे से जब एक–एक पशु और ग्वालिने भी ठंड केमारे ठिठुरने और व्याकुल हो गयी.

 

तब सब-के-सब भगवान श्रीकृष्ण की शरण में आये, सब बोले – कृष्ण अब तुम ही एकमात्र हमारे रक्षक हो, इंद्र के क्रोध से अब तुम्ही हमारी रक्षा कर सकते हो.

 

भगवान ने देखा तो वे समझ गये कि ये सब इंद्र की करतूत है वे मन-ही-मन कहने लगे हमने इंद्र का यज्ञ भंग कर दिया है इसी से व्रज का नाश करने के लिए बिना ऋतु के ही यह प्रचंड वायु और ओलो के साथ घनघोर वर्षा कर रहे हैमै भी अपनी योगमाया से इसका भालिभाँती जवाव दूँगा .

 

इस प्रकार कहकर भगवान ने खेल-खेल में एक ही हाथ से गिरिराज गोवर्धन को उखाड़ लिया और जैसे छोटा बच्चा बरसाती छत्ते के पुष्प को उखाडकर हाथ में रख लेते है वैसे ही उन्होंने उस पर्वत को धारण कर लिया.

 

इसके बाद भगवान ने कहा –मैया, बाबाऔर व्रजवासी तुम लोग अपनी गौओ और सब सामग्रियों के साथ इस पर्वत के गड्डे में आकर आराम से बैठ जाओ तब सब-के-सब ग्वालबाल छकडे, गोधन लेकर अंदर घुस गये.

 

थोड़ी देर बाद कृष्ण के सखाओ ने अपनी अपनी लाठिया गोवर्धन पर्वत में लगा दी और कृष्ण से कहने लगे कि ये मत समझना कि केवल तुम ही उठाये हुए हो तब कृष्ण जी ने कहा –

 

“कछु माखन को बल बढ्यो कछु गोपन करि सहाय

श्री राधा जू कि कृपा से मेने गिरिवर लियो उठाय ”

 

भगवान ने सब व्रजवासियो के देखते-देखते भूख प्यास की पीड़ा आराम-विश्राम की आवश्यकता आदि सब कुछ भुलाकर सात दिन तक लगातार उस पर्वत को उठाये रखा वे एक पग भी वहाँसे इधर-उधर नही हुये.

 

श्रीकृष्ण की योगमाया का यह प्रभाव देखकर इंद्र के आश्चर्य का ठिकाना नरहा अपना संकल्प पूरा न होने के कारण उनकी सारी हेकड़ी बंद हो गयी.

 

उन्होंने मेघों को अपने-आप वर्षा करने से रोक दिया. जब आकाश में बादल छट गये और सूरज देखने लगे तब सब लोग धीरे-धीरे सब लोग बाहर निकल आये सबके देखते-ही-देखते भगवान ने गिरिराज को पूर्ववत् उसके स्थान पर रख दिया .और व्रज लौट आये .

 

व्रज पहुँचे तो ब्रजवासियों ने देखा कि व्रज की सारी चीजे ज्यो-की-त्यों पहले की तरह है एक बूंद पानी भी कही नहीं है.तब ग्वालो ने श्रीकृष्ण से पूंछा–कान्हा सात दिन तक लगातार इतना पानी बरसा सब का सब पानी कहाँ गया.

 

भगवान ने सोचा – यदि मै इन ग्वालवालो से कहूँगा कि मैने शेष जीऔर सुदर्शन चक्र को व्रज के चारों ओर लगा रखा था ताकि व्रज में पानी न आये.तो ये व्रजवासियो को विश्वास नहीं होगा.इसलिए भगवान ने कहा– तुम लोगो ने गिरिराज जी को इतना भोग लगाया, पर किसी ने पानी भी पिलाया इसलिए वे ही सारा पानी पी गये .

 

तब सब ने कहा – लाला गिरिराज जी ने इतना खाया कि हम लोग उन्हें पानी पिलाना ही भूल गये .एक दिन भगवान जब एकांत में बैठे थे तब गोलोक से कामधेनु और स्वर्ग से इंद्र अपने अपराध को क्षमा माँगने के लिए आये उन्होंने हाथ जोड़कर १० श्लोको में भगवान की स्तुति की .

 

फिरकामधेनु ने अपने दूध से और इंद्र ने ऐरावत की सूंड के द्वारा लाए हुए आकाश गंगा के जल से देवर्षियो के साथ यदुनाथ श्रीकृष्ण का अभिषेक किया और उन्हें ‘गोविन्द’नाम से संबोधित किया इसके बाद वे स्वर्ग चले गये.“जय जय श्री राधे”

 

“श्री श्याम सुन्दर गोस्वामी जी ”

      सेवाधिकारी श्री राधा रानी मन्दिर बरसाना 

          श्री जी बरसाना मण्डल ट्रस्ट (रजि०)

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??आज की “ब्रज रस धारा”??
दिनांक 30/12/2017

श्री गौडीय षड गोस्वामियो में आप अन्यतम है. ब्रजलीला में आप”अनंग-मंजरी”थे कोई इन्हें श्रीगुण मंजरीभी कहते है.

“अनंगमंजरी यासीत साघ गोपालभट्टक :भट्ट गोवामिनं केचिदाहु: श्रीगुणमंजरी “

 

श्री रंगक्षेत्र में कावेरी के कूल स्थित बेलगुंडी ग्राम में श्री सम्प्रदायी श्रीवैंकटभट्ट के घर में संवत १५५७ में आपका आर्विर्भाव हुआ.जब चैतन्य महाप्रभु संवत १५६८ में दक्षिण यात्रा करते हुए रंग क्षेत्र पधारे और वहाँ श्रीरंगनाथ भगवान के दर्शन किये, तब वहाँ श्रीवैंकटभट्ट जी ने भी महाप्रभु के दर्शन किये.और अपने घर भिक्षा का निमंत्रण दिया.

 

उस समय महाप्रभु ने चातुर्मास इनके ही घर में किया,तब गोपाल भट्ट जी की आयु ११ वर्ष की थी.इन्होने भी महाप्रभु की हर प्रकार से सेवा की और गोपाल जी से महाप्रभु का भी अत्यंत स्नेह हो गया.फिर महा प्रभु ने ही इन्हें वृंदावन जाने की आज्ञादी थी.वृंदावन ने आकर श्रीरूप-सनातनके पास रहने लगे.

 

गोपालभट्ट जी के द्वारा श्रीराधा रमण जी का प्राकट्यएक बार श्रीगोपाल भट्ट गोस्वामी अपनी धर्म प्रचार यात्रा के दौरान जब एक बार गण्डकी नदी में स्नान कर रहे थे, उसी समय सूर्य को अर्घ देते हुए जब अंजुली में जल लिया तो तो एक अद्भुत शलिग्राम शिला आपकी अंजुली में आ गई जब दुबारा अंजलि में एक-एक करके बारह शालिग्राम की शिलायें आ गयीं.जिन्हे लेकर श्री गोस्वामी वृन्दावन धाम आ पहुंचे और यमुना तट पर केशीघाट के निकट भजन कुटी बनाकर श्रद्धापूर्वक शिलाओं का पूजन-अर्चन करने लगे.एक बार वृंदावन यात्रा करते हुए एक सेठ जी ने वृंदावनस्थ समस्त श्री विग्रहों के लिए अनेक प्रकार के बहुमूल्य वस्त्र आभूषण आदि भेट किये.

 

श्री गोपाल भट्ट जी को भी उसनेवस्त्र आभूषण दिए.परन्तु श्री शालग्राम जी को कैसे वे धारण कराते श्री गोस्वामी के हृदय में भाव प्रकट हुआ कि अगर मेरे आराध्य के भी अन्य श्रीविग्रहों की भांति हस्त-पद होते तो मैं भी इनको विविध प्रकार से सजाता एवं विभिन्न प्रकार की पोशाक धारण कराता, और इन्हें झूले पर झूलता.यह विचार करते-करते श्री गोस्वामी जी को सारीरात नींद नहीं आई.प्रात: काल जब वह उठे तो उनके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा, जब उन्होंने देखा कि श्री शालिग्राम जी त्रिभंग ललित द्विभुज मुरलीधर मधुर मूर्ति श्रीव्रजकिशोर श्याम रूप में विराजमान है. श्री गोस्वामी ने भावविभोर होकर वस्त्रालंकार विभूषित कर अपने आराध्य का अनूठा श्रृंगार किया.

 

श्री रूप सनातन आदि गुरुजनों को बुलाया और राधारमणलाल का प्राकटय महोत्सव श्रद्धापूर्वक आयोजित किया गया.यही श्री राधारमण लाल जी का विग्रह आज भी श्री राधारमण देव मंदिर में गोस्वामी समाज द्वारा सेवित है.और इन्ही के साथ गोपाल भट्ट जी के द्वारा सेवित अन्य शालिग्राम शिलाएं भी मन्दिर में स्थापित हैं ।1599 की वैशाख की पूर्णिमा को शालग्राम शिला से राधारमण जी प्रकट हुए थे.हर वर्ष इसी दिन इनका प्राकट्य उत्सव बड़े प्रेम से मनाया जाता है, और उस दिन इनका अभिषेक भी होता है.राधारमण जी का श्री विग्रह वैसे तो सिर्फ द्वादश अंगुल का है, तब भी इनके दर्शन बड़े ही मनोहारी है.

 

श्रीराधारमण विग्रह का श्री मुखारविन्द”गोविन्द देव जी”के समान, वक्षस्थल”श्री गोपीनाथ”के समान तथा चरणकमल”मदनमोहन जी”के समान हैं.इनके दर्शनों से तीनों विग्रहों के दर्शन का फल एक साथ प्राप्त होता है.श्री राधा रमण जी का मन्दिर श्री गौड़ीय वैष्णव सम्प्रदाय के सुप्रसिद्ध मन्दिरों में से एक है.श्री राधा रमण जी उन वास्तविक विग्रहों में से एक हैं, जो अब भी वृन्दावन में ही स्थापित हैं.अन्य विग्रह जयपुर चले गये थे, पर श्री राधा रमणजी ने कभी वृन्दावन को नहीं छोड़ा ।

 

मन्दिर के दक्षिण पार्श्व में श्री राधारमण जी का प्राकट्य स्थल तथा गोपाल भट्ट गोस्वामीजी का समाधि मन्दिर है.गोपालभट्ट द्वारा लिखे ग्रन्थ -श्री सनातन प्रभु के आदेश से श्री गोपाल भट्ट जी ने”लघुहरिभक्ति विलास”नाम से रचना की उसे देखकर श्रीसनातन जी ने उसका परिवर्तन परिवर्धन कर श्रीहरि भक्ति विलास का संपादन किया और उसकी विस्तृत दिग्दर्शिनी नामक टीका लिखी.इस प्रकार अनेक वैष्णव ग्रन्थ प्रणयन में सहायक होकर श्रीमन महाप्रभु के भक्ति रस सिद्धांतों के प्रचार प्रसार के लिए अनेको व्यक्तियों के लिए दीक्षा दी.

 

संवत १६४३ की श्रावण कृष्ण पंचमी को आप नित्य लीला में प्रविष्ट हो गए.श्री राधा रमण जी के प्राकट्य स्थल के पार्श्व में इनकी पावन समाधि का दर्शन अब भी होता है.

?श्री श्याम सुन्दर गोस्वामी जी ?

 श्री मध्वाचार्य जी 

(तुलु):(1238-1317) भारत में भक्ति आन्दोलन के समय के सबसे महत्वपूर्ण दार्शनिकों में से एक थे। वे पूर्णप्रज्ञ व आनंदतीर्थ के नाम से भी प्रसिद्ध हैं। वे तत्ववाद के प्रवर्तक थे जिसे द्वैतवाद के नाम से जाना जाता है। द्वैतवाद, वेदान्त की तीन प्रमुख दर्शनों में एक है। मध्वाचार्य को वायु का तृतीय अवतार माना जाता है (हनुमान और भीम क्रमशः प्रथम व द्वितीय अवतार थे)।

मध्वाचार्य कई अर्थों में अपने समय के अग्रदूत थे, वे कई बार प्रचलित रीतियों के विरुद्ध चले गये हैं। उन्होने द्वैत दर्शन का प्रतिपादन किया। इन्होने द्वैत दर्शन के ब्रह्मसूत्र पर भाष्य लिखा और अपने वेदांत के व्याख्यान की तार्किक पुष्टि के लिये एक स्वतंत्र ग्रंथ ‘अनुव्याख्यान’ भी लिखा। श्रीमद्भगवद्गीता और उपनिषदों पर टीकाएँ, महाभारत के तात्पर्य की व्याख्या करनेवाला ग्रंथ महाभारततात्पर्यनिर्णय तथा श्रीमद्भागवतपुराण पर टीका ये इनके अन्य ग्रंथ है। ऋग्वेद के पहले चालीस सूक्तों पर भी एक टीका लिखी और अनेक स्वतंत्र प्रकरणों में अपने मत का प्रतिपादन किया। ऐसा लगता है कि ये अपने मत के समर्थन के लिये प्रस्थानत्रयी की अपेक्षा पुराणों पर अधिक निर्भर हैं।

जीवनी

इनका जन्म दक्षिण कन्नड जिले के उडुपी शिवल्ली नामक स्थान के पास पाजक नामक एक गाँव में सन् १२३८ ई में हुआ। अल्पावस्था में ही ये वेद और वेदांगों के अच्छे ज्ञाता हुए और संन्यास लिया। पूजा, ध्यान, अध्ययन और शास्त्रचर्चा में इन्होंने संन्यास ले लिया। शंकर मत के अनुयायी अच्युतप्रेक्ष नामक आचार्य से इन्होंने विद्या ग्रहण की और गुरु के साथ शास्त्रार्थ कर इन्होंने अपना एक अलग मत बनाया जिसे “द्वैत दर्शन” कहते हैं। इनके अनुसार विष्णु ही परमात्मा हैं। रामानुज की तरह इन्होंने श्री विष्णु के आयुधों, शंख, चक्र, गदा और पद्म के चिन्हों से अपने अंगों को अंलकृत करने की प्रथा का समर्थन किया। देश के विभिन्न भागों में इन्होंने अपने अनुयायी बनाए। उडुपी में कृष्ण के मंदिर का स्थापन किया, जो उनके सारे अनुयायियों के लिये तीर्थस्थान बन गया। यज्ञों में पशुबलि बंद कराने का सामाजिक सुधार इन्हीं की देन है। 79 वर्ष की अवस्था (सन् 1317 ई) में इनका देहावसान हुआ। नारायण पंडिताचार्य कृत सुमध्वविजय और मणिमंजरी नामक ग्रंथों में मध्वाचार्य की जीवनी ओर कार्यों का पारंपरिक वर्णन मिलता है। परंतु ये ग्रंथ आचार्य के प्रति लेखक के श्रद्धालु होने के कारण अतिरंजना, चमत्कार और अविश्वसनीय घटनाओं से पूर्ण हैं। अत: इनके आधार पर कोई यथातथ्य विवरण मध्वाचार्य के जीवन के संबंध में नहीं उपस्थित किया जा सकता।

दर्शन

श्री मध्वाचार्य ने प्रस्थानत्रयी ग्रंथों से अपने द्वैतवाद सिद्धांत का विकास किया। यह `सद्वैष्णव´ भी कहा जाता है, क्योंकि यह श्री रामानुजाचार्य के श्री वैष्णवत्व से अलग है।

श्री मध्वाचार्य ने `’पंच भेद’ का अध्ययन किया जो `अत्यन्त भेद दर्शनम्´ भी कहा जाता है। उसकी पांच विशेशतायें हैं :

  • (क) भगवान और व्यक्तिगत आत्मा की पृथकता,

  • (ख) परमात्मा और पदार्थ की पृथकता,

  • (ग) जीवात्मा एवं पदार्थ की पृथकता,

  • (घ) एक आत्मा और दूसरी आत्मा में पृथकता तथा

  • (ङ) एक भौतिक वस्तु और अन्य भौतिक वस्तु में पृथकता।

`अत्यन्त भेद दर्शनम्´ का वर्गीकरण पदार्थ रूप में इस प्रकार भी किया गया है :

  • (अ) स्वतंत्र

  • (आ) आश्रित

स्वतंत्र वह है जो पूर्ण रूपेण स्वतंत्र है। जो भगवान या सनातन सत्य है। लेकिन जीवात्मा और जगत् भगवान पर आश्रित हैं। इसलिये भगवान उनका नियंत्रण करते हैं। परमात्मा स्वतंत्र हैं। इसलिए उनका वर्गीकरण असम्भव है। आश्रित तत्त्व सकारात्मक एवं नकारात्मक रूप में विभाजित किये जाते हैं। सकारात्मक को भी चेतन (जैसे आत्मा) और अचेतन (जैसे वे पदार्थ) में वर्गीकृत किया जा सकता है।

अचेतन तत्त्व को परिभाशित करने के पहले मध्वाचार्य स्वतंत्र और आश्रित के बारे में बताते हैं जो संसार से नित्य मुक्त हैं। इस विचारधारा के अनुसार `विष्णु` स्वतंत्र हैं जो विवेकी और संसार के नियन्ता हैं। उनकी शक्ति लक्ष्मी हैं जो नित्य मुक्त हैं। कई व्यूहों एवं अवतारों के रूपों में हम विष्णु को पा सकते हैं (उन तक पहुँच सकते हैं)। उसी प्रकार अत्यन्त आश्रित लक्ष्मी भी विष्णु की शक्ति हैं और नित्य भौतिक शरीर लिये ही कई रूप धारण कर सकती हैं। वह दुख-दर्द से परे हैं। उनके पुत्र ब्रह्मा और वायु हैं। `प्रकृति´ शब्द प्र = परे + कृति = सृष्टि का संगम है।

मध्वाचार्य ने सृष्टि और ब्रह्म को अलग माना है। उनके अनुसार विष्णु भौतिक संसार के कारण कर्ता हैं। भगवान प्रकृति को लक्ष्मी द्वारा सशक्त बनाते हैं और उसे दृश्य जगत में परिवर्तित करते हैं। प्रकृति भौतिक वस्तु, शरीर एवं अंगों का भौतिक कारण है। प्रकृति के तीन पहलुओं से तीन शक्तियाँ आविर्भूत हैं : लक्ष्मी, भू (सरस्वती-धरती) और दुर्गा। अविद्या (अज्ञान) भी प्रकृति का ही एक रूप है जो परमात्मा को जीवात्मा से छिपाती है।

मध्वाचार्य जी का विश्वास है कि प्रकृति से बनी धरती माया नहीं, बल्कि परमात्मा से पृथक सत्य है। यह दूध में छिपी दही के समान परिवर्तन नहीं है, न ही परमात्मा का रूप है। इसलिए यह अविशेष द्वैतवाद ही है।

मध्वाचार्य जी ने रामानुजाचार्य का आत्माओं का वर्गीकरण को स्वीकार किया। जैसे :–

  • (क) नित्य – सनातन (लक्ष्मी के समान)

  • (ख) मुक्त – देवता, मनुश्य, ॠषि, सन्त और महान व्यक्ति

  • (ग) बद्ध – बँधे व्यक्ति

मध्वाचार्य ने इनके साथ और दो वर्ग जोड़ा जो मोक्ष के योग्य है और जो मोक्ष के योग्य नहीं है :

  • पूर्ण समर्पित लोग, बद्ध भी मोक्ष के लिए योग्य हैं।

  • जो मोक्ष के लिए योग्य नहीं हैं। वे हैं:

  • (क)नित्य संसारी : सांसारिक चक्र में बद्ध।

  • (ख)तमोयोग्य : जिन्हें नरक जाना है।

इस वर्गीकरण के अनुसार जीवात्मा का एक अलग अस्तित्व है। इस प्रकार एक आत्मा दूसरी आत्मा से भिन्न होती हैं। इसका अर्थआत्मा अनेक हैं। जीवात्मा परमात्मा एवं प्रकृति से भिन्न होने से परमात्मा के निर्देश पर आश्रित है। उनके पिछले जन्मों के आधार (कर्मो) पर परमात्मा उन्हें प्रेरित करते हैं। पिछले कर्मो के अनुसार जीवात्मा कष्ट झेलते हैं, जिससे उनकी आत्मा पवित्र हो जाती है और जीवन-मरण से मुक्त होकर आनन्द का अनुभव करती हैं जो आत्मा की सहजता है। आनन्दानुभूति में जीवात्मा भिन्न होती है। लेकिन उनमें कोई वैमनस्य नहीं होता और वे पवित्र होकर परब्रह्म को प्राप्त कर लेते हैं। लेकिन वे परमात्मा के बराबर नहीं हो सकतीं। वे परमात्मा की सेवा के लायक हो जाती हैं। नवधा भक्ति मार्ग से आत्मा परमात्मा की कृपा से मुक्ति प्राप्त कर लेती है।

 

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