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श्री राधे 

“श्रील नारायण भट्ट ज़ू जयति”

“श्री नारायण दास गोस्वामी जयति”

??आज की ब्रज रस धारा ??

दिनांक 25/05/2018

कृष्ण क्यों राधा जी के चरण दबाते है

ब्रज लीला में मुख्य वस्तु है “प्रेम”, ब्रह्म का सर्वसार ही प्रेम है. श्री कृष्ण राधा रानी के चरण पकड़ते हैं इसे समझने से पहले एक बात समझना जरुरी है कि राधा रानी कौन हैं ?

बहुत थोड़े में समझ लो कि ‘रा’ धातु के बहुत से अर्थ होते हैं. देवी भागवत में इसके बारे में लिखा है कि जिससे समस्त कामनायें, कृष्ण को पाने की कामना तक भी, सिद्ध होती हैं.  सामरस उपनिषद में वर्णन आया है कि राधा नाम क्यों पड़ा ?

भगवान सत्य संकल्प हैं. उनको युद्ध की इच्छा हुई तो उन्होंने जय विजय को श्राप दिला दिया.

तपस्या की इच्छा हुई तो नर-नारायण बन गये. उपदेश देने की इच्छा हुई तो भगवान कपिल बन गये.

उस सत्य संकल्प के मन में अनेक इच्छाएं उत्पन्न होती रहती हैं. भगवान के मन में अब इच्छा हुई कि हम भी आराधना करें. हम भी भजन करें.

अब किसका भजन करें ?   उनसे बड़ा कौन है ?  तो श्रुतियाँ कहती हैं कि स्वयं ही उन्होंने अपनी आराधना की. ऐसा क्यों किया ?  क्योंकि वो अकेले ही तो हैं, तो वो किसकी आराधना करेंगे.  

तो श्रुति कहती हैं कि कृष्ण के मन में आराधना की इच्छा प्रगट हुई तो श्री कृष्ण ही राधा रानी के रूप में आराधना से प्रगट हो गये. 

इसीलिए ये मान आदि लीला में जो कृष्ण चरण पकड़ते है, एक विशेष प्रेम लीला है. राधा रानी को तो छोड़ दो, वो तो उनका ही रूप हैं, उनकी ही आत्मा हैं.

भगवान कहते हैं – कि तुम निरपेक्ष हो जाओ तो मैं तुम्हारे भी चरणों के पीछे घूमुंगा कि जिससे तुम्हारी चरण रज मेरे ऊपर पड़ जाये और  मैं पवित्र हो जाऊं.

भगवान तो रसिक हैं जो भक्तों के चरणों की रज के लिये उनके पीछे दौड़ते हैं.

जब भगवान भक्तों की चरण रज के लिये भक्तों के पीछे दौड़ते हैं तो राधा रानी के चरण पकडें तो इसमें क्या आश्चर्य ?

जब वो श्री जी के चरण छूने जाते हैं तो वो प्रेम से हुंकार करती हैं. तो रसिक श्याम डर जाते हैं कि कहीं ऐसा ना हो लाड़ली जी मान कर लें.

इसीलिए भयभीत होकर पीछे हट जाते हैं.  उन चरणों से ही जो सरस रस बिखरा उस रस को पाकर के गोपीजन ही नहीं स्वयं श्री कृष्ण भी धन्य हुए.

बिहारी जी के प्रकटकर्ता स्वामी हरिदास जी लिखते हैं कि (ता ठाकुर को ठकुराई —–) .

वो बोले कि ये मत समझना कि बांके बीहारी जी सर्वोच्चपति हैं.  सब ठाकुरों के ठाकुर ये बांके बिहारी हैं. लेकिन इनकी भी ठकुराइन हैं श्री राधा रानी. हम उस गाँव में बैठे हैं.

“जय जय श्री राधे “

“श्री श्याम सुन्दर गोस्वामी जी ”

      सेवाधिकारी श्री राधा रानी मन्दिर बरसाना 

          श्री जी बरसाना मण्डल ट्रस्ट (रजि०)

            Website:- www.sjbmt.in

Contact Us:-08923563256,07417699169

श्री राधे 

“श्रील नारायण भट्ट ज़ू जयति”

“श्री नारायण दास गोस्वामी जयति”

??आज की ब्रज रस धारा ??

दिनांक 11/05/2018

राधा रानी जी के वंशज

सूर्यवंशी महाराज दिलीप हुए. वो बड़े गौ भक्त थे .राधा रानी सूर्य वंशी थीं. राम जी भी सूर्य वंशी थे.

इनकी परम्परा इस प्रकार है. महाराज दिलीप तक तो एक ही वंश आता है.  दिलीप ने गाय की भक्ति की क्योंकि उनको कामधेनु गाय का श्राप था.

ये जब एक बार स्वर्ग में गये थे तो जल्दी-जल्दी में गाय को प्रणाम करना भूल गए थे.

कामधेनु ने श्राप दिया कि तुम पुत्र की इच्छा से जा रहे हो तुम्हें पुत्र नहीं होगा.

 

ये श्राप उस समय दिलीप सुन नहीं सके थे क्योंकि आकाश में इंद्र का ऐरावत हाथी क्रीड़ा कर रहा था.

दीघर्काल तक भी प्रयत्न करने पर उनको जब पुत्र की प्राप्ति नहीं हुई तो गुरु वशिष्ठ के पास गए.

उन्होंने ध्यान करके बताया कि राजन तुम्हें तो श्राप है.  तुम्हें पुत्र कभी हो ही नहीं सकता.

ये अमोघ श्राप है कामधेनु गाय का वशिष्ट जी ने कहा कि तुम गाय सेवा करो. कामधेनु की लड़की हमारे पास है वो भी कामधेनु है. सिर्फ वही इस श्राप को नष्ट कर सकती है.

दिलीप ने अद्भुत सेवा की .इनकी परीक्षा भी हुई.  परीक्षा में सिंह ने आक्रमण किया और दिलीप ने अपना शरीर सिंह को दे दिया .

सिंह बोला कि मैं पार्वती से नियुक्त सिंह हूँ, तुम इस साधारण गाय के लिए अपना शरीर क्यों नष्ट करते हो ?

जीवित रहोगे तो अनेक तरह की तपस्या आदि कर सकोगे .

उन्होंने कहा कि ये शरीर जीवित रखने से कोई लाभ नहीं अगर हम गाय को नहीं बचा सकते.

इससे तो मर जाना अच्छा है. मनुष्य को उतनी ही देर जीना चाहिए जब तक मशाल की तरह उस में प्रकाश हो. अगर प्रकाश न रहे तो जीने से कोई लाभ नहीं.

उससे अच्छा है मर जाना. सिंह ने कहा तो फिर तैयार हो जाओ मरने के लिए. वो तैयार हो गए. सिंह आकाश में ऊपर उछला पर ये सिर नीचे करके बैठ गए.

हिले नहीं कि सिंह हमारे ऊपर प्रहार करेगा. तब तक क्या देखते हैं कि एक फूलों की माला आकाश से उनके ऊपर आकर पड़ गयी.

उन्होंने सामने देखा तो गाय मुस्करा रही थी. बोली मैंने तुम्हारी परीक्षा ली थी. तुम इसमें पास हो गये हो.

जाओ मेरी माँ का श्राप मिटता है. तुम्हारा पुत्र होगा बड़ा प्रतापी. उनका नाम रघु होगा.

उस गौ सेवा को देख करके राजा दिलीप के लडकों में से जो धर्म नाम के सबसे छोटे लड़के थे उन्होंने कहा कि हमें राज्य नहीं चाहिए. हमें कुछ नहीं चाहिए हम तो सिर्फ गाय की सेवा करेंगे.

उसी वंश में आगे चलकर अभय कर्ण हुए. शत्रुघ्न जी जब ब्रज में आये तो अभय कर्ण को साथ लाये क्योंकि ये भी बड़े गाय भक्त थे. शत्रुघ्न जी जानते थे कि ये भूमि गाय के लायक है.

जब अभय कर्ण जी यहाँ आये तो बड़े प्रसन्न हुए और गाय सेवा करने लग गए.

इसीलिए रघुवंश का ये एक अलग वंश आता है. इन्हीं के वंश में रशंग जी हुए जिन्होंने बरसाना बसाया है और इन्हीं के वंश में राधा रानी होती हैं.

ये बरसाने का इतिहास है. रशंग जी के वंश में ही राजा वृषभानु और राधा रानी हुई हैं. ये सूर्यवंशी थीं और श्री कृष्ण चंद्रवंशी थे.

“जय जय श्री राधे ” 

 

“श्री श्याम सुन्दर गोस्वामी जी ”

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श्री राधे 

“श्रील नारायण भट्ट ज़ू जयति”

“श्री नारायण दास गोस्वामी जयति”

??आज की ब्रज रस धारा ??

दिनांक 08/05/2018

 

राधाजी की चिंता का निवारण

गौ लोक धाम में जब देवताओ ने भगवान श्री कृष्ण से पृथ्वी के उद्धार के करने को कहा तो भगवान ने उन्हें आश्वासन दिया में अवतार लूँगा.

 

जब भगवान श्रीकृष्ण इस प्रकार बाते कर रहे थे उसी क्षण ‘अब प्राणनाथ से मेरा वियोग हो जायेगा ‘ यह समझकर राधिका जी व्याकुल हो गई और मूर्छित होकर गिर पड़ी.

श्री राधिका जी ने कहा – आप पृथ्वी का भार उतारने के लिए अवश्य पधारे परन्तु मेरी एक प्रतिज्ञा है प्राणनाथ आपके चले जाने पर एक क्षण भी मै यहाँ जीवन धारण नहीं कर सकूँगी मेरे प्राण इस शरीर से वैसे ही उड़ जायेगे जैसे कपूर के धूलिकण

श्री भगवान ने कहा -तुम विषाद मत करो! मै तुम्हारे साथ चलूँगा.

श्री राधिका जी ने कहा – परन्तु प्रभु !जहाँ वृंदावन नहीं है, यमुना नदी नहीं है, और गोवर्धन पर्वत भी नहीं है, वहाँ मेरे मन को सुख नहीं मिल सकता.

तब राधिका जी के इस प्रकार कहने पर भगवान श्रीकृष्ण ने अपने धाम से चौरासी कोस भूमि ,गोवर्धन पर्वत और यमुना नदी को भूतल पर भेजा.

तब ब्रह्मा जी ने कहा – भगवन मेरे लिए कौन सा स्थान होगा. और ये सारे देवता किन ग्रहों में रहेगे और किन-किन नामो से प्रसिद्ध होगे ?

भगवान ने कहा – मै स्वयं वासुदेव और देवकी जी के यहाँ प्रकट होऊँगा.मेरे कालस्वरूप ये शेष रोहिणी के गर्भ से जन्म लेगे.

* साक्षात् “लक्ष्मी” राजा भीष्मक के घर पुत्री रूप से उत्पन्न होगी इनका नाम ‘रुक्मणि’ होगा.

पार्वती – ‘जाम्बवती’ के नाम से प्रकट होगी.

* यज्ञपुरुष की पत्नी “दक्षिणा देवी” –  ‘लक्ष्मणा’ नाम धारण करेगी.

* यहाँ जो “विरजा” नाम की नदी है–  वही ‘कालिंदी’ नाम से विख्यात होगी.

* भगवंती “लज्जा”-  का नाम ‘भद्रा’ होगा.

समस्त पापों का प्रशमन करने वाली “गंगा”-  ‘मित्रविन्दा’ नाम धारण करेगी.

जो इस समय “कामदेव” है वे ही रुक्मिणी के गर्भ से ‘प्रधुम्न’ रूप में उत्पन्न होगे. प्रधुम्न के घर तुम्हारा (ब्रह्मा) अवतार होगा. उस समय तुम्हे ‘अनिरुद्ध’ कहा जायेगा.

* ये वसु जो “द्रोंण” नाम से प्रसिद्ध है व्रज में ‘नन्द‘ होगे, और स्वयं इनकी प्राणप्रिया “धरा देवी” ‘यशोदा’ नाम धारण करेगी.

* “सुचन्द्र” ‘वृषभानु’ बनेगे और इनकी सहधर्मिणी “कलावती” धराधाम पर ‘कीर्ति‘ के नाम से प्रसिद्ध होगी फिर उन्ही के यहाँ इन राधिका जी का प्राकट्य होगा.

*’सुबल’ और ‘श्रीदामा’ नाम के मेरे सखा ‘नन्द’ और ‘उपनन्द’ के घर जन्म धारण करेगे, इसी प्रकार मेरे और भी सखा जिनके नाम ‘स्तोककृष्ण’ ,’अर्जुन’ और ‘अंशु’ आदि सभी ‘नौ नन्दों’ के यहाँ प्रकट होगे. व्रजमंडल में जो छै वृषभानु है उनके गृह ‘विशाल’  ‘ऋषभ’ ‘तेजस्वी देवप्रस्थ’ और ‘व्ररुथप’ नाम के मेरे सखा अवतीर्ण होगे.

ब्रह्मा जी ने कहा – किसे “नन्द” कहा जाता है? और किसे “उपनन्द” और “वृषभानु” के क्या लक्षण है ?

भगवान ने कहा –  जो गौशालाओ में सदा गौओ का पालन करते रहते है और गौ-सेवा ही जिनकी जीविका है उन्हें मैंने “गोपाल” संज्ञा दी है. अब उनके लक्षण सुनो –

नन्द – गोपालो के साथ “नौ लाख गायों के स्वामी को नन्द” कहा जाता है.

उपनन्द – “पांच लाख गौओ का स्वामी उपनन्द” कहा जाता है.

वृषभानु – वृषभानु नाम उसका पडता है जिसके अधिकार में “दस लाख गौए” रहती है.

नन्दराज– ऐसे ही जिसके यहाँ “एक करोड गौओ की रक्षा” होती है वह “नन्दराज” कहलाता है.

वृषभानुवर– “पचास लाख गौओ के अध्यक्ष” की “वृषभानुवर” संज्ञा है.

सुचन्द्र और द्रोण – ये दो ही व्रज में इस प्रकार के सम्पूर्ण लक्षणों से संपन्न गोपराज बनेगे.

“जय जय श्री राधे “

 

          “श्री श्याम सुन्दर गोस्वामी जी ”

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पीपल के वृक्ष की पूजा क्यों करते हैं?

पीपल का वृक्ष सब वृक्षों में पवित्र माना गया है. पीपल को संस्कृत में अश्वत्थ कहते है. हिन्दुओ की धार्मिक आस्था के अनुसार विष्णु का पीपल के वृक्ष में निवास है.

 

श्रीमदभगवत गीता में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने बताया है-“अश्वत्थ: सर्ववृक्षाणां” अर्थात वृक्षों में, मै पीपल हूँ. स्कंध पुराण में बताया गया है.

अर्थात पीपल के वृक्ष में ब्रह्म, विष्णु, महेश तीनो देवताओ का वास होता है, पीपल की जड़ में ‘विष्णुजी’,तने में ‘केशव’ (कृष्णजी), शाखाओ में ‘नारायण’,पत्तों में भगवान ‘हरि’ और फलो में समस्त देवताओं का निवास है.

 

पीपल को प्रणाम करने और उसकी परिक्रमा करने से आयु वृद्धि होती है। पीपल को जल से संचित करने वाला व्यक्ति के सारे पापों से मुक्त हो जाता है.

                               अश्वत्थ: पूजितोयत्र पूजिता:सर्व देवता:।

अर्थात शास्त्रों में वर्णित है कि पीपल की सविधि पूजा-अर्चना करने से सम्पूर्ण देवता स्वयं ही पूजित हो जाते हैं. पीपल का वृक्ष लगाने वाले की वंश परम्परा कभी विनष्ट नहीं होती. पीपल की सेवा करने वाले सद्गति प्राप्त करते हैं.

पीपल में पितरों का वास भी माना गया है. पीपल में सभी तीर्थों का निवास माना गया है शनि की साढे साती में पीपल के पूजन और परिक्रमा का विधान बताया गया है.

 

रात में पीपल की पूजा को निषिद्ध माना गया है.क्योंकि ऎसा माना जाता है कि रात्री में पीपल पर दरिद्रता बसती है और सूर्योदय के बाद पीपल पर लक्ष्मी का वास माना गया है.

वैज्ञानिक द्रष्टिकोण-
पीपल का वृक्ष २४ घंटे ऑक्सीजन छोड़ता है जो प्राणधारियो के लिए प्राण वायु कही जाती है. इस गुण के अतिरिक्त इसकी छाया सर्दियो में गर्मी देती है और गर्मियो में सर्दी, पीपल के पत्तों का स्पर्श होने पर वायु में मिले संक्रामक वायरस नष्ट हो जाते हैं. अतः वैज्ञानिक द्रष्टिकोण से भी यह वृक्ष पूजनीय है.

पीपल की पूजा साक्षात देव शक्तियों के आवाहन और प्रभाव से पितृदोष, ग्रह दोष, सर्पदोष दूर कर लंबी उम्र, धन-संपत्ति, संतान, सौभाग्य व शांति देने वाली मानी गई है.

सूर्य-चन्द्र ग्रहण के समय भोजन क्यों वर्जित है ?

ग्रहण काल में भोजन  –  
सूर्य और चंद्रग्रहण के समय भोजन निषिद्ध है. प्राचीन ऋषियों के अनुसार, ग्रहण के दौरान खाद्य पदार्थो तथा जल आदि में सूक्ष्म जीवाणु एकत्रित होकर उन्हें दूषित कर देते है जिससे विभिन्न रोग होने की संभावना रहती है

सूर्य-चंद्र ग्रहण के समय मनुष्य के पेट की पाचन-शक्ति कमजोर हो जाती है, जिसके कारण इस समय किया गया भोजन अपच, अजीर्ण आदि शिकायतें पैदा कर शारीरिक या मानसिक हानि पहुँचा सकता है.

सूतक काल –

भारतीय धर्म विज्ञानवेत्ताओं का मानना है कि सूर्य-चंद्र ग्रहण लगने से १२ घंटे पूर्व से ही इसका कुप्रभाव शुरू हो जाता है.अंतरिक्षीय प्रदूषण के समय को सूतक काल कहा गया है। इसलिए “सूतक काल” और ग्रहण के समय में भोजन तथा पेय पदार्थों के सेवन की मनाही की गई है. बूढ़े, बालक और रोगी एक प्रहर पूर्व खा सकते हैं.

स्कंद पुराण’ के अनुसार ग्रहण के अवसर पर दूसरे का अन्न खाने से बारह वर्षो का एकत्र किया हुआ सब पुण्य नष्ट हो जाता है. देवी भागवत में आता हैः सूर्यग्रहण या चन्द्रग्रहण के समय भोजन करने वाला मनुष्य जितने अन्न के दाने खाता है, उतने वर्षों तक अरुतुन्द नामक  नरक में वास करता है.

ग्रहण काल 

ग्रहण से हमारी जीवन शक्ति का हास होता है और तुलसी दल (पत्र) में विद्युत शक्ति व प्राण शक्ति सबसे अधिक होती है, इसलिए सौर मंडलीय ग्रहण काल में ग्रहण प्रदूषण को समाप्त करने के लिए भोजन तथा पेय सामग्री में तुलसी के कुछ पत्ते डाल दिए जाते हैं। जिसके प्रभाव से न केवल भोज्य पदार्थ बल्कि अन्न, आटा आदि भी प्रदूषण से मुक्त बने रह सकते हैं.

पुराणों की मान्यता के अनुसार राहु चंद्रमा को तथा केतु सूर्य को ग्रसता है. चन्द्र ग्रहण में मन की शक्ति क्षीण होती है, जबकि सूर्य ग्रहण के समय जठराग्नि, नेत्र तथा पित्त की शक्ति कमजोर पड़ती है.

गर्भवती स्त्री के लिए 

गर्भवती स्त्री को सूर्य-चंद्र ग्रहण नहीं देखने चाहिए, क्योंकि उसके दुष्प्रभाव से शिशु अंगहीन होकर विकलांग बन सकता है, गर्भपात की संभावना बढ़ जाती है.  इसके लिए गर्भवती के उदर भाग में गोबर और तुलसी का लेप लगा दिया जाता है, जिससे कि राहु-केतु उसका स्पर्श न करें.

ग्रहण काल में वर्जित चीजे

1. – सूर्यग्रहण मे ग्रहण से चार प्रहर पूर्व और चंद्र ग्रहण मे तीन प्रहर पूर्व भोजन नहीं करना चाहिये । बूढे बालक और रोगी एक प्रहर पूर्व तक खा सकते हैं ग्रहण पूरा होने पर सूर्य या चंद्र, जिसका ग्रहण हो,

2. – ग्रहण के दिन पत्ते, तिनके, लकड़ी और फूल नहीं तोडना चाहिए. बाल तथा वस्त्र नहीं निचोड़ने चाहिये व दंत धावन नहीं करना चाहिये.

3. – ग्रहण के समय  तेल लगाना,मालिश या उबटन किया तो व्यक्ति कुष्‍ठ रोगी होता है ,ग्रहण के समय सोने से रोग पकड़ता है, लघुशंका करने से घर में दरिद्रता आती है, मल त्यागने से पेट में कृमि रोग पकड़ता है,  मैथुन  करना और भोजन करना जल पीना, – ये सब कार्य वर्जित हैं.

4. –  ग्रहण के समय गायों को घास, पक्षियों को अन्न, जरुरतमंदों को वस्त्र दान से अनेक गुना पुण्य प्राप्त होता है.

5. – भागवत’ में आता है कि भूकंप एवं ग्रहण के अवसर पृथ्वी को खोदना नहीं चाहिये.

 

ग्रहण के पूर्व

1.
 – ग्रहण लगने के पूर्व नदी या घर में उपलब्ध जल से स्नान करके भगवान्‌ का पूजन, यज्ञ, जप करना चाहिए. भजन-कीर्तन करके ग्रहण के समय का सदुपयोग करें.

2. – भगवान वेदव्यास जी ने परम हितकारी वचन कहे हैं- चन्द्रग्रहण में किया गया पुण्यकर्म (जप, ध्यान, दान आदि) एक लाख गुना और सूर्य ग्रहण में दस लाख गुना फलदायी होता है. यदि गंगा जल पास में हो तो चन्द्रग्रहण में एक करोड़ गुना और सूर्यग्रहण में दस करोड़ गुना फलदायी होता है।

3. – ग्रहण के दौरान कोई कार्य न करें। ग्रहण के समय में मंत्रों का जाप करने से सिद्धि प्राप्त होती है.

ग्रहण समाप्ति पर 

1. – ग्रहण समाप्त हो जाने पर स्नान करके ब्राह्‌मण को दान देने का विधान है.
2. – पुराना पानी, अन्न नष्ट कर नया भोजन पकाया जाता है और ताजा भरकर पिया जाता है.

धार्मिक कार्यों में मौलि क्यों बांधते हैं?

हिंदू धर्म में प्रत्येक धार्मिक कर्म यानि पूजा-पाठ, यज्ञ, हवन आदि के पूर्व ब्राह्मण द्वारा यजमान के दाएं हाथ में मौली(एक विशेष धार्मिक धागा) बांधी जाती है. मौली को रक्षा सूत्र, कलावा आदि भी कहते हैं.जिसका अपना धार्मिक और वैज्ञानिक महत्व है.

 

शास्त्रों का ऐसा मत है कि मौलि बांधने से त्रिदेव – ब्रह्मा, विष्णु व महेश तथा तीनों देवियों- लक्ष्मी, पार्वती व सरस्वती की कृपा प्राप्त होती है.

 

ब्रह्मा की कृपा से “कीर्ति”, विष्णु की अनुकंपा से “रक्षा बल” मिलता है तथा शिव “दुर्गुणों” का विनाश करते हैं. इसी प्रकार लक्ष्मी से “धन”, दुर्गा से “शक्ति” एवं सरस्वती की कृपा से “बुद्धि” प्राप्त होती है.


शरीर विज्ञान की द्रष्टि से मौली का महत्व 

शरीर विज्ञान की दृष्टि से अगर देखा जाए तो मौलि बांधना उत्तम स्वास्थ्य भी प्रदान करती है. चूंकि मौलि बांधने से त्रिदोष- वात, पित्त तथा कफ का शरीर में सामंजस्य बना रहता है. शरीर की संरचना का प्रमुख नियंत्रण हाथ की कलाई में होता है, अतः यहां मौली बांधने से व्यक्ति स्वस्थ रहता है.

 

ऐसी भी मान्यता है कि इसे बांधने से बीमारी अधिक नहीं बढती है. ब्लड प्रेशर, हार्ट एटेक, डायबीटिज और लकवा जैसे रोगों से बचाव के लिये मौली बांधना हितकर बताया गया है. मौली शत प्रतिशत कच्चे धागे (सूत) की ही होनी चाहिये.

 

मौलि बांधने की प्रथा तब से चली आ रही है जब दानवीर राजा बलि के लिए वामन भगवान ने उनकी कलाई पर रक्षा सूत्र बांधा था.

शास्त्रों में भी इसका इस श्लोक के माध्यम से मिलता है –

” येन बद्धो बलीराजा दानवेन्द्रो महाबल:
                                                                       

तेन त्वामनुबध्नामि रक्षे मा चल मा चल”..

इस मंत्र का सामान्यत: यह अर्थ लिया जाता है कि दानवों के महाबली राजा बलि जिससे बांधे गए थे, उसी से तुम्हें बांधता हूं. हे रक्षे!(रक्षासूत्र) तुम चलायमान न हो, चलायमान न हो.

 

धर्मशास्त्र के विद्वानों के अनुसार इसका अर्थ यह है कि रक्षा सूत्र बांधते समय ब्राह्मण या पुरोहत अपने यजमान को कहता है कि जिस रक्षासूत्र से दानवों के महापराक्रमी राजा बलि धर्म के बंधन में बांधे गए थे अर्थात् धर्म में प्रयुक्त किए गये थे, उसी सूत्र से मैं तुम्हें बांधता हूं, यानी धर्म के लिए प्रतिबद्ध करता हूं.

 

इसके बाद पुरोहित रक्षा सूत्र से कहता है कि हे रक्षे तुम स्थिर रहना, स्थिर रहना. इस प्रकार रक्षा सूत्र का उद्देश्य ब्राह्मणों द्वारा अपने यजमानों को धर्म के लिए प्रेरित एवं प्रयुक्त करना है.

 

कभी कभी मानव के लिए अशुभ ग्रहों के कुप्रभाव जीवन में कष्ट ले आते हैं. इससे पराजित होकर मनुष्य यत्र-तत्र भटकता रहता है. बड़े-बड़े सेठ, साहूकार एवं सम्राटों के सुनहरे स्वप्न छिन्न भिन्न हो जाते हैं. जीवन आकाश में दुखों के बादल छाए रहते हैं. इन्हीं उलझनों से बचने के लिए रक्षासूत्र सच्चे गुरु के द्वारा मंदिर में प्रभु के आशीर्वाद से धारण करना चाहिए  

 

मौली कब और कैसे धारण करे 

पुरुषों तथा अविवाहित कन्याओं के दाएं हाथ में तथा विवाहित महिलाओं के बाएं हाथ में मौली बांधा जाता है. जिस हाथ में कलावा या मौली बांधें उसकी मुट्ठी बंधी हो एवं दूसरा हाथ सिर पर हो. इस पुण्य कार्य के लिए व्रतशील बनकर उत्तरदायित्व स्वीकार करने का भाव रखा जाए.

 

पूजा करते समय नवीन वस्त्रों के न धारण किए होने पर मोली हाथ में धारण अवश्य करना चाहिए. धर्म के प्रति आस्था रखें. मंगलवार या शनिवार को पुरानी मौली उतारकर नई मोली धारण करें. संकटों के समय भी रक्षासूत्र हमारी रक्षा करते हैं.

                                   व्यापार और घर में मौली का प्रयोग 

वाहन, कलम, बही खाते, फैक्ट्री के मेन गेट, चाबी के छल्ले, तिजोरी पर पवित्र मौली बांधने से लाभ होता है, महिलाये मटकी, कलश, कंडा, अलमारी, चाबी के छल्ले, पूजा घर में मौली बांधें या रखें. मोली से बनी सजावट की वस्तुएं घर में रखेंगी तो नई खुशियां आती है.नौकरी पेशा लोग कार्य करने की टेबल एवं दराज में पवित्र मौली रखें या हाथ में मौली बांधेंगे तो लाभ प्राप्ति की संभावना बढ़ती है.

क्यों लगाते है मंदिरो में घंटा ?

अक्सर जब हम मंदिर जाते है तो सबसे पहले घंटी जरुर बजाते है,और घर में भी पूजा करने पर घंटी बजाते है. क्या कभी सोचा है मंदिर में घंटी क्यों लगी होती है ?

मंदिरों से हमेशा घंटी की आवाज आती रहती है. सामान्यत: सभी श्रद्धालु मंदिरों में लगी घंटी अवश्य बजाते हैं. घंटी की आवाज हमें ईश्वर की अनुभूति तो कराती है साथ ही हमारे स्वास्थ्य के लिए भी फायदेमंद है.

 

घंटी आवाज से जो कंपन होता है उससे हमारे शरीर पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ता है. घंटी की आवाज से हमारा दिमाग बुरे विचारों से हट जाता है और विचार शुद्ध बनते हैं. इसके पीछे ऋषियों का नाद विज्ञान हैं.

पुरातन काल से ही मंदिरों में घंटियां से लगाई जाती हैं. सुबह-शाम मंदिरों में जब पूजा-आरती की जाती है तो छोटी घंटियों, घंटों के अलाव घडिय़ाल भी बजाए जाते हैं. इन्हें विशेष ताल और गति से बजाया जाता है.

 

इन लय युक्त तरंगौं का प्रभाव व्यक्ति के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर भी पडता है ऐसा माना जाता है कि घंटी बजाने से मंदिर में प्राण प्रतिष्ठित मूर्ति के देवता भी चैतन्य हो जाते हैं, जिससे उनकी पूजा प्रभावशाली तथा शीघ्र फल देने वाली होती है.

 

पुराणों के अनुसार मंदिर में घंटी बजाने से हमारे कई पाप नष्ट हो जाते हैं. जब सृष्टि का प्रारंभ हुआ तब जो नाद (आवाज) था, वहीं स्वर घंटी की आवाज से निकलती है. यही नाद ओंकार के उच्चारण से भी जाग्रत होता है.

 

घंटे को काल का प्रतीक भी माना गया है. धर्म शास्त्रियों के अनुसार जब प्रलय काल आएगा तब भी इसी प्रकार का नाद प्रकट होगा.स्कंद पुराण के अनुसार मंदिर में घंटी बजाने से मानव के सौ जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं.

मंदिरों में घंटी बजाने का वैज्ञानिक कारण भी है. अधिक भीड़ के समय भक्तों को संक्रामक बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है,जब घंटी बजाई जाती है तो उससे वातावरण में कंपन उत्पन्न होता है जो वायुमंडल के कारण काफी दूर तक जाता है. इस कंपन की सीमा में आने वाले जीवाणु, विषाणु आदि सूक्ष्म जीव नष्ट हो जाते हैं तथा मंदिर का तथा उसके आस-पास का वातावरण शुद्ध बना रहता है.

एकादशी के दिन चावल क्यों नहीं खाते

                                   एकादशी का व्रत क्यों करते है

शास्त्रों में कहा गया है-आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु. बुद्धिं तु सारथि विद्धि येन श्रेयोअहमाप्नुयाम. अर्थात आत्मा को रथी जानो, शरीर को रथ और बुद्धि को सारथी मानो.

 

इनके संतुलित व्यवहार (आचरण) से ही श्रेय अर्थात श्रेष्ठत्व की प्राप्त होती है. इसमें इंद्रिय रूपी घोड़े तथा मन रूपी की लगाम होना भी जरुरी है. इस प्रकार दस इन्द्रियों के बाद मन को भी ग्यारहवीं इन्द्रिय शास्त्र ने माना है. अतएव इंद्रियों की कुल संख्या एकादश होती है.

एकादशी तिथि को मन:शक्ति का केन्द्र चन्द्रमा क्षितिज की एकादशवीं कक्षा पर अवस्थित होता है. यदि इस अनुकूल समय में मनोनिग्रह की साधना की जाए तो वह फलवती सिद्ध हो सकती है.

 

इसी वैज्ञानिक आशय से ही एकादशेन्द्रियभूत मन को एकादशी तिथि के दिन धर्मानुष्ठान एवं व्रतोपवास द्वारा निग्रहीत करने का विधान किया गया है. यदि सार रूप में कहा जाए तो एकादशी व्रत करने का अर्थ है- अपनी इंद्रियों पर निग्रह करना.

एकादशी में चावल वर्जित क्यों 

एकादशी के दिन चावल न खाने के संदर्भ में यह जानना आवश्यक है कि चावल और अन्य अन्नों की खेती में क्या अंतर है. यह सर्वविदित है कि चावल की खेती के लिए सर्वाधिक जल की आवश्यकता होती है.

 

एकादशी का व्रत इंद्रियों सहित मन के निग्रह के लिए किया जाता है. ऎसे में यह आवश्यक है कि उस वस्तु का कम से कम या बिल्कुल नहीं उपयोग किया जाए जिसमें जलीय तत्व की मात्रा अधिक होती है.

कारण- चंद्र का संबंध जल से है. वह जल को अपनी ओर आकषित करता है. यदि व्रती चावल का भोजन करे तो चंद्रकिरणें उसके शरीर के संपूर्ण जलीय अंश को तरंगित करेंगी. परिणामत: मन में विक्षेप और संशय का जागरण होगा.

 

इस कारण व्रती अपने व्रत से गिर जाएगा या जिस एकाग्रता से उसे व्रत के अन्य कर्म-स्तुति पाठ, जप, श्रवण एवं मननादि करने थे, उन्हें सही प्रकार से नहीं कर पाएगा. ज्ञातव्य हो कि औषधि के साथ पथ्य का भी ध्यान रखना आवश्यक होता है.

पूजा में नैवेध और प्रसाद का महत्व

प्रत्येक देवता का नैवेध निर्धारित होता है लेकिन इसका मतलब ये नहीं होता कि आप इन्ही वस्तुओ का भोग लगाये ईश्वर श्रद्धा को ज्यादा महत्व देते है.भाव के बिना कुछ भी नहीं है.भाव भक्ति होनी जरुरी है.कहते है कि भगवान तो भाव के भूखे है.

लेकिन जैसे आप अपना मन पसंद पदार्थ देखकर खुश होते है इसी प्रकार देवता भी मन पसंद नैवेध देख कर प्रसन्न हो कर आशीर्वाद देते है, प्रिय पदार्थ देवता को आकृष्ट करते है और वह नैवेध अर्थात प्रसाद जब हम ग्रहण करते है तो उसमे विघमान शक्ति हमें प्राप्त होती है.

                                 कौन से देवता को कौन सा नैवेध 


१. –
विष्णु जी को खीर या सूजी हलवा का नैवेध बहुत पसंद है.
२. – गणेश जी को मोदक या लड्डू का नैवेध बहुत पसंद है.
३. – श्री कृष्ण को माखन-मिश्री का नैवेध बहुत पसंद है.
४. – शिव को भांग का नैवेध बहुत पसंद है.
५. – अन्नपूर्णा माता को अन्न के बने पदार्थ,देवी को पायस या खीर बहुत पसंद है.
६. – लक्ष्मी जी को सफ़ेद रंग से मिष्ठान बहुत पसंद होते है.

नैवेध कैसे चढ़ाये 

नैवेध की थाली और भोजन की थाली परोसने कि पद्धति में सिर्फ एक अंतर होता है भोजन की  थाली परोसते समय सबसे पहले नमक परोसा जाता है और नैवेध की थाली में मिष्ठान सबसे महत्वपूर्ण होते है इसके अलावा पकवान रखने चाहिये प्रत्येक खाघान्न पर तुलसी दल रखकर थाली के चारो ओर जल की धार गोल घुमाते हुए घंटी बजानी चाहिये.

नैवेध की थाली तुरंत भगवान के आगे से नहीं हटाना चाहिये. कुछ देर बाद सभी लोगो को इस थाली से प्रसाद बांटना चाहिये. गणेश जी और शिव जी के नैवेध में तुलसी पत्र नहीं रखते गणेश जी के नैवेध में दूर्वा दल और शिव जी के नैवेध में बेल पत्र रखते है.

                                         प्रसाद का महत्व

जब हम भगवान को खाघ पदार्थ अर्पण करते है तो वह “भोग या नैवेध” कहलाता है और भगवान के ग्रहण करने के बाद वह “प्रसाद” बन जाता है.प्रसाद चाहे सूखा हो, बासी हो, अथवा दूर देश से लाया हुआ हो, उसे पाते ही खा लेना चाहिये. उसमे काल के विचार करने की आवश्यकता नहीं है, महा प्रसाद में काल या देश का नियम नहीं है. जिस समय भी महा प्रसाद मिल जाये, उसे वही उसी समय पाते ही जल्दी से खा ले,ऐसा भगवान ने साक्षात् अपने श्री मुख से कहा है.कभी भी प्रसाद का निरादर नहीं करना चाहिये, और ना ही लेने से मना करना चाहिये.

स्वयं भगवान ने कहा है –
                             “पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति

                                  तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मन:”

जो कोई भक्त मेरे लिये प्रेम से पत्र (पत्ती), पुष्प, फल, जल आदि अर्पण करता है, उस शुद्ध बुद्धि निष्काम प्रेमी भक्त का प्रेमपूर्वक अर्पण किया हुआ, वह पत्र-पुष्पादि मैं सगुण रूप से प्रकट होकर प्रीति सहित खाता हूँ.. जब श्रद्धा रूपी पत्र हो ,सुमन अर्थात फूल, हमारा अच्छा मन ही सुमन है,फल अर्थात अपने कर्म फल और जल अर्थात भाव में नैनो से बहें हुए, दो बूंद आँसू हो, इसे ही भगवान ग्रहण करते है.

तो आईये हम भी अपने अपने इष्ट को उनका मन पसंद नैवेध अर्पण करे और उनका आशीर्वाद प्राप्त करे.

                                              “जय जय श्री राधे” 

किस देवता की, कितनी परिक्रमा करे ?

जब हम मंदिर जाते है तो हम भगवान की परिक्रमा जरुर लगाते है. पर क्या कभी हमने ये सोचा है कि देव मूर्ति की परिक्रमा क्यो की जाती है? शास्त्रों में लिखा है जिस स्थान पर मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा हुई हो,

 

उसके मध्य बिंदु से लेकर कुछ दूरी तक दिव्य प्रभा अथवा प्रभाव रहता है,यह निकट होने पर अधिक गहरा और दूर दूर होने पर घटता जाता है, इसलिए प्रतिमा के निकट परिक्रमा करने से दैवीय शक्ति के ज्योतिर्मडल से निकलने वाले तेज की सहज ही प्राप्ती हो जाती है.

                                           कैसे करे परिक्रमा

देवमूर्ति की परिक्रमा सदैव दाएं हाथ की ओर से करनी चाहिए क्योकि दैवीय शक्ति की आभामंडल की गति दक्षिणावर्ती होती है।बाएं हाथ की ओर से परिक्रमा करने पर दैवीय शक्ति के ज्योतिर्मडल की गति और हमारे अंदर विद्यमान दिव्य परमाणुओं में टकराव पैदा होता है, जिससे हमारा तेज नष्ट हो जाता है.जाने-अनजाने की गई उल्टी परिक्रमा का दुष्परिणाम भुगतना पडता है.

                     किस देव की कितनी परिक्रमा करनी चाहिये ?

वैसे तो सामान्यत: सभी देवी-देवताओं की एक ही परिक्रमा की जाती है परंतु शास्त्रों के अनुसार अलग-अलग देवी-देवताओं के लिए परिक्रमा की अलग संख्या निर्धारित की गई है।इस संबंध में धर्म शास्त्रों में कहा गया है कि भगवान की परिक्रमा करने से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है और इससे हमारे पाप नष्ट होते है.सभी देवताओं की परिक्रमा के संबंध में अलग-अलग नियम बताए गए हैं.

1. – महिलाओं द्वारा “वटवृक्ष” की परिक्रमा करना सौभाग्य का सूचक है.

2. –
“शिवजी”
की आधी परिक्रमा की जाती है.है शिव जी की परिक्रमा करने से बुरे खयालात और अनर्गल स्वप्नों का खात्मा होता है।भगवान शिव की परिक्रमा करते समय अभिषेक की धार को न लांघे.

3. –  “देवी मां” की एक परिक्रमा की जानी चाहिए.

4. – “श्रीगणेशजी और हनुमानजी” की तीन परिक्रमा करने का विधान है.गणेश जी की परिक्रमा करने से अपनी सोची हुई कई अतृप्त कामनाओं की तृप्ति होती है.गणेशजी के विराट स्वरूप व मंत्र का विधिवत ध्यान करने पर कार्य सिद्ध होने लगते हैं.

5. –
भगवान विष्णुजी” एवं उनके सभी अवतारों की चार परिक्रमा करनी चाहिए.विष्णु जी की परिक्रमा करने से हृदय परिपुष्ट और संकल्प ऊर्जावान बनकर सकारात्मक सोच की वृद्धि करते हैं.

6. – सूर्य मंदिर की सात परिक्रमा करने से मन पवित्र और आनंद से भर उठता है तथा बुरे और कड़वे विचारों का विनाश होकर श्रेष्ठ विचार पोषित होते हैं.हमें भास्कराय मंत्र का भी उच्चारण करना चाहिए, जो कई रोगों का नाशक है जैसे सूर्य को अर्घ्य देकर “ॐ भास्कराय नमः” का जाप करना.देवी के मंदिर में महज एक परिक्रमा कर नवार्ण मंत्र का ध्यान जरूरी है.इससे सँजोए गए संकल्प और लक्ष्य सकारात्मक रूप लेते हैं.

परिक्रमा के संबंध में नियम

१. – परिक्रमा शुरु करने के पश्चात बीच में रुकना नहीं चाहिए.साथ परिक्रमा वहीं खत्म करें जहां से शुरु की गई थी.ध्यान रखें कि परिक्रमा बीच में रोकने से वह पूर्ण नही मानी जाती

२. – परिक्रमा के दौरान किसी से बातचीत कतई ना करें.जिस देवता की परिक्रमा कर रहे हैं, उनका ही ध्यान करें.

३.- उलटी अर्थात बाये हाथ की तरफ परिक्रमा नहीं करनी चाहिये.

इस प्रकार देवी-देवताओं की परिक्रमा विधिवत करने से जीवन में हो रही उथल-पुथल व समस्याओं का समाधान सहज ही हो जाता है.इस प्रकार सही परिक्रमा करने से पूर्ण लाभ की प्राप्ती होती है.


“जय जय श्री राधे”

Shree Ji Barsana Mandal Trust (SJBMT)

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