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??आज की “ब्रज रस धारा”??
दिनांक 29/12/2017

श्री सनातन गोस्वामी का जन्म सं. 1523 के लगभग हुआ था सनातन गोस्वामी जी को संस्कृत के साथ फारसी अरबी की भी अच्छी शिक्षा पाई थी.सन् 1483 ई. में पितामह की मृत्यु पर अठारह वर्षकी अवस्था में यह उन्हीं के पद पर नियत किए गए और बड़ी योग्यता से कार्य सँभाल लिया.

 

हुसेन शाह के समय में यह प्रधान मंत्री हो गए तथा इन्हें दरबारे खासउपाधि मिली.गोस्वामी जी तीन भाई थे, सबसे बड़े”सनातन जी”ही थे, फिर”रूप गोस्वामी”और सबसे छोटे’अनूप गोस्वामी जी”थे. तीनो भाई राजकार्यमें लगे रहते थे. थे तो ब्राह्मण कुलके परन्तु हुसेन शाह के यहाँ काम करते करते उसके जैसा ही रहन सहन हो गया था.श्री चैतन्य महाप्रभु का जब प्रकाश हुआ तब यह भी उनके दर्शन के लिए उतावले हुए, पर राजकार्य से छुट्टी नहीं मिली.

 

इसलिए उन्हें पत्र लिखकर रामकेलि ग्राम में आने का आग्रह किया.श्री चैतन्य जब वृंदावन जाते समय रामकेलि ग्राम में आए तब इन तीनों भाइयों ने उनके दर्शन किएऔर सभी ने सांसारिक जंजाल से मुक्तिपाने का दृढ़ संकल्प किया.सभी राजपद पर थे.पर सनातन इनमें सबसे बड़े और मंत्रीपद पर थे

 

अत: पहले श्री रूप तथा अनुपम सारे कुटुंब को स्वजन्मस्थान फतेहाबाद में सुरक्षित रख आए और रामकेलि ग्राम में सनतान जी के लिए कुसमय में काम आने को कुछ धन एक विश्वसनीय पुरुष के पास रखकर वृंदावन की ओर चले गए.जब सनातन जी ने राजकार्य से हटने का प्रयत्न किया तब नवाब ने इन्हें कारागार में बंद करा दिया.अंत में घूस देकर यह बंदीगृह से भागे और काशी पहुँच गए.स. 1572 में यहीं श्रीगौरांग से भेंट हुई और दो मास तक वैष्णव भक्ति शास्त्र पर उपदेश देकर इन्हें वृंदावन भेज दिया कि वहाँ के लुप्त तीर्थों का उद्धार, भक्तिशास्त्र की रचना तथा प्रेमभक्ति एवं संकीर्तन का प्रचार करें.

 

यहाँ से वृंदावन चले गए पर कुछ दिनों बाद श्रीगौरांग के दर्शन की प्रबल इच्छा से जगन्नाथपुरी की यात्रा की.वहाँ कभी जगन्नाथ भगवान के दर्शन करने नहीं जाते थे,उनकाऐसा मानना था कि यवनों के संसर्ग से हम दूषित हो गए है,जगन्नाथ जी के मंदिर के पास भी कही कोई भक्त हम से स्पर्श न कर जाए,इसलिए मंदिर दूर से ही मंदिर कि धवजा के दर्शन कर लिया करते थे,कुछ दिन रहकर यह पुन: वृंदावन लौट आए.

 

“श्री सनातन गोस्वामी जी”जब वृंदावन आये और द्वादश टीला जो कलिदेह के निकट है वही पर एक कुटिया में निवास करते थे उस समयवृंदावन घोर जंगल के रूप में परिणित हो गया यहाँ किसी गृहस्थ का वास नहीं था.अतः सनातन जी मथुरासे भिक्षा माँग कर लाते थे श्री सनातन जी प्रातः काल वृंदावन से सोलह मील चलकर चौदह मील गोवर्धन की परिक्रमाकरते थे वहाँ से सोलह मील चलकर मथुरा में मधुकरी करते औरपुन:वृंदावन में अपनी भजन कुटी पर लौट आते.सनातन जी का मदनमोहन को चौबाईन के घर से लाना

 

प्रसंग  १. -एक दिन मथुरा में एक चौबे के घर में श्री सनातन जी ने श्यामकांति वाले मदन नामक बालक को देखा, जो चौबे के घर में स्थित मंदिर से निकलकर चौबे के बालक के साथ गुल्ली डंडा खेल रहे थे. उन श्याम कांति वाले मदन बालक ने चौबाईन के बालक को पराजित कर दिया, मदन ने पराजित चौबे बालक के कंधे पर बैठकर घोड़े क का आनंद लिया.किन्तु दूसरी बार पराजित होने पर जब मदन के कंधे पर, चौबे बालक को चढ़ने की बारी आई तो मदन भागकर मंदिर में प्रवेश कर गया.

 

ऐसा देखकर चौबे का बालक क्रोध से गली देता हुआ उसके पीछे दौड़ा, वह मंदिर में प्रवेश करना चाहता था किन्तु पुजारी जी ने उसे डाट-डपटकर भगा दिया, अतः विग्रह बने मदन को दूर से ही तर्जनी अँगुली दिखाते हुए चौबे बालक ने कहा – अच्छा कल तुझे देख लूँगा.श्री सनातन जी इस द्रश्य को देखकर आश्चर्य चकित रह गए दूसरे दिन वे कुछ पहले ही दर्शनों की पिपासा लेकर पहुँच गए कलेवे का समय था अतः चौबाईन दोनों बालको के कलेबे के लिए खिचड़ी पका रही थी, अभी उसने स्नान आदि नहीं किया था दोनों बालक कलेवे की प्रतीक्षा कर रहे थे. मैया दातुन करती जा रही थी और उसके दूसरे सिरे से खिचड़ी को भी चलाती जा रही थी. खिचड़ी पक जाने पर कटोरी में गर्म-गर्म खिचड़ी बालको के सामने रखकर फूँक कर उसे ठंडा भी करने लगी. और दोनों बालको ने बड़े प्रेम से खिचड़ी का रसास्वादन करने लगे.सनातनजी से ये चौबाईन का अनाचार सहन नहीं हुआ उन्होंने कहा – माई! इन बालको को बिना स्नान किये दातुन से खिचड़ीचलाकर अपवित्र कलेवा देना उचित नहीं है,

चौबा ईन अपनी भूल समझ गई. बोली – बाबा कल से शुद्ध रूप से बनाकर ही दूँगी.सनातन जी तो रोज ही मधुकरी के लिए आते थे तीसरे दिन फिर पहुच गए तो देखा की माई के स्नान पूजन में विलम्ब के कारण दोनों बालक भूख लगने के कारण कलेबा के लिए मचल रहे है. माँ बर्तन धोकर खिचड़ी पका रही है. दोनों उसके वस्त्र पकड़कर मचल रहे थे.तब सनातन जी ने फिर कहा – माई! आपको स्नान करने की कोई आवश्यकता नहीं है आप पूर्ववत ही बनाये .मैंने आपके चरणों का अपराध किया है, उस बालक के दर्शन हेतु सनातन जी नियम से चौबे के घर आने लगे,और घंटो खड़े उसे देखते और रोते रहते.एक दिन रात में स्वप्न में श्री मदनमोहन जी ने श्री सनातन जी से कहा – कि तुम मुझे मथुरा से यहाँ ले आओ, और उधर चौबाईन को भी स्वप्न में कहा – कि मुझे उन बाबा को दे देना,अगले दिन चौबाईन ने मदनमोहन जी को श्री सनातन जी कोसौप दिया. बोली ये तो बहुत छलिया है जिस यशोदा ने इतना लाड लड़ाया उसे ही छोडकर मथुरा चला गया. इसका कोई सगा नहीं है, इसे मेरी चाह नहीं है तो मै भी क्यों इसके लिए मरू,जाये मेरी बला से, इस तरह प्रेम में रोष करने लगी. बाहर से तो गुस्सा दिखा रही थी और अन्दर से प्रेम के कारण आँसू निकल रहे थे,श्री सनातन जी भिक्षा के द्वारा प्राप्त आटे से अलौनी बाटी बनाकर अपने मदन मोहन का भोग लगाकर खुद पाते थे एक दिन मदन मोहन जी ने कहा बोले – बाबा ये अलौनी बाटी मेरे गले के नीचे नहीं उतरती थोडा सा नमक क्यों नहीं डालते सनातन जी बोले नमक कहा से लाऊ ?बोले मधुकरी मागकर लाते हो वही से, अब सनातन जी नमक लगाकर बाटी बनाने लगे.अब कुछ दिनों बाद मदनमोहन जी फिर बोले –बाबा ये बिना घी कि बाटी हमसे नहीं खायी जाती अब तो सनातन जी बोले – देखो मै ठहरा वैरागी, अगर इतना ही स्वादिष्ट भोजन करना चाहते थे तो किसी सेठ के पास क्यों नहीं गए यहाँ तो ऐसे ही मिलेगा, कभी कहते हो नमक नही, कभी कहते हो घी नहीं, कल ५६ भोग मांगोगे, कहा से लाऊंगा ? अपनी व्यवस्था स्वयं कर लो.

 

प्रसंग २-एक दिन पंजाब में मुल्तान का रामदास खत्री – जो कपूरी नाम से अधिक जाना जाता था, आगरा जाता हुआ व्यापार के माल से भरी नाव लेकर जमुना में आया किन्तु कालीदह घाट के पास रेतीले तट पर नाव अटक गयी. तीन दिनों तक निकालने के असफल प्रयासों के बाद वह स्थानीय देवता को खोजने और सहायता माँगने लगा. वह किनारे पर आकर पहाड़ीपर चढ़ा. वहाँ उसे सनातन मिले. और सारा वृतांत कहा.सनातन जी बोले -मै तो एक संन्यासी हूँ क्या कर सकता हूँ अन्दर मदन मोहन जी है उनसे प्रार्थना करो व्यापारी से मदनमोहन से प्रार्थना करने लगा,और तत्काल नाव तैरने लग गई. जब वह आगरे से माल बेचकर लौटा तो उसने सारा पैसा सनातन को अर्पण कर दिया और उससे वहाँ मंदिर बनाने की विनती की. मंदिर बन गया और लाल पत्थर का घाट भी बना .भगवान के चरण चिन्ह अंकित गोवर्धन शिलासनातन गोस्वामी का नियम था गिरि गोवर्द्धन की नित्य परिक्रमा करना. अब उनकी अवस्था 90 वर्ष की हो गयी थी. नियम पालन मुश्किल हो गया था. फिर भी वे किसी प्रकार निबाहे जा रहे थे. तब श्री मदन मोहन जी को दया आई और छोटे से बालक के रूप में प्रकट होकर कहने लगे.-सनातन, तुम्हारा कष्ट मुझसे नहीं देखा जाता. तुम गिरिराजपरिक्रमा का अपना नियम नहीं छोड़ना चाहते तो इस गिरिराजशिला की परिक्रमा कर लिया करो. इस पर मेरा चरण-चिन्ह अंकित है. इसकी परिक्रमा करने से तुम्हारी गिरिराज परिक्रमा हो जाया करेगी.”इतना कह मदनगोपाल अन्तर्धान हो गये. सनातन गोस्वामी मदनगोपाल-चरणान्कित उस शिला को भक्तिपूर्वक सिर पर रखकरअपनी कुटिया में गये. उसका अभिषेक किया और नित्य उसकी परिक्रमा करने लगे. आज भी मदगोपाल के चरणचिन्हयुक्त वह शिला वृन्दावन में श्रीराधादामोदर के मन्दिर में विद्यमान हैं,ऐसी मान्यता है कि राधा दामोदर मंदिर की चार परिक्रमा लगाने पर गिरिराज गोवर्धन की परिक्रमा का फल मिल जाता है.आज भी कार्तिक सेवा में श्रद्धालु बड़े भाव से मंदिर की परिक्रमा करते है.

?श्री श्याम सुन्दर गोस्वामी जी ?

??आज की “ब्रज रस धारा”??
दिनांक 27/12/2017

श्री कृष्णदासजी कीव्रजरज् में बहुत निष्ठा थी. कृष्णदास जी सदा ही उसे धारण किये रहते थे.एक बार इनके गुरुने इन्हें किसी कारण वश इन्हें त्याग दिया,एक बार ये दिल्ली गए वहाँ एक मिठाई वाला उत्तम गरम-गरम जलेबियाँ निकाल रहाथा.जलेबियाँ देखकर मन ही मन श्री नाथ जी को (मानसी) भोग लगाया.और प्रेम के ग्राहक श्री ठाकुर जी ने स्वीकार कर ली.

 

यहाँ श्री नाथ जी कोबाहर का भोग नहीं लगता,जब गोसाई जी नेदेखा जलेबियो का थार कहाँ से आ गया, तो श्री नाथ जी से बोले – आप बड़े चटोरे हो जलेबियाँ खानी थी तो हमसे कहते हमने उसे त्याग दिया और आप जलेबियाँ खाने पहुँच गए.श्री नाथ जी बोले -आपगुरु हो अंगीकार भी कर सकते हो और त्याग भी कर सकते हो, किन्तु मै तो जीव को केवल अंगीकार करना ही जानता हूँ,और एक बार आपने उसका हाथ मेरे हाथ में दे दिया.आप छोड़ सकते हो मै नही छोड़ सकता.गुरु जी ठाकुर जी से लिपट कर रोने लगे,नाथ जब तुम नहीं छोड़ सकते तो हम कैसे छोड़ सकता हूँ.और फिर कृष्णदास जी को स्वीकार कर लिया.

 

प्रसंग 2 -एक बार एक वारमुखी का राग सुनकर कृष्णदास जी उसके पास गए और अनुराग वश उससे पूछने लगे -हे चन्द्र मुखी! मेरे शशि मुख लाला राग का बड़ा रसिक है तुम उसको राग गान सुनाने के लिए मेरे साथ चलोगी ?उसने सोचा होगा कोई रसिक मुझे क्या मेरा काम तो रिझाना है बोली -हाँ चलूंगी.कृष्णदास जी लोक की लज्जा छोड़कर उस वारमुखी को अपने साथ व्रज में लाए,उस वारमुखी को भली भांति स्नान करवा वसन भूषण पहना कर श्रृंगार करा सुगंध लगा उसे श्री नाथ जी के मंदिर में लाकर ठाकुर जी के सामने खड़ी कर आज्ञा की कि मनुष्यों को बहुत रिझाया अब तेरा भाग्य चमका हमारे लाल जी को रिझा.उस वारमुखी ने जैसे ही श्रीनाथ जी के दर्शन किया प्रेम में मतवाली होकर नाचने लगी.

 

कृष्णदास जी ने उससे पूँछा -मेरे लाल को तूने देखा है ?उसने उत्तर दिया -कि केवल देखा ही नहीं वरन इनकी सौंदर्य पर अपना तन मन भी वार चुकी.उसने गाया, नाचा, भाव बताया, अपनी सब कलाओं प्रकटकर ठाकुरजी को रिझा लिया.तदाकार हो गई, सबको प्रेमरंग में भीगा दिया. शरीर उसी दशा में छोड़कर परम पद को पहुँच गई.

?श्री श्याम सुन्दर गोस्वामी जी ?

ब्रज का परिचय / Introduction of Braj

ब्रज शब्द का काल-क्रमानुसार अर्थ विकास हुआ है। वेदों और रामायण-महाभारत के काल में जहाँ इसका प्रयोग ‘गोष्ठ’-‘गो-स्थान’ जैसे लघु स्थल के लिये होता था। वहाँ पौराणिक काल में ‘गोप-बस्ती’ जैसे कुछ बड़े स्थान के लिये किया जाने लगा। उस समय तक यह शब्द प्रदेशवायी न होकर क्षेत्रवायी ही था।

भागवत में ‘ब्रज’ क्षेत्रवायी अर्थ में ही प्रयुक्त हुआ है। वहाँ इसे एक छोटे ग्राम की संज्ञा दी गई है। उसमें ‘पुर’ से छोटा ‘ग्राम’ और उससे भी छोटी बस्ती को ‘ब्रज’ कहा गया है। 16वीं शताब्दी में ‘ब्रज’ प्रदेशवायी होकर ‘ब्रजमंडल’ हो गया और तब उसका आकार 84 कोस का माना जाने लगा था। उस समय मथुरा नगर ‘ब्रज’ में सम्मिलित नहीं माना जाता था। सूरदास तथा अन्य ब्रजभाषा कवियों ने ‘ब्रज’ और मथुरा का पृथक रुप में ही कथन किया है। कृष्ण उपासक सम्प्रदायों और ब्रजभाषा कवियों के कारण जब ब्रज संस्कृति और ब्रजभाषा का क्षेत्र विस्तृत हुआ तब ब्रज का आकार भी सुविस्तृत हो गया था। उस समय मथुरा नगर ही नहीं, बल्कि उससे दूर-दूर के भू-भाग, जो ब्रज संस्कृति और ब्रज-भाषा से प्रभावित थे, व्रज अन्तर्गत मान लिये गये थे। वर्तमान काल में मथुरा नगर सहित मथुरा ज़िले का अधिकांश भाग तथा राजस्थान के डीग और कामवन का कुछ भाग, जहाँ से ब्रजयात्रा गुजरती है, ब्रज कहा जाता है। ब्रज संस्कृति और ब्रज भाषा का क्षेत्र और भी विस्तृत है।

उक्त समस्त भू-भाग के प्राचीन नाम, मधुबन, शूरसेन, मधुरा, मधुपुरी, मथुरा और मथुरा मंडल थे तथा आधुनिक नाम ब्रज या ब्रजमंडल हैं। यद्यपि इनके अर्थ-बोध और आकार-प्रकार में समय-समय पर अन्तर होता रहा है। इस भू-भाग की धार्मिक, राजनैतिक, ऐतिहासिक और संस्कृतिक परंपरा अत्यन्त गौरवपूर्ण रही है।

ब्रज शब्द से अभिप्राय


ब्रज शब्द से अभिप्राय सामान्यत: मथुरा ज़िला और उसके आस-पास का क्षेत्र समझा जाता है। वैदिक साहित्य में ब्रज शब्द का प्रयोग प्राय: पशुओं के समूह, उनके चारागाह (चरने के स्थान) या उनके बाडे़ के अर्थ में है। रामायण, महाभारत और समकालीन संस्कृत साहित्य में सामान्यत: यही अर्थ ‘ब्रज’ का संदर्भ है। ‘स्थान’ के अर्थ में ब्रज शब्द का उपयोग पुराणों में गाहे-बगाहे आया है, विद्वान मानते हैं कि यह गोकुल के लिये प्रयुक्त है। ‘ब्रज’ शब्द का चलन भक्ति आंदोलन के दौरान पूरे चरम पर पहुँच गया। चौदहवीं शताब्दी की कृष्ण भक्ति की व्यापक लहर ने ब्रज शब्द की पवित्रता को जन-जन में पूर्ण रूप से प्रचारित कर दिया । सूर, मीरां (मीरा), तुलसीदास, रसखान के भजन तो जैसे आज भी ब्रज के वातावरण में गूंजते रहते हैं।

कृष्ण भक्ति में ऐसा क्या है जिसने मीरां (मीरा) से राज-पाट छुड़वा दिया और सूर की रचनाओं की गहराई को जानकर विश्व भर में इस विषय पर ही शोध होता रहा कि सूर वास्तव में दृष्टिहीन थे भी या नहीं। संगीत विशेषज्ञ मानते हैं कि ब्रज में सोलह हज़ार राग रागनिंयों का निर्माण हुआ था। जिन्हें कृष्ण की रानियाँ भी कहा जाता है । ब्रज में ही स्वामी हरिदास का जीवन, ‘एक ही वस्त्र और एक मिट्टी का करवा’ नियम पालन में बीता और इनका गायन सुनने के लिए राजा महाराजा भी कुटिया के द्वार पर आसन जमाए घन्टों बैठे रहते थे। बैजूबावरा, तानसेन, नायक बख़्शू (ध्रुपद-धमार) जैसे अमर संगीतकारों ने संगीत की सेवा ब्रज में रहकर ही की थी। अष्टछाप कवियों के अलावा बिहारी, अमीर ख़ुसरो, भूषण, घनानन्द आदि ब्रज भाषा के कवि, साहित्य में अमर हैं। ब्रज भाषा के साहित्यिक प्रयोग के उदाहरण महाराष्ट्र में तेरहवीं शती में मिलते हैं। बाद में उन्नीसवीं शती तक गुजरात, असम, मणिपुर, केरल तक भी साहित्यिक ब्रजभाषा का प्रयोग हुआ। ब्रज भाषा के प्रयोग के बिना शास्त्रीय गायन की कल्पना करना भी असंभव है। आज भी फ़िल्मों के गीतों में मधुरता लाने के लिए ब्रज भाषा का ही प्रयोग होता है।

??आज की “ब्रज रस धारा”??
दिनांक 26/12/2017

श्री बांकेबिहारी महाराज को वृंदावन में प्रकट करनेवाले स्वामी हरिदासजी महाराज है इनका जन्म विक्रम सम्वत् 1535 में भाद्रपद मास के शुक्लपक्ष की अष्टमी (श्री राधाष्टमी) के ब्रह्म मुहूर्त में हुआ था.परिचय -स्वामी हरिदास जी केपिता श्री आशुधीर जी अपने उपास्य श्रीराधा-माधव की प्रेरणा से पत्नी गंगादेवी के साथ अनेक तीर्थो की यात्रा करने के पश्चात अलीगढ जनपद की कोल तहसील में ब्रज आकर एक गांव में बस गए.

 

श्री हरिदास जी का व्यक्तित्व बड़ा ही विलक्षण था. वे बचपन से ही एकान्त-प्रिय थे. उन्हें अनासक्त भाव से भगवद्-भजन में लीन रहने से बड़ा आनंद मिलता था.श्री हरिदासजी का कण्ठ बड़ा मधुर था और उनमें संगीत कीअपूर्व प्रतिभा थी. धीरे-धीरे उनकी प्रसिद्धि दूर-दूर तक फैल गई. उनका गांव उनके नाम हरिदासपुर से विख्यात हो गया. हरिदास जी को उनके पिता ने यज्ञोपवीत-संस्कार के उपरान्त वैष्णवी दीक्षा प्रदान की.युवा होने पर माता-पिता ने उनका विवाह हरिमति नामक परम सौंदर्यमयी एवं सद्गुणी कन्या से कर दिया, किंतु स्वामी हरिदास जी कीआसक्ति तो अपने श्यामा-कुंजबिहारी के अतिरिक्त अन्य किसी में थी ही नहीं. उन्हें गृहस्थ जीवन से विमुख देखकर उनकी पतिव्रता पत्नी ने उनकी साधना में विघ्न उपस्थित नकरने के उद्देश्य से योगाग्नि के माध्यम से अपना शरीर त्याग दिया और उनका तेज स्वामी हरिदास के चरणों में लीन हो गया.विक्रम सम्वत् 1560 में पच्चीस वर्ष की अवस्था मेंश्री हरिदास वृन्दावन पहुंचे. वहां उन्होंने निधिवन को अपनी तपोस्थली बनाया.

 

हरिदास जी निधिवन में सदा श्यामा-कुंजबिहारी के ध्यान तथा उनके भजन में तल्लीन रहते थे. स्वामीजी ने प्रिया-प्रियतम की युगल छवि श्री बांकेबिहारीजी महाराज के रूप में प्रतिष्ठित की.स्वामी जी की संगीत साधनाहरिदासजी के ये ठाकुर आज असंख्य भक्तों के इष्टदेव हैं. श्यामा-कुंजबिहारी केनित्य विहार का मुख्य आधारसंगीत है. उनके रास-विलास से अनेक राग-रागनियां उत्पन्न होती हैं. ललिता’संगीत’की अधिष्ठात्री मानीगई हैं.’ललितावतार’स्वामी हरिदास संगीत के परम आचार्य थे.

 

श्री हरिदासजी का कण्ठ बड़ा मधुर था और उनमें संगीत की अपूर्व प्रतिभा थी. धीरे-धीरे उनकी प्रसिद्धि दूर-दूर तक फैल गई.उनका संगीत किसी राजा-महाराजा को नहींउनके अपने आराध्य की उपासना को समर्पित था, बैजुवाबरा और तानसेन जैसे विश्व-विख्यात संगीतज्ञ स्वामी जी के शिष्य थे.विक्रम सम्वत 1630 में स्वामी हरिदास का निकुंजवास निधिवन में हुआ.

 

प्रसंग १. -अकबर के दरबार के नौ रत्नों में तानसेन एक थे.एक बार जब उन्होंने तानसेन से कहा कि हरिदास जी का संगीतसुनना चाहता हूँ तो तानसेन ने कहा कि मेरे गुरूजी केवल बांकेबिहारी जी के लिए ही गाते है. तब जब वे नहीं माने तोतानसेन उन्हें लेकर वृंदावन आ गए और अकबर को उनकी कुटिया के बाहर खड़ा करके स्वयं अंदर चले गए और जान बूझकर गलत राग में गाने लगे,तब स्वामी हरिदास जी ने उन्हें रोका और स्वयं गाने लगे.जब बाहर खड़े अकबर ने स्वामी जी का संगीत सुना तो बड़ा भाव बिभोर हो गया और तानसेन से पूंछा – कि क्या कारण है कि तुम भी इतना अच्छा नहीं गा पाते जितना तुम्हारे स्वामी जी गाते है. तुम्हारा संगीत भी अब तो मुझे फीका लगता है इस पर तानसेन ने कहा – मै तो केवल दिल्ली के बादशाह के लिए गाता हूँ और मेरे स्वामी दुनिया के बादशाह के लिए गाते है बस यही फर्क है.

 

“हरि भजि हरि भजि छांड़िन मान नर तन कौजिन बंछैरे जिन बंछैरे तिल तिल धनकौंअनमागैं आगैं आवैगौ ज्यौं पल लागैं पलकौंकहि हरिदास मीच ज्यौं आवै त्यौं धन आपुन कौ”

 

 

प्रसंग २ . -दयालदास नामक एक खत्री एक दिन आया, जिसे अनायास पारस का पत्थर प्राप्त हुआ, जो सम्पर्क में आई प्रत्येक वस्तु को सोने में रूपान्तरित कर देता था. उसने यह पत्थर एक महान निधि के रूप में स्वामी जी को भेंट किया.स्वामी जी ने वह यमुना में फेंक दिया.दाता के प्रवोधन को देखकर स्वामी जी उसे यमुना किनारे ले गये और उसे मुट्ठी भर रेती जल में से निकालने का आदेश दिया. जब उसने वैसा ही किया तो प्रत्येक कण में पारस पत्थर की प्रतीत हुई, जो फेंक दिया गया था. और जब परीक्षण किया तो वह उन्हीं गुणों से सम्पन्न पाया गया. तब खत्री की समझ में आया कि सन्तों को भौतिक सम्पदा की कोई आवश्यकता नहीं है लेकिन वे स्वयमेव परिपूर्ण होते हैं. तदनन्तर वह स्वामी हरिदास के शिष्यों में सम्मिलितहो गया.

 

 

प्रसंग ३ . -जब यह बात फैली कि साधु को दार्शनिक का पत्थरभेंट किया गया है तो एक दिन जब स्वामी जी स्नान कर रहे थे, कुछ चोरों ने शालिग्राम को चुराने का अवसर पा लिया. उन्होंने सोचा कदाचित यही वह (पत्थर) हो. अपने उद्देश्य हेतु व्यर्थ जानकर चोरों ने उसे एक झाड़ी में फेंक दिया. जैसे ही सन्त उसकी खोज में उस स्थान से होकर निकले शालिग्राम की वाणी सुनाई दी कि मैं यहाँ हूँ. उसी समय से प्रत्येक प्रात:काल किसी चामत्कारिक माध्यम से स्वामी जी को नित्य एक स्वर्ण-मुद्रा प्राप्त होने लगी जिससे वे मन्दिर का भोग लगाते और जो बचता था, उससे वे अन्न क्रयकरते, जिसे वे यमुना में मछलियों को और तट पर मोर और वानरों को खिलाते थे.

 

“जय जय श्री राधे “

?श्री श्याम सुन्दर गोस्वामी जी ?

ब्रज की मान्यता

मथुरा की बेटी गोकुल की गाय। करम फूटै तौ अनत जाय।

 मथुरा (ब्रज-क्षेत्र) की बेटियों का विवाह ब्रज में ही होने की परम्परा थी और गोकुल की गायों गोकुल से बाहर भेजने की परम्परा नहीं थी। चूँकि कि पुत्री को ‘दुहिता’ कहा गया है अर्थात गाय दुहने और गऊ सेवा करने वाली। इसलिए बेटी गऊ की सेवा से वंचित हो जाती है और गायों की सेवा ब्रज जैसी होना बाहर कठिन है। वृद्ध होने पर गायों को कटवा भी दिया जाता था, जो ब्रज में संभव नहीं था।

ब्रजहिं छोड़ बैकुंठउ न जइहों

ब्रज को छोड़ कर स्वर्ग के आनंद भोगने का मन भी नहीं होता।

मानुस हों तो वही रसखान, बसों ब्रज गोकुल गाँव की ग्वारन।

इस प्रकार के अनेक उदाहरण हैं जो ब्रज को अद्भुत बनाते हैं। ब्रज के संतों ने और ब्रजवासियों ने तो कभी मोक्ष की कामना भी नहीं की क्योंकि ब्रज में इह लीला के समाप्त होने पर ब्रजवासी, ब्रज में ही वृक्ष का रूप धारण करता है अर्थात ब्रजवासी मृत्यु के पश्चात स्वर्गवासी न होकर ब्रजवासी ही रहता है और यह क्रम अनन्त काल से चल रहा है। ऐसी मान्यता है ब्रज की।

और भरोसों कहा कहियो गुण गवत राधे को गायन में 

करि ज़ोर के भाग मनावत हों बृषभानु किशोरी के पायन में

??आज की “ब्रज रस धारा”??
दिनांक 25/12/2017

हरीराम व्यास’जी जिन्होंने राजा को दिव्य वृंदावन के स्वरुप का दर्शन कराया.व्यासजी ओरछा नरेश ‘मधुकरशाह’ के ‘राजगुरु’थे. और’गौड़ संप्रदाय’के वैष्णव थे.ये संस्कृत के शास्त्रार्थी पंडित थे और सदा शास्त्रार्थ करने के लिए तैयार रहते एक बार जब ये वृंदावन आये और गोस्वामी हितहरिवंश जी को शास्त्रार्थ के लिए ललकारा.परन्तु अंत में उनके ही शिष्य हो गए.श्रीकिशोरजी की सहचरी (सखी) भाव की उपासना में लीन रहते थे और कुंजमहल में श्रीप्रिया-प्रियतम की सेवा में पीकदानी की भाव से सेवा किया करते थे

श्रीधाम वृन्दावन की रसधारा के मुख्य स्रोत, जो ‘हरि त्रिवेणी’ के नाम से जाने जाते हैं, ये (हरित्रयी) हैं, स्वामी हरिदासजी, श्रीहितहरिवंशजी और श्रीहरिरामजी व्यास. ये प्रिया-प्रियतम जी की निज सखी थीं और आठों प्रहर (अष्टयाम लीला) में उपस्थित रहती थीं. ये सखी थीं”ललिता सखी”(स्वामी श्रीहरिदास),”श्रीवंशी सखी”(श्रीहित हरिवंशजी) और”श्रीविशाखा जी”(श्रीगोस्वामी हरिरामजी व्यास)। ये तीनों महापुरुष एक समय में प्रकट होकर श्रीधाम वृन्दावन में आए.वृन्दावन में जिस प्रकार’निधिवनराज’स्वामी श्रीहरिदासजी की साधना स्थली है, श्रीहित हरिवंश महाप्रभुजी की’सेवाकुंज’साधना स्थली है, उसी प्रकार बनखण्डी से लोई बाजार जाते हुए सेवाकुंज के दक्षिण भाग से लगा‘किशोरवन’रसिक संत श्रीहरिरामव्यासजी की साधनास्थली है.हरि हम कब हवै हैं ब्रजवासीय।ठाकुर नन्दकिशोर हमारे, ठकुराइन राधा सी।कब मिलि हैं वे सखी सहैली, हरिवंशी हरिदासी।।वंशीवट की शीतल छैंया, सुभग नदी यमुना सी।इतनी आस व्यास की पुजवौ, वृन्दा विपिन विलासी।।

प्रसंग 1 -जब ओरछा नरेश मधुकर शाह इन्हें लेने आये, तो इन्होने मना कर दिया.कि हम वृंदावन छोड़कर अन्यत्र नहींजायेगे. श्रीधाम वृंदावन में विशेष निष्ठा थी धाम के प्रेम में आपको अतः करण पगे रहते थे.वृंदावन छोड़कर जाना नहीं जाना चाहते थे,तभी एक मेहतरानी गोविंददेव जी के प्रसाद का संतो द्वारा पाये गए उच्छिष्ट लेकर चलि आ रही थी,राजा को दिखाने के लिए उसकी टोकरी में से एक पकौड़ी उठाकर खा ली.भला इस मर्म को राजा क्या समझ सकता था.?राजा लौट गए और व्यास जी बड़े प्रसन्न हुए और बोले”संसार एक पकौड़ी ही का ही है”.एक पकौड़ी ने मेरा संसार छुडा दिया.प्रसंग

2-एक दिन एक वंशी सोने व चांदी की श्रीकिशोर जी के हाथो में धारण कराते समय श्री अँगुली कुछ छिल गई लहू निकलने लगा श्री व्यास बहुत दुखी हुए और शीघ्र ही जल से भीगा कपड़ा श्री अँगुली में बड़े प्रेम से बाँध,और तभी से ठाकुर जी की उँगली में अभी तक भीगे कपड़े बांधने की परंपरा है.

प्रसंग 3 -एक बार जब व्यास जी भाव राज्य में थे और उस लीला का दर्शन कर रहे थे जब रास लीला में श्री ठाकुर जी और किशोरी जी रास में नृत्य कर रहे थे,श्री प्रिया जी ने आवेश से ऐसी गति ली कि मंडली में मानो बिजली-सी चमक उठि,ऐसा प्रकाश हो गया सबकी आँखों में चकाचौंध हो गया.परन्तु प्रिया जी का नुपुर टूट गया ,दाने छितर गए आपका मन चंचल हुआ शीघ्र ही आपने अपना जनेऊ तोड़कर उससे ठीकठाक कर नुपुर चरण में धारण करा दिया और फिर जब भावराजसे बाहर आये तो उस भरे महात्माओ के समाज में जहाँ बैठे हुए थे बोले – कि यज्ञोपवीत के भार को जन्म भर ढोया पर वह आज काम आ गया.

?श्री श्याम सुन्दर गोस्वामी जी?

मेरो मन लाग्यो बरसाने में जहाँ विराजे राधा रानी 

बोलो राधे बोलो राधे बोलो राधे बोलो राधे

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