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श्री राधा रानी चरणारविन्द (राधा रानी जी का दायाँचरण )

राधारानी जी के दायाँचरण “आठ मंगल चिन्हों” से अलंकृत है,‘शंख’, ‘गिरी’, ‘रथ’, ‘मीन’, ‘शक्ति-अस्त्र’, ‘गदा’, ‘यज्ञकुण्ड’, ‘रत्न-कुंडल’.पादांगुष्ठ के मूल पर एक ‘शंख’ है. दूसरी एवं माध्यम अँगुली के नीचे एक ‘गिरी’ है. गिरी के नीचे मध्य में एडी की ओर एक ‘रथ’ है और एड़ी पर एक ‘मीन’ है, रथ के समीप पावं के भीतरी किनारे पर एक ‘शक्ति अस्त्र’ है. रथ के दूसरी ओर पावं के बाहरी किनारे के निकट एक ‘गदा’ है. कनिष्ठा के नीचे एक ‘यज्ञकुण्ड’ है.और उसके नीचे एक ‘रत्न कुंडल’ है.

१. शंख – शंख विजय का प्रतीक है यह बताता है कि राधा-गोविंद के चरणकमलो की शरण ग्रहण करने वाले व्यक्ति सदैव दुख से बचे रहते है और अभय दान प्राप्त करते है.२. गिरी  – यह बताता है यधपि गिरी-गोवर्धन की गिरिवर के रूप में व्रज में सर्वत्र पूजा होती है, तथापि गिरी-गोवर्धन विशेषकर राधिका की  चरण सेवा करते है.

३. रथ – यह चिन्ह बताता है, कि मन रूपी रथ को राधा के चरणकमलों में लगाकर सुगमता पूर्वक नियंत्रित किया जा  सकता है.४. मीन – जिस प्रकार मछली जल के बिना नहीं रह सकती, उसी प्रकार भक्तगण क्षण भर भी राधा-श्यामसुन्दर के चरणाम्बुजों के बिना नहीं रह सकते.५. शक्ति  – यह एक भाले का घोतक है, जो व्यक्ति राधा जी कि शरण ग्रहण करता है उनके लिए श्री राधा के चरण प्रकट होकर सांसारिक जीवन के सभी अप्रिय बंधनों को काट डालते है.६.गदा – यह चिन्ह सूचित करता है कि राधा के चरण पापमय काम रूपी हाथी को प्रताड़ित कर सकते है.७. होम कुण्ड –  यह घोषित करता है कि राधा के चरणों का ध्यान करने वाले व्यक्ति के पाप इस प्रकार भस्म हो जाते है मानो वे यज्ञ वेदी में विघमान हो.८. कुंडल – श्री कृष्ण के कर्ण सदा राधा जी के मंजुल नूपुरो कि ध्वनि और उनकी  वीणा के मादक रागों का श्रवण करते है.

राधा रानी जी का बायाँ चरण   

राधा रानी जी का बायाँ चरण “ग्यारह शुभ चिन्हों” से सज्जित है. जौ, चक्र, छत्र, कंकण, ऊर्ध्वरेखा, कमल, ध्वज,  सुमन, पुष्पलता, अर्धचंद्र, अंकुश. पादांगुष्ठ के मूल पर “एक जौ” का दाना है उसके नीचे एक “चक्र” है, उसके नीचे एक “छत्र” है, और उसके नीचे एक “कंकण” है. एक “ऊर्ध्वरेखा” पावं के मध्य में प्रारंभ होती है, मध्यमा के नीचे एक “कमल” है, और उसके नीचे एक “ध्वज” है. ध्वज के नीचे एक “सुमन” है, और उसके नीचे “पुष्पलता” है, एड़ी पर एक चारु “अर्धचंद्र” है. कनिष्ठा के नीचे एक “अंकुश” अंकित है.

1. जौ का दाना – जौ का दाना व्यक्त करता है कि भक्तजन राधा कृष्ण के पदारविन्दो कि सेवा कर समस्त भोगो ऐश्वर्य प्राप्त करते है. एक बार उनका पदाश्रय प्राप्त कर लेने पर भक्त की  अनेकानेक जन्म मरण कि यात्रा घट कर, जौ के दानो के समान बहुत छोटी हो जाती है.2. चक्र – यह चिन्ह सूचित करता है कि राधा कृष्ण के चरण कमलों का ध्यान काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, और मात्सर्य, रूपी छै शत्रुओ का  नाश करता है. ये तेजस तत्व का प्रतीक है जिसके द्वारा राधा गोविंद भक्तो के अंतःकरण से पाप तिमिर को छिन्न-भिन्न कर देते है.3. छत्र – छत्र यह सिद्ध करता है कि उनके चरणों कि शरण ग्रहण करने वाले भक्त भौतिक कष्टों कि अविराम वर्षा से बचे रहते है.4. कंकण  – राधा के चरण सर्वदा कृष्ण के हाथो में रहते है (जब वे मान करती है तो कृष्ण चरण दबाते है) जिस प्रकार कंकण सदा हाथ में रहता है.5. उर्ध्व रेखा – जो भक्त इस प्रकार राधा श्याम के पद कमलों से लिपटे रहते है, मानो वे उनकी जीवन रेखा हो वे दिव्य धाम को जाएँगे. 6. कमल – सरस सरसिज राधा गोविंद के चरणविंदो का ध्यान करने वाले मधुकर सद्रश भक्तो के मन में प्रेम हेतु लोभ उत्पन्न करता है.7. ध्वज – ध्वज उन भक्तो कि भय से बचाता और सुरक्षा करता है जो उनके चरण सरसिज का ध्यान करते है विजय का प्रतीक है.8. पुष्प – पुष्प दिखाता है कि राधा जी के चरणों कि दिव्य कीर्ति सर्वत्र एक सुमन सौरभ कि भांति फैलती है9. पुष्पलता  – यह चिन्ह बताता है कि किस प्रकार भक्तो की इच्छा लता तब तक बढती रहती है, जब तक वह श्रीमती राधा के चरणों की शरण ग्रहण नहीं कर लेती.10. अर्धचंद्र – यह बताता है कि जिस प्रकार शिव जी जैसे देवताओं ने राधा गोविंद के चरणारविन्दों के तलवो से अपने शीश को शोभित किया है, इसी प्रकार जो भक्त इस प्रकार राधा और कृष्ण के पदाम्बुजो द्वारा अपने शीश को सुसज्जित करते है वे शिव जी के समान महान भक्त बन जाते है.11. अंकुश – अंकुश इस बात का घोतक है कि राधा गोविद के चरणों का ध्यान भक्तो के मन रूपी गज को वश में करता है उसे सही मार्ग दिखाता है.इस प्रकार राधारानी के चरण सरसिज के “उन्नीस मंगल चिन्हों” का नित्य स्मरण किया जाता है.

जब ये पृथ्वी दानवों असुरों के भार से पीड़ित हो गई तब गौ का रूप रखकर देवताओ के पास गई ,तब ब्रह्मा जी देवताओ को और शिव जी को लेकर,विष्णु जी के पास गए .तब भगवान विष्णु जी ने कहा – भगवान श्रीकृष्ण ही अगणित ब्रह्मांडो के स्वामी है,उन्की कृपा के बिना यह कार्य कदापि सिद्ध नहीं होगा,आप लोग उनके धाम ही शीघ्र जाओतब ब्रह्मा जी ने कहा – प्रभु ! आपके अतिरिक्त कोई दूसरा भी परिपूर्णतम तत्व है यह हम नहीं जानते यदि दूसरा कोई भी परमेश्वर है तो उनके लोक का मुझे दर्शन कराइए.तब भगवान विष्णु जी ने  सभी देवताओ को ब्रह्मांड शिखर पर विराजमान गौलोक धाम का मार्ग दिखलाया.वामन जी के बाये पैर के अंगूठे से ब्रह्मांड के शिरोभाग का भेदन हो जाने पर जो छिद्र हुआ वह “ब्रहद्रव्”(नित्य अक्षय नीर ) से परिपूर्ण था. सब देवता उसी मार्ग से वहाँ के लिए नियत जलयान द्वारा बाहर निकले वहाँ ब्रह्मांड के ऊपर पहुँचकर उन सबने नीचे को ओर उस ब्रह्मांड को देखा इसके अतिरिक्त अन्य भी बहुत से ब्रह्मांड उसी जल में इन्द्रायण फल के सदृश इधर उधर लहरों में लुढक रहे थे, यह देखकर सब देवताओं को विस्मय हुआ वे चकित हो गए. वहाँ से करोडो योजन ऊपर आठ नगर मिले जिनको चारो ओर दिव्य चाहरदीवारी शोभा बढ़ा  रही थी वही ऊपर  देवताओ ने विरजा नदी का सुन्दर तट देखा देवता उस उत्तम नगर में पहुँचे,जो अनन्तकोटि सूर्यो की ज्योति का महान पुंज जान पडता था, उसे देखकर देवताओ की आँखे चौधिया गई ओर वे उस तेज से पराभूत होकर जहाँ के तहां खड़े रह गए.

तब ब्रह्मा उस का ध्यान करने लगे. उसी ज्योति के भीतर उन्होंने एक परम शांतिमय साकार धाम देखा उसमे  परम अद्भुत कमलनाल के समान धवल-वर्ण हजारों मुख वाले शेष नाग का दर्शन करके सभी देवताओ ने उन्हें प्रणाम किया उन शेषनाग की गोद में महान “आलोकमय लोकवंदित गोलोकधाम” का दर्शन हुआ जहाँ धमाभिमानी देवताओ के ईश्वर और गणनाशीलो में प्रधान काल का भी कोई वश नहीं चलता. वहाँ माया अपना प्रभाव नहीं डाल सकती, मन, चित्त, बुद्धि, अहंकार, सोलह विकार और महतत्व भी वहाँ प्रवेश नहीं कर सकते. फिर तीनो गुणों के विषय में तो कहना ही क्या. वहाँ कामदेव के समान मनोहर रूप लावण्य शालिनी श्यामसुंदर विग्रहा श्रीकृष्ण पार्षदा द्वारपाल का कार्य करती थी. देवताओ के द्वार के भीतर जाने पर उन्होंने मना किया.तब देवता बोले – हम सभी ब्रह्मा, विष्णु, शंकर, नाम के लोकपाल और इंद्र आदि देवता है. भगवान श्रीकृष्ण का दर्शन करने आये है.देवताओ की बात सुनकर उन सखियों ने जो द्वारापालिकाएँ थी अन्तः पुर जाकर सारी बात कह सुनाई तब एक सखी जो “शतचन्द्रनना” नाम से विख्यात थी. जिसके वस्त्र पीले थे, और जो हाथ में बेत की छड़ी लिए थी,उसने आने का प्रयोजन पूछा शतचन्द्रंनना  ने कहा – आप सब किस ब्रह्मांड के निवासी है बताईये ?देवताओ ने कहा – बड़े आश्चर्य की बात है क्या अन्य भी ब्रह्मांड है हमने तो कभी नहीं देखा हम तो यही जानते है की एक ही ब्रह्मांड है ,दूसरा है ही नहीं.शतचन्द्रंनना बोली – यहाँ तो “विरजा नदी” में करोडो ब्रह्मांड इधर-उधर लुढक रहे है. उनमे भी आप जैसे पृथक-पृथक देवता वास करते है. क्या आप लोग अपना नाम और गाँव नहीं जानते. जान पडता है कभी घर से बाहर नहीं निकले. जैसे गुलर के फलो में रहने वाले कीड़े जिस फल में रहते है, उसके सिवा दूसरे को नहीं जानते,उसी प्रकार आप जैसे साधारण जन जिसमे उत्पन्न होते है एक मात्र उसी को ब्रह्मांड समझते है.विष्णु भगवान ने कहा- जिस ब्रह्मांड में विराट रूपधारी वामन के  नख से ब्रहमांड में विवर बन गया था हम वही के निवासी है फिर शतचन्द्रं नना अंदर गई और शीघ्र ही वापस आकर भीतर आनेकी आज्ञा देकर चली गई.“जय जय श्री राधे “

सदाशिव सर्व वरदाता

सदाशिव सर्व वरदातादिगम्बर हो तो ऐसा हो,

       हरे सब दुःख भक्तों केदयाकर हो तो ऐसा हो।

शिखर कैलाश के ऊपर, कल्पतरुओं की छाया में,

       रमे नित संग गिरिजा के, रमणधर हो तो ऐसा हो।

शीश पर गंग की धारासुहाए भाल पर लोचन,

       कला मस्तक पे चन्दा कीमनोहर हो तो ऐसा हो।

भयंकर जहर जब निकलाक्षीरसागर के मंथन से,

       रखा सब कण्ठ में पीकरकि विषधर हो तो ऐसा हो।

सिरों को काटकर अपनेकिया जब होम रावण ने,

       दिया सब राज दुनियाँ कादिलावर हो तो ऐसा हो।

बनाए बीच सागर केतीन पुर दैत्य सेना ने,

       उड़ाए एक ही शर सेत्रिपुरहर हो तो ऐसा हो।

देवगण दैत्य नर सारेजपें नित नाम शंकर जो,

       वो ब्रह्मानन्द दुनियाँ मेंउजागर हो तो ऐसा हो॥

मारे मत मइया

मारे मत मइया, वचन भरवाय लै

वचन भरवाय लै, सौगन्ध खवाय लै।

गंगा की खवाय लै, चाहे जमुना की खवाय लै

क्षीर सागर में मइया ठाड़ो करवाय लै ॥ मारे मत मइया ——

गइया की खवाय लै, चाहे बछड़ा की खवाय लै

नन्द बाबा के आगे ठाड़ो करवाय लै ॥ मारे मत मइया ——

गोपिन की खवाय लै, चाहे ग्वालन की खवाय लै

दाऊ भइया के आगे कान पकराय लै ॥ मारे मत मइया ——

बंसी की खवाय लै, चाहे कामर की खवाय लै

मेरे अपने सिर पे हाथ धर के कहवाय लै ॥ मारे मत मइया ——

इकली घेरी बन में आय

इकली घेरी बन में आय श्याम तूने कैसी ठानी रे |

श्याम मुझे वृन्दावन जाना

     लौट कर बरसाने आना

          हाथ जोड़ूँ मानो कहना

जो मुझे हो जाए देरलड़े द्योरानी-जिठानी रे || इकली घेरी —–

ग्वालिनी मैं समझाऊँ तुझे

     दान तू दधि का दे जा मुझे

          तभी ग्वालिन जाने दूँ तुझे

जो तू नहीं माने तो होगी ऐंचातानी रे || इकली घेरी —–

दान मैंने कभी नहीं दीना

     रोक मेरा मारग क्यों लीना

          बहुत सा ऊधम तुम कीन्हा

आज तलक इस ब्रज में ऐसा हुआ न सानी रे || इकली घेरी —–

ग्वालिनी बातें रही बनाय

     ग्वाल-बालों को लूँ मैं बुलाय

          तेरा सब दधि-माखन लुट जाय

इठला ले तू भलेचले-न तेरी मनमानी रे || इकली घेरी —–

कंस राजा से करूँ गुहार

     बँधा के फिर लगवाऊँ मार

          तेरी ठकुराई देऊँ निकार

जुल्मी फिर तू डरेहरे ना नार बिरानी रे || इकली घेरी —–

कंस क्या बलम लगे तेरा

     वो चूहा क्या कर ले मेरा

          गर कभी उसको जा घेरा

कर दूँगा निर्वंशमिटा दूँ नाम-निशानी रे || इकली घेरी —–

आ गए इतने में सब ग्वाल

     पड़े नैनों में डोरे लाल

          झूम के चले अदा की चाल

लुट गया माखन मारग मेंघर गई खिसियानी रे || इकली घेरी —–

करें लीला जो राधेश्याम

     कौन कर सके बखान तमाम

          जाऊँ बलिहार धन्य ब्रजधाम

कहते सारे ग्वालनन्द का है सैलानी रे || इकली घेरी —–

हमारी गली होते जाना

हमारी गली होते जानाओ प्यारे नंदलाला |
मोर मुकुट पीतांबर सोहेगले में मोहनमाला, हमारी गली ——–

हाथ लकुटिया अधर बँसुरियाओढ़े कंबल कालाहमारी गली ——–

श्याम रंग और नैन रसीलेगउओं का रखवालाहमारी गली ——–

चुरा-चुरा कर माखन खाए झगड़ रहीं ब्रजबालाहमारी गली ——–

वृन्दावन की कुंज गलिन में नित-नित डाका डालाहमारी गली ——–

कालिय दह में कूद के मोहननाग नाथ दिया कालाहमारी गली ——–

फन के ऊपर नाच बजाई बंसी की धुन आलाहमारी गली ——–

चीर चुरा कर चढ़े कदम परखेला खेल निरालाहमारी गली ——–

चंद्र सखी भज कृष्ण-कन्हैया राधा का मतवालाहमारी गली ——–

 मेरी भाव-बाधा हरोराधा नागरी सोय। जा तन की झाईं पड़ेश्याम हरित दुत होय।

में हरित (हरामुदित) शब्द में श्लेष किया हैवहाँ इस गीत में मन शब्द में श्लेष है। मन का अर्थ हृदय भी होता है व भार का एक मात्रक भी जो लगभग 37.324 किलोग्राम होता है। जहाँ बिहारी ने दो रंगों (राधा का गोरा तथा कृष्ण का काला), को मिला कर एक तीसरा रंग बनाया है, वहाँ इस गीत में तो तीन रंगों (गुजरी का गोरा, यमुना का नीला तथा स्वर्ण-कलश का पीला) को मिलाकर रूप की त्रिवेणी बना दी गई है। यहाँ त्रिवेणी शब्द में भी श्लेष है: रंगों का मिलाप तथा गंगा-यमुना-सरस्वती के संगम की भाँति रूप का संगम-पर्व।

अरे वह पनघट पे बटमार गुजरिया जादू कर गई रे |
    चित में वह चितवन चुभा और बाँकी भौंह मरोड़
    वह चितई चितवन चुभा और संग में भौंह मरोड़
       इठला के शरमाय के वह मुसकाई मुँह मोड़
       कलेजे बिजली गिर गई रेहिया पे बिजली गिर गई रे || गुजरिया जादू —–
              अरे वह पनघट पे ———————

    जमुना में गागर ड़ुबा और इधरउधर को झाँक
    मेरा मन हर ले गईअरे मेरा मन हर ले गई
       और दे गई नहीं छटाँकलूट पनिहारी कर गई रे || गुजरिया —–
              अरे वह पनघट पे —————–

    गुण गरवीली गोरकी, अरे कुछ गरवीली गूजरी
    और कुछ गागर में भारअरे कुछ गागर में भार
              झीनी कटि लटलट करेअरे पतली कमर लचपच करे
              हे राम लगाना पारभँवर में नैया पड़ गई रे  ||    गुजरिया जादू —–

              अरे वह पनघट पे —————–

    नील वरन यमुना इधरऔर उधर वो गोरी नार
    नीला रंग यमुना इधरऔर उधर वो गोरी नार
              कंचन कलसा शीश परअरे कंचन कलसा शीश पर
             लो बनी त्रिवेणी धाररूप की परवी पड़ गई रे || गुजरिया जादू —–
              अरे वह पनघट पे —————

राधा की छवि देख

टिप्पणी: अभी राधा रानी अल्हड़ हैं। अभी तो वे कृष्ण के प्रणय-निवेदन का न अर्थ जानती हैं न मर्म। और कृष्ण?वे तो राधा रानी को देखते ही मचल पड़े हैं। लुभा रहे हैं उन्हें। राधा की काली चितवन को अपनी काली काँवर से जोड़ रहे हैं। उन्हें पाने को कुछ भी करने को तत्पर हैं। गा देंगेबजा देंगेनाच देंगे, ब्याह कर आँखों का काजल बनाकर भी रख लेंगे! धन्य हो कृष्ण-कन्हैयाधन्य-धन्य!

राधा की छवि देखमचल गए साँवरिया |
हँसमुसकाय प्रेम रस चक्खूँ
नैनन में तुझे ऐसे रक्खूँ
ज्यों काजर की रेख,
पड़ेंगी तोसे भाँवरिया  

 राधा की छवि —–

तू गोरी वृषभानदुलारी
मैं काला मेरी चितवन कारी
काला ही मेरा भेष
के कारी कामरिया 

राधा की छवि —–

मैं राधा तेरे घर आऊँ
अँगना में बाँसुरी बजाऊँ
नृत्य करूँ दिल खोल
कमल-पे जैसे भामरिया ।।

राधा की छवि —–
अपनी सब सखियाँ बुलवा ले
हिलमिल के मोसे नाच नचा ले
गढ़ें प्रेम की मेख
झनन बोले पायलिया ॥

राधा की छवि —–
बरसाने की राधा प्यारी
वृन्दावन के कृष्ण मुरारी
सुख-सागर में खेल तू ग्वालिन गामरिया ॥

राधा की छवि —–

कन्हैया तेरी फिर-फिर जात सगाई

कन्हैया तेरीओ हो रेकन्हैया तेरीफिर-फिर जात सगाई

सो लाला तेरीफिरफिर जात सगाई।
बरसाने वृषमानु-नंदिनीबरसाने वृषमानुनंदिनीवहाँ तेरी बात चलाई
देखत सुनत तेरे अवगुनअरे देखत सुनत तेरे अवगुन,
उन फेरे बामन नाई ||

सो लाला तेरी —–
दूध दही घर में बहुतेरादूध दही घर में बहुतेरामाखन और मलाई
खा ले पी ले और लुटा लेखा ले पी ले और लुटा ले,
चोरी छोड़ कन्हाई ||

 सो लाला तेरी —–
कन्हैया तेरीफिरफिर जात सगाई ||

कोई माखन ले लो

कोई माखन ले लोओ हो जीकोई माखन ले लोगुजरी तो आई बरसाने से ||

बलम हमारा भोला भालाबलम हमारा भोला भालाससुर हमारा अंधा

सास निगोड़ी ने सर पर धरसास निगोड़ी ने सर पर धर दिया बेचन का धंधा || 

कोई माखन ——-

जो घर खाली लौट के जाऊँजो घर खाली लौट के जाऊँमारे नन्द निगोड़ी

माई बाप मेरे जनम के बैरीमाई बाप मेरे जनम के बैरीजो ऐसे घर छोड़ी || 

कोई माखन ——–

माखन बेचूँ मिसरी बेचूँमाखन बेचूँ मिसरी बेचूँऔर दूध का छेना

मीठे मीठे लड्डू बेचूँमीठे मीठे लड्डू बेचूँमन चाहे सो लेना || 

कोई माखन ——–

कान्हा जी का भोग लगा हैकान्हा जी का भोग लगा हैयह माखन ले जाओ

खुद खाओ औरौ को खिलाओखुद खाओ औरौ को खिलाओभवसागर तर जाओ || 

कोई माखन ——

Shree Ji Barsana Mandal Trust (SJBMT)

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