
हमारे श्री लाडली लाल जू के परम दुलारे भगवत रसिक शिरोमणि “श्री सूरदास जी” महाराज के प्राकट्य उत्सव की आप सभी रसिकन कूँ कोटि कोटि बधाइयाँ
श्री राम नवमी की हार्दिक शुभकामनाएं
आप सभी को मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री रामचंद्र जू महाराज के प्राकट्योत्सव की कोटि कोटि बधाइयाँ…
श्री राम कृष्ण दोऊ एक हैं,अंतर नहीं निमेष।
इनके नयन गंभीर हैं, उनके चपल विशेष ।।
छप्पनभोग सेवा कराने हेतु (FOR CHHAPPAN BHOG SEWA)
यदि आप श्री लाडली लाल जू के महल में छप्पनभोग कराना चाहते हैं तो नीचे अपनी जानकारी भरें
पोशाक धारण सेवा कराने हेतु (FOR POSHAK DHARAN SEWA)
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ब्रह्मभोज(भण्डारा) सेवा कराने हेतु (FOR BHANDARA SEWA)
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फूल बंगला सेवा कराने हेतु (FOR FOOL BANGLA SEWA)
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श्री राधा रानी के चरणों का वर्णन पढ़ें सभी
श्री राधा रानी चरणारविन्द (राधा रानी जी का दायाँचरण )
राधारानी जी के दायाँचरण “आठ मंगल चिन्हों” से अलंकृत है,‘शंख’, ‘गिरी’, ‘रथ’, ‘मीन’, ‘शक्ति-अस्त्र’, ‘गदा’, ‘यज्ञकुण्ड’, ‘रत्न-कुंडल’.पादांगुष्ठ के मूल पर एक ‘शंख’ है. दूसरी एवं माध्यम अँगुली के नीचे एक ‘गिरी’ है. गिरी के नीचे मध्य में एडी की ओर एक ‘रथ’ है और एड़ी पर एक ‘मीन’ है, रथ के समीप पावं के भीतरी किनारे पर एक ‘शक्ति अस्त्र’ है. रथ के दूसरी ओर पावं के बाहरी किनारे के निकट एक ‘गदा’ है. कनिष्ठा के नीचे एक ‘यज्ञकुण्ड’ है.और उसके नीचे एक ‘रत्न कुंडल’ है.
१. शंख – शंख विजय का प्रतीक है यह बताता है कि राधा-गोविंद के चरणकमलो की शरण ग्रहण करने वाले व्यक्ति सदैव दुख से बचे रहते है और अभय दान प्राप्त करते है.२. गिरी – यह बताता है यधपि गिरी-गोवर्धन की गिरिवर के रूप में व्रज में सर्वत्र पूजा होती है, तथापि गिरी-गोवर्धन विशेषकर राधिका की चरण सेवा करते है.
३. रथ – यह चिन्ह बताता है, कि मन रूपी रथ को राधा के चरणकमलों में लगाकर सुगमता पूर्वक नियंत्रित किया जा सकता है.४. मीन – जिस प्रकार मछली जल के बिना नहीं रह सकती, उसी प्रकार भक्तगण क्षण भर भी राधा-श्यामसुन्दर के चरणाम्बुजों के बिना नहीं रह सकते.५. शक्ति – यह एक भाले का घोतक है, जो व्यक्ति राधा जी कि शरण ग्रहण करता है उनके लिए श्री राधा के चरण प्रकट होकर सांसारिक जीवन के सभी अप्रिय बंधनों को काट डालते है.६.गदा – यह चिन्ह सूचित करता है कि राधा के चरण पापमय काम रूपी हाथी को प्रताड़ित कर सकते है.७. होम कुण्ड – यह घोषित करता है कि राधा के चरणों का ध्यान करने वाले व्यक्ति के पाप इस प्रकार भस्म हो जाते है मानो वे यज्ञ वेदी में विघमान हो.८. कुंडल – श्री कृष्ण के कर्ण सदा राधा जी के मंजुल नूपुरो कि ध्वनि और उनकी वीणा के मादक रागों का श्रवण करते है.
राधा रानी जी का बायाँ चरण
राधा रानी जी का बायाँ चरण “ग्यारह शुभ चिन्हों” से सज्जित है. जौ, चक्र, छत्र, कंकण, ऊर्ध्वरेखा, कमल, ध्वज, सुमन, पुष्पलता, अर्धचंद्र, अंकुश. पादांगुष्ठ के मूल पर “एक जौ” का दाना है उसके नीचे एक “चक्र” है, उसके नीचे एक “छत्र” है, और उसके नीचे एक “कंकण” है. एक “ऊर्ध्वरेखा” पावं के मध्य में प्रारंभ होती है, मध्यमा के नीचे एक “कमल” है, और उसके नीचे एक “ध्वज” है. ध्वज के नीचे एक “सुमन” है, और उसके नीचे “पुष्पलता” है, एड़ी पर एक चारु “अर्धचंद्र” है. कनिष्ठा के नीचे एक “अंकुश” अंकित है.
1. जौ का दाना – जौ का दाना व्यक्त करता है कि भक्तजन राधा कृष्ण के पदारविन्दो कि सेवा कर समस्त भोगो ऐश्वर्य प्राप्त करते है. एक बार उनका पदाश्रय प्राप्त कर लेने पर भक्त की अनेकानेक जन्म मरण कि यात्रा घट कर, जौ के दानो के समान बहुत छोटी हो जाती है.2. चक्र – यह चिन्ह सूचित करता है कि राधा कृष्ण के चरण कमलों का ध्यान काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, और मात्सर्य, रूपी छै शत्रुओ का नाश करता है. ये तेजस तत्व का प्रतीक है जिसके द्वारा राधा गोविंद भक्तो के अंतःकरण से पाप तिमिर को छिन्न-भिन्न कर देते है.3. छत्र – छत्र यह सिद्ध करता है कि उनके चरणों कि शरण ग्रहण करने वाले भक्त भौतिक कष्टों कि अविराम वर्षा से बचे रहते है.4. कंकण – राधा के चरण सर्वदा कृष्ण के हाथो में रहते है (जब वे मान करती है तो कृष्ण चरण दबाते है) जिस प्रकार कंकण सदा हाथ में रहता है.5. उर्ध्व रेखा – जो भक्त इस प्रकार राधा श्याम के पद कमलों से लिपटे रहते है, मानो वे उनकी जीवन रेखा हो वे दिव्य धाम को जाएँगे. 6. कमल – सरस सरसिज राधा गोविंद के चरणविंदो का ध्यान करने वाले मधुकर सद्रश भक्तो के मन में प्रेम हेतु लोभ उत्पन्न करता है.7. ध्वज – ध्वज उन भक्तो कि भय से बचाता और सुरक्षा करता है जो उनके चरण सरसिज का ध्यान करते है विजय का प्रतीक है.8. पुष्प – पुष्प दिखाता है कि राधा जी के चरणों कि दिव्य कीर्ति सर्वत्र एक सुमन सौरभ कि भांति फैलती है9. पुष्पलता – यह चिन्ह बताता है कि किस प्रकार भक्तो की इच्छा लता तब तक बढती रहती है, जब तक वह श्रीमती राधा के चरणों की शरण ग्रहण नहीं कर लेती.10. अर्धचंद्र – यह बताता है कि जिस प्रकार शिव जी जैसे देवताओं ने राधा गोविंद के चरणारविन्दों के तलवो से अपने शीश को शोभित किया है, इसी प्रकार जो भक्त इस प्रकार राधा और कृष्ण के पदाम्बुजो द्वारा अपने शीश को सुसज्जित करते है वे शिव जी के समान महान भक्त बन जाते है.11. अंकुश – अंकुश इस बात का घोतक है कि राधा गोविद के चरणों का ध्यान भक्तो के मन रूपी गज को वश में करता है उसे सही मार्ग दिखाता है.इस प्रकार राधारानी के चरण सरसिज के “उन्नीस मंगल चिन्हों” का नित्य स्मरण किया जाता है.
आइए जानते हैं कि गौलोक धाम क्या है?
जब ये पृथ्वी दानवों असुरों के भार से पीड़ित हो गई तब गौ का रूप रखकर देवताओ के पास गई ,तब ब्रह्मा जी देवताओ को और शिव जी को लेकर,विष्णु जी के पास गए .तब भगवान विष्णु जी ने कहा – भगवान श्रीकृष्ण ही अगणित ब्रह्मांडो के स्वामी है,उन्की कृपा के बिना यह कार्य कदापि सिद्ध नहीं होगा,आप लोग उनके धाम ही शीघ्र जाओतब ब्रह्मा जी ने कहा – प्रभु ! आपके अतिरिक्त कोई दूसरा भी परिपूर्णतम तत्व है यह हम नहीं जानते यदि दूसरा कोई भी परमेश्वर है तो उनके लोक का मुझे दर्शन कराइए.तब भगवान विष्णु जी ने सभी देवताओ को ब्रह्मांड शिखर पर विराजमान गौलोक धाम का मार्ग दिखलाया.वामन जी के बाये पैर के अंगूठे से ब्रह्मांड के शिरोभाग का भेदन हो जाने पर जो छिद्र हुआ वह “ब्रहद्रव्”(नित्य अक्षय नीर ) से परिपूर्ण था. सब देवता उसी मार्ग से वहाँ के लिए नियत जलयान द्वारा बाहर निकले वहाँ ब्रह्मांड के ऊपर पहुँचकर उन सबने नीचे को ओर उस ब्रह्मांड को देखा इसके अतिरिक्त अन्य भी बहुत से ब्रह्मांड उसी जल में इन्द्रायण फल के सदृश इधर उधर लहरों में लुढक रहे थे, यह देखकर सब देवताओं को विस्मय हुआ वे चकित हो गए. वहाँ से करोडो योजन ऊपर आठ नगर मिले जिनको चारो ओर दिव्य चाहरदीवारी शोभा बढ़ा रही थी वही ऊपर देवताओ ने विरजा नदी का सुन्दर तट देखा देवता उस उत्तम नगर में पहुँचे,जो अनन्तकोटि सूर्यो की ज्योति का महान पुंज जान पडता था, उसे देखकर देवताओ की आँखे चौधिया गई ओर वे उस तेज से पराभूत होकर जहाँ के तहां खड़े रह गए.
तब ब्रह्मा उस का ध्यान करने लगे. उसी ज्योति के भीतर उन्होंने एक परम शांतिमय साकार धाम देखा उसमे परम अद्भुत कमलनाल के समान धवल-वर्ण हजारों मुख वाले शेष नाग का दर्शन करके सभी देवताओ ने उन्हें प्रणाम किया उन शेषनाग की गोद में महान “आलोकमय लोकवंदित गोलोकधाम” का दर्शन हुआ जहाँ धमाभिमानी देवताओ के ईश्वर और गणनाशीलो में प्रधान काल का भी कोई वश नहीं चलता. वहाँ माया अपना प्रभाव नहीं डाल सकती, मन, चित्त, बुद्धि, अहंकार, सोलह विकार और महतत्व भी वहाँ प्रवेश नहीं कर सकते. फिर तीनो गुणों के विषय में तो कहना ही क्या. वहाँ कामदेव के समान मनोहर रूप लावण्य शालिनी श्यामसुंदर विग्रहा श्रीकृष्ण पार्षदा द्वारपाल का कार्य करती थी. देवताओ के द्वार के भीतर जाने पर उन्होंने मना किया.तब देवता बोले – हम सभी ब्रह्मा, विष्णु, शंकर, नाम के लोकपाल और इंद्र आदि देवता है. भगवान श्रीकृष्ण का दर्शन करने आये है.देवताओ की बात सुनकर उन सखियों ने जो द्वारापालिकाएँ थी अन्तः पुर जाकर सारी बात कह सुनाई तब एक सखी जो “शतचन्द्रनना” नाम से विख्यात थी. जिसके वस्त्र पीले थे, और जो हाथ में बेत की छड़ी लिए थी,उसने आने का प्रयोजन पूछा शतचन्द्रंनना ने कहा – आप सब किस ब्रह्मांड के निवासी है बताईये ?देवताओ ने कहा – बड़े आश्चर्य की बात है क्या अन्य भी ब्रह्मांड है हमने तो कभी नहीं देखा हम तो यही जानते है की एक ही ब्रह्मांड है ,दूसरा है ही नहीं.शतचन्द्रंनना बोली – यहाँ तो “विरजा नदी” में करोडो ब्रह्मांड इधर-उधर लुढक रहे है. उनमे भी आप जैसे पृथक-पृथक देवता वास करते है. क्या आप लोग अपना नाम और गाँव नहीं जानते. जान पडता है कभी घर से बाहर नहीं निकले. जैसे गुलर के फलो में रहने वाले कीड़े जिस फल में रहते है, उसके सिवा दूसरे को नहीं जानते,उसी प्रकार आप जैसे साधारण जन जिसमे उत्पन्न होते है एक मात्र उसी को ब्रह्मांड समझते है.विष्णु भगवान ने कहा- जिस ब्रह्मांड में विराट रूपधारी वामन के नख से ब्रहमांड में विवर बन गया था हम वही के निवासी है फिर शतचन्द्रं नना अंदर गई और शीघ्र ही वापस आकर भीतर आनेकी आज्ञा देकर चली गई.“जय जय श्री राधे “
Sadashiv
सदाशिव सर्व वरदाता
सदाशिव सर्व वरदाता, दिगम्बर हो तो ऐसा हो,
हरे सब दुःख भक्तों के, दयाकर हो तो ऐसा हो।
शिखर कैलाश के ऊपर, कल्पतरुओं की छाया में,
रमे नित संग गिरिजा के, रमणधर हो तो ऐसा हो।
शीश पर गंग की धारा, सुहाए भाल पर लोचन,
कला मस्तक पे चन्दा की, मनोहर हो तो ऐसा हो।
भयंकर जहर जब निकला, क्षीरसागर के मंथन से,
रखा सब कण्ठ में पीकर, कि विषधर हो तो ऐसा हो।
सिरों को काटकर अपने, किया जब होम रावण ने,
दिया सब राज दुनियाँ का, दिलावर हो तो ऐसा हो।
बनाए बीच सागर के, तीन पुर दैत्य सेना ने,
उड़ाए एक ही शर से, त्रिपुरहर हो तो ऐसा हो।
देवगण दैत्य नर सारे, जपें नित नाम शंकर जो,
वो ब्रह्मानन्द दुनियाँ में, उजागर हो तो ऐसा हो॥
Mare Mat Maiya
मारे मत मइया
मारे मत मइया, वचन भरवाय लै
वचन भरवाय लै, सौगन्ध खवाय लै।
गंगा की खवाय लै, चाहे जमुना की खवाय लै
क्षीर सागर में मइया ठाड़ो करवाय लै ॥ मारे मत मइया ——
गइया की खवाय लै, चाहे बछड़ा की खवाय लै
नन्द बाबा के आगे ठाड़ो करवाय लै ॥ मारे मत मइया ——
गोपिन की खवाय लै, चाहे ग्वालन की खवाय लै
दाऊ भइया के आगे कान पकराय लै ॥ मारे मत मइया ——
बंसी की खवाय लै, चाहे कामर की खवाय लै
मेरे अपने सिर पे हाथ धर के कहवाय लै ॥ मारे मत मइया ——